आर्टफिशल इन्टेलिजन्स और सब कुछ जानने का भ्रम

Nisarg Joshi

Dharma

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आर्टफिशल इन्टेलिजन्स और सब कुछ जानने का भ्रम

आधुनिक माहिती के यंत्रों के प्रचुर उपयोग के कारण एक भ्रम होता है की अब हम तजज्ञ हो गए ! यह भ्रम , कौशल निर्माण से भी दूर रखता है और भविष्य के दुःख का कारण भी बनता है।

चरक संहिता से समझते है।

ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने|
अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः||१२०||

“जंगल में रहने वाले अजपा, अविप (भेड़पालक), गोप (गोपक / ग्वाले) तथा अन्य वनवासी भी औषधियों को नाम और रूप से जानते हैं।”
“केवल औषधियों का नाम जान लेने से या उनके स्वरूप (रूप, गुण, रस आदि) को पहचान लेने से कोई भी व्यक्ति औषधियों की श्रेष्ठतम उपयोगिता (परम प्राप्ति) को नहीं जान सकता।”

औषधियों का शुद्ध प्रयोग, युक्त योग, और रोग-रोगी के अनुसार उनका अनुकूलन — यह सब केवल सैद्धांतिक जानकारी से नहीं आता, बल्कि यह गम्भीर अध्ययन, अनुभव, प्रेक्षण और विवेकपूर्ण निर्णय से प्राप्त होता है।

योगवित्त्वप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते|
किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक्||१२२||

“यदि कोई चिकित्सक औषधियों का सम्यक् योग (संयोजन) जानता है, भले ही वह उनके रूप (पहचान) को न जानता हो, तो भी वह तत्त्वज्ञ माना जाता है;
तो सोचिए, वह भिषक् (चिकित्सक) कितना श्रेष्ठ होगा जो औषधियों को सम्पूर्णता से जानता हो!”
यह बात कोई भी विषय में सत्य है। ईश्वर श्रद्धा, साधना, तप, गुरु सानिध्य के अभाव में ज्ञान आत्मसात नहीं होता।

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