
यदा प्रियो दोषभाक् स्यात् तदाल्पो भाति दोषकः।
अप्रियेतु स्थितो दोषः स्वल्पो भूमिधरायते॥
जब कोई व्यक्ति हमें प्रिय होता है, तब उसके भीतर का दोष बहुत छोटा दिखाई देता है।
और जब वही दोष किसी अप्रिय व्यक्ति में होता है, तो अत्यन्त छोटा दोष भी पहाड़ जैसा भारी लगने लगता है।
- व्यक्ति विशेष के प्रति प्रेम का स्वभाव है की हम व्यक्ति के दोष को नगण्य समझते है।
- व्यक्ति विशेष के प्रति अप्रसन्नता / दुर्भाव का कारण उनका छोटा सा दोष भी हम बढ़ा-चढ़ा कर देखते है।
- मन की वृत्ति दोष के आकार को बदल देती है।
सदैव आत्मनिरीक्षण करो – क्या मैं मन की पक्षपातपूर्ण वृत्ति में फँसकर किसी के दोष को बढ़ा तो नहीं रहा? या प्रियता के कारण किसी की त्रुटि को अनदेखा तो नहीं कर रहा?
रुग्णता किसी को पसंद नहीं होती, चाहे वह शरीरी हो या मानसिक। हंस की तरह क्षीर-जल विवेक सत्व गुण की प्रधानता से ही होगा। तब तक, Confirmation Bias,Halo Effect,Horn Effect,In-group / Out-group Bias,Attribution Bias,Motivated Reasoning जैसे पूर्वाग्रहों से पीड़ित रहना पड़ता है।
मनुष्य का अपरिपक्व मन, जानकारी को वस्तुतः नहीं, बल्कि भावनात्मक पक्षपात से रंगे हुए चश्मे से देखता है।
प्रियता = मन की अभिलाषा अनुकूल → दोष छोटा दिखता है।
प्रियता दोष को छोटा करती है (halo + confirmation)।
प्रिय व्यक्ति के लिए रज सत्त्व के साथ जुड़कर दोष को ढक देता है।
अप्रियता = मन की अभिलाषा प्रतिकूल → दोष बड़ा दिखता है।
अप्रियता दोष को पर्वत बनाती है (horn + negativity + attribution).
अप्रिय व्यक्ति के लिए रज और तम मिलकर दोष को विकराल बना देते हैं।
नकारात्मकता पूर्वाग्रह तमस और राजस के कारण है और दोनों के वृद्धि भी करेगा। सोचो के रात्री में कार चला रहे हो, गाड़ी की बत्ती बंध है और आपको अंधकार में १२० की गति पर चलने का मन हुआ ! तमोगुण मन को अंधकार-दृष्टि देता है; रजस् उसे उत्तेजित करता है।
स्वास्थ्य प्रभाव भी है-
- चित्त-अवसाद
- अनिद्रा
- उद्वेग
- आम-उत्पत्ति (जठराग्नि मन्द)
- रोचना / उत्साहहीनता → ओजस घटता है
समाधान सत्व गुण की वृद्धि में है। शास्त्र अभ्यास, साधना, सत्संग से सत्व गुण विकसित होता है। मार्ग सरल है, सातत्य से चलना दुष्कर है।
