दैनिक सुभाषित पञ्चाङ्ग (पौष/माघ कृष्ण पक्ष : अमावस्या)


Planting trees is very sacred activity. Don’t do it zombie way, for clicking selfie! Today, it is उत्तराषाढा नक्षत्र. FIXED constellation and is favourable for planting tree!


शक सम्वत:
१९३९ हेमलम्बी
पौष – अमांत
विक्रम सम्वत:
२०७४ साधारण
माघ – पूर्णिमांत
गुजराती सम्वत:
कृष्ण पक्ष
अमावस्या – ०७:४७ तक
 शिशिर ऋतू

Read old notes on tree plantation.

Plant wisely, plant native : Don’t go chasing Guinness world records

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४० (पुराण विशेष) :: वृक्ष प्रतिष्ठा

Why Holy Bath or गंगा स्नान(Ganga Snan)?


Why Ganga Snan?

Hindus have always believed that water from India’s Ganges River has extraordinary powers. The Mogul emperor Akbar called it the “water of immortality” and always traveled with a supply. The British East India Co. used only Ganges water on its ships during the three-month journey back to England, because it stayed “sweet and fresh.”
Indians have always claimed it prevents diseases, but are the claims wives’ tales or do they have scientific substance?

In the fourth installment of a six-part series, independent producer Julian Crandall Hollick searched for the “mysterious X factor” that gives Ganges water its mythical reputation.

He starts his investigation looking for the water’s special properties at the river’s source in the Himalayas. There, wild plants, radioactive rocks, and unusually cold, fast-running water combine to form the river. But since 1854, almost all of the Ganges’ water has been siphoned off for irrigation as it leaves the Himalayas.

Hollick speaks with DS Bhargava, a retired professor of hydrology, who has spent a lifetime performing experiments up and down Ganges in the plains of India. In most rivers, Bhargava says, organic material usually exhausts a river’s available oxygen and starts putrefying. But in the Ganges, an unknown substance, or “X factor” that Indians refer to as a “disinfectant,” acts on organic materials and bacteria and kills them. Bhargava says that the Ganges’ self-purifying quality leads to oxygen levels 25 times higher than any other river in the world.

Hollick’s search for a scientific explanation for the X factor leads him to a spiritual leader at an ashram and a biologist in Kanpur. But his best answer for the Ganges’ mysterious substance comes from Jay Ramachandran, a molecular biologist and entrepreneur in Bangalore.

In a short science lesson, Ramachandran explains why the Ganges doesn’t spread disease among the millions of Indians who bathe in it. But he can’t explain why the river alone has this extraordinary ability to retain oxygen.

Polluted Ganga still has medicinal qualities

He said during the research it was found that E.coli could survivie for only three days in a three-day old sample of Ganga water. The bacteria survivied for seven days in the Ganga water sample collected eight years back while it lasted for 15 days in a 16-year old sample of the Ganga water.

The E.coli however survived for longer time in boiled water, he said. A study of factors affecting the survival of E. coli in Ganga water is of great interest due to its importance as an indicator of fecal pollution in natural waters. It is ancient knowledge that Ganges water does not putrefy, even after long periods of storage, thus water from the Ganges has for millennia been regarded as incorruptible, Dr Nautiyal said.

Dr Nautiyal says this quality of the Ganga water could be used to develop a new anti-biotic which could be more useful in fighting bacterial infections. “There is however need for more research in this regard”, he said.

दैनिक सुभाषित पञ्चाङ्ग (पौष/माघ कृष्ण पक्ष : मौनी अमावस्या)


शक सम्वत:
१९३९ हेमलम्बी
पौष – अमांत
विक्रम सम्वत:
२०७४ साधारण
माघ – पूर्णिमांत
गुजराती सम्वत:
कृष्ण पक्ष
अमावस्या – पूर्ण रात्रि तक
 शिशिर ऋतू
 मंगल वार

मौनी अमावस्या

Mauni Amavasya is the last Amavasya before Mahashivratri. It is day to give rest to mind. मौन does not only mean, not to speak anything but to calm down mind and remain in silence.

Rituals during Mauni Amavasya:


  • The devotees get up early on the day of Mauni Amavasya to take holy dip in the Ganges at sunrise. If a person cannot visit any pilgrimage destination on this day, he/she must add little Ganga ‘jal’ to the bathing water. It is widespread belief that while taking bath, one must remain quiet. On this day devotees also worship Lord Brahma and recite the ‘Gayatri mantra’.
  • After finishing the bathing ritual, devotees then sit down for meditation. Meditation is a practice that helps to concentrate and attain inner peace. On the day of Mauni Amavasya any wrong actions must be avoided.
  • Some of the devotees observe complete ‘mauna’ or silence on the day of Mauni Amavasya. They abstain from speaking all day long and only meditate to attain the state of oneness with self. This practice is known as ‘Mauna Vrat’. If a person cannot keep, mauna vrat, for the complete day, he/she must maintain silence until finishing the puja rituals.
  • On the day of Mauni Amavasya, thousand of Hindu devotees along with the ‘kalpavasis’ take a holy dip in ‘Sangam’ at Prayag and spend the rest of the day in meditation.
  • In the Hindu religion, the day of Mauni Amavasya is also appropriate for relieving pirtu dosh. People offer ‘tarpan’ to their ‘pitrs’ or ancestors to seek forgiveness and attain their blessings. On this day people offer food to dog, crow, cow and kusht rogi.
  • Offering charity is another important ritual for the day. ‘Magha’ is an important month in the Hindu calendar. On this day people donate food, clothes and other essentials to the poor and needy people. There is also a ritual of offering sesame (til) oil to Shani Dev.

संस्कृत साधना : पाठ १५ (तिङन्त-प्रकरण)


नमः संस्कृताय !!
पिछले पाठों में आपने सर्वनाम के विषय में जाना। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सर्वनामों के रूपों का अभ्यास भी आपने किया। मुझे विश्वास है कि आप इस विषय को भलीभाँति समझ गये हैं। जिन सर्वनामों के रूप आपको बताये गये हैं उनका प्रयोग स्थान स्थान पर होता ही रहेगा। अब हम बहुत महत्त्वपूर्ण विषय में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ‘तिङन्त-प्रकरण’ की चर्चा करेंगे। संस्कृतभाषा में यदि आप तिङन्त, कारक और शब्दरूप- ये तीन बातें भली प्रकार जान गये तो समझिए कि संस्कृत के विशाल प्रासाद में प्रवेश कर गए। तब आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।

१) पिछले पाठों में हमने आपको धातुओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। आपने विस्मृत तो नहीं कर दिया ? चलिये पुनः बता देते हैं । क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द ‘धातु’ कहे जाते हैं, जैसे- भू , अस् , पठ् , पा इत्यादि। अब इन मूल शब्दों अर्थात् धातुओं से- भवति, अस्ति, पठति, पिबति इत्यादि रूप कैसे बन जाते हैं- यह बात आपके मस्तिष्क में कभी न कभी आयी ही होगी ! है कि नहीं ? तो इसका उत्तर है- ‘लकार’ । अब यह ‘लकार’ क्या है, यह बताते हैं-

२) लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में ‘ङ्’ है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

३) इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे। इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, आप एक श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे
भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ
लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥

अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।

आने वाले पाठों में हम प्रत्येक लकार के प्रयोगों के नियमों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही आपको आत्मनेपद – परस्मैपद, धातुओं के दस गणों, सेट् और अनिट् धातुओं के विषय में भी समझायेंगे। इस प्रकरण में आपको विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह तिङन्त-प्रकरण ही संस्कृत का प्राण है।

शब्दकोश :
‘स्त्री’ के पर्यायवाची शब्द-

१ योषित् २ अबला
३ योषा ४ नारी
५ सीमन्तिनी ६ वधूः
७ प्रतीपदर्शिनी ८ वामा
९ वनिता १० महिला
११ प्रिया १२ रामा
१३ जनिः १४ जनी
१५ योषिता १६ जोषित्
१७ जोषा १८ जोविता
१९ वनिका २० महेलिका
२१ महेला २२ शर्व्वरी
२३ सिन्दूरतिलका २४ सुभ्रूः (सुन्दर भौंह वाली)
२५ सुनयना २६ वामदृक्
२७ अङ्गना २८ ललना
२९ कान्ता ३० पुरन्ध्री
३१ वरवर्णिनी ३२ सुतनुः
३३ तन्वी ३४ तनुः
३५ कामिनी ३६ तन्वङ्गी
३७ रमणी ३८ कुरङ्गनयना
३९ भीरुः ४० भाविनी
४१ विलासिनी ४२ नितम्बिनी
४३ मत्तकासिनी ४४ सुनेत्रा
४५ प्रमदा ४६ सुन्दरी
४७ अञ्चितभ्रूः ४८ ललिता
४९ वासिता ५० भामिनी
५१ वरारोहा ५२ नताङ्गी
५३ त्रिनता ५४ वरा
५५ श्यामा ५६ चारुवदना

* सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द जैसे – भीरुः, सुभ्रूः आदि शब्द विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।

वाक्य अभ्यास :

यह स्त्री बुद्धिमती है।
= एषा नारी बुद्धिमती अस्ति।

वे दो नारियाँ शिक्षका हैं।
= ते वनिते शिक्षिके स्तः।

वे नारियाँ मधुर गीत गाती हैं।
= ताः प्रमदाः मधुरं गीतं गायन्ति।

उस स्त्री से यह सुन्दर भौहों वाली स्त्री पूछती है..
= तां महिलाम् एषा सुभ्रूः पृच्छति…

कि वे स्त्रियाँ किस गीत को गाती हैं ?
= यत् ताः प्रमदाः कं गीतं गायन्ति ?

ये दो स्त्रियाँ उन दो स्त्रियों को फल देती हैं।
= एते प्रमदे ताभ्यां ललनाभ्यां फलानि यच्छतः।

एक स्त्री रोटी पकाती है और एक दाल पकाती है।
= एका जोषा रोटिकाः पचति एका च सूपं पचति।

दो स्त्रियाँ इन स्त्रियों से भोजन पकवाती हैं।
= द्वे अङ्गने एताभिः वनिताभिः भोजनं पाचयतः।

सभी स्त्रियाँ परस्पर बातें करती हैं।
= सर्वाः जोषिताः परस्परं वार्तालापं कुर्वन्ति।


श्लोक :

यः प्रीणाति सुचरितैः पितरं स पुत्रः
यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रम् आपदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

जो अपने सुन्दर आचरणों से पिता को प्रसन्न करे वह पुत्र, जो पति के ही हित को चाहे वह पत्नी, जो सम्पत्ति और विपत्ति में समान व्यवहार करे वह मित्र, इन तीनों को संसार में बहुत पुण्य करने वाला व्यक्ति (ही) प्राप्त करता है।

॥ शिवोऽवतु ॥

Jallikattu : Making of Warriors, 300 style




If you share this video ( or this video ( with Indian parents of this age, 99.999999 % will reply it as disgusting harassment and extreme torture of innocent kids and will never engage their kid in such warrior making process.

But in reality, that is how the warriors were made in Sparta. Or here, in Gokul or Dwarka or Ayodhya.

Bulls are like kids for farmers. And bulls also realize it over the period of their lifetime. And only farmers can realize it as they are their life partners and sevak(s). What we see as torture, is not really the torture when you compare it with bulls sent to slaughter-house for their non-utility in milk-centric breeding of cows by artificial insemination.

But as I said, what you & me see as ritual-impurity in some modern forms of Jallikattu, must be corrected. Ban is not the solution. Ban will increase the slaughter. Ban will decimate the mighty breeds. While we worry about Bull’s rights, we actually impose societal adharma based karma. Suicidal in the long run.

Farmer’s Dharma, like all other forms of dharma, is very complex phenomenon. And difficult to understand until we put ourselves in farmer’s shoes.

If you would have shown me Jallikattu videos in 2005, I would have reacted in the same way as many of us in urban set up do. Even I would have supported the controversial ban. But things have changed lately for me as I myself experienced being farmer.

Enoughness : Restoring balance to economy


How we see the world determines how we act. Western thought sees us at war with each other over resources. In Indigenous philosophy, we are all related as individuals in balance with nature. Enoughness juxtaposes these two world views and delivers some startling facts.

It is pointed out that “Indigenous peoples territory spans 24% of the earths land surface but is home to 80% of it’s total biodiversity. This is not a coincidence.” Well illustrated throughout, this short film is a powerful testament to living in harmony rather than in competition with each other and the earth.

दैनिक सुभाषित पञ्चाङ्ग (पौष/माघ कृष्ण पक्ष : चतुर्दशी-मासिक शिवरात्रि)


शक सम्वत:
१९३९ हेमलम्बी
पौष – अमांत
विक्रम सम्वत:
२०७४ साधारण
माघ – पूर्णिमांत
गुजराती सम्वत:
कृष्ण पक्ष

One of the wealth I aspire to achieve in this life is, rock solid, forever friendship with 10 friends. Friendship is everything. सखत्व is over and above all relations.

संस्कृत साधना : पाठ १४ (अभ्यास)


अभ्यास :

इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए ।

इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

शब्दकोश :

‘पक्षी’ के पर्यायवाची शब्द –

1] खगः 2] विहङ्गः 3] विहगः
4] विहङ्गमः 5] विहायस् 6] शकुन्तिः
7] पक्षिन् 8] शकुनिः 9] शकुन्तः
10] शकुनः 11] द्विजः 12] पतत्रिन्
13] पत्रिन् 14] पतङ्गः 15] पतत्
16] पत्ररथः 17] अण्डजः 18] नगौकस्
19] वाजिन् 20] विकिरः 21] विः
22] विष्किरः 23] पतत्रिः 24] नीडोद्भवः
25] गरुत्मत् 26] पित्सित् 27] नभसङ्गमः

* ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।

वाक्य अभ्यास :

वे पक्षी तीव्र वेग से उड़ते हैं।
= अमी खगाः तीव्रवेगेन उड्डयन्ति।

ये पक्षी खेत में बैठे हैं।
= इमे विहङ्गाः क्षेत्रे आसीनाः सन्ति।

इन पक्षियों को दाना देता हूँ।
= एभ्यः विहगेभ्यः अन्नकणान् ददामि।

इस खेत से पक्षी चले गए हैं।
= अस्मात् क्षेत्रात् पत्ररथाः गताः सन्ति।

इस वाटिका में पक्षी कूजते हैं।
= अस्यां वाटिकायां शकुन्ताः कूजन्ति।

इस वृक्ष पर बहुत पक्षी रहते हैं।
= अस्मिन् वृक्षे बहवः अण्डजाः वसन्ति।

उस बरगद पर बहुत से पक्षी रहते हैं।
= अमुष्मिन् न्यग्रोधे बहवः विष्किराः वसन्ति।

ये पक्षी उन पीपल के वृक्षों पर रहते हैं।
= इमे अण्डजाः अमीषु अश्वत्थेषु वसन्ति।

ये व्याध उन पक्षियों को मारते हैं।
= इमे व्याधाः अमून् अण्डजान् घ्नन्ति।


श्लोक :

उदेति सविता ताम्रः
ताम्रम् एवास्तम् एति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च
महताम् एकरूपता ॥

सूर्य रक्तवर्ण ही उदित होता है और रक्तवर्ण ही अस्त होता है। सम्पत्ति और विपत्ति में सज्जन एक समान रहते हैं।


संक्रांति/पोंगल Wishes

Best wishes for the festivity!

यज्ञ, दान, तप – Festivals of हेमंत/शिशिर/वसंत are designed to make us active for यज्ञ, दान. Our duties toward समष्टि & समाज. Act.

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Teach your children about farming, native cattle and cow worship before flying first kite of the day!!

Remember, if this is missed, Kala/Time will remember you as ignorant and careless parent.

Without protection and respect for native cattle, what will your kids eat in future? Don’t allow media and so cool modernity kill their respect for native place, rituals and food! Without native, we are living dead! Let them enjoy realization of being part of grand construct called the universe!! Sun’s movements help very much in this realization! Gau Mata helps in this realization too! (How? Next Uttarayan!)

मकर संक्रान्ति & गौ is not just about pampering and worshiping Gau mata on physical plane. Her reflection on आध्यात्मिक & दैविक plane, equally need nurturance.

It is mother Gau, who actually inspires to take care of Gau on other planes.


Best wishes!

संस्कृत साधना : पाठ १३ (कारक-विभक्ति)


नमः संस्कृताय मित्रों !
संस्कृतभाषा की वाक्यरचना हिन्दी से बहुत भिन्न है, यह बात आपको सदैव याद रखनी चाहिए। हिन्दी में अपादान कारक को छोड़कर शेष सभी कारकों में ‘को’ अथवा अन्य चिह्न भी देखने में आते हैं। किन्तु संस्कृत में उसका अनुवाद करते समय आपको यह बात ध्यान रखनी है कि क्रिया के सम्पादन में वह शब्द किस कारक की भूमिका में है। यदि इसका ध्यान रखेंगे तो भ्रमित नहीं होंगे। अगले पाठों में आपको कारक-विभक्ति के विषय में समझाया जाएगा जिससे आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि कब किस पदार्थ को कौन सा कारक माना जाएगा। अभी आप लिंग, वचन, पुरुष, विशेषण, सर्वनाम विशेषण और शब्दकोश पर ध्यान देते जाइये।

अभ्यास :

यद् ( जो ), तद् ( वह ) और किम् ( कौन ) के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए।

शब्दकोश :

वनम् (वन) के पर्यायवाची शब्द –
1] अटवी ( स्त्रीलिंग )
2] अरण्यम् ( नपुसंकलिंग )
3] विपिनम् (नपुसंकलिंग )
4] गहनम् (नपुसंकलिंग )
5] काननम् (नपुसंकलिंग )
6] वनम् ( नपुसंकलिंग )

भारी वन के नाम –
1] महारण्यम् (नपुसंकलिंग )
2] अरण्यानी (स्त्रीलिंग)


वाक्य अभ्यास :

(निम्नलिखित वाक्यों में कुछ पशु-पक्षियों के नाम हैं उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िये ।)

जो भालू बैठा है वह किस वन में रहता है ?
= यः भल्लूकः आसीनः अस्ति सः कस्मिन् कानने निवसति ?

जिस वन में सिंह रहता है उसी वन में खरगोश भी रहता है।
= यस्मिन् अरण्ये सिंहः वसति तस्मिन् एव अरण्ये शशकः अपि वसति।

जिसका नाम पिंगलक है वह सिंह किस वन से आया है ?
= यस्य नाम पिङ्गलकः अस्ति सः कस्मात् विपिनात् आगतः अस्ति ?

जिस मोरनी का नाम चारुपर्णा है वह किस वन से आयी है ?
= यस्याः मयूर्याः नाम चारुपर्णा अस्ति सा कस्मात् अरण्यात् आगता अस्ति ?

जिस वन से वह कौआ आया है उसी वन से वह गौरैया भी आयी है।
= यस्मात् विपिनात् सः वायसः आगतः अस्ति तस्मात् एव विपिनात् सा चटका अपि आगता अस्ति।

जिन पंखों से हंस उड़ता है उन्हीं पंखों से बगुला भी उड़ता है।
= याभ्यां पक्षाभ्यां हंसः उड्डयति ताभ्याम् एव पक्षाभ्यां बकः अपि उड्डयति ।

वह ऊँट किस विधि से काँटे खाता है ?
= सः क्रमेलकः केन विधिना कण्टकानि खादति ?

जिस विधि से सिंह मांस खाता है उसी विधि से ऊँट काँटे खाता है।
= येन विधिना मृगेन्द्रः मांसं खादति तेन एव विधिना उष्ट्रः कण्टकानि खादति।

जो बन्दर लाल मुँह वाला है, वह किस वृक्ष पर चढ़ता है ?
= यः वानरः रक्तमुखः अस्ति सः कं वृक्षम् आरोहति ?

वे भयंकर सुअर जिनके दाँत टेढ़े हैं, किन महावनों में रहते हैं ?
= ते भयङ्कराः कोलाः येषां दन्ताः वक्राः सन्ति, केषु महारण्येषु वसन्ति ?

वे काले हिरन किन वनों से आये हैं ?
= ते कृष्णसाराः केभ्यः गहनेभ्यः आगताः सन्ति ?

वह नेता नहीं वह तो गिरगिट है जो सच्ची बात वाला नहीं है।
= सः नेता नैव स तु सरटः अस्ति यः सत्यवाक्यः नास्ति।

श्लोक :

यः यः यां यां तनुं भक्तः
श्रद्धयाऽर्चितुम् इच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां
ताम् एव विदधाम्यहम्॥

(श्रीमद्भगवद्गीता 7.21)

पुस्तक में एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

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