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व्यवहारकुशलता is primary trait of pious character.

व्यक्तित्व के विकास में व्यवहारकुशलता का अपना एक विशिष्ट स्थान है | दुःख इस बात का है, कि आज व्यवहारकुशलता को गलत अर्थों में ले लिया गया है | आज जो चतुर, चालाक, चापलूस, चपल और चाटुकार हो, उसे व्यवहारकुशल समझा जाता है | इस गलत धारणा का निराकरण सर्वत्र होना चाहिये |

जो मन से मनन किया गया हो, वही वाणी से बोलें | और जो वाणी से कहें, उसे ही कार्यान्वित करें | आज सब कुछ उल्टा हो गया है | अब स्थिति यह है – ‘मन की बात मन ही राखे, कहे वही जो जग मन भाये |’ कितने ही वायदे कर ले जुबान से, पूरा एकहु करे न कराये’ || यह स्थिति डिप्लोमेसी तो हो सकती है, व्यवहारकुशलता नहीं | व्यवहारकुशलता का एक मूलभूत सिद्धान्त यह है, कि सबसे प्रीतिपूर्वक, (अर्थात् निष्‍कपटता के साथ), धर्मानुसार, (अर्थात् उचित अनुचित को ध्यान में रखते हुये) वरतना चाहिये | व्यवहारकुशलता का मापदण्ड इस बात में है कि जो कहा जा रहा हो, वह व्यवहारिक हो, और क्रियात्मक रूप से व्यवह्रत‌ किया जा सके | वचनबद्धता और सही चीज का सही ढंग से, सही समय पर क्रियान्वन व्यवहारकुशलता के अभिन्न अंग हैं |

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