
भारत में कलाकार कोई साधारण मनुष्य नहीं होता। वह परम्परा से साधक होता है और स्वभाव से भी आत्मोन्नति की दिशा में साधना में प्रवृत्त रहता है। उसका स्थान सामान्य जन से कहीं ऊँचा माना गया है।
शास्त्रों में कहा गया है —
“साहित्य-संगीत-कला-विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छ-विषाण-विहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः तद्भाग-देयं परम-पशूनाम्॥”
अर्थात — जो मनुष्य साहित्य, संगीत अथवा किसी भी कला से रहित है, वह बिना पूँछ और सींग वाला पशु ही है। वह घास भले न खाए, पर अन्न से जीवित रहता है; ऐसे मनुष्य को उच्च श्रेणी के पशुओं के समान मानना उचित है।
सनातन व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार का समान अवसर था। आज के जैसे ऊँच-नीच भेद केवल पिछले लगभग हज़ार वर्ष की दासता का परिणाम है, वह भी कुछ प्रदेशों तक सीमित। वास्तव में वृत्ति ही साधना का साधन मानी जाती थी — और प्रत्येक को उसके स्वभावानुसार अवसर मिलता था।
परन्तु हमने साहित्य को सस्ता उपन्यास बना दिया, संगीत को कोलाहल और कला को चलचित्रों की भड़कीली नकल। परिणाम यह हुआ कि समाज में neither शान्ति रही, nor मोक्ष की अभिलाषा।
सच्चाई यह है कि आज हम न ब्राह्मण हैं, न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र — हम सब म्लेच्छ-स्वभावी बन गए हैं — अस्थिर, दिशाहीन और अनिश्चित। अभियन्ता प्रबन्धन सीखने जाते हैं, प्रबन्धन-पढ़े लोग तरकारी बेचने लगते हैं, वैद्य भोजनालय चलाने लगते हैं — और हम सब मिलकर फिल्मों और खेल को कला मानकर ताली बजाते हैं!
पहले न सकल घरेलू उत्पाद था, न विकास-दर; परन्तु जीवन में शान्ति और स्थिरता थी।
आज हमारे पास विकास के आँकड़े हैं — पर आत्मिक शान्ति नहीं।
विचार कीजिए — हम आने वाली पीढ़ियों को कैसी धरोहर सौंप रहे हैं? क्या एक प्रतिशत भी उन्नति हुई है?
