
जिनके जीवन में एकमेव लक्ष्य सार्वभौमिक हित ही है और इस हेतु से स्वयं को शास्त्र मार्ग पर रखकर जीवन जी रहा है। वह जीवनमुक्त है या साधक, उसके जीवन में ओजस निर्माण होगा। यह ओजस ही अन्यों को धार्मिक जीवन जीने प्रेरित करेगा ।
वेद में लोकसंग्रह हेतु संकेत कुछ ऐसे किया है –
कृष्टि ओजस् (ऋग्वेद) — अपने ओजस् (शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक बल) को इतना प्रखर बनाओ कि शत्रु स्वयं तुम्हारी ओर आकर्षित (कृष्टि) होकर समर्पण कर दें।
कृष्टि — चुम्बकीय आकर्षण
ओजस् — जीवनशक्ति / तेज / पराक्रम
शत्रु पर आक्रमण कर उसे नष्ट करना एक उपाय है।
शत्रु को आकर्षित कर, उसकी शक्ति को निष्क्रिय कर नष्ट करना दूसरा उपाय है।
जो अग्रिम पंक्ति में संघर्ष करते हैं (वीर लोकनेता), उन्हें यह विशेष सामर्थ्य — कृष्टि ओजस् — अवश्य विकसित करनी चाहिए। यदि समाज के श्रेष्ठ लोगों में पूर्वजन्मों के प्रारब्ध वशात ओजस है पर धर्म दृष्टि नहीं है तो हमें उनके अंदर यह दृष्टि निर्माण करनी चाहिए! ओजस पूर्ण लोकनेता भरतभूमि की मांग है!
याद है वह प्रसिद्ध दीपक–पतंगा आकर्षण? उसी सिद्धान्त को समझो। शास्त्रीय दिनचर्या के वाहक बनना लोकसंग्रह है। प्रेरणा लो, प्रेरणा देने योग्य बनो और शनै शनै धार्मिक समाज का निर्माण करो!
