Skin and mind

Nisarg Joshi

Health

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आयुर्वेद में मन का प्रधान स्थान हृदय माना गया है, किन्तु त्वचा को मन का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब कहा गया है।

  • भय होने पर मुख पीला पड़ जाता है,
  • लज्जा आने पर मुख पर लालिमा छा जाती है,
  • आनन्द होने पर मुख पर तेज प्रकट होता है।

त्वचा से मन की अवस्था जानी जा सकती है।

नवीन अध्ययन (EurekAlert, 2025[१]) के अनुसार मानसिक विकार की आरम्भिक अवस्था में ही त्वचा पर लक्षण प्रकट हो सकते हैं – जैसे खुजली, दाद, अथवा संवेदनशीलता। ऐसे बच्चों/वयस्कों में बाद में उदासी (डिप्रेशन) और मनोविकार बढ़ने की सम्भावना देखी गई। अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि त्वचा के लक्षण मन के असन्तुलन के पूर्व संकेत हो सकते हैं।

बच्चें जब विकासशील अवस्था होते है तो उनका मन अनेक उलझनों से पसार होता है। त्वचा केवल शरीर का आवरण नहीं है, यह मानसिक स्वास्थ्य का दर्पण भी है।

माता–पिता के लिए आवश्यक है:

  1. अवलोकन –

* यदि बच्चा अचानक पसीना, लालिमा या खुजली अनुभव करे तो उसके पीछे मानसिक कारण भी हो सकता है।
* भय, चिन्ता अथवा अत्यधिक उत्साह जैसी दशाएँ त्वचा पर झलकती हैं।

  1. स्पर्श का महत्व –

* आयुर्वेद में अभ्यङ्ग (तेल से स्निग्ध मालिश) मन को शान्त करता है।
* माता–पिता का स्नेहिल स्पर्श, गले लगाना, हाथ पकड़ना – ये सब बच्चे के मन को सुरक्षित बनाते हैं।
* वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि स्नेहपूर्ण स्पर्श से तनाव हार्मोन घटते हैं और ऑक्सिटोसिन (स्नेह रस) बढ़ता है।

  • त्वचा पर ध्यान देने से माता–पिता बच्चे की भीतरी मानसिक दशा को शीघ्र समझ सकते हैं।
  • समय पर समझने से मानसिक अस्थिरता अथवा उदासी बढ़ने से पहले ही सहायता मिल सकती है।
  • स्नेहपूर्ण स्पर्श और सावधान अवलोकन बच्चे को आत्मविश्वासी, शान्त और संतुलित बनाते हैं।

[१] https://www.eurekalert.org/news-releases/1101355

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