
सनातन परंपरा में दिन की शुरुआत ब्राह्ममुहूर्त के जागरण से होती है। यह आठों प्रहरों का राजा कहलाता है, इसलिए इसका सदुपयोग करना हमारा आवश्यक कर्तव्य है।
“ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थम् आयुषः।” (अष्टाङ्ग हृदयम्)
अर्थात — स्वस्थ व्यक्ति को अपनी आयु की रक्षा के लिए, रात के भोजन के पाचन की स्थिति पर विचार करते हुए, ऊषाकाल (ब्राह्ममुहूर्त) में उठना चाहिए।
पाचन का विचार करते जागने का अर्थ है अग्नि का स्मरण करते हुते प्रातःकाल से दिन का प्रारंभ हो।
प्रातःकाल का यह समय अनेक दृष्टियों से अमूल्य है—
– वातावरण की सात्त्विकता और शुद्ध वायु (ऑक्सीजन) का भरपूर लाभ।
– सूर्यशक्ति का अवलम्बन, जो दिनभर के लिए जीवनशक्ति प्रदान करता है।
– मानसिक शुद्धि और नवीन ऊर्जा — मस्तिष्क शांत, स्पष्ट और रचनात्मक होता है।
– आयुर्वेदीय लाभ — प्रातः जलपान और दिनचर्या से शारीरिक संतुलन और रोग-निवारण।
व्यावहारिक दृष्टि से भी, इस समय जागने पर हम अपने नित्यकर्म और दिनचर्या को शीघ्र पूरा कर लेते हैं, जिससे दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है।
दुर्भाग्य से, आज हमारी जीवनशैली प्रकृति से विपरीत हो चुकी है। देर रात तक जागना एक सामान्य सामाजिक आदत बन गई है। इसका दुष्परिणाम वैज्ञानिक शोध में स्पष्ट है—
अतः ब्राह्ममुहूर्त का पालन केवल धार्मिक अनुशासन नहीं, बल्कि विज्ञान और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है।
एक संशोधन अनुसार, देर से सोने वाले किशोर प्रायः कम सक्रिय रहते हैं, अधिक कार्बोहाइड्रेट ग्रहण करते हैं और गंभीर रोगों को निमंत्रण देते हैं।
“Our data supports that this lack of alignment may be associated with inadequate diet and physical activity, further contributing to the obesity epidemic and poor cardiometabolic health.”
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