स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्पंदनों का संबंध- एक वैदिक दृष्टिकोण

Nisarg Joshi

Environment

Grihastha
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स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्पंदनों का संबंध: एक वैदिक दृष्टिकोण

“पर्यावरणीय कंपन” – चाहे वे प्राकृतिक हों या मानव-निर्मित – हमारे शरीर, मन और आत्मा पर गहरा प्रभाव डालते हैं। आयुर्वेद और योग के अनुसार, स्वास्थ्य का मूल अर्थ केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा का ब्रह्मांडीय लयों के साथ सामंजस्य (संगति) में होना है।

🌀 स्पंदनात्मक असंतुलन ही विनाश का कारण

ऋग्वेद (1.164.41) कहता है:

“ऋतं च सत्यम् च अभि प्रजायताम्”,
अर्थात – ब्रह्मांड की सम्यक गति (ऋतम्) और सत्य (सत्यम्) से ही सृष्टि टिकती है।

जब मनुष्य इन ऋतुओं, ग्रहों और पर्यावरणीय लयों से असंगत कार्य करता है, तो वही असंतुलन उसे युद्ध, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं की ओर ले जाता है। यही विचार चरक संहिता (सूत्रस्थान 6/4) में स्पष्ट रूप से वर्णित है:

“कालो हि नाम दोषाणां दोषः…”
– समय का अवज्ञान या विकृति रोगों का मुख्य कारण बनता है।

⚖️ मनुष्य की जीवनीशक्ति और स्पंदनों से तालमेल

हमारा जीवन इस पर निर्भर करता है कि हम इन पर्यावरणीय स्पंदनों के साथ कितना तालमेल बना पाते हैं। यह सामंजस्य ही जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकता है। कोई टीका या दवा तभी कार्य करती है जब शरीर की मूल प्रतिरक्षा शक्ति (ओज) जाग्रत हो – जिसे आयुर्वेद स्वाभाविक बल कहता है।

“बलवद्भिः क्रियाः सिद्धाः” (चरक संहिता)
– चिकित्सा केवल तब सफल होती है जब शरीर में बल (ऊर्जा) हो।

🌿 प्राकृतिक लय के अनुसार जीवनचर्या

ऋतुओं के संक्रमण (ऋतु संधि) जैसे कि शरद और ग्रीष्म के समय शरीर अधिक संवेदनशील होता है। जेठ का महीना विशेष रूप से मारक होता है, जैसा कि आप अनुभव करते आए हैं। आयुर्वेद में इसे ऋतुचर्या कहा गया है – हर ऋतु में विशेष आहार, विहार और उपवास का पालन स्वास्थ्य रक्षक माना गया है।

“ऋतुविपर्यये दोषा विकृतिं यान्ति देहिनाम्” (अ.हृ., सूत्रस्थान 3/4)
– ऋतु की उपेक्षा करने से दोष (वात, पित्त, कफ) शरीर में विकृत होकर रोग उत्पन्न करते हैं।

🧘‍♂️ अनुष्ठान, उपवास और चंद्र लय के साथ तालमेल

हमारे पूर्वजों ने ऋतुओं के अनुसार जीवन की गति निर्धारित करने हेतु संस्कार और अनुष्ठान की व्यवस्था की थी – चाहे वह एकादशी उपवास, अमावस्या/पूर्णिमा पर विश्राम, या यज्ञ-हवन हो। ये केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि चंद्र-नाड़ी तंत्र और जीव विज्ञान के साथ सूक्ष्म तालमेल के उपाय हैं।

“नियतं कुरु कर्म त्वं…” (भगवद्गीता 3.8)
– नियमित कर्म करना ही स्वास्थ्य और मुक्ति दोनों का कारण बनता है।

आह्वान

आज आवश्यकता है कि हम अपने आंतरिक तंत्र (मन, शरीर और प्राण) को सुदृढ़ करें, और बाह्य पर्यावरण को स्थिर, शांत और प्राकृतिक बनाएँ। यही आरोग्यम् और धर्मयुक्त जीवन का मूल है।

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