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Dharma

माता-पिता के रूप में अक्सर यह प्रश्न उठता है:
*”अपने बालक को कैसा लक्ष्य दूँ?” और “उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कैसी शिक्षा दूँ?”*

इस प्रश्न का मूल यह है कि —
👉🏽 *मनुष्य जीवन का एक ही परम लक्ष्य है — कैवल्य की प्राप्ति (पूर्ण मुक्ति, आत्मिक स्वतंत्रता)*

ऐसे परम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संसार का उपयोग साधन के रूप में करना होता है —
परन्तु इन साधनों का उचित उपयोग करने के लिए जीवन में ऐसा शिक्षण आवश्यक है जो विवेक को जाग्रत करे।

*विवेक क्या है?*
विवेक वह अंतर्बुद्धि है जो इन्द्रिय-सुखों में आसक्ति न करते हुए लक्ष्य की ओर गति कराए।

कैवल्य ही नहीं, बल्कि वहाँ तक ले जाने वाले छोटे-छोटे लक्ष्य भी होने चाहिए —
परंतु हर बार यह पूछना आवश्यक है:
“यह लक्ष्य श्रेय मार्गी है या प्रेय मार्गी?”

🔸 *प्रेय मार्ग — पहले सुखद, अंततः दुखद*
– जो कार्य या वस्तु पहले सुख देती है परंतु बाद में दुःख में बदलती है, वह प्रेय है।
– यह दिखने में आकर्षक लगती है, तुरंत सुख देती है, लोभ जगाती है।
– ऐसे मार्ग अंत में सुख-दुःख के चक्र में बाँधते हैं।

🔹 *श्रेय मार्ग — दीर्घकालिक सुखद, अंततः मुक्तिकारक*
– जो कार्य या अभ्यास आरंभ में कठिन लगे, पर अंत में भीतर से मधुर और तृप्तिकर हो, वह श्रेय है।
– यह मार्ग अन्नमय कोश से आनंदमय कोश की ओर ले जाता है।

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