
जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तब ऐसा दृश्य हुआ –
अश्वानां खरशब्दैश्च रथनेमिस्वनेन च।
शङ्खदुन्दुभिनादेन संचचालेव मेदिनी॥ (६-१२७-२१)
“नादेन सञ्चचालेव मेदिनी”
अर्थात् पृथ्वी या भवन को हिलाने के लिए जिस ध्वनि की आवश्यकता होती है, वह विस्फोटक नाद के बिना सम्भव नहीं।
—
*दीपावली, पटाखे और ध्वनि का महत्त्व*
दीपावली केवल दीप प्रज्वलन का पर्व नहीं है, यह जागृति और संवेदनाओं को झकझोरने का उत्सव है।
*पटाखों की ध्वनि* : मन के भीतर बैठे जड़त्व (तमोगुण) को तोड़ती है। ध्वनि का आघात इन्द्रियों को सजग करता है, सोई हुई चैतन्यता को जगाता है।
*प्रकाश की चमक* : रजोगुण और तमोगुण की अन्धकारमयी परत को चीरकर सात्त्विकता को बल देती है।
*सामूहिकता* : एक साथ दीप प्रज्वलन और ध्वनि-प्रकाश का अनुभव हृदय में उत्साह और समाज में एकता जगाता है।
*ध्वनि चिकित्सा (नादोपचार)* : नाद को मन की चंचलता शांत करने और आलस्य को भगाने वाला माना गया है। अचानक उत्पन्न तीव्र ध्वनि मन के सुस्त प्रवाह को झकझोरकर नयी ऊर्जा भरती है।
*प्रकाश और अग्नि* : अग्नि ही जीवन की जड़ है। दीप और आतिशबाज़ी अग्नि के प्रतीक हैं—ये आंतरिक जठराग्नि और मानसिक तेजस को प्रज्वलित करने की स्मृति दिलाते हैं।
भारतीय मनोविज्ञान की दृष्टि से
नाजुकता (Fragility) मृत्यु है, और प्रबलता (Anti-fragility) ही जीवन है।
आन्तरिक भय को मिटाकर, स्वास्थ्यप्रद ध्वनि और प्रकाश का विवेकपूर्ण उपयोग से उत्सव मनाना, यही रामराज्य की उत्सवप्रियता है।
