
चंद्र = सौभाग्य , दक्षिणायन हो या उत्तरायण, प्रकृति निरंतर, ऐसे रूप में आती है की जो मनुष्यों को सौभाग्य प्रदान करने हेतु सक्षम होती है ।
सौभाग्य क्या है? क्यूँ विवाहित स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती ऐसे आशीर्वाद देते है ?
"सौभाग्यवती मे प्रथम सौभाग्य शब्दसे प्रारंभ करते है| सौभाग्य शब्दमे भाग्यको समझते है| भाग्य शब्द बना है संस्कृत धातु भज् से जिसमें हिस्से करना, बांटना, अंश करना, वितरित करना, आराधना-पूजा करना आदि भाव शामिल हैं। भज् से ही बना है भक्त। आयु के विभिन्न कालखंडों में हमारा जीवनानुभव अलग अलग होता है। उम्र के इन हिस्सों में सुख के क्षण भी हैं और दुख के भी। जीवन के यही हिस्से भाग्य है| मोटे तौर पर भाग्य का अर्थ अच्छे वक़्त या सौभाग्य से ही है पर यदि मनुष्य अपने कर्मों से अपने जीवन को अर्थात अपना समय अच्छे ढंग से व्यतीत नहीं करता है तो यही उसका दुर्भाग्य है। ये अलग बात है कि अच्छी और बुरी प्रवृत्तियोंवाले लोगों के लिए भी भाग्य और दुर्भाग्य की परिभाषाएं अलग-अलग होती हैं। एक चोर लगातार चोरी के अवसर मिलने को ही सौभाग्य समझता है।
निश्चित ही यह एक आशीर्वाद ही है जिसमे विवाहित स्त्रीके अखंड सौभाग्यकी कामना है| सदैवके लिए अच्छा समय जीवन में स्थिर हो! "
"हमममम…मात्र स्त्रीके लिए यह कामना क्यूँ?"
"विवाहित स्त्री पर ही सम्पूर्ण परिवार स्थिर है| परिवार का केंद्र है| उसकी मंगलकामनामें पुरे परिवारका कल्याण है!"
चन्द्र, मन और जीवन – कुछ बिखरे हुए विचार
साल में दिन होते हैं ३६०।
नवजात शिशु के शरीर में अस्थि-सन्धियाँ भी ३६० होती हैं।
वेद में कहा गया है –
“चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।”
चन्द्रमा मन का प्रतीक है और सूर्य नेत्र का।
जन्म लेते ही, जिस नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित होता है, उसी के अनुसार शिशु की पहली श्वास चलती है। जब तक जीवन है, चन्द्र-नाड़ी मूलाधार से समय-चक्र को चलाती रहती है।
जैसे ब्रह्माण्ड का समय-चक्र चन्द्रमा से चलता है, वैसे ही शरीर का समय-चक्र भी चन्द्रमा से संचालित होता है।
ब्रह्माण्ड और शरीर एक-दूसरे के प्रतिबिंब हैं।
बाहर का विश्व और भीतर का विश्व अलग नहीं हैं।
सोचिए ज़रा…
