Skin reflects mental states

Marut

Mind, Parenting, ParentingDharma

आयुर्वेद में मन का प्रधान स्थान हृदय माना गया है, किन्तु त्वचा को मन का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब कहा गया है।

* भय होने पर मुख पीला पड़ जाता है,
* लज्जा आने पर मुख पर लालिमा छा जाती है,
* आनन्द होने पर मुख पर तेज प्रकट होता है।

त्वचा से मन की अवस्था जानी जा सकती है।

नवीन अध्ययन (EurekAlert, 2025[१]) के अनुसार मानसिक विकार की आरम्भिक अवस्था में ही त्वचा पर लक्षण प्रकट हो सकते हैं – जैसे खुजली, दाद, अथवा संवेदनशीलता। ऐसे बच्चों/वयस्कों  में बाद में उदासी (डिप्रेशन) और मनोविकार बढ़ने की सम्भावना देखी गई। अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि **त्वचा के लक्षण मन के असन्तुलन के पूर्व संकेत हो सकते हैं**।

बच्चें जब विकासशील अवस्था होते है तो उनका मन अनेक उलझनों से पसार होता है। त्वचा केवल शरीर का आवरण नहीं है, यह **मानसिक स्वास्थ्य का दर्पण** भी है।

माता–पिता के लिए आवश्यक है:

1. **अवलोकन** –

   * यदि बच्चा अचानक पसीना, लालिमा या खुजली अनुभव करे तो उसके पीछे मानसिक कारण भी हो सकता है।
   * भय, चिन्ता अथवा अत्यधिक उत्साह जैसी दशाएँ त्वचा पर झलकती हैं।

2. **स्पर्श का महत्व** –

   * आयुर्वेद में अभ्यङ्ग (तेल से स्निग्ध मालिश) मन को शान्त करता है।
   * माता–पिता का स्नेहिल स्पर्श, गले लगाना, हाथ पकड़ना – ये सब बच्चे के मन को सुरक्षित बनाते हैं।
   * वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि स्नेहपूर्ण स्पर्श से तनाव हार्मोन घटते हैं और ऑक्सिटोसिन (स्नेह रस) बढ़ता है।

* त्वचा पर ध्यान देने से माता–पिता बच्चे की भीतरी मानसिक दशा को शीघ्र समझ सकते हैं।
* समय पर समझने से मानसिक अस्थिरता अथवा उदासी बढ़ने से पहले ही सहायता मिल सकती है।
* **स्नेहपूर्ण स्पर्श और सावधान अवलोकन** बच्चे को आत्मविश्वासी, शान्त और संतुलित बनाते हैं।

[१] https://www.eurekalert.org/news-releases/1101355

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