
नास्तिक्यादथवालस्याद् योऽग्नीन् नाधातुमिच्छति ।
यजेत वा न यज्ञेन स याति नरकान् बहून् ।।
नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण जो अग्नियोंका आधान एवं यज्ञसे यजन नहीं करना चाहता, वह बहुतसे नरकोंमें जाता है ।।
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गृहस्थ हो तो अग्नि पूजा में चूक नहीं।
प्रत्येक कर्म याज्ञिक हो 😊 निष्काम, स्वार्थ रहित, अन्यों की सेवा हेतु ही सभी कर्म हो)
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