श्राद्ध विज्ञान भाग 12 : पितर तर्पण कैसे ग्रहण करते है?

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17 – श्राद्ध विज्ञान भाग 12 : पितर तर्पण कैसे ग्रहण करते है?

**सर्वप्रथम तो प्रश्न यह होता है की मरणोपरांत आत्मा की गति कैसे हो सकती है? आत्मा तो चेतन तत्त्व है, सर्वव्यापक है तो गति किसकी?**

आत्मा शब्द के अनेक अर्थ है उसमे से चेतन तत्त्व एक अर्थ है । इसके साथ साथ, प्रत्येक प्रणाली का संचालन जो करता है उसे भी उस प्रणाली का आत्मा कहा जाता है । वह सभी मुख्य चेतन तत्त्व का प्रतिबिंब ही है ।

शास्त्र अनुसार, भिन्न भिन्न कोषीय शरीर से हमारा अस्तित्व, जिनमे वासना और कर्मों के फल अनुसार स्थूल शरीर से अन्य सूक्ष्म शरीर का विभिन्न स्तर में जो आत्मा स्वरूप वहन होता है वही आत्मा की गति की बात की गई है ।

**सूक्ष्म शरीर रूप आत्मा के कितने प्रकार है?**

जीतने शरीर उतने प्रकार ।

आत्मा + {अन्न ,प्राण,मन,विज्ञान,आनंद}

तो चेतन तत्त्व के पर्यंत जो है वह शरीर है । उतने ही आत्मा के स्वरूप है । पाँच प्रकार है । जिनमे से अन्नमय को चर्मचक्षु से देख सकते है । अन्यों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता।

शरीरात्मा → प्राणात्म → प्रज्ञानात्म → महानात्म → यज्ञात्म → अव्यक्तत्म

**इनमे से सोम स्वरूप पितर कौन है?**

महानात्म पितर रूप है ।

कारण शरीर ही पितर है ।

जीतने कर्मों के बंधन अधिक, जितनी वासना अधिक, उतना ही पार्थिव आकर्षण अधिक। यही पार्थिव आकर्षण के कारण ही तर्पण स्वीकार करने हेतु पितर आते है।

**तो क्या पितृओं का पुनर्जन्म नहीं होता?**

निश्चित पूर्णजन्म होता है ! किसी का १ वर्ष में, तो किसी का १०० वर्षों पश्चात !हमारा प्रॉब्लेम है की हम मात्र आधुनिक विज्ञान के चश्मे से अस्तित्व को देखते है ! कर्म की गति गहन है । किसका कब कहाँ जन्म होगा यह हम स्थूल अस्तित्व से नहीं जन सकते। यहाँ शास्त्र श्रद्धा पर ही निर्भर रहना होगा।

जहां तक तर्पण का संबंध है, वायु पुराण में यही कहा गया है:

मृत्यु के बाद, कर्म खाते या गुप्त चित्र के अनुसार, हमें अलग-अलग गति प्राप्त होती है। कोई देवता तो कोई पितर तो प्रेत, कभी कभी वासनाओं की प्रबलता के कारण जीव काल चक्र में फस भी जाते है !

**So how really my tarpan reaches to my ancestors?**

नाममंत्रास्तथा देशा भवान्तरगतानपि ।
प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान् ।।
देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः ।
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेऽप्युनुगच्छति ।।
मर्त्यत्वे ह्यन्नरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् ।
श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वे ऽ प्युपतिष्ठति ।।

The food is not just physical form (अन्नमय). It is after ritual performed, layer of your मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय & आनंदमय शरीर. So based on the योनी where ancestor is right now, different form reaches to them by various cycles of transformation of पिंड offered.

यथा गोष्ठे प्रणष्टां वै वत्सो विन्देत मातरम् ।
तथा तं नयते मंत्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठते ।
नाम गोत्रं च मंत्रश्च दत्तमन्नं नयन्ति तम् ।
अपि योनिशतं प्राप्तांस्तृप्तिस्ताननुगच्छति ।।

जैसे बछड़ा हजारों गायों में से अपनी मां को ढूंढ लेता है, उसी तरह उचित नाम, गोत्र, श्राद्ध और मंत्र के साथ, जो कुछ भी चढ़ाया जाता है, वह सभी अलग-अलग पूर्वजों तक पहुंच जाता है।

अंत में मात्र एक ही बात है । जो प्रत्यक्ष समझ नहीं आते ऐसे परलोक का अस्तित्व है और परलोक स्थित जीवों के कल्याण का भार भी गृहस्थों के कंधों पर है । अपने स्वधर्म से चुके नहीं ।

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अंत में एक और प्रश्न :

श्राद्ध पक्ष में कौआ ही क्यूँ?

मेरी अल्प बुद्धि अनुसार, दो बात है |

(१) कुछ एक पशु पक्षी है जिनको पंचभौतिक से पर जीवों का सज्ञान रहता है | कौआ ऐसा एक जीव है |
(२) यह तय नहीं है कि आप केवल कौवे को ही भोजन दें। कौआ आपको विरासत में मिली मानसिक सीमाओं \कमजोरियों का प्रतिनिधित्व करता है। कौए के माध्यम से, पितृ दोष को याद कर उसे दूर करने के प्रयत्न करने है |

हम न केवल भौतिक शरीर को विरासत के रूप में प्राप्त करते हैं, बल्कि शरीर के अन्य स्तर (संदर्भ: पंचकोश) को मातृ और पैतृक बीजों से प्राप्त करते हैं।
हमारे पूर्वजों के मनोमय कोष में उनकी सीमाओं या परिस्थितियों (या विभिन्न डिग्री के किसी अन्य मानसिक विकार) के कारण अस्थिर प्रकृति के निशान हो सकते हैं। कौआ आपके मनोमय शरिर का विरासत दोष है, जो मुख्य रूप से डगमगाते विक्षिप्त मन का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अलग-अलग तीव्रता के चंचलता से पीड़ित है। वात + तमस प्रकार के लोग अधिक पीड़ित होते हैं।
यह समय इस दोष का ध्यान रखने और इसे दूर करने का है।

चूंकि हम संदर्भ के बिना कुछ भी कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसलिए वर्ष के इस समय के दौरान कौवे को खिलाना महत्वपूर्ण है ताकि हमें अपने मन की चंचल प्रकृति और उस पर तत्काल नियंत्रण के बारे में याद दिलाया जा सके।

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