
आदर्श वैद्य कैसे हो?
यज्ञभुग् वासुदेवांशः स्मृतमात्रार्तिनाशनः । – भागवत – स्कंध ९ – अध्याय १७
वैद्य का आदर्श – चन्द्र वंश में जन्म लेने वाले, ऋषि दीर्घतमस के पुत्र,यज्ञभोक्ता भगवान विष्णु के अंश, भगवान धन्वंतरि समान हो जोकि मात्र स्मरण से आतुर को रोग से निवृत करते थे (स्मृतमात्रार्तिनाशनः)।
- चन्द्र के वंशज अर्थात चंद्र से पोषित पवित्र मन और प्रज्ञा से सुसज्ज
- दीर्घतमस के पुत्र ऋषियों की ज्ञान परंपरा का वहन हेतु नित्य अध्ययन और अध्यापन करनेवाले
- यज्ञभोक्ता अर्थात याज्ञिक निष्काम कर्मयोग से अपना योगक्षेम चलाने वाले
- स्मृतमात्रार्तिनाशनः आतुर को स्मृति मात्र में रखकर रोग निवृत करने वाले अर्थात योग साधना को सिद्ध करने तत्पर
ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाविशति तत्त्ववित्
आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगांश्चिकित्सति||१२||
जो चिकित्सक अपने ज्ञान और बुद्धि रूपी दीपक द्वारा रोग की परीक्षा के निमित रोगी की अंतरआत्मा में प्रवेश नही कर पाता,वह रोगों की ठीक ठीक चिकित्सा नही कर पाता।
A physician cannot treat a patient if he does not reach upto the innermost of the patient with the help of his own intellect.
This is not limited to being physician. Those who are working in public domain, to help the fellow travelers realizing real purpose of life, should be skilled enough to penetrate self into others’ psyche.
Only possible by developing deep empathy for eachother.
This is not possible to achieve under the influence of medical technology. Profit driven healthcare is curse for the society.