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pancha-kosha Img: https://advaitasite.files.wordpress.com/2015/12/pancha-kosha1.png?w=736
pancha-kosha
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Ayurveda or Allopathy, medical system exists because we don’t know /forgot skills to embrace mighty Prana to maintain body. Ever since our birth, we are just wasting Prana.

No, I am not talking about Pranayam when I say “Embracing Prana”. Pranayam is just one aspect. There are other aspects too. Like , Homa/Havan turning herbs into digestible Prana. Like, Vastu Shashtra to nurture and make local Place’s prana healthy. Like, Sandhya routine to utilize free gift of Prana from ultimate source, the Sun.

We, first need to see things beyond physical body. Then only we can understand and realize value of Prana.

There is Sukta in Atharvaveda. It is known as रोगनिवारण सूक्त. And it only talks about Vayu/Prana as panacea.

Any physical medicine – it has to go through digestive track. Trade of losing Prana for digesting it is high compare to what we receive as result of digestion process. And if fire is low(मन्दाग्नि) , we don’t receive the benefits. The easy way to embrace Prana directly from respiratory track. Controlling Prana losing Dwars (Stool/Urine/Sperm/Ovum).

Try to realize body as pachkoshiya sharir. Al layers create impacts on other layers. Being the gross most, physical layer is difficult to change. Better we focus on Pranamaya kosh and Manomay kosh.

Read it. Realize it.

[ऋषि- सप्तर्षि-गण 1-भरद्वाज 2- कश्यप 3- गोतम 4- अत्रि 5- विश्वामित्र 6- जमदग्नि 7- वसिष्ठ । देवता- विश्वेदेवा । छन्द- अनुष्टुप ।]

उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः।
उतागश्चकु्रषं देवा देवा जीवयथा पुनः।।1।।
हे देवो! हे देवो! आप नीचे गिरे हुए को फिर निश्चयपूर्वक ऊपर उठाएँ। हे देवो! हे देवो! और पाप करने वालों को भी फिर जीवित करें, जीवित करें।
द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः।
दक्षं ते अन्य आवातु व्यन्यो वातु यद्रपः।।2।।
ये दो वायु हैं। समुद्र से आने वाला पहला वायु है और दूर भूमि पर से आनेवाला दूसरा वायु है। इनमें से एक वायु तेरे पास बल ले आये और दूसरा वायु जो दोष है, उसे दूर करे।
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः।
त्वं हि विश्वभेषज देवानां दूत ईयसे।।3।।
हे वायु! ओषधि यहाँ ले आ! हे वायु! जो दोष है, वह दूर कर। हे सम्पूर्ण ओषधियों को साथ रखने वाले वायु! निःसंदेह तु देवों का दूत-जैसा होकर चलता है, जाता है, प्रवाहित है।
त्रायन्तामिमं देवास्त्रायन्तां मरूतां गणाः।
त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत्।।4।।
हे देवो! इस रोगी की रक्षा करें। हे मरूतों के समूहो! रक्षा करें। सब प्राणी रक्षा करें। जिससे यह रोगी रोग-दोषरहित हो जाये।
आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टतातिभिः।
दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते।।5।।
आप के पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिये प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।
अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः।
अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः।।6।।
मेरा यह हाथ भाग्यवान् है। मेरा यह हाथ अधिक भाग्यशाली है। मेरा यह हाथ सब ओषधियों से युक्त है और मेरा यह हाथ शुभ-स्पर्श देनेवाला है।
हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिहृा वाचः पुरोगवी।
अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि।।7।।
दस शाखा वाले दोनों हाथों के साथ वाणी को आगे प्रेरणा करने वाली मेरी जीभ है। उन नीरोग करने वाले दोनो हाथों से तुझे हम स्पर्श करते हैं।

Think about it.

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