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When in doubt, seek शास्त्र help : Shri Krishna, Gita and Chandal(चांडाल)

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When it comes to following dharma based conducts, one must seek help from scriptures. When we cannot understand the scriptures, seek help from Guru(s) who have spent entire life understanding and acting as per Sashtra.

What Shri Krishna teaches in Gita?

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5.18।।

।।5.18।।ज्ञानी महापुरुष विद्याविनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।

Here are some excerpts from the life of Shri Krishna:

When he visited Dwarka from Hastinapur, citizens were gathered to welcome him

प्रह्वाभिवादनाश्लेषकरस्पर्शस्मितेक्षणैः।
आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः ॥२२॥

The almighty Lord greeted everyone present by bowing His head, exchanging greetings, embracing, shaking hands, looking and smiling, giving assurances and awarding benedictions, even to the lowest in rank.

He did not hesitate to meet चांडाल.

This is not just about Shri Krishna, look at how society was treating Chandals. Had they been completely outcaste, this would be documented.

यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तना-
द्यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्।
श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते 
कुतः पुनस्ते भगवन् नु दर्शनात्  ॥६॥

अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् 
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् ।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या 
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते   ॥७ ॥

To say nothing of the spiritual advancement of persons who see the Supreme Person face to face, even a person born in a family of dog-eaters immediately becomes eligible to perform Vedic sacrifices if he once utters the holy name of the Supreme Personality of Godhead or chants about Him, hears about His pastimes, offers Him obeisances or even remembers Him.

Oh, how glorious are they whose tongues are chanting Your holy name! Even if born in the families of dog-eaters, such persons are worshipable. Persons who chant the holy name of Your Lordship must have executed all kinds of austerities and fire sacrifices and achieved all the good manners of the Āryans. To be chanting the holy name of Your Lordship, they must have bathed at holy places of pilgrimage, studied the Vedas and fulfilled everything required.
 In Mahabharata, there is event where Shri Krishna encounter उत्तंक मुनि which explains, what is expected from ब्राह्मण
[Following excerpts from book महाभारत कथा -चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य]

मुनि उत्तंक ने वन्दना करके श्रीकृष्ण से पूछा- “माधव! हस्तिनापुर में सब कुशल से तो हैं? पांडवों और कौरवों में स्नेह-भाव बना रहता है न?” तपस्वी उत्तंक संसार की घटनाओं से बिलकुल बेखबर थे। उन्हें इतना भी पता न था कि इन्हीं दिनों दोनों में घोर संग्राम हुआ और उसमें कौरवों का विनाश हो गया। श्रीकृष्ण को ब्राह्मण मुनि का यह प्रश्न पहेली-सा लगा। क्षण-भर के लिये उन्हें जवाब न सूझा। थोड़ी देर के बाद उन्होंने युद्ध का सारा हाल बताया और कहा- “द्विजवर, कौरवों और पांडवों में घोर युद्ध हुआ। मैंने अपनी तरफ से शांति-स्थापन की कोई चेष्टा उठा न रखी। परन्तु कौरव कुछ मानते ही न थे। सब-के-सब युद्ध में मारे गये। भावी को कौन टाल सकता है?”

यह हाल सुनकर उत्तंक को क्रोध हो आया। उनकी आंखें लाल हो उठीं और होंठ फड़कने लगे। वह बोले,” वासुदेव! तुम्हारे देखते-देखते यह घोर अन्याय हुआ? तुमने कौरवों की रक्षा क्यों नहीं की? तुम चाहते तो उनको बचा सकते थे। तुम्हारे छल-कपट के कारण ही उनका नाश हुआ होगा। तुम्हीं उनके नाश का कारण बने होगे। मैं तुम्हें अभी शाप देता हूँ।”

उत्तंक मुनि की बात सुनकर श्रीकृष्ण हंसते हुए बोले- “महर्षि शांत होइये। आप तो बड़े तपस्वी हैं। क्रोध के कारण तपस्या का फल क्यों गंवाते हैं? पहले मेरी बात पूरी तरह सुन लीजिये तब फिर चाहे जो शाप दीजिये।” इसके बाद श्रीकृष्ण ने मुनि उत्तंक को ज्ञानचक्षु प्रदान करके अपना विश्वरूप दिखलाया और कहा- “संसार की रक्षा एवं धर्म के संस्थापन के लिये ही मैं तरह-तरह के जन्म लेता रहता हूँ। जिस समय जिस योनि में जन्म लेता हूँ उस-उस अवतार के धर्म का पालन करता हूँ। देवताओं में अवतरित होते समय देवताओं का-सा व्यवहार करता हूँ। यक्ष बना तो यक्ष का-सा और राक्षस बना तो राक्षसों का-सा व्यवहार करता हूँ। इसी प्रकार मनुष्य या पशु का जन्म लेने पर मनुष्य या पशु का-सा आचरण करता हूँ। जिस समय जिस ढंग से धर्म-स्थापन का उद्देश्य पूरा हो सके उस समय उसी रीति से काम लिया करता हूँ और अपना उद्देश्य सिद्ध कर लेता हूँ। कौरव लोग विवेक खो चुके थे। राजसत्त के मद में आकर उन्होंने मेरी कोई बात नहीं सुनी। मैंने उनसे विनती की, डराया-धमकाया भी और अपना विश्वरूप भी उन्हें दिखलाया। किन्तु मेरे सारे प्रयत्न विफल हुए। अधर्म का भूत उन पर सवार था। इस कारण वे अपना हठ नहीं छोड़ते थे। युद्ध की आग में वे स्वयं ही कूदे और नष्ट हुए। अतएव द्विज-श्रेष्ठ! इस बारे में मुझ पर क्रोध करने का कोई कारण नहीं है।”

उत्तंक मुनि ने जब यह देखा-सुना तो एकदम शांत हो गये। तब भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर कहा- “मुनिवर, मैं अब आपको कुछ वरदान देना चाहता हूँ। आप जो चाहें मांग लें।” उत्तंक ने कहा, “हे अच्युत! तुम्हारा साक्षात्कार ही मेरे लिए वरदान स्वरूप है। तुम्हारे विश्वरूप के दर्शन करने का जो सौभाग्य प्राप्त हुआ है इससे मेरा जीवन सार्थक हुआ। बस, मुझे किसी और वरदान की चाह नहीं।” परन्तु भगवान ने बहुत आग्रह किया कि कोई वरदान मांगिये ही। उत्तंक मुनि मरुभूमि के आसपास घूमने-फिरने वाले निःस्पृह तपस्वी थे। अतः उन्होंने कहा- “प्रभो! यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो इतनी कृपा करो कि जब भी और जहाँ कहीं भी मुझे प्यास बुझाने के लिये जल की आवश्यकता हो, मुझे वहीं जल मिल जाया करे।”

“बस! और कुछ नहीं चाहिए?” यह कहकर श्रीकृष्ण हंस पड़े और मुनि को वरदान देकर द्वारका की ओर रवाना हो गये। बहुत दिन बाद, एक बार उत्तंक वन में फिर रहे थे तो उन्हें बड़ी प्यास लगी। बहुत ढूंढ़ने पर भी कहीं पानी नहीं मिला। तब उत्तंक ने श्रीकृष्ण का ध्यान किया और तुरन्त उनके सामने एक चाण्डाल खड़ा दिखाई दिया।
वह अर्धनग्न था और उसने फटे-पुराने चीथड़े पहन रक्खे थे। वे इतने मैले कि देखते ही घृणा उत्पन्न होती थी। चार-पांच शिकारी कुत्ते उसे घेरे हुए थे। हाथ में वह धनुष लिये था और उसके कंधे पर पानी से भरी मशक लटक रही थी। उत्तंक को देख चाण्डाल हंसता हुआ बोला- “मालूम होता है आप प्यास के मारे परेशान हैं। आपको देखकर मुझे बड़ी दया आती है। यह लीजिये पानी।” कहकर चाण्डाल ने मशक के मुंह पर बांस की टोंटी आगे बढ़ा दी।

उस चाण्डाल की गन्दी सूरत,उसकी चमड़े की मशक और उसके पास खड़े शिकारी कुत्तों को देखकर उत्तंक ने नाक-भौं सिकोड़ ली और उसका पानी लेने से इनकार कर दिया। उत्तंक को बड़ा क्रोध हुआ कि श्रीकृष्ण ने मुझे झूठा वरदान कैसे दिया? उधर चाण्डाल सामने खड़ा बार-बार मशक बढ़ाकर कह रहा था कि पानी पी लें। ज्यों-ज्यों वह आग्रह करता था त्यों-त्यों मुनि उत्तंक का क्रोध भी बढ़ता जाता था। एकाएक चाण्डाल कुत्तों समेत आंखों से ओझल हो गया। चाण्डाल के यों अचानक अन्तर्धान हो जाने पर उत्तंक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कौन था यह? निश्चय ही चाण्डाल नहीं है। यह तो मेरी परीक्षा हुई थी। अरे रे, मुझसे भारी भूल हो गई। मेरे ज्ञान ने भी समय पर मेरा साथ न दिया। यदि चाण्डाल ही था तो बिगड़ क्या गया था? मैंने उसके हाथ का पानी पीने से इनकार करके बड़ी मूर्खता की। यह सोचकर उत्तंक मुनि पश्चात्ताप करने लगे।

थोड़ी देर में शंख और सुदर्शनचक्र लिये भगवान श्रीकृष्ण उत्तंक के सामने प्रकट हुए। उत्तंक ने व्यथित होकर कहा- “पुरुषोत्तम! मेरी इस तरह परीक्षा लेना क्या तुम्हारे लिये ठीक था? मैं ब्राह्मण हूँ। प्यास लगने पर भी किसी चाण्डाल के हाथों मशक वाला गन्दा पानी कैसे पी सकता था? तुमको मेरे लिये ऐसा पानी भेजना क्या उचित था?” श्रीकृष्ण हंसकर बोले- “मुनिवर! आपने पानी की इच्छा की तो मैंने देवराज से कहा कि उत्तंक मुनि को अमृत ले जाकर पिलाओ। देवराज ने कहा कि मनुष्य को अमृत नहीं पिलाया जा सकता। कोई और वस्तु भले ही भिजवाइए। अन्त में मेरे आग्रह करने पर देवराज ने तो मान लिया, पर कहा- ‘मैं चाण्डाल के रूप में जाऊंगा और पानी के रूप में अमृत पिलाऊंगा। यदि उत्तंक ने न पिया तो नहीं पिलाऊंगा।’ मैं देवराज की बात पर राजी हो गया कि आप तो बड़े ज्ञानी और महात्मा हैं। आपके लिये तो चाण्डाल और ब्राह्मण समान होंगे और चाण्डाल के हाथ का पानी पीने में नहीं सकुचायेंगे। अब आपके इस इनकार करने से इन्द्र के हाथों मेरी पराजय ही हो गई।” इतना कहकर श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और उत्तंक बहुत ही लज्जित हुए।

Read more at: http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE_-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%83._331
साभार krishnakosh.org

If this was the case, why do some people still keep distance from certain class?
रामसुखदासजी explained it very well in his book:
ब्राह्मण और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें व्यवहारकी विषमता अनिवार्य है। इनमें समान बर्ताव शास्त्र भी नहीं कहता उचित भी नहीं और कर सकते भी नहीं।
इन पाँचों प्राणियोंका उदाहरण देकर भगवान् यह कह रहे हैं कि इनमें व्यवहारकी समता सम्भव न होनेपर भी तत्त्वतः सबमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। महापुरुषोंकी दृष्टि उस परमात्मतत्त्वपर ही सदासर्वदा रहती है। इसलिये उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती।

समताका अर्थ यह नहीं है कि समान रीतिसे सबके साथ रोटीबेटी (भोजन और विवाह) का बर्ताव करें। व्यवहारमें समता तो महान् पतन करनेवाली चीज है। समान बर्ताव यमराजका मौतका नाम है क्योंकि उसके बर्तावमें विषमता नहीं होती। चाहे महात्मा हो चाहे गृहस्थ हो चाहे साधु हो चाहे पशु हो चाहे देवता हो मौत सबकी बराबर होती है। इसलिये यमराजको समवर्ती (समान बर्ताव करनेवाला) कहा गया है (टिप्पणी प0 307)। अतः जो समान बर्ताव करते हैं वे भी यमराज हैं।पशुओंमें भी समान बर्ताव पाया जाता है। कुत्ता ब्राह्मणकी रसोईमें जाता है तो पैर धोकर नहीं जाता। ब्राह्मणकी रसोई हो अथवा हरिजनकी वह तो जैसा है वैसा ही चला जाता है क्योंकि यह उसकी समता है। पर मनुष्यके लिये यह समता नहीं है प्रत्युत महान् पशुता है। समता तो यह है कि दूसरेका दुःख कैसे मिटे दूसरेको सुख कैसे हो आराम कैसे हो ऐसी समता रखते हुए बर्तावमें पवित्रता निर्मलता रखनी चाहिये। बर्तावमें पवित्रता रखनेसे अन्तःकरण पवित्र निर्मल होता है। परन्तु बर्तावमें अपवित्रता रखनेसे खानपान आदि एक करनेसे अन्तःकरणमें अपवित्रता आती है जिससे अशान्ति बढ़ती है। केवल बाहरका बर्ताव समान रखना शास्त्र और समाजकी मर्यादाके विरुद्ध है। इससे समाजमें संघर्ष पैदा होता है।वर्णोंमें ब्राह्मण ऊँचे हैं और शूद्र नीचे हैं ऐसा शास्त्रोंका सिद्धान्त नहीं है। ब्राह्मण उपदेशके द्वारा क्षत्रिय रक्षाके द्वारा वैश्य धनसम्पत्ति आवश्यक वस्तुओँके द्वारा और शूद्र शरीरसे परिश्रम करके सभी वर्णोंकी सेवाकरे। इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे अपने कर्तव्यपालनमें परिश्रम न करें प्रत्युत अपने कर्तव्यपालनमें समान रीतिसे सभी परिश्रम करें। जिसके पास जिस प्रकारकी शक्ति विद्या वस्तु कला आदि है उसके द्वारा चारों ही वर्ण चारों वर्णोंकी सेवा करें उनके कार्योंमें सहायक बनें। परन्तु चारों वर्णोंकी सेवा करनेमें भेदभाव न रखें।आजकल वर्णाश्रमको मिटाकर पार्टीबाजी हो रही है। आज वर्णाश्रममें इतनी लड़ाई नहीं है जितनी लड़ाई पार्टीबाजीमें हो रही है यह प्रत्यक्ष बात है। पहले लोग चारों वर्णों और आश्रमोंकी मर्यादामें चलते थे और सुखशान्तिपूर्वक रहते थे। आज वर्णाश्रमकी मर्यादाको मिटाकर अनेक पार्टियाँ बनायी जा रही हैं जिससे संघर्षको बढ़ावा मिल रहा है। गाँवोंमें सब लोगोंको पानी मिलना कठिन हो रहा है। जिनके अधिकारमें कुआँ है वे कहते हैं कि तुमने उस पार्टीको वोट दिया है इसलिये तुम यहाँसे पानी नहीं भर सकते। माँ बाप और बेटा तीनों अलगअलग पार्टियोंको वोट देते हैं और घरमें लड़ते हैं। भीतरमें वैर बाँध लिया कि तुम उस पार्टीके और हम इस पार्टीके। कितना महान् अनर्थ हो रहा हैयदि समता लानी हो तो दूसरा व्यक्ति किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय मत आदिका क्यों न हो उसे सुख देना है उसका दुःख दूर करना है और उसका वास्तविक हित करना है। उनमें यह भेद हो सकता है कि आप रामराम कहते हैं हम कृष्णकृष्ण कहेंगे आप वैष्णव हैं हम शैव हैं आप मुसलमान हैं हम हिन्दू हैं इत्यादि। परन्तु इससे कोई बाधा नहीं आती है। बाधा तब आती है जब यह भाव रहता है कि वे हमारी पार्टीके नहीं हैं इसलिये उनको चाहे दुःख होता रहे पर हमें और हमारी पार्टीवालोंको सुख हो जाय। यह भाव महान् पतन करनेवाला है। इसलिये कभी किसी वर्ण आदिके मनुष्योंको कष्ट हो तो उनके हितकी चिन्ता समान रीतिसे होनी चाहिये और उन्हें सुख हो तो उससे प्रसन्नता समान रीतिसे होनी चाहिये। जैसे ब्राह्मणों और हरिजनोंमें संघर्ष हुआ। उसमें हरिजनोंकी हार और ब्राह्मणोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें प्रसन्नता हो अथवा ब्राह्मणोंकी हार और हरिजनोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें दुःख हो तो यह विषमता है जो बहुत हानिकारक है। ब्राह्मणों और हरिजनों दोनोंके प्रति ही हमारे मनमें हितकी समान भावना होनी चाहिये। किसीका भी अहित हमें सहन न हो। किसीका भी दुःख हमें समान रीतिसे खटकना चाहिये। यदि ब्राह्मण दुःखी है तो उसे सुख पहुँचायें और यदि हरिजन दुःखी है तो उसे सुख न पहुँचायें ऐसा पक्षपात नहीं होना चाहिये प्रत्युत हरिजनको सुख पहुँचानेकी विशेष चेष्टा होनी चाहिये। हरिजनोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करते हुए भी ब्राह्मणोंके दुःखकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिये। इस प्रकार किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिको लेकर पक्षपात नहीं होना चाहिये। सभीके प्रति समान रीतिसे हितका बर्ताव होना चाहिये। यदि कोई निम्नवर्ग है और उसे हम ऊँचा उठाना चाहते हों तो उस वर्गके लोगोंके भावों और आचरणोंको शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना चाहिये उनके पास वस्तुओंकी कमी हो तो उसकी पूर्ति करनी चाहिये परन्तु उन्हें उकसाकर उनके हृदयोंमें दूसरे वर्गके प्रति ईर्ष्या और द्वेषके भाव भर देना अत्यन्त ही अहितकर घातक है तथा लोकपरलोकमें पतन करनेवाला है। कारण कि ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि मनुष्यका महान् पतन करनेवाले हैं। यदि ऐसे भाव ब्राह्मणोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा और हरिजनोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा। उत्थान तो सद्भावों सद्गुणों सदाचारोंसे ही होता है।

भोजन वस्त्र मकान आदि निर्वाहकी वस्तुओंकी जिनके पास कमी है उन्हें ये वस्तुएँ विशेषतासे देनी चाहिये चाहे वे किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिके क्यों न हों। सबका जीवनयापन सुखपूर्वक होना चाहिये। सभी सुखी हों सभी नीरोग हों सभीका हित हो कभी किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न हो (टिप्पणी प0 308) ऐसा भाव रखते हुए यथायोग्य बर्ताव करना ही समता है जो सम्पूर्ण मनुष्योंके लिये हितकर है।

The way we treat each-other is more about respecting each-other’s space and not to discriminate. Smriti talks about rules and they change with time.

प्रजा-आधीन राजा,राष्ट्र-प्रेमी प्रजा

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My suggestion to all patriots is to work for strengthening of both legs together i.e. Desh and Deshi-bhakt. Let there be no gaffe in achieving this goal.

All of us seek Nation governed for the people, by the people (प्रजा-आधीन राजा,राष्ट्र-प्रेमी प्रजा).
Let us assume that we get such system, by hook or crook. System is in place. Do you think, it will go on forever? If yes, I think you are living in some lunatic plane.

Ethical conduct of citizens play vital role to nurture and preserve any ideal political system envisioned.

Ethical conduct needs to be induced in citizens. If this ethical conduct is induced out of fear of the law, it won’t last for long because of humans inherent tendency to protest again slavery.

For self-governed system to stay on for time immemorial, we also need to work hard to establish self-governed morality, rooted in love for Nation and understanding of swa-dharma. To establish self-governed morality, character-building of subjects remain unavoidable job. That is where parenting, educating, military-training will play important role.

My suggestion to all patriots is to work for strengthening of both legs together i.e. Desh and Deshi-bhakt. Let there be no gaffe in achieving this goal.

If you blabber about Praja aadhin Raja all time, let me give you example of eternal Praja aaddhin raja i.e. Raam. It took several thousand years and many generations of Raghu to change psyche of their subjects and at the culmination of all their activities, Raam Rajya (People friendly laws) was established.

So while I criticize current govt, I also consider it as my failure. My failure of not to reach out to maximum citizens.

Avatar or ideal Dhara emerges when critical mass desires it. Let us work hard for critical mass. No Kalki will emerge till then.

Some ways I follow:

1) Spread awareness based on my personal life experiments about changes we can bring in our life style and influence societal patterns. For example, if we start demanding organic food by befriending farmers, they will grow for us.

2) Do daily Homa for own mind purification.

3) Learn actionable changes from others and spread the same.

4) Bridge the modern way of living with the ancient Sanatana principles for slow and steady transformation

All medicines are not same. Some medicines solve ailment for short time. Problem resurface. So doctors always prescribe prevention mechanism along with medicines so that problem does not resurface.

मनुष्य is basic foundation of any movement(spiritual or political etc).

Only those movements will be able to do successfully मनुष्य उत्थान and अवतार मान्य परंपरा निर्माण whose मनुष्य trying to imbibe or at-least craving for below qualities(chart)!

Negation of चारित्र्य निर्माण is insult of मनुष्यत्व and without मनुष्य ,we are intentionally or un- intentionally creating ROBOT.

Is your movement creating मनुष्य or Robot? IF not, step back and try to find movements who is working on मनुष्य ..if you cant find, Be a one JUST LIKE OUR RISHI–THE UNIVERSITY of मनुष्य उत्थान WITHOUT TITLE.

NationBuilding

संस्कृत साधना : पाठ १२ (अभ्यास – तद् और एतद्)

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अभ्यास :
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तद् और एतद् के रूपों का वाक्यों में प्रयोग। दोनों सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद करिये।

तद् = दूर स्थित व्यक्ति-वस्तु
एतद् = समीपस्थ व्यक्ति-वस्तु

शब्दकोश :
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गृहम् (घर) के पर्यायवाची शब्द –

1] गृहम् (नपुसंकलिंग)
2] गेहम् (नपुसंकलिंग)
3] उदवसितम् (नपुसंकलिंग)
4] वेश्मन् (नपुसंकलिंग)
5] सद्मन् (नपुसंकलिंग)
6] निकेतनम् (नपुसंकलिंग)
7] निशान्तम् (नपुसंकलिंग)
8] पस्त्यम् (नपुसंकलिंग)
9] सदनम् (नपुसंकलिंग)
10] भवनम् (नपुसंकलिंग)
11] आगारम् (नपुसंकलिंग)
12] मन्दिरम् (नपुसंकलिंग और पुँल्लिंग भी)
13] गृहाः (पुँल्लिंग, सदैव बहुवचन में)
14] निकाय्यः (पुँल्लिंग)
15] निलयः (पुँल्लिंग)
16] आलयः (पुँल्लिंग)
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वाक्य अभ्यास :
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उस बालक का नाम अनिरुद्ध है।
= तस्य बालकस्य नाम अनिरुद्धः अस्ति।

उस बालिका का नाम राधिका है।
= तस्याः बालिकायाः नाम राधिका अस्ति।

वे दोनों इस घर में रहते हैं।
= तौ एतस्मिन् भवने निवसतः।

इस बालिका के पिता उस घर में रहते हैं।
= एतस्याः बालिकायाः पिता तस्मिन् गेहे निवसति।

इन दो बालकों को तुम ये फल देते हो।
= एताभ्यां बालकाभ्यां त्वं एतानि फलानि यच्छसि।

इन घरों में वे बालक रहते हैं।
= एतेषु सदनेषु ते बालकाः निवसन्ति।

उस घर में तुम रहते हो, इस घर में मैं रहता हूँ।
= तस्मिन् निलये त्वं वससि, एतस्मिन् निलये अहं वसामि।

यह घर इस बालिका का है।
= एतत् निकेतनम् अस्याः बालिकायाः अस्ति।

ये हमारे घर हैं।
= एते अस्माकं निलयाः सन्ति।

इनमें हम रहते हैं।
= एतेषु वयं निवसामः।

मोहन उस घर से वस्तुएँ लाकर इस घर में रखता है,
= मोहनः तस्मात् गृहात् वस्तूनि नीत्वा एतस्मिन् गृहे स्थापयति,

और इस घर से वस्तुएँ लेकर उस घर में रखता है।
= तथा च एतस्मात् गृहात् वस्तूनि आदाय तस्मिन् गृहे स्थापयति।

मैं इस घर से विद्यालय जाता हूँ, वह उस घर से विद्यालय जाता है।
= अहम् एतस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छामि , सः तस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छति।

इन दो घरों का स्वामी कौन है ?
= एतयोः भवनयोः स्वामी कः अस्ति ?

इस घर से क्या तू राजा हो जाएगा ?
= एतेन गृहेण किं त्वं राजा भविष्यसि वा ?

** इसी प्रकार आप भी तद् और एतद् सर्वनामों के प्रयोग से कम से कम पाँच वाक्य संस्कृत में बनाइये।
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श्लोक :

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनम् आत्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥
एतैः विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैः त्रिभिः नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयः ततः याति परां गतिम्॥
( श्रीमद्भगवद्गीता १६.२१-२२ )

पुस्तक में अर्थ देखें और सर्वनाम शब्दों को ढूँढकर अपनी कॉपी में लिखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

दैनिक सुभाषित पञ्चाङ्ग (पौष/माघ कृष्ण पक्ष : द्वादशी-लोहड़ी)

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शक सम्वत:
१९३९ हेमलम्बी
चन्द्रमास:
पौष – अमांत
विक्रम सम्वत:
२०७४ साधारण
माघ – पूर्णिमांत
गुजराती सम्वत:
२०७४
पक्ष:
कृष्ण पक्ष
तिथि:
द्वादशी – २३:५२ तक
 शिशिर ऋतु
 शनिवार

शनिवार – द्वादशी – लोहड़ी

Who is Hanuman?

पवनपुत्र हनुमान
पवन शब्द का अर्थ है पवित्र करने वाला। यथा पुनाति इति पवनः।
वायोरग्निः (तै.उ. २-१-१)
पवनपुत्र अग्नि.
हनुमान – अग्नि personified.

Daily Sandhya + Sun Exposure + Ventilated home and workplace + Everyday Homa : Essential for physical and mental purification! 

 

Making of Zombies : Why media spreads objectification of woman?

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Objectification

He or she is not human who lacks empathy and community sentiments. Living life of each other is the Vedic principle. We see life as universal sacrifice, helping others. Our motto is “इदं न मम” (This is not mine. This life, this action. Nothing is mine! Nothing is for me! My life is for the world! Rest of the universe!)

This way of life, backed and relied upon Vedic dharmic principles is dangerous for power centers of the world. When world runs like this, they cannot rule the world forever!

So, what is the weapon?

  1. Modern media as mediums
  2. To spread the objectification of gender

Result?

  • Making of zombie who lives life for extremely narrow-minded self-interest and lacks empathy towards the rest.

One one hand, media sells sex to young girls, making them obsessed of self, body and external appearance. Spreading a meme that, it is perfectly ok to be object in front of rest.

On the other hand, media sell extreme objectification of females. This turns most media content recipients into zombies who lack empathy! The collective feeling! For them, opposite gender is mere object to be consumed!

Please read old note on same topic:

Hyper-sexual Media and Child Development

New research shows that in hyper sexulized world, we are being hardwired to lose empathy networks in brain!


Research


Reduced empathic responses for sexually objectified women: An fMRI investigation

Sexual objectification is a widespread phenomenon characterized by a focus on the individual’s physical appearance over his/her mental state. This has been associated with negative social consequences, as objectified individuals are judged to be less human, competent, and moral. Moreover, behavioral responses toward the person change as a function of the degree of the perceived sexual objectification. In the present study, we investigated how behavioral and neural representations of other social pain are modulated by the degree of sexual objectification of the target. Using a within-subject fMRI design, we found reduced empathic feelings for positive (but not negative) emotions toward sexually objectified women as compared to non-objectified (personalized) women when witnessing their participation to a ball-tossing game. At the brain level, empathy for social exclusion of personalized women recruited areas coding the affective component of pain (i.e., anterior insula and cingulate cortex), the somatosensory components of pain (i.e., posterior insula and secondary somatosensory cortex) together with the mentalizing network (i.e., middle frontal cortex) to a greater extent than for the sexually objectified women. This diminished empathy is discussed in light of the gender-based violence that is afflicting the modern society.

http://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0010945217304045?via%3Dihub


Stop acting like a consumption machines. Teach this bloody Ad industry tight slap lesson. Boycott their medium for 5 years. You, you family, your friends – complete boycott of all TV channels showing Ads with objectification of Mahila.

Can you do it in National interest? I hear lot of noise like ‘Nation First’. Here is simple step to contribute your efforts without hampering daily life routine.

 

 

दैनिक सुभाषित पञ्चाङ्ग (पौष/माघ कृष्ण पक्ष : षटतिला एकादशी)

subhashita_12-1-18

शक सम्वत:
१९३९ हेमलम्बी
चन्द्रमास:
पौष – अमांत
विक्रम सम्वत:
२०७४ साधारण
माघ – पूर्णिमांत
गुजराती सम्वत:
२०७४
पक्ष:
कृष्ण पक्ष
तिथि:
एकादशी – २१:२२ तक
 शिशिर ऋतु
 शुक्रवार

There is only one sublime goal for being victorious – sustaining dharma! We must win to participate in process of sustaining dharma!

To win the battle on physical plane, it is important to be winner and hero for own universe i.e. mind-body complex. जितेन्द्रिय.

One of the primary weapon to become जितेन्द्रिय is व्रत & उपवास. एकादशी being King!

Today: षटतिला एकादशी

शिशिर ऋतु, माघ मास

तिल-गुड़ से बने पदार्थ स्वास्थ्यकर होते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार पौष और माघ मास में तिल और गुड़ का दान पुण्यकारक तथा सेवन हितकर होता है।

This is the time to embrace तिल in daily routine to sustain life against शीतकाल of शिशिर. Sesame oil for massage, bath, homa and daana. Ekadashi is called षटतिला as it advices 6 activities related to usage of sesame (तिल) in routine. 

  1. Massage
  2. Bath
  3. Drink
  4. Food
  5. Homa
  6. Charity(दान)

Even those who cannot afford, should have luxury of first five activities! दान plays critical role here!

 

 

संस्कृत साधना : पाठ ११ (अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ))

Sanskrut_11

नमः संस्कृताय !
आज आपको अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ) सर्वनामों के रूप बताएँगे और इनका वाक्यों में अभ्यास भी करवायेंगे। आज से आपको अमरकोष या आधुनिक शब्दकोशों से प्रतिदिन कुछ शब्द बताया करेंगे जिससे आपका शब्दभण्डार बढ़े। क्योंकि किसी भी भाषा को सीखने के लिए दो वस्तुएँ अनिवार्य हैं- व्याकरण और शब्दकोश। कहा जाता है न कि “अवैयाकरणस्त्वन्धः बधिरः कोशवर्जितः” अर्थात् व्याकरण न जानने वाला अन्धा है , वह साधु असाधु शब्दों में भेद नहीं कर सकता और शब्दकोश के बिना बधिर, न वह अपने विचार अच्छी प्रकार व्यक्त कर सकता है और न ही दूसरों के विचार समझ सकता है। इसलिए अपना शब्दभण्डार बढ़ाते रहिये। संस्कृतभाषा में संसार के सबसे अधिक शब्द हैं। इसे ‘शब्दसन्दोहप्रसविनी’ अर्थात् ‘शब्दों के समूहों को उत्पन्न करने वाली’ कहा जाता है।

१ ) अस्मद् और युष्मद् के रूप तीनों लिंगों में एक जैसे होते हैं ।

अस्मद्

अहम् आवाम् वयम्
माम्/मा आवाम्/नौ अस्मान्/नः
मया आवाभ्याम् अस्माभिः
मह्यम्/मे आवाभ्याम्/नौ अस्मभ्यम्/नः
मत् आवाभ्याम् अस्मत्
मम/मे आवयोः/नौ अस्माकम्/नः
मयि आवयोः अस्मासु

युष्मद्

त्वम् युवाम् यूयम्
त्वाम्/त्वा युवाम्/वाम् युष्मान्/वः
त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः
तुभ्यम्/ते युवाभ्याम्/वाम् युष्मभ्यम्/वः
त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्
तव/ते युवयोः/वाम् युष्माकम्/वः
त्वयि युवयोः युष्मासु
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शब्दकोश :
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मिठाइयाँ, खाद्य /मिष्टान्नानि, खाद्याः

1) रसगुल्ला – रसगोलः
2) लड्डू – मोदकम्
3) जलेबी – कुण्डलिका,
4) खीर – पायसम्
5) बर्फी – हैमी
6) रबड़ी – कूर्चिका
7) श्रीखंड – श्रीखण्डम्

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वाक्य अभ्यास :
===========

तुम दोनों मुझे खीर देते हो।
= युवां मह्यं पायसं यच्छथः। ( यच्छ् – देना )

हम दोनों तुम सबको सेवइयाँ देते हैं।
= आवां युष्मभ्यं सूत्रिकाः यच्छावः।

क्या तुझमें बुद्धि नहीं है ?
= किं त्वयि बुद्धिः नास्ति ?

मुझमें बुद्धि है, तुम क्यों कुपित होते हो ?
= मयि बुद्धिः अस्ति, त्वं कथं कुपितः भवसि ?

तुम ये मिठाईयाँ अकेले ही खाते हो ?
= त्वम् इमानि मिष्टान्नानि एकाकी एव खादसि ?

हाँ, क्यों ?
= आम्, कथमिव ?

क्या तुम शास्त्र का यह वाक्य नहीं मानते ?
= किं त्वं शास्त्रस्य इदं वाक्यं न मन्यसे ?

कि- “स्वादिष्ट चीज अकेले नहीं खानी चाहिए”- ऐसा।
= यत् – “एकः स्वादु न भुञ्जीत” इति।

ओह ! अब समझा !
= अहो ! इदानीम् अवगतम् !

ये रसगुल्ले हम दोनों के हैं।
= इमे रसगोलाः आवयोः सन्ति।

किन्तु ये लड्डू हमारे नहीं हैं।
= किन्तु इमानि मोदकानि आवयोः न सन्ति।

ये मीठी जलेबियाँ तुम्हारी ही हैं।
= इमाः मधुराः कुण्डलिकाः तव एव सन्ति।

मैं तो इन्हें तुम्हें भी देता हूँ।
= अहं तु इमाः तुभ्यम् अपि ददामि।

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श्लोक :

दैवी ह्येषा गुणमयी
मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ते
मायाम् एतां तरन्ति ते॥

( श्रीमद्भगवद्गीता 7.14 )

॥शिवोऽवतु॥

Microbes and Cruciferous Vegetables : Cancer Cure

0

It confirms once more that:

  1. the inflamed organs end into cancer
  2. Prana heals (Here, in form of microbes that releases chemical to stop the cancer proliferation signals

Cruciferos-Vegetable


Research


With these special bacteria, a broccoli a day can keep the cancer doctor away

Colorectal cancer is one of the most common cancers in the world, especially the developed world. Although the 5-year survival rates for earlier stages of this cancer are relatively good, at later stages survival goes down and the risk of cancer recurrence goes up considerably.

At the heart of this cancer-targeting system is an engineered form of E. coli Nissle, a harmless type of bacteria found in the gut. Using genetic techniques, the team engineered the bacteria into a probiotic that attached to the surface of colorectal cancer cells and secreted an enzyme to convert a substance found in cruciferous vegetables (like broccoli) into a potent anticancer agent. The idea was for the cancer cells in the vicinity to take up this anticancer agent and be killed. Normal cells cannot do this conversion, nor are they affected by the toxin, thus the system should be targeted only to colorectal cancer cells.

True enough, the mixture of engineered probiotics with a broccoli extract or water containing the dietary substance killed more than 95% of colorectal cancer cells in a dish. Moreover, the mixture had no effect on cells from other types of cancer such as breast and stomach cancer. Strikingly, the probiotics-veggie combination reduced tumour numbers by 75% in mice with colorectal cancer. Also, the tumours that were detected in these mice were 3 times smaller than those in control mice which were not fed with the mixture.

https://www.nature.com/articles/s41551-017-0181-y

Dietary Sulforaphane in Cancer Chemoprevention: The Role of Epigenetic Regulation and HDAC Inhibition

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4432495/

Significance: Sulforaphane, produced by the hydrolytic conversion of glucoraphanin after ingestion of cruciferous vegetables, particularly broccoli and broccoli sprouts, has been extensively studied due to its apparent health-promoting properties in disease and limited toxicity in normal tissue. Recent Studies: Recent identification of a sub-population of tumor cells with stem cell-like self-renewal capacity that may be responsible for relapse, metastasis, and resistance, as a potential target of the dietary compound, may be an important aspect of sulforaphane chemoprevention. Evidence also suggests that sulforaphane may target the epigenetic alterations observed in specific cancers, reversing aberrant changes in gene transcription through mechanisms of histone deacetylase inhibition, global demethylation, and microRNA modulation. Critical Issues: In this review, we discuss the biochemical and biological properties of sulforaphane with a particular emphasis on the anticancer properties of the dietary compound. Sulforaphane possesses the capacity to intervene in multistage carcinogenesis through the modulation and/or regulation of important cellular mechanisms. The inhibition of phase I enzymes that are responsible for the activation of pro-carcinogens, and the induction of phase II enzymes that are critical in mutagen elimination are well-characterized chemopreventive properties. Furthermore, sulforaphane mediates a number of anticancer pathways, including the activation of apoptosis, induction of cell cycle arrest, and inhibition of NFκB. Future Directions: Further characterization of the chemopreventive properties of sulforaphane and its capacity to be selectively toxic to malignant cells are warranted to potentially establish the clinical utility of the dietary compound as an anti-cancer compound alone, and in combination with clinically relevant therapeutic and management strategies. Antioxid. Redox Signal. 22, 1382–1424.

संस्कृत साधना : पाठ १० (सर्वनाम विशेषण-२)

Sanskrut_10

नमः संस्कृताय !!
कल आपने ‘सर्वनाम विशेषण’ के विषय में जाना और तद् , एतद्, यद् और किम् के रूप भी जान लिये। मुझे आभास हो रहा है कि सर्वनाम वाला प्रसंग आपको थोड़ा सा कठिन लग रहा है। किन्तु घबराइये बिल्कुल नहीं। धैर्य रखिए। धैर्य बहुत महान् गुण है। धैर्य, ध्यान और अभ्यास ये तीन आपके मित्र हैं। इन सर्वनाम शब्दों के रूप आपको याद नहीं हुए हैं तो कोई बात नहीं। वाक्यों द्वारा जब आपको अभ्यास करायेंगे तो ये सारे शब्द आपकी जिह्वा पर स्थिर हो जाएँगे। इन्हें याद करने का सबसे सरल उपाय है इनका बारम्बार अभ्यास। अथवा आप इन्हें दिन भर में किन्हीं पाँच व्यक्तियों को सुना दें। इससे आपका अभ्यास भी हो जाएगा और संस्कृत का प्रचार भी।

१) आज आपको इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप बताते हैं।
इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

२) अब आपको एक श्लोक बता देते हैं जिससे आपको यह बात पक्की हो जाएगी कि इदम् , एतद् , अदस् और तद् का प्रयोग कब और कहाँ करना चाहिए।

“इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥”

(इदम् अस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति च एतदः रूपम्।
अदसः तु विप्रकृष्टे तद् इति परोक्षे विजानीयात् ॥)

अर्थात् –
१] इदम् = समीपस्थ वस्तु के लिए
२] एतद् = अत्यन्त समीपस्थ वस्तु के लिए
३] अदस् = दूरस्थ वस्तु के लिए
४] तद् = परोक्ष अर्थात् जो आपको दिखाई न दे ऐसी वस्तु के लिए।

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

* ध्यानपूर्वक देखिए , आप पाएँगे कि स्त्रीलिंग के द्विवचन के सभी रूप पुँल्लिंग की भाँति ही हैं। एकवचन और बहुवचन में भी थोड़ा सा ही अन्तर है।

अब कल आपको युष्मद् ( तुम ) और अस्मद्( मैं ) के रूप बताकर कुछ दिनों तक केवल अभ्यास करवायेंगे अन्यथा यह सब सिर के ऊपर से चला जाएगा। बुद्धि में कुछ भी न टिकेगा। उपर्युक्त सर्वनामों के कुछ वैकल्पिक रूप भी होते हैं। इन वैकल्पिक रूपों को अभ्यास कराते समय बताएँगे।
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श्लोक : अयम् = यह (इदम् का पुँल्लिंग एकवचन)

अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम्
अक्लेद्यः अशोष्यः एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुः
अचलः अयं सनातनः ॥
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम्
अविकार्यः अयम् उच्यते।
तस्मात् एवं विदित्वा एनम्*
न अनुशोचितुम् अर्हसि॥

*एनम् = इसको (इमम् का वैकल्पिक रूप)
(श्रीमद्भगवद्गीता २।२४-२५॥)

इस प्रकार के और भी श्लोक आप ढूँढकर लिख सकते हैं जिनमें उपर्युक्त सर्वनामों का प्रयोग किया गया हो।

॥शिवोऽवतु॥

दैनिक सुभाषित पञ्चाङ्ग (पौष/माघ कृष्ण पक्ष : दशमी )

subhashita_11-1-18

शक सम्वत:
१९३९ हेमलम्बी
चन्द्रमास:
पौष – अमांत
विक्रम सम्वत:
२०७४ साधारण
माघ – पूर्णिमांत
गुजराती सम्वत:
२०७४
पक्ष:
कृष्ण पक्ष
तिथि:
दशमी – १९:१० तक
 शिशिर ऋतु
 गुरूवार

हर्षशोकान्वितः – राजसिक or तामसिक स्वभाव.

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।18.27।।

Passionate, desiring to obtain the reward of actions, greedy, cruel, impure, moved by joy and sorrow, such an agent is said to be Rajasic (passionate).

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।18.35।।

That, by which a stupid man does not abandon sleep, fear, grief, despair and also conceit that firmness, O Arjuna, is Tamasic.

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