
आदर्श भारतीय समाज में प्रत्येक छोटे छोटे आनंद का उत्सव होता था!
बाल जन्म पर उत्सव, शिशु का पहली बार अन्न ग्रहण करने पर उत्सव, पहली बार प्रकृति दर्शन का उत्सव ! अरे पहली बार करवट बदलता है नवजात शिशु तो भी उत्सव होता था!
यह छोटे आनंद छोड़ो, कितने घरों में १६ संस्कार का उत्सव होता है ? जो होता है उनका भी व्यापारीकरण हो गया है !
यदि समाज से मानसिक रोगों को भगाना है तो पुनः अपने पूर्वजों के आदर्श छोटे छोटे आनंद के उत्सव मनाना सीखना होगा।
उत्सव सभी जीवनों की सेवा करता है – आधिभौतिक (हम सब), आधिदैविक (हमारी इंद्रियाँ), आध्यात्मिक (हमारा उच्च स्व -आत्मा)।
उत्सव से बढ़े उत्साह से 4 पुरुषार्थ के लिए क्रियाशील रहना है।
उत्सव से बने उत्साह से धर्म टिकाना है।
आजकल के व्यापारी फेस्टिवल (Father Day, Mother Day, Chocolate Day etc) और हमारे उत्सवों का व्यापारीकरण, दोनों, केवल भौतिक भोग आनंद प्रदान करते है। यह मनोरंजन की लत में इंद्रियों को भोग लिप्त करके हमारी मृत्यु को नजदीक ले आता है।
इससे विपरीत, ग्रामीण सीमित सामाजिक क्षेत्र में प्रतिदिन उत्सवों का वातावरण बना रहता है और इस कारण से मनुष्य कभी उदास या नीरस नहीं रहता था!
कदाचिदौत्थानिककौतुकाप्लवे
जन्मर्क्षयोगे समवेतयोषिताम् ।
भागवत दशम स्कन्ध अनुसार शिशु श्री कृष्ण के प्रथम बार करवट बदलने पर भी पूरा गाँव इकट्ठा हो गया था! उनके प्रत्येक जन्म नक्षत्र योग पर भी उत्सव होता था (प्रत्येक मास जब चंद्र रोहिणी नक्षत्र में हो तब)
दशम स्कन्ध के अध्याय सात अनुसार कल्पना करो ! कितना सुखद समाज था !
हम भी यह कर सकते है! दवाइयों से नहीं सामाजिक सक्रियता और एक दूसरे के आनंद में सहभाग हो कर मानसिक रोगों का निवारण होगा !
