चातुर्मास – प्रकृति से फिर से जुड़ने का न्यौता

Nisarg Joshi

Nature

Ramayana
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चातुर्मास – प्रकृति से फिर से जुड़ने का न्यौता

युवाओं को विषैले आधुनिक आचरणों के बादलों से बाहर लाना ही समय की माँग है। जब तक वे प्रकृति को माँ मानकर उसके सान्निध्य में पर्याप्त समय नहीं बिताएँगे, तब तक कोई स्थायी परिवर्तन सम्भव नहीं।

उन्हें प्रारंभ से ही संजोएँ – यदि आतंकवादी उन्हें कम उम्र में अपना बना सकते हैं, तो हम उन्हें धर्म के मार्ग पर क्यों नहीं ला सकते?

उम्र 10-12 से लेकर 16-18 वर्ष तक – यही वह समय है जब समाज की चाक पर उनका मन गढ़ा जा रहा होता है। इससे पहले कि वह मिट्टी पथरीली हो जाए, उसमें प्रकृति-माता के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम भर देना चाहिए।

बचपन से ही बच्चों के मन में प्रकृति माता के लिए प्रगाढ़ प्रेम जगाएँ! यही भविष्य का बीजारोपण है।

चातुर्मास कोई धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है। यह वह समय है जब जीवन थोड़ी देर के लिए थमता है – बाहर की दौड़-भाग कम होती है, और भीतर की ओर देखने का अवसर मिलता है। यही तो प्रकृति का संदेश है – “रुको, सुनो, महसूस करो।”

🌿 क्यों यह समय इतना खास है?

  1. प्रकृति दत्त व्रत अनुष्ठानों से प्रकृति माता का देवत्व भाव
    यह चार मास के व्रत, उत्सव, अनुष्ठान में प्रकृति के तत्वों का पूजन होता ही है। योग्य काल है की हम बच्चों के मन मैं देव आदर निर्माण करें।

  2. धरती बोलती है… अगर हम सुनें तो।
    बारिश की पहली बूँद जब सूखी मिट्टी को छूती है, तो एक ख़ुशबू उठती है – जैसे माँ ने सिर पर हाथ फेरा हो। खेत हरे हो जाते हैं, नदियाँ गुनगुनाती हैं, पक्षी नाचने लगते हैं। यह सिर्फ़ दृश्य नहीं, एक भाव है – कि हम प्रकृति की संतान हैं। यही भाव बच्चे महसूस करें, यही चातुर्मास का सौंदर्य है।

  3. थोड़ा ठहरना, थोड़ा कम करना।
    इस समय बाहर कम जाना होता है। यही अवसर है – जीवन को धीमा करने का, खाने-पीने में सादगी लाने का, मन की चंचलता को थोड़ी शांति देने का। संयम और साधना कोई कठोर नियम नहीं – यह एक कोमल आमंत्रण है कि हम अपने भीतर झाँकें।

  4. बच्चों के मन में बीज बोने का मौसम।
    मिट्टी गीली है, बीज डालो तो पौधा ज़रूर निकलेगा। ऐसे ही बच्चों का मन इस ऋतु में खुला होता है – उन्हें वृक्षों की बातें सुनाओ, बारिश में नंगे पाँव चलाओ, एक पौधा उन्हें सौंपो जिसकी वे सेवा करें। यही प्रकृति से प्रेम का पहला पाठ है।

  5. ‘कहाँ से आता है हमारा खाना?’ – यह सवाल उठे।
    जब खेत भीगते हैं, किसान बीज बोता है, तब हमें बच्चों को यह समझाना चाहिए कि उनका भोजन किसी फैक्टरी में नहीं बनता – वह धरती माँ की कोख से आता है। यह जानने से एक अलग ही श्रद्धा उपजती है।


🌱 तो क्या करें?

  • प्रकृति तत्व से जुड़े व्रत अनुष्ठान अवश्य कीजिए।
  • हर दिन थोड़ा समय पेड़ के नीचे बैठकर बिताएं।
  • मिट्टी में कुछ बोएँ – भले ही गमले में ही क्यों न हो।
  • बच्चों से कहें – “धरती माँ को धन्यवाद दो, वह तुम्हें हर दिन खाना देती है।”
  • बारिश में भीगने दो – बीमार नहीं पड़ेंगे, बल्कि जिएंगे।

🙏 चातुर्मास – समय है रिश्ते सँवारने का।

प्रकृति से, अपने आप से, और अगली पीढ़ी के संस्कारों से।
अब भी अगर नहीं जोड़ा, तो कब?

यह चार महीने केवल पंचांग में नहीं, हमारे भीतर कुछ बदलने के लिए आते हैं।
उन्हें यूँ ही मत जाने दो।

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