
पति-पत्नी दोनों एक ही स्तर पर साधनारत हों — यह स्थिति अत्यंत दुर्लभ, किंतु आदर्श मानी जाती है। उपरोक्त चित्र में जो भाव झलकता है, वह आत्मिक सहयात्रा का प्रतीक है, जिसमें दोनों एक ही दिशा में, समान जिज्ञासा और समर्पण के साथ उन्नति की ओर अग्रसर हैं। परंतु वास्तविक जीवन में ऐसा संतुलन प्रायः नहीं देखने को मिलता। सामान्यतः दोनों की रुचि, परिपक्वता, अथवा गति अलग-अलग होती है। ऐसे में जो अधिक विवेकशील, जागरूक या आध्यात्मिक रूप से परिपक्व होता है, उसका उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। वह अपने जीवनसाथी को प्रेरणा देकर, प्रेम और धैर्यपूर्वक उसे साथ लेकर चलने का प्रयास करता है।
यह एक प्रकार का लोकसंग्रह ही है — जहाँ व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मोक्ष या आत्मकल्याण की चिंता के साथ-साथ अपने निकटस्थों, विशेषकर परिवारजनों के उन्नयन के लिए भी कार्य करता है। यदि पत्नी अधिक साधनाशील हो तो वह पति का सहारा बने, और यदि पति अधिक जागरूक हो तो वह पत्नी का मार्गदर्शन करे — यही सहधर्मचारिणी और सहधर्मी के आदर्श का मूर्त रूप है। इस प्रकार, पारिवारिक जीवन स्वयं में एक तपस्या बन सकता है, जहाँ एक दूसरे के विकास में सहयोग देना ही सच्ची साधना है।
लोकसंग्रह का अर्थ सीधा सामाजिक NGO कार्यों को न समझकर यदि अपने मित्र परिवार को कर्मक्षेत्र बनाए तो भी इस जन्म को सार्थक करने के मार्ग पर अच्छी पहल रहेगी।
