“भोजन करनेसे आनंद होता है” – इस वाक्यका वारंवार उच्चारण करनेसे आनंद प्राप्त नहीं होगा | दाल-रोटी खाना पडेगा |

आम्नायस्य हि क्रियार्थत्वात् |
“Entire Veda is to enjoin action.”

Actions or अनुष्ठान is necessary because we are still in this body. What you realize, is mere thought cloud, unless it is passed on to the body. Let your entire universe (body) resonate with your sadhana. Once they resonate with you, your realization’s intensity increases manifold.

Hence कर्मकांड.

Any actions fruits depend upon the state of mind with which action is performed.
स मनसा ध्यायेद्, यद् वां अहं किं च मनसा ध्यास्यामि तथैव तद् भविष्यति। तद्ध स्म तथैव भवति| गोपथ-ब्राह्मण 1.1.9
आधे-अधूरेपन से कार्य करने का भी निषेध किया है।आदमी मन से जो सोचता है, वही होता है|
Mental focus is important while performing any action.
अकर्मण्यता (तमस) -> कर्मण्यता (रजस) -> अनुष्ठान (कर्म + मन) (सत्व)
Action must be backed by मनका पूर्ण विश्वास + निश्चयात्मक बुध्धि