शिक्षक के आदर्श

Marut

Education

**सभी शिक्षकों के लिए**
यह प्रत्येक शिक्षक के लिए एक मूल-सूत्र है — समस्त विश्व की पाठ्यपुस्तकों की प्रस्तावना के समान। यह प्रकृति की ओर से एक संकेत है।

**”कविं शशासुः कवयो अदब्धाः” — ऋग्वेद ४.२.१२**
**अर्थ**: “प्राज्ञ व्यक्ति को प्राज्ञ ही शिक्षित करता है।” या “प्राज्ञ व्यक्ति, प्राज्ञ से ही सीखता है।”

किन्तु जो अध्यात्म-आधार से वंचित हैं, वे इसी वैदिक मंत्र का ऐसा अर्थ कर बैठते हैं —
**”केवल प्राज्ञ को ही शिक्षित किया जाना चाहिए!”** 🙂
(मैं कोई निष्णात नहीं, यदि त्रुटि हो तो कृपया मार्गदर्शन करें।)

**शिक्षण का मूलाधार यह हो** कि *मेरा विद्यार्थी भी एक आत्मवत् जीव है, जिसमें ब्रह्मांडीय ज्ञान प्राप्त करने की सर्वोच्च सम्भावना निहित है।*
विद्यार्थी किसी भी दृष्टि से शिक्षक से हीन नहीं है। यही सोच सभी विद्यार्थियों की वास्तविक सामर्थ्य को प्रकट करने की कुञ्जी है — केवल चुनिंदा ‘श्रेष्ठ’ (या ‘टॉपर’) छात्रों की नहीं।

शिक्षक और विद्यार्थी — दोनों मिलकर ही पूर्ण ज्ञान की संधि रचते हैं। केवल तब ही शिक्षण एक तप बनता है।

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