SanskritLearning

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संस्कृत गोवीथि : : गव्य १२ (हनुमान विशेष)

प्राणका प्रेरक कौन?

केन उपनिषद् में प्राण प्रेरककी बात है| सम्पूर्ण जगत प्राण आधीन है, पर प्राण किसके आधीन है?

राजाकी प्रेरणासे दीवान काम कर शकता है, उसी प्रकार, प्राणका प्राण कौन?

स उ प्राणस्य प्राण|

आत्मा|

राम – हनुमान
आत्मा – प्राण

Gavya12


शब्दसिन्धु


अटति (aTati) = (1 pp) to roam
अणीयांसं (aNiiyaa.nsaM) = smaller
अणु (aNu) = atom
अणोः (aNoH) = than the atom
अण्वस्त्रं (aNvastraM) = (n) nuclear weapon
अतः (ataH) = hence
अतत्त्वार्थवत् (atattvaarthavat.h) = without knowledge of reality
अतन्द्रितः (atandritaH) = with great care
अतपस्काय (atapaskaaya) = to one who is not austere
अति (ati) = extremely
अतिपरिचय (atiparichaya) = excessive familiarity
अतिवीर्यं (ativiiryaM) = super power
अतिचार (atichaara) = Accelerated planetary motion
अतितरन्ति (atitaranti) = transcend
अतितरलं (atitaralaM) = ati+tarala, very+unstable
अतिथि (atithi) = (m) guest
अतिथिः (atithiH) = (masc.Nom.sing.)guest (literally undated)
अतिदारूणमन् (atidaaruuNaman.h) = adj. very dreadful
अतिदुर्वृत्त (atidurvRitta) = of exceedingly bad conduct


पाठ


१ २ ३

भोजनप्रकरणम्

नित्यः स्वाध्यायो जातो भोजनसमय आगतो गन्तव्यम् । नित्य का पढ़ना हो गया, भोजन समय आया, चलना चाहिये ।
तव पाकशालायां प्रत्यहं भोजनाय किं किं पच्यते ? तुम्हारी पाकशाला में प्रतिदिन भोजन के लिये क्या-क्या पकाया जाता है ?
शाकसूपौदश्वित्कौदनरोटिकादयः । शाक, दाल, कढ़ी, भात, रोटी आदि ।
किं वः पायसादिमधुरेषु रुचिर्नास्ति ? क्या आप लोगों की खीर आदि मीठे भोजन में रुचि नहीं है ?
अस्ति खलु परन्त्वेतानि कदाचित् कदाचित् भवन्ति । है सही परन्तु ये भोजन कभी-कभी होते हैं ।
कदाचिच्छष्कुली-श्रीखण्डादयोऽपि भवन्ति न वा ? कभी पूरी कचौड़ी शिखरन आदि भी होते हैं वा नहीं ?
भवन्ति परन्तु यथर्त्तुयोगम् । होते हैं परन्तु जैसा ऋतु का योग होता है वैसा ही भोजन बनाते हैं ।
सत्यमस्माकमपि भोजनादिकमेवमेव निष्पद्यते । ठीक है हमारे भी भोजन आदि ऐसे ही बनते हैं ।
त्वं भोजनं करिष्यसि न वा ? तू भोजन करेगा वा नहीं ?
अद्य न करोम्यजीर्णतास्ति । आज नहीं करता अजीर्णता है ।
अधिकभोजनस्येदमेव फलम् । अधिक भोजन का यही फल है ।
बुद्धिमत्ता तु यावज्जीर्यते तावदेव भुज्यते । बुद्धिमान पुरुष तो जितना पचता है उतना ही खाता है ।
अतिस्वल्पे भुक्ते शरीरबलम् ह्रस्त्यधिके चातः सर्वदा मिताहारी भवेत् । बहुत कम और अत्यधिक भोजन करने से शरीर का बल घटता है, इससे सब दिन मिताहारी होवे ।
योऽन्यथाऽऽहारव्यवहारौ करोति स कथं न दुःखी जायेत ? जो उलट-पलट आहार और व्यवहार करता है वह क्यों न दुःखी होवे ?
येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स शरीरसुखं नाप्नोति । जो शरीर से परिश्रम नहीं करता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता ।
येनात्मना पुरुषार्थो न विधीयते तस्यात्मनो बलमपि न जायते । जो आत्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसको आत्मा का बल भी नहीं बढ़ता ।
तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैर्यथाशक्ति सत्क्रिया नित्यं साधनीयाः । इससे सब मनुष्यों को उचित है यथाशक्ति उत्तम कर्मों की साधना नित्य करनी चाहिये ।
भो देवदत्त ! त्वामहं निमन्त्रये । हे देवदत्त ! मैं तुमको भोजन के लिए निमन्त्रित करता हूं ।
मन्येऽहं कदा खल्वागच्छेयम् ? मैं मानता हूँ परन्तु किस समय आऊँ ?
श्वो द्वितीयप्रहरमध्ये आगन्तासि । कल डेढ पहर दिन चढ़े आना ।
आगच्छ भो, आसनमध्यास्व, भवता ममोपरि महती कृपा कृता । आप आइये, आसन पर बैठिये, आपने मुझ पर बड़ी कृपा की ।

 

अकारादिः सूक्तयः

  • अग्ने: खरतरादेव लोहं दृढतरं भवेत्।
  • अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः ।
  • अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।
  • अजो नित्यं शाश्वतोऽयं पुराणः ।
  • अज्ञः सुखमाराध्यः ।
  • अति सर्वत्र वर्जयेत् ।

सुभाषित


गोष्पदी-कृत-वारीशं मशकी-कृत-राक्षसम् ।
रामायण-महामाला-रत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥

I make obeisance to the son of Vayu (the Wind God),
who tamed the vast ocean into a hoof-print (in
the mud), turned the demons into mosquitoes, and is
the gem in the great garland that the Ramayana is.


पठन/मनन/स्मरण


॥ श्रीहनूमत्स्तुती ॥

हनुमानञ्जनासूनुर्वायुपुत्रो महाबलः ।
रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः ॥ १॥
Hanuman, Anjana’s son, the son of wind-god,
one endowed with great strength,
the favourite of Sri Rama, Arjuna’s friend,
one having reddish brown eyes and unlimited valour

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ २॥
The one who leapt across the ocean,
who dispelled the deep anguish of Sita,
the saviour of Laxmana and who destroyed the pride of Ravana

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत् ॥ ३॥
If one recites these twelve names of the noble Hanuman –
the best among the monkeys before retiring to bed,
on rising up in the morning or during journeys

तस्य सर्व भयं नास्ति रणे च विजयी भवेत् ।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन ॥ ४॥
He will not face fear from any quarter. He will be successful in
battles. He need not have fear
either while entering the royal door, or a deep cavern.
(From Ananda Ramayana, Manohara Kanda.13-8-11).
॥ ॐ तत्सत् ॥
Encoded, proofread, and comments by
N. Balasubramanian bbalu at satyam.net.in

संस्कृत गोवीथी : गव्य 2

Gavya_2


शब्द सिन्धु

Morning


  • गतप्रभाते – last morning
  • अद्य प्रभाते – this morning
  • उषसी – Sandhya Time
  • बालादित्य – Morning Sun

पाठ १.२


Morning Theme

  • अद्य प्रातः आगतवान् वा? – Did you come this morning?
  • त्वं प्रातः किं खादसि? – What do you eat in the morning?
  • अद्य प्रातः आरभ्य बहु कार्याणि – I have had a lot work since morning
  • प्रतिप्रभातं विद्यालयं न गच्छामि इति रोदिति – He cries every morning saying he would not go to school

पाठ

Word Word2 Sentence Pattern 1 Sentence Pattern 2
अहं (में) वदामि अहं वदामि| वदामि अहं|
त्वं (तू) वदसि त्वं  वदसि| वदसि त्वं |
स: (वह) वदति स: वदति| वदति स:|

 

वदामि – To say

Usages:

(Focus on वदामि)

  • यथार्थं वदामि – I am telling the truth.
  • अस्मिन् विषये अनन्तरं वदामि – I’ll tell you about it later.
  • अहं किमर्थं असत्यं वदामि? – Why should I tell a lie?
  • त्वां धन्यं वदामि – Thank you!
  • तत्र अहं किमपि न वदामि – I do not want to say anything in this regard
  • अहम् तां किमपि न वदामि । प्रयोजनम् किम् ? – I don’t say anything to her. What is the point?

(Focus on वदसि?)

  • किं भोः, एवं वदसि? – Hey, why do you say so?
  • त्वम् संस्कृतं वदसि ? – Do you speak Sanskrit?

(Focus on वदति)

  • तत्र गमनं मास्तु भोः, सः बहुमूल्यं वदति । He is very expensive, let us not go to him.
  • संस्कृतं जानामि इति वदति भवान् तदनन्तरं संस्कृतेन सम्भाषणं कर्तुं किमर्थं सङ्कोचः ? You say you know Sanskrit but why then this hesitation to talk in Sanskrit?

Patha

सुभाषित


 

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

एक एक क्षण गवाये बिना विद्या पानी चाहिए; और एक एक कण बचा करके धन ईकट्ठा करना चाहिए । क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समजनेवाले को धन कहाँ ?

 


स्वाध्याय – पठन, मनन


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संस्कृत गोवीथी : : गव्य 3

Gavya_3


शब्द सिन्धु

Work


  • कार्यप्रवाह – workflow
  • कार्यभार – workload
  • कार्यक्रमस्वचालन – workflow automation
  • कर्मसारथि – co-worker
  • कर्मकरगण – workforce
  • परिबृंहण – additional work

पाठ १.३


Work Theme

  • अहं आगामिवर्षे करिष्यामि | – Next year, I will work.
  • मम अन्यत् कार्यम् अस्ति| – I have some other work.
  • गृहकार्यं सर्वं समाप्तं वा? – Finished your household work?
  • ममापि बहुनि कार्याणि सन्ति – I have a lot of work to do myself.
अहं पठामि में पढ़ता हूँ
त्वं पठसि तू पढ़ता है
स: पठति वह पढ़ता है
अहं खादामि में खाता हूँ
त्वं खादसि तू खाता है
स: खादति वह खाता है
अहं पश्यामि में देखता हूँ
त्वं पश्यसि तू देखता है
स: पश्यति वह देखता है
  • अहं वाणिज्यशास्त्रं पठामि|
  • नवमकक्श्यायां पठामि|
  • संस्कृतं पठामि|
  • त्वं प्रातः किं खादसि?
  • त्वं फलानि अपि खादसि?
  • पुनः कदाचित् पश्यामि (Meet you again)
  • मासे कति चित्राणि पश्यति? – How often do you go to films in a month?

 

Bookish..

Untitled

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सुभाषित


विवेक-चूड़ामणि

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटीभि:।।11।।

Work leads to purification of the mind, not to perception of the Reality. The realisation of Truth is brought about by discrimination and not in the least by ten million of acts.

कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तुपलब्धि (तत्वदृष्टि) – के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता।


पठन/मनन


Following excerpt is from Kathak griha sutra. It is commenraty by Devapala on first Sun sighting Sanskar for newborn. Try to interpret it by self.

KathakGrihasutra_0

KathakGrihasutra

 

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १७ (साहित्य विशेष)

Gavya17

 


शब्द सिन्धु


अनहङ्कारः (anaha.nkaaraH) = being without false egoism
अनात्मनः (anaatmanaH) = of one who has failed to control the mind
अनादर (anaadara) = lack of respect
अनादि (anaadi) = without beginning
अनादिं (anaadiM) = without beginning
अनादित्व (anaaditva) = non-beginning
अनादित्वात् (anaaditvaat.h) = due to eternity
अनानसफलम् (anaanasaphalam.h) = (n) pineapple
अनामयं (anaamayaM) = without miseries
अनारम्भात् (anaarambhaat.h) = by nonperformance
अनार्य (anaarya) = persons who do not know the value of life
अनावृत्तिं (anaavRittiM) = no return
अनाशिनः (anaashinaH) = never to be destroyed
अनाश्रितः (anaashritaH) = without taking shelter
अनाहत (anaahata) = unbeaten
अनिकेतः (aniketaH) = having no residence
अनिच्छन् (anichchhan.h) = without desiring
अनित्य (anitya) = uncertain/temporary/ephemeral/transient
अनित्यं (anityaM) = temporary
अनित्यः (anityaH) = nonpermanent
अनियमित (aniyamita) = irregular
अनिर्देश्यं (anirdeshyaM) = indefinite
अनिर्विण्णचेतस (anirviNNachetasa) = without deviation
अनिलः (anilaH) = wind or air
अनिलचुल्लि (anilachulli) = (f) gas (LPG)
अनिवार्य (anivaarya) = (adj) compulsary
अनिश्चयत् (anishchayat.h) = due to non-determination (having not decided)
अनिष्ट (anishhTa) = and undesirable
अनिष्टं (anishhTaM) = leading to hell
अनीश्वरं (aniishvaraM) = with no controller
अनु (anu) = following
अनुकम्पार्थं (anukampaarthaM) = to show special mercy
अनुकारि (anukaari) = like
अनुचारय (anuchaaraya) = (causative of anu+car) follow
अनुचिन्तयन् (anuchintayan.h) = constantly thinking of
अनुतिष्ठन्ति (anutishhThanti) = regularly perform
अनुत्तमं (anuttamaM) = the finest
अनुत्तमां (anuttamaaM) = the highest
अनुदर्शनं (anudarshanaM) = observing
अनुदानं (anudaanaM) = (n) donation, grant
अनुदिनं (anudinaM) = daily
अनुद्दिश्य (anuddishya) = having targetted or aimed at
अनुद्योगिता (anudyogitaa) = unemployment
अनुद्योगी (anudyogii) = unemployed
अनुद्विग्नमनाः (anudvignamanaaH) = without being agitated in mind
अनुद्वेगकरं (anudvegakaraM) = not agitating
अनुपकारिणे (anupakaariNe) = irrespective of return
अनुपश्यति (anupashyati) = one tries to see through authority
अनुपश्यन्ति (anupashyanti) = can see
अनुपश्यामि (anupashyaami) = do I foresee
अनुप्रपन्नाः (anuprapannaaH) = following
अनुबन्ध (anubandha) = (m) result, effect
अनुबन्धं (anubandhaM) = of future bondage
अनुबन्धः (anubandhaH) = (m) annexure


पाठ


1 2

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • शठे शाठ्यं समाचरेत्।
  • शत्रवो यान्ति मित्रत्वं विशुद्धे सति चेतसा ।
  • शत्रोरपि गुणा वाच्याः दोषा वाच्या गुरोरपि ।
  • शरीरं पातयामि कार्यं वा साधयामि।
  • शास्त्रं हि निश्चितधियां क्व न सिद्धमेति।
  • शिरो वा तद्यज्ञस्य यदातिथ्यम् ।
  • शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ।
  • शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ।

सुभाषित


प्रीणाति य सुचरितैः पितरं स पुत्रो
यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् ।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यत्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥

पिता को अपने सद्वर्तन से खुश करनेवाला पुत्र, केवल पति का हित चाहनेवाली पत्नी, और जो सुख-दुःख में समान आचरण रखता हो ऐसा मित्र – ये तीन जगत में पुण्यवान को हि प्राप्त होते हैं ।


पठन/स्मरण/मनन


चम्पू श्रव्य काव्य का एक भेद है, अर्थात गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। गद्य तथा पद्य मिश्रित काव्य को “चंपू” कहते हैं।

गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते – (साहित्य दर्पण ६ / ३३६)
काव्य की इस विधा का उल्लेख साहित्यशास्त्र के प्राचीन आचार्यों- भामह, दण्डी, वामन आदि ने नहीं किया है। यों गद्य पद्यमय शैली का प्रयोग वैदिक साहित्य, बौद्ध जातक, जातकमाला आदि अति प्राचीन साहित्य में भी मिलता है। चम्पूकाव्य परंपरा का प्रारम्भ हमें अथर्व वेद से प्राप्त होता है। चम्पू नाम के प्रकृत काव्य की रचना दसवीं शती के पहले नहीं हुई। त्रिविक्रम भट्ट द्वारा रचित ‘नलचम्पू’, जो दसवीं सदी के प्रारम्भ की रचना है, चम्पू का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अतिरिक्त सोमदेव सुरि द्वारा रचित यशःतिलक, भोजराज कृत चम्पू रामायण, कवि कर्णपूरि कृत आनन्दवृन्दावन, गोपाल चम्पू (जीव गोस्वामी), नीलकण्ठ चम्पू (नीलकण्ठ दीक्षित) और चम्पू भारत (अनन्त कवि) दसवीं से सत्रहवीं शती तक के उदाहरण हैं। यह काव्य रूप अधिक लोकप्रिय न हो सका और न ही काव्यशास्त्र में उसकी विशेष मान्यता हुई। हिन्दी में यशोधरा (मैथिलीशरण गुप्त) को चम्पू-काव्य कहा जाता है, क्योंकि उसमें गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है।

गद्य और पद्य के इस मिश्रण का उचित विभाजन यह प्रतीत होता है कि भावात्मक विषयों का वर्णन पद्य के द्वारा तथा वर्णनात्मक विषयों का विवरण गद्य के द्वारा प्रस्तुत किया जाय। परन्तु चंपूरचयिताओं ने इस मनोवैज्ञानिक वैशिष्ट्य पर विशेष ध्यान न देकर दोनों के संमिश्रण में अपनी स्वतंत्र इच्छा तथा वैयक्तिक अभिरुचि को ही महत्व दिया है।

Let us read and imbibe this version of Sanskrit by पठन/स्मरण/मनन of भोज रचित चंपू रामायण – बाल काण्ड

Read the book here: https://www.scribd.com/doc/100068695/Bhoja-Champu-Champu-Ramayana

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संस्कृत गोवीथी : : गव्य 4 (धर्म)

Gavya_4


शब्द सिन्धु


धर्मसारथि –  charioteer of dharma
धर्मवत् – accompanied by dharman or the law
धर्मार्थ – religious merit and wealth
धर्मागम – Law book


पाठ १.३


 

Bookish

Capture

Capture१

Now, it is easy to understand following set of sentences.

Capture२Simple Sentences for daily usage

  • प्रयत्नं करोमि – I will try.
  • तथा न वदतु – Don’t say that!
  • अहं किं करोमि – What can I do?
  • अवश्यं आगच्छामि – Certainly, I will come

सुभाषित


विद्या मित्रं प्रवासेषु ,भार्या मित्रं गृहेषु च |व्याधितस्यौषधं मित्रं , धर्मो मित्रं मृतस्य च ||

अर्थात् : ज्ञान यात्रा में ,पत्नी घर में, औषध रोगी का तथा धर्म मृतक का ( सबसे बड़ा ) मित्र होता है |


पठन/मनन


पञ्चतन्त्रम् – इत्यस्मात् पुनर्निर्दिष्टम्
लेखक – विष्णुशर्मा
कथामुखम्
ओं नमः श्रीशारदागणपतिगुरुभ्यः । महाकविभ्यो नमः ।


ब्रह्मा रुद्रः कुमारो हरिवरुणयमा वह्निरिद्रः कुबेरः
चन्द्रादित्यौ सरस्वत्यदधियुगनगा वायुरुर्वीभुजङ्गाः ।
सिढा नद्यो श्विनौ श्रीर् दितिर् अदितिसुता मातरश् चंडिकाद्या
वेदास्तीर्थानि यक्षा गणवसुमुनयः पन्तु नित्यं ग्रहाश्च ॥
मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।
चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः ॥०.१॥
सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम्।
तन्त्रैः पञ्चभिरैतच्चकार सुममोहरं शास्त्रम् ॥०.२॥
तद् यथानुश्रूयते। अस्ति दक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम्। तत्र सकलार्थिसार्थकल्पद्रुमः प्रवरङक्पमुकुटमणिम् अजरीचयचर्चितचरणयुगलः सकलकल्पपारंगतेऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव। तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसो वसुशक्तिरुग्रशक्तिरनेकशक्तिश्चेति नामानो बभूवुः।
अथ राजा तान् शास्त्रविमुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय प्रोवाच । भोः ज्ञातम् एतद् भवद्भिर्यः ममैते त्रयोऽपि पुत्राः शास्त्रविमुखा विवेकहीनाश्च। तदेतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्यम् आवहति । अथवा साध्विदम् उच्यते
अजातमृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम्।
यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥०.३॥
वरं गर्भस्रवो वरं मृतेषु नैवाभिगमनम्
वरं जातः प्रोतो वरमपि च कंयैव जनिता।
वरं वन्ध्या भार्या वरमपि च गर्भेषु वसतिः
न चाविदग्धान् रूपद्रविणगुणयुक्तोऽपि तनयः॥ ०.४॥
किं तया क्रियते धेन्वा या न सूते न दुग्धदा।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान्॥ ०.५॥
तदेतेषां यथा बुद्धिप्रबोधनं भवति तथा कोऽप्युपायो नुष्ठीयताम् । अत्र च मद्दत्तां वृत्तिं भुञ्जानानां पण्डितानां पञ्चशती तिष्ठति।
ततो यथा मम मनोरथाः सिद्धिं यान्ति तथानुष्ठीयतामिति।
तत्रैकः प्रोवाचदेव द्वादशभिर्वर्षैर्व्याकरणं श्रूयते । ततो धर्मशास्त्राणि आदीनि अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि। एवञ्च ततो दर्मार्थकामशास्त्राणि ज्ञायन्ते। ततः प्रतिबोधनं भवति।
अथ तन्मध्यतः सुमतिर्नाम सचिवः प्राह । अशाश्वतो यं जीवितव्यविषयः। प्रभूतकालज्ञेयानि शब्दशास्त्राणि। तत् सङ्क्षेपमात्रं शास्त्रं किञ्चितेतेषां प्रबोधनार्थं चिन्त्यतामिति। उक्तं च यतः
अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम्
स्वल्पं तथायुर्वहवश्च विघ्नाः।
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु
हंसैर्ययथा क्षीरमिवाम्बुध्यात् ॥ ०.६॥
तदत्रास्ति विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणः सकलशास्त्रपारङ्गमः छात्रसंसदि लब्धकीर्तिः। तस्मै समर्पयतु एतान्। स नूनं द्राक् प्रबुद्धान् करिष्यति इति।
स राजा तदाकर्ण्य विष्णुशर्माणमाहूय प्रोवाच । भोः भगवन् मदनुग्रहार्थमेतान् अर्थशास्त्रं प्रति द्राग् यथानंयषड्दर्शनान् विदधासि तथा कुरु। तदाहं त्वां शासनशतेन योजयिष्यामि।
अथ विष्णुशर्मा तं राजानमाहदेव श्रूयतां मे तथ्यवचनम्। नाहं विद्याविक्रयं शासनशतेनापि करोमि। पुनरेतान् तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।
अथासौ राजा तां ब्राह्मणस्यासम्भाव्यां प्रतिज्ञां श्रुत्वा ससचिवः प्रहृष्टो विस्मन्वितस्तस्मै सादरं तान् कुमारान् समर्प्य परां निर्व्यतिम् आजगाम। विष्णुशर्मणापि तान् आदाय तदर्थं मित्रभॆदमित्रप्राप्तिकाकोलूकीयलब्धप्रणाशापरीक्षितकारकाणि चेति पञ्चन्त्राणि रचयित्वा पाठिताः ते राजपुत्राः। तेपि तानधीत्य मासषट्केन यथोक्ताः संवृत्ताः। ततः प्रभृत्येतत् पञ्चतन्त्रं नाम नीतिशास्त्रं बालबोधनार्थं भूतले प्रवृत्तम्। किं बहुना
अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं श्रुणोति च।
न पराभवमवाप्नोति शक्रादपि कदाचन ॥०.७॥
इति कथामुखम्।

 

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 7

Gavya7


शब्द सिन्धु


कवची (kavachii) = with armor
कवयः (kavayaH) = the intelligent
ज्ञायसे (GYaayase) = can to be known
ज्ञास्यसि (GYaasyasi) = you can know
ज्ञेयं (GYeyaM) = be known
ज्ञेयः (GYeyaH) = should be known
ज्ञेयोसि (GYeyosi) = You can be known


पाठ


संधि

1

Apply above simple sandhi rules on below paragraph, wherever you feel applicable.

2व्यवहार वाक्य

  • समय समागत:| – समय पर आ गए|
  • भवन्तं जानामि| – आपको जनता हूँ|
  • तथैव अस्तु| – वैसा ही हो|
  • जानामि भो:| – जानता हूँ|

सुभाषित


शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
सुजनाः न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने ॥ ॥

Not every mountain has gems in it, and not every
elephant is adorned with pearls . Not every forest
is blessed with sandal trees, and good people are
not to be found everywhere.


पठन/मनन


उषा वंदना

http://sanskritdocuments.org/doc_deities_misc/salutedawn.html?lang=sa

उषावंदनम्
   Salutation of the Dawn

अद्य भावय सुदिनम्!
Look to this Day!
जीवभूतः काल एषः । प्राणस्य प्राणः ।
For it is Life, the very Life of Life.
अस्मिन् स्वल्पकाले सत्यमये तव सतः सत्यं तिष्ठति
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence;
विकासानन्देन
The Bliss of Growth,
कर्मश्रिया
The Glory of Action,
सौन्दर्यशोभया ।
The Splendor of Beauty;
ह्यस्तु स्वप्नः ।
For Yesterday is but a Dream,
श्वस्तु आभासः ।
And Tomorrow is only a Vision;
कर्मकुशलतया आचरिते अद्य
But Today well lived makes every
गतदिनानि आनन्दस्वप्नमयानि भवन्ति ।
Yesterday a Dream of Happiness, and every
भाविदिनानि आशाप्रभया ज्वलन्ति ।
Tomorrow a Vision of Hope.
अतः सुदिनं अद्य सम्यक् भावय!
Look well therefore to this Day!
एषा उषाभिवन्दना!
Such is the Salutation of the Dawn.

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ९(हनुमान विशेष)

Gavya9

 


शब्द सिन्धु


अंशभूतं (a.nshabhuutaM) = has been a part of her
अंशः (a.nshaH) = fragmental particle
अंशुमान् (a.nshumaan.h) = radiant
अंशेन (a.nshena) = part
अकर्तारं (akartaaraM) = as the nondoer
अकर्म (akarma) = inaction
अकर्मकृत् (akarmakRit.h) = without doing something
अकर्मणः (akarmaNaH) = than no work
अकर्मणि (akarmaNi) = in not doing prescribed duties
अकल्मषं (akalmashhaM) = freed from all past sinful reactions
अकस्मात् (akasmaat.h) = by chance
अकारः (akaaraH) = the first letter
अकारो (akaaro) = the letter `a’
अकार्य (akaarya) = and forbidden activities
अकार्यं (akaaryaM) = what ought not to be done
अकार्ये (akaarye) = and what ought not to be done
अकीर्ति (akiirti) = infamy
अकीर्तिं (akiirtiM) = infamy
अकीर्तिः (akiirtiH) = ill fame
अकुर्वत् (akurvat.h) = did
अकुर्वत (akurvata) = did they do
अकुशलं (akushalaM) = inauspicious


पाठ


Untitled

2

3


सुभाषित


कृतम् हनुमता कार्यम् सुमहद्भुवि दुर्लभम् |
मनसापि यदन्येन न शक्यम् धरणीतले || ६-१-२

“A very outstanding work, the most arduous in the world has been done by Hanuman, which could not be carried out even in thought by any other on the surface of this earth.”


पठन/मनन/स्मरण


आञ्जनेय गायत्रि
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि ।
तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ॥
Meaning: I wish to know the son of a~njani.
I meditate on vAyu putra.
May that hanumAn propel us.

आञ्जनेय त्रिकाल वंदनं
प्रातः स्मरामि हनुमन् अनन्तवीर्यं
श्री रामचन्द्र चरणाम्बुज चंचरीकम् ।
लंकापुरीदहन नन्दितदेववृन्दं
सर्वार्थसिद्धिसदनं प्रथितप्रभावम् ॥

Meaning: I remember that hanuman during
the early hours as one whose valor is
immeasurable. I remember that bee who
stays always at shrI ramachandra’s
feet. I remember HIM who burnt la.nka
and made gods happy. I remember him
who is the store house of all siddhis
and who is capable of anything.
माध्यम् नमामि वृजिनार्णव तारणैकाधारं
शरण्य मुदितानुपम प्रभावम् ।
सीताधि सिंधु परिशोषण कर्म दक्षं
वंदारु कल्पतरुं अव्ययं आञ्ज्नेयम् ॥

Meaning: I bow that Anjaneya svAmi during
the mid day as the one capable Person
to crossing the ocean, who blesses the
person with enormous happiness when
he/she takes refuge in HIM. He is
entrusted with the responsibility of
annihilating sIta’s sorrows. He is like
a wish-fulfilling tree for one who bows to HIM.
सायं भजामि शरणोप स्मृताखिलार्ति
पुञ्ज प्रणाशन विधौ प्रथित प्रतापम् ।
अक्षांतकं सकल राक्षस वंश
धूम केतुं प्रमोदित विदेह सुतं दयालुम् ॥

Meaning: I worship that A~njaneya svAmi
during the evening as the one who saves
everyone who takes HIS name. He the most
valorous one, who killed akShA and was
the dhUmaketu for all the demons.
He also made sIta devi (daughter of
videha country) happy.

——-
Ravisankar S. Mayavaram

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २१ (साहित्य विशेष)

 

Gavya21

सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्‌।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेवसम्पद:॥1:30॥

[बिना सोचे-विचारे सहसा किसी काम को अंजाम नहीं देना चाहिए. अविवेक बड़ी विपत्तियों का घर है. सम्पत्तियाँ (सफलताएँ) तो गुणों पर लुब्ध होती हैं और विचारशील व्यक्ति का स्वयं ही वरण करती हैं.]


शब्द सिन्धु


अभि (abhi) = preposition
अभि+तड् (abhi+taD.h) = to strike
अभिकथनं (abhikathanaM) = (n) allegation
अभिक्रम (abhikrama) = in endeavouring
अभिचार (abhichaara) = black magic
अभिजनवान् (abhijanavaan.h) = surrounded by aristocratic relatives
अभिजातः (abhijaataH) = born of
अभिजातस्य (abhijaatasya) = of one who is born of
अभिजानन्ति (abhijaananti) = they know
अभिजानाति (abhijaanaati) = does know
अभिजायते (abhijaayate) = becomes manifest
अभिजित (abhijita) = A nakshatra between uttaraashhDhaa and shravaNa mainly centred on the star Vega. For some reason it is not usually included in the 27 nakshatras although it would make 28 if it was. adhipatii – Lord
अभिजिन्मुहूर्त (abhijin.hmuhuurta) = the most auspicious moment
अभितः (abhitaH) = everywhere
अभिद्रोहः (abhidrohaH) = (m) insurgency
अभिधानं (abhidhaanaM) = (n) designation
अभिधास्यति (abhidhaasyati) = explains
अभिधीयते (abhidhiiyate) = is called
अभिनन्दती (abhinandatii) = praises
अभिनय (abhinaya) = acting
अभिनिवेश (abhinivesha) = possessiveness
अभिन्यासः (abhinyaasaH) = (m) layout
अभिपुष्टिः (abhipushhTiH) = (f) affirmation
अभिप्रवृत्तः (abhipravRittaH) = being fully engaged
अभिप्रायः (abhipraayaH) = (m) opinion
अभिभवति (abhibhavati) = transforms
अभिभवात् (abhibhavaat.h) = having become predominant
अभिभूय (abhibhuuya) = surpassing
अभिमनः (abhimanaH) = conceit
अभिमान (abhimaana) = self-importance
अभिमुखाः (abhimukhaaH) = towards


पाठ (सातवलेकर पाठमाला से)


1 2 3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • न कञ्च न वसतौ प्रत्याचक्षीत ।
  • न कालमतिवर्तन्ते महान्तः स्वेषु कर्मसु ।
  • न गृहं गृहमित्याहुः गृहिणी गृहमुच्यते।
  • न जातु कामः कामानामुपभोगे न शाम्यति।
  • न जातु कामः कामानाम् उपभोगे न शाम्यति।
  • न तद् दानं प्रशंसन्ति ये न वृत्तिर्विपद्यते ।
  • न नश्यति तमो नाम कृतया दीपवार्तया ।
  • न रत्नम् अन्विष्यति मृग्यते हि तत्।
  • न वक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ।
  • न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।
  • न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ।
  • न विश्वसेत् अविश्वस्ते विश्वस्ते नाति विश्वसेत्।
  • न शक्या हि स्त्रियो रोद्धुं प्रस्थिता दयितं प्रति ।
  • न हि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति ।
  • न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति ।
  • न हि दुष्करमस्तीह किञ्चदध्यवसायिनाम् ।
  • न हि निर्विण्णमागम्य कश्चित् प्राप्नोति शोभनम् ।
  • न हि सर्वः सर्वं जानाति ।
  • न ह्यमूला जनश्रुतिः।

सुभाषित


येषां बाहुबलं न अस्ति येषां न अस्ति मनोबलम् ।
तेषां चंद्रबलं देवः किं करोति अम्बरे स्थितम् ॥ ॥

Those who do not have armstrength (physical strength) and those who do not have mental strength, What good can moon’s strength do to them being resident in the sky ?


पठन/स्मरण


You will always notice two points about Sanskrit Mahakavya(s).

  1. Vivid detailed description of mother nature and her changing colors with season
  2. Dharma / Niti

Sharing some notable excerpts from किरातार्जुनीयम्

धर्म/व्यवहार/निति अंश

क्रियासु युक्तैर्नृपचारचक्षुषो न वञ्चनीया: प्रभवोsनुजीविभि:।
अतोsर्हसि क्षंतुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।।1:4।।
स किंसखा साधु न शास्ति योsधिपं हितान्न य: संश्रृणुते स किंप्रभु:।
सदाsनुकूलेषु हि कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसंपद: ॥1:5॥

व्रजंति ते मूढधिप:है पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिन:।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिता इवेषव:॥1:30॥

अवंध्यकोपस्य विहन्तुरापदां भवंति वश्या: स्वमेव देहिन:।
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातदार्हेन न विद्विषादर:॥1:33॥

सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्‌।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेवसम्पद:॥1:30॥

नैसर्गिक वर्णन

Read following one from Sarga 5

उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मादुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्तादाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीं ।। ५.३९ ।।

I must share translation for this.

स्थल-कमलिनी का वन. उसमें फूले हुए कमल. वायु-चक्र के कारण चारों ओर फूलों से उड़ते पराग-कण. ऊपर आकाश में पहुंचकर वे मंडलाकार फैल जाते हैं. लगता है जैसे सुवर्णमय छत्र तन गया हो.

In 4th Sarga, there is beautiful description of Sharad Ritu!

किरातार्जुनीयम्/चतुर्थः सर्गः

ततः स कूजत्कलहंसमेखलां सपाकसस्याहितपाण्डुतागुणां ।
उपाससादोपजनं जनप्रियः प्रियां इवासादितयौवनां भुवं ।। ४.१ ।।

विनम्रशालिप्रसवौघशालिनीरपेतपङ्काः ससरोरुहाम्भसः ।
ननन्द पश्यन्नुपसीम स स्थलीरुपायनीभूतशरद्गुणश्रियः ।। ४.२ ।।

निरीक्ष्यमाणा इव विस्मयाकुलैः पयोभिरुन्मीलितपद्मलोचनैः ।
हृतप्रियादृष्टिविलासविभ्रमा मनोऽस्य जह्रुः शफरीविवृत्तयः ।। ४.३ ।।

तुतोष पश्यन्कलमस्य स अधिकं सवारिजे वारिणि रामणीयकं ।
सुदुर्लभे नार्हति कोऽभिनन्दितुं प्रकर्षलक्ष्मीं अनुरूपसंगमे ।। ४.४ ।।

नुनोद तस्य स्थलपद्मिनीगतं वितर्कं आविष्कृतफेनसंतति ।
अवाप्तकिञ्जल्कविभेदं उच्चकैर्विवृत्तपाठीनपराहतं पयः ।। ४.५ ।।

कृतोर्मिरेखं शिथिलत्वं आयता शनैः शनैः शान्तरयेण वारिणा ।
निरीक्ष्य रेमे स समुद्रयोषितां तरङ्गितक्ष्ॐअविपाण्डु सैकतं ।। ४.६ ।।

मनोरमं प्रापितं अन्तरं भ्रुवोरलंकृतं केसररेणुणाणुना ।
अलक्तताम्राधरपल्लवश्रिया समानयन्तीं इव बन्धुजीवकं ।। ४.७ ।।

नवातपालोहितं आहितं मुहुर्महानिवेशौ परितः पयोधरौ ।
चकासयन्तीं अरविन्दजं रजः परिश्रमाम्भःपुलकेन सर्पता ।। ४.८ ।।

कपोलसंश्लेषि विलोचनत्विषा विभूषयन्तीं अवतंसकोत्पलं ।
सुतेन पाण्डोः कलमस्य गोपिकां निरीक्ष्य मेने शरदः कृतार्थता ।। ४.९ ।।

उपारताः पश्चिमरात्रिगोचरादपारयन्तः पतितुं जवेन गां ।
तं उत्सुकाश्चक्रुरवेक्षणोत्सुकं गवां गणाः प्रस्नुतपीवरौधरसः ।। ४.१० ।।

परीतं उक्षावजये जयश्रिया नदन्तं उच्चैः क्षतसिन्धुरोधसं ।
ददर्श पुष्टिं दधतं स शारदीं सविग्रहं दर्पं इवाधिपं गवां ।। ४.११ ।।

विमुच्यमानैरपि तस्य मन्थरं गवां हिमानीविशदैः कदम्बकैः ।
शरन्नदीनां पुलिनैः कुतूहलं गलद्दुकूलैर्जघनैरिवादधे ।। ४.१२ ।।

गतान्पशूनां सहजन्मबन्धुतां गृहाश्रयं प्रेम वनेषु बिभ्रतः ।
ददर्श गोपानुपधेनु पाण्डवः कृतानुकारानिव गोभिरार्जवे ।। ४.१३ ।।

परिभ्रमन्मूर्धजषट्पदाकुलैः स्मितोदयादर्शितदन्तकेसरैः ।
मुखैश्चलत्कुण्डलरश्मिरञ्जितैर्नवातपामृष्टसरोजचारुभिः ।। ४.१४ ।।

निबद्धनिःश्वासविकम्पिताधरा लता इव प्रस्फुरितैकपल्लवाः ।
व्यपोढपार्श्वैरपवर्तितत्रिका विकर्षणैः पाणिविहारहारिभिः ।। ४.१५ ।।

व्रजाजिरेष्वम्बुदनादशङ्किनीः शिखण्डिनां उन्मदयत्सु योषितः ।
मुहुः प्रणुन्नेषु मथां विवर्तनैर्नदत्सु कुम्भेषु मृदङ्गमन्थरं ।। ४.१६ ।।

स मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः ।
निरीक्षितुं नोपरराम बल्लवीरभिप्रनृत्ता इव वारयोषितः ।। ४.१७ ।।

पपात पूर्वां जहतो विजिह्मतां वृषोपभुक्तान्तिकसस्यसम्पदः ।
रथाङ्गसीमन्तितसान्द्रकर्दमान्प्रसक्तसम्पातपृथक्कृतान्पथः ।। ४.१८ ।।

जनैरुपग्रामं अनिन्द्यकर्मभिर्विविक्तभावेङ्गितभूषणैर्वृताः ।
भृशं ददर्शाश्रममण्डपोपमाः सपुष्पहासाः स निवेशवीरुधः ।। ४.१९ ।।

ततः स सम्प्रेक्ष्य शरद्गुणश्रियं शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषं ।
उवाच यक्षस्तं अचोदितोऽपि गां न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति ।। ४.२० ।।

इयं शिवाया नियतेरिवायतिः कृतार्थयन्ती जगतः फलैः क्रियाः ।
जयश्रियं पार्थ पृथूकरोतु ते शरत्प्रसन्नाम्बुरनम्बुवारिदा ।। ४.२१ ।।

उपैति सस्यं परिणामरम्यता नदीरनौद्धत्यं अपङ्कता महीं ।
नवैर्गुणैः सम्प्रति संस्तवस्थिरं तिरोहितं प्रेम घनागमश्रियः ।। ४.२२ ।।

पतन्ति नास्मिन्विशदाः पतत्त्रिणो धृतेन्द्रचापा न पयोदपङ्क्तयः ।
तथापि पुष्णाति नभः श्रियं परां न रम्यं आहार्यं अपेक्षते गुणं ।। ४.२३ ।।

विपाण्डुभिर्ग्लानतया पयोधरैश्च्युताचिराभागुणहेमदामभिः ।
इयं कदम्बानिलभर्तुरत्यये न दिग्वधूनां कृशता न राजते ।। ४.२४ ।।

विहाय वाञ्छां उदिते मदात्ययादरक्तकण्ठस्य रुते शिखण्डिनः ।
श्रुतिः श्रयत्युन्मदहंसनिःस्वनं गुणाः प्रियत्वेऽधिकृता न संस्तवः ।। ४.२५ ।।

अमी पृथुस्तम्बभृतः पिशङ्गतां गता विपाकेन फलस्य शालयः ।
विकासि वप्राम्भसि गन्धसूचितं नमन्ति निघ्रातुं इवासितोत्पलं ।। ४.२६ ।।

मृणालिनीनां अनुरञ्जितं त्विषा विभिन्नं अम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं द्रुतं धनुष्खण्डं इवाहिविद्विषः ।। ४.२७ ।।

विपाण्डु संव्यानं इवानिलोद्धतं निरुन्धतीः सप्तपलाशजं रजः ।
अनाविलोन्मीलितबाणचक्षुषः सपुष्पहासा वनराजियोषितः ।। ४.२८ ।।

अदीपितं वैद्युतजातवेदसा सिताम्बुदच्छेदतिरोहितातपं ।
ततान्तरं सान्तरवारिशीकरैः शिवं नभोवर्त्म सरोजवायुभिः ।। ४.२९ ।।

सितच्छदानां अपदिश्य धावतां रुतैरमीषां ग्रथिताः पतत्रिणां ।
प्रकुर्वते वारिदरोधनिर्गताः परस्परालापं इवामला दिशः ।। ४.३० ।।

विहारभूमेरभिघोषं उत्सुकाः शरीरजेभ्यश्च्युतयूथपङ्क्तयः ।
असक्तं ऊधांसि पयः क्षरन्त्यमूरुपायनानीव नयन्ति धेनवः ।। ४.३१ ।।

जगत्प्रसूतिर्जगदेकपावनी व्रजोपकण्ठं तनयैरुपेयुषी ।
द्युतिं समग्रां समितिर्गवां असावुपैति मन्त्रैरिव संहिताहुतिः ।। ४.३२ ।।

कृतावधानं जितबर्हिणध्वनौ सुरक्तगोपीजनगीतनिःस्वने ।
इदं जिघत्सां अपहाय भूयसीं न सस्यं अभ्येति मृगीकदम्बकं ।। ४.३३ ।।

असावनास्थापरयावधीरितः सरोरुहिण्या शिरसा नमन्नपि ।
उपैति शुष्यन्कलमः सहाम्भसा मनोभुवा तप्त इवाभिपाण्डुतां ।। ४.३४ ।।

अमी समुद्धूतसरोजरेणुना हृता हृतासारकणेन वायुना ।
उपागमे दुश्चरिता इवापदां गतिं न निश्चेतुं अलं शिलीमुखाः ।। ४.३५ ।।

मुखैरसौ विद्रुमभङ्गलोहितैः शिखाः पिशङ्गीः कलमस्य बिभ्रती ।
शुकावलिर्व्यक्तशिरीषक्ॐअला धनुःश्रियं गोत्रभिदोऽनुगच्छति ।। ४.३६ ।।

इति कथयति तत्र नातिदूरादथ ददृशे पिहितोष्णरश्मिबिम्बः ।
विगलितजलभारशुक्लभासां निचय इवाम्बुमुचां नगाधिराजः ।। ४.३७ ।।

तं अतनुवनराजिश्यामितोपत्यकान्तं नगं उपरि हिमानीगौरं आसद्य जिष्णुः ।
व्यपगतमदरागस्यानुसस्मार लक्ष्मीं असितं अधरवासो बिभ्रतः सीरपाणेः ।। ४.३८ ।।

इति भारविकृतौ महाकाव्ये किरातार्जुनीये चतुर्थः सर्गः ।

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १०(हनुमान विशेष)

Gavya10


शब्द सिन्धु


अकृतबुद्धित्वात् (akRitabuddhitvaat.h) = due to unintelligence
अकृतात्मानः (akRitaatmaanaH) = those without self-realisation
अकृतेन (akRitena) = without discharge of duty
अकृत्वा (akRitvaa) = without doing (from kRi)
अकृत्स्नविदाः (akRitsnavidaaH) = persons with a poor fund of knowledge
अक्रियाः (akriyaaH) = without duty
अक्रोध (akrodha) = freedom from anger
अक्रोधः (akrodhaH) = freedom from anger
अक्लेद्यः (akledyaH) = insoluble
अखिल (akhila) = entire
अखिलं (akhilaM) = whole
अखिलगुरु (akhilaguru) = preceptor for all, also all types of long syllable letters
अगत (agata) = not past
अगतसूंस्च (agatasuu.nscha) = agata + asuun.h + cha:undeparted life + and (living people)
अगत्वा (agatvaa) = without going (from gam.h)
अगम (agama) = proof of the trustworthiness of a source of knowledge
अगस्तमास (agastamaasa) = month of August
अगोचर (agochara) = (adj) unknown
अग्नि (agni) = fire
अग्निः (agniH) = fire
अग्निपर्वतः (agniparvataH) = (m) volcano, volcanic cone
अग्निपेतिका (agnipetikaa) = (f) matchbox
अग्निशलाका (agnishalaakaa) = (f) matchstick
अग्निषु (agnishhu) = in the fires
अग्नौ (agnau) = in the fire of consummation
अग्र (agra) = (neut in this sense) tip
अग्रं (agraM) = at the tip
अग्रजः (agrajaH) = elder
अग्रतः (agrataH) = (let the two go) before (me)
अग्रदीपः (agradiipaH) = (m) headlight
अग्रे (agre) = in front of/ahead/beforehand


पाठ


1 2 3


सुभाषित – हनुमान विशेष


स सूर्याय महेन्द्राय पवनाय स्वयंभुवे |
भूतेभ्यश्चाञ्जलिं कृत्वा चकार गमने मतिम् || ५-१-८

He saluted with joined palms to the Sun-God, Lord Indra, God of Wind, Lord Brahma and Bhutas and decided to leave.

 


पठन/मनन – हनुमान विशेष


॥ श्रीहनुमत्सूक्तम् ॥
श्रीमन्तो सर्वलक्षणसम्पन्नो जयप्रदः
सर्वाभरणभूषित उदारो महोन्नतोष्ट्रारूढः
केसरीप्रियनन्न्दनो वायुतनूजो यथेच्छं पम्पातीरविहारी
गन्धमादनसञ्चारी हेमप्राकाराञ्चितकनककदलीवनान्तरनिवासी
परमात्मा वनेचरशापविमोचनो
हेमकनकवर्णो नानारत्नखचिताममूल्यां मेखलां च स्वर्णोपवीतं
कौशेयवस्त्रं च बिभ्राणः सनातनो परमपुरषो
महाबलो अप्रमेयप्रतापशाली रजितवर्णः
शुद्धस्पटिकसङ्काशः पञ्चवदनः
पञ्चदशनेत्रस्सकलदिव्यास्त्रधारी
श्रीसुवर्चलारमणो महेन्द्राद्यष्टदिक्पालक-
त्रयस्त्रिंशद्गीर्वाणमुनिगणगन्धर्वयक्षकिन्नरपन्नगासुरपूजित
पादपद्मयुगलः नानावर्णः कामरूपः
कामचारी योगिध्येयः श्रीहनुमान्
आञ्जनेयः विराट्रूपी विश्वात्मा विश्वरूपः
पवननन्दनः पार्वतीपुत्रः
ईश्वरतनूजः सकलमनोरथान्नो ददातु।

इदं श्रीहनुमत्सूक्तं यो धीमानेकवारं पठेद्यदि
सर्वेभ्यः पापेभ्यो विमुक्तो भूयात् ।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३१ (शंकराचार्य विशेष)

Gavuya31

What is Pranayam to Adi Shankaracharya?

चित्तादिसर्वभावेषु ब्रह्मत्वेनैव भावनात्
निरोधः सर्व वृत्तीनां प्राणायामः स उच्यते॥

The restraint of all modifications of the mind by regarding all mental states like memories as Reality alone, is called pranayama.

अपरोक्षानुभूति


शब्द सिन्धु


विजानतः (vijaanataH) = who is in complete knowledge
विजानीताः (vijaaniitaaH) = are in knowledge
विजानीयं (vijaaniiyaM) = shall I understand
विजितात्मा (vijitaatmaa) = self-controlled
विजितेन्द्रियः (vijitendriyaH) = sensually controlled
विततः (vitataH) = are spread
वितरति (vitarati) = to distribute
वितर्क (vitarka) = discernment
वितृ (vitRi) = to distribute
वितृष्णां (vitRishhNaaM) = desirelessness
वित्त (vitta) = money
वित्तं (vittaM) = wealth
वित्तकोषः (vittakoshhaH) = (m) bank
वित्ते (vitte) = wealth
वित्तेशः (vitteshaH) = the lord of the treasury of the demigods
विद् (vid.h) = to obtain
विदः (vidaH) = who understand
विदधामि (vidadhaami) = give
विदारयति (vidaarayati) = to split apart
विदाहिनः (vidaahinaH) = burning
विदितम् (viditam.h) = known
विदितात्मनां (viditaatmanaaM) = of those who are self-realised
विदित्वा (viditvaa) = having known/realised
विदिशां (vidishaaM) = non-direction
विदुः (viduH) = understood
विदूषकः (viduushhakaH) = (m) clown, joker
विदेश (videsha) = foreign land
विदेशी (videshii) = foreigner
विद्धि (viddhi) = know for sure
विद्मः (vidmaH) = do we know
विद्महे (vidmahe) = ?
विद्यते (vidyate) = there is
विद्यनिपुणै (vidyanipuNai) = by the ace scholar Shankara (Plural is used for reverance)
विद्यया (vidyayaa) = (fem.instr.sing.) by knowledge
विद्या (vidyaa) = knowledge


पाठ


1 2

लोकोक्ति

बहुत अधिक प्रचलित और लोगों के मुँहचढ़े वाक्य लोकोक्ति के तौर पर जाने जाते हैं। इन वाक्यों में जनता के अनुभव का निचोड़ या सार होता है। इनकी उत्पत्ति एवं रचनाकार ज्ञात नहीं होते।

न अस्ति अवमानभयम् अनार्यस्य

न अस्ति अवमानभयम् अनार्यस्य

न आक्रोशात्सारमेयाणां गजो मार्गान्निवर्तते।
न काकशापेन म्रियेत धेनु:।

न तेजसां हि वय: समीक्ष्यते।

न त्यजन्ति रुतं मञ्जु काकसम्पर्कत: पिका:।

न देवचरितं चरेत्

न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।


सुभाषित


अतो गरीय: किं नु स्याद् अशर्म नरकेष्वपि।
यत् प्रियस्य प्रियं कर्तुम् अधमेन न शक्यते॥

What greater misfortune can there be even in hell than to (have) a worthless person who is (willfully) unable to do a good deed for a friend?


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


॥ एकश्लोकी ॥

किं ज्योतिस्तवभानुमानहनि मे रात्रौ प्रदीपादिकं
स्यादेवं रविदीपदर्शनविधौ किं ज्योतिराख्याहि मे ।
चक्षुस्तस्य निमीलनादिसमये किं धीर्धियो दर्शने
किं तत्राहमतो भवान्परमकं ज्योतिस्तदस्मि प्रभो ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ एकश्लोकी सम्पूर्णा ॥

Is it your light that shines in the day as the sun and as the bright
lamp in the night? Let it be. Which light shines when i close my eyes?
(in mental vision) Which light illumines in my intellctual perception?
You are that supreme light that illumines the awareness of `aham’ and
I am that light. In short `that thou art’ or `ahambrahmasmi.’
I am that by the light of which the world is illumined in the day and
the night also by the lamp, beause the Brahman is the source of all
light, agni or surya. He is the light through which the indriyas
function . When the eyes are closed, there is no perception, the
eyes implying perception through all indriyas, then the mind
functions with the help of the intellect , which in its turn
functions by the light of the atman, which is beyond body, mind and
intellect and that am I, the supreme reality, Brahman.

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