SanskritLearning

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संस्कृत साधना : पाठ : ३ (कारक और सम्बन्ध)

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नमः संस्कृताय मित्राणि ! अद्यत्वे शैत्यं निरन्तरं वर्द्धते, न वा ?
तो कल के पाठ में आपने यह जाना कि किसी भी वाक्य में क्रिया का होना अनिवार्य है और उस क्रिया के सम्पादन में जितने भी कारण होते हैं वे “कारक” कहे जाते हैं। एक श्लोक के माध्यम से छहों कारकों का नाम भी बताया था। आपको वह श्लोक अवश्य याद हो गया होगा। चलिए एक बार फिर याद दिला देते हैं-
“कर्त्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट् ॥”

अब इन छह “कारकों” और “सम्बन्ध” के विषय में समझाते हैं। यह भी बताएँगे कि किस कारक के लिए किस विभक्ति का प्रयोग होता है। सम्बोधन को छोड़कर सात विभक्तियाँ होती हैं- यह तो आप जानते ही हैं।

1] कर्त्ता = जो क्रिया को करने में स्वतन्त्र होता है उसे कर्त्ता कहते हैं अर्थात् यह सीधा सीधा क्रिया को सम्पादित करता है। “जो करता है वही कर्त्ता।” जैसे- कृष्णः खेलति – इसमें “खेलना” क्रिया को कृष्ण कर रहा है, इसलिए “कृष्ण” “कर्त्ता कारक” हुआ। कल वाले उदाहरण में- “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ना” क्रिया कौन कर रहा है ? उत्तर है- डोनाल्ड ट्रम्प, यही इस वाक्य में कर्त्ता है।

2] कर्म = जिस पदार्थ के लिए कोई क्रिया की जाती है वह पदार्थ ही उस क्रिया का कर्म होता है। जैसे – “डोनाल्ड ट्रम्प फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “फल” के लिए की जा रही है इसलिए फल “तोड़ना” क्रिया का “कर्म” हुआ।

3] करण = क्रिया की सिद्धि में जो चीज कर्त्ता की सबसे अधिक सहायक होती है वही “करण” है। “डोनाल्ड ट्रम्प डण्डे से फल तोड़ता है।” डोनाल्ड ट्रम्प कर्त्ता है और उसकी सबसे सहायक चीज है डण्डा, इसलिए “डण्डा” करण हुआ।

4] सम्प्रदान = जिसके लिए क्रिया की जाती है तथा जिसको कोई वस्तु दी जाती है उसे “सम्प्रदान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया नरेन्द्र मोदी के लिए की जा रही है इसलिए नरेन्द्र मोदी “सम्प्रदान कारक” हुआ।

5] अपादान = किसी वस्तु के दूसरी वस्तु से अलग होने की क्रिया में जो वस्तु स्थिर रहती है उसे ही “अपादान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प पेड़ से फल तोड़ता है” – पेड़ से फल अलग हो रहा है किन्तु पेड़ स्थिर है, इसलिए स्थिर वस्तु “पेड़” “अपादान” हुआ।

6) *सम्बन्ध = इसे कारकों में नहीं गिना जाता क्योंकि क्रिया के सम्पादन में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। कल इसके विषय में बताया था, आपको याद होगा।

7] अधिकरण = क्रिया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है उस स्थान को “अधिकरण” कारक कहा जाता है। “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “बाग में” हो रही है इसलिए “बाग” “अधिकरण” कारक हआ।

सम्बन्ध को मिलाकर ये कुल सात चीजें हो गईं। विभक्तियाँ भी सात ही होती हैं। इन सातों के लिए अलग-अलग एक-एक विभक्ति निर्धारित कर दी गई है। देखिए-

1] कर्त्ता = प्रथमा विभक्ति
2] कर्म = द्वितीया ”
3] करण = तृतीया ”
4] सम्प्रदान = चतुर्थी ”
5] अपादान = पञ्चमी ”
6] सम्बन्ध = षष्ठी ”
7] अधिकरण = सप्तमी ”

*सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति ही होती है किन्तु शब्द के रूप में प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। जैसे – रामः = हे राम ! (विसर्ग लुप्त हो गये)।
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कल हमने आपको एक बहुत सुंदर श्लोक बताया था-

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय ॥

इसमें “राम” शब्द के एकवचन में सभी विभक्तियों का प्रयोग किया गया है । देखिए –

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
2] रामं रमेशं भजे।
3] रामेण अभिहता निशाचरचमू।
4] रामाय तस्मै नमः ।
5] रामात् नास्ति परायणं परतरम्।
6] रामस्य दासः अस्मि अहम्।
7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे ।
8] हे राम ! मां पालय ।

कल हम आपको वाक्य में कारक पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना बताएँगे। इससे आपको अभ्यास हो जाएगा। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ भी बताएँगे। आप लोगों को कहीं कोई समस्या हो तो टिप्पणी करके निःसंकोच पूछिएगा। तब तक के लिए नमो नमः !!

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

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नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
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उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १६ (तिङन्त-प्रकरण २ :: विशेष नियम)

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पिछले पाठ में आपने लकारों के विषय में जाना। ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं से जुड़ते हैं। अब आपको कुछ विशेष बातें बताते हैं-

१) जब हम किसी धातु से कोई लकार जोड़ते हैं तब उस लकार का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अट्ठारह प्रत्ययों का प्रयोग होता है। इन प्रत्ययों को संक्षेप में तिङ् कहा जाता है। जैसे हम हिन्दी आदि भाषाओं में संक्षिप्त नामों का प्रयोग करते हैं वैसे ही संस्कृतभाषा में भी संक्षिप्त नामों का प्रयोग होता था। आप कह सकते हैं कि यह प्रवृत्ति संस्कृत से ही आयी। चूँकि इन अट्ठारह प्रत्ययों में से पहला है ‘तिप्’ और अन्तिम है ‘महिङ्’ तो तिप् का ति ले लिया और महिङ् का ङ् ले लिया जिससे ‘तिङ्’ यह संक्षिप्त नाम हो गया इन प्रत्ययों का। सारा खेल इन तिङ् प्रत्ययों का ही है। कोई भी क्रियापद इन तिङ् प्रत्ययों के बिना नहीं बन सकता। धातु के अन्त में तिङ् जोड़ना ही होता है अतः इस प्रकरण को तिङन्त-प्रकरण कहा जाता है। तिङन्त अर्थात् तिङ् प्रत्यय हैं जिनके अन्त में ‘तिङ्+अन्त’।

२) इन अट्ठारह प्रत्ययों के आरम्भिक नौ प्रत्यय ‘परस्मैपद’ और अन्तिम नौ प्रत्यय ‘आत्मनेपद’ कहलाते हैं। यह भी स्मरण रखिए कि जिन धातुओं से परस्मैपद प्रत्यय होते हैं उन धातुओं को ‘परस्मैपदी’ कहा जाता है और जिन धातुओं से आत्मनेपद प्रत्यय जुड़ते हैं उन्हें ‘आत्मनेपदी’ कहा जाता है और जिन
धातुओं से दोनों प्रकार के प्रत्यय होते हैं उन धातुओं को ‘उभयपदी’ धातु कहा जाता है।

परस्मैपद प्रत्यय
(१) (२) (३४५…)
प्रथमपुरुष तिप् तस् झि
मध्यमपुरुष सिप् थस् थ
उत्तमपुरुष मिप् वस् मस्

आत्मनेपद प्रत्यय
(१) (२) (३४५…)
प्रथमपुरुष ता आताम् झ
मध्यमपुरुष थास् आथाम् ध्वम्
उत्तमपुरुष इट् वहि महिङ्

पुरुष और वचन के विषय में आपको पहले ही बताया जा चुका है। पुरुष और वचन के अनुसार ही इन प्रत्ययों को धातु से जोड़ा जाता है। यह तो आपको लकार, तिङ् प्रत्ययों और आत्मनेपद परस्मैपद के विषय में समझाया। अगामी पाठों में आपको लकारों के प्रयोग के नियमों से अवगत करायेंगे।
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शब्दकोश :
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‘मनुष्य’ के पर्यायवाची शब्द –

१) मनुष्यः
२) मानुषः
३) मर्त्यः
४) मनुजः
५) मानवः
६) नरः

‘पुरुष’ के पर्यायवाची शब्द –

१) पुंस्
२) पञ्चजनः
३) पुरुषः
४) पूरुषः
५) नृ

* उपर्युक्त सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं।
= मनुजाः उत्सवप्रियाः भवन्ति।

प्रतिदिन सैकड़ो मनुष्य जन्मते और मरते हैं।
= प्रतिदिनं शतानि मानुषाः जायन्ते म्रियन्ते च।

मनुष्यों में कुछ तो सज्जन होते हैं,
= मानवेषु केचित् तु सज्जनाः भवन्ति,

और कुछ मनुष्य धूर्त होते हैं।
= केचित् नराः धूर्ताः च भवन्ति।

सैकडों मनुष्य धन के लिए ही मरते हैं।
= शतानि मनुजाः धनाय एव म्रियन्ते।

किन्तु उन मनुष्यों को कोई नहीं जानता।
= किन्तु तान् मनुजान् कोऽपि न जानाति।

धूर्त मनुष्य आपसी स्नेह को फाड़ देते हैं।
= धूर्ताः मनुजाः पारस्परिकं स्नेहं भिन्दन्ति।

सत्पुरुषों के लिए तो सारी पृथ्वी कुटुम्ब है।
= सत्पुरुषेभ्यः तु समग्रा वसुधा कुटुम्बकम् एव अस्ति।

वे दो ठग पुरुष उस भले पुरुष को ठगते हैं।
= तौ वञ्चकौ पुरुषौ तं भद्रं पुरुषं वञ्चयतः।

इस भले आदमी में कोई दुर्गुण नहीं है।
= अस्मिन् भद्रे पूरुषे कोऽपि दुर्गुणः न अस्ति।

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श्लोक :
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यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥३.२३॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४.११॥

(श्रीमद्भगवद्गीता)

पुस्तक में से एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २१ (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार अभ्यास)

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॥ लिट् लकार अभ्यास ॥

कुछ स्मरणीय बातें –

१) संस्कृत लिखते समय स्वरों, ह्रस्व दीर्घ मात्राओं , अनुस्वार, विसर्ग और हलन्त पर विशेष ध्यान दें। इनका उचित प्रयोग करें। कुछ लोग ‘मम’ के स्थान पर ‘मम्’ लिख देते हैं और ‘प्रणाम’ के स्थान पर ‘प्रणाम्’ – यहाँ अनावश्यक हलन्त लगा दिया गया। उसी प्रकार कुछ लोग ‘आम्’ (हाँ) के स्थान पर ‘आम’ और ‘किम्’ के स्थान पर ‘किम’ लिख देते हैं- यहाँ हलन्त लगाना भूल जाते हैं। इसी प्रकार विसर्ग और मात्रा आदि के विषय में जानना चाहिए।

२) संस्कृत में ‘ ड़ ‘ और ‘ ढ़ ‘ अक्षर नहीं होते अतः इनका प्रयोग न करें। ‘ ड़ ‘ और ‘ ङ ‘ तथा ‘ ढ़ ‘ और ‘ ढ ‘ के अन्तर को तो आप जानते ही होंगे।
‘पीड़ा’ को संस्कृत में ‘पीडा’ लिखा जाता है।
‘गूढ़’ को संस्कृत में ‘गूढ’ लिखा जाता है। इसी प्रकार ‘ड’ और ‘ङ’ , ‘व’ और ‘ब’ तथा श ष स का भी ध्यान रखें।

३) संस्कृत लिखने के लिए आपको पुरुष, वचन, लिंग, विशेष्य, विशेषण, सर्वनाम, कर्त्ता, कर्म, क्रिया, कारक-विभक्ति, धातुरूप (लकार) और शब्दरूप – इतनी बातें जानना अति आवश्यक है। इनमें से अधिकांश बातें मैं समझा चुका हूँ। अब केवल धातुरूप, शब्दरूप और कारकविभक्ति विस्तार से समझाना रह गया है। इसके बाद की बातें सन्धि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग, वाच्यपरिवर्तन आदि प्रौढ संस्कृत लिखने के लिए हैं, इन्हें सीख लेने पर भाषा में प्रौढता आ जाती है।

४) संस्कृत में किस क्रिया के लिए कौन सी धातु है- यह स्मरण रखेंगे तो अनुवाद करना बहुत सहज हो जाएगा। आगामी पाठों में यह बताते चलेंगे।

भू धातु-
बभूव (वह हुआ)/ बभूवतुः (वे दो हुए)/बभूवुः (वे सब हुए)

शब्दकोश :
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‘विद्वान्’ के पर्यायवाची शब्द –

१] विद्वान्
२] विपश्चित्
३] दोषज्ञः
४] सत्
५] सुधीः
६] कोविदः
७] बुधः
८] धीरः
९] मनीषी
१०] ज्ञः
१२] प्राज्ञः
१३] सङ्ख्यावान्
१४] पण्डितः
१५] कविः
१६] धीमान्
१७] सूरिः
१८] कृती
१८] कृष्टिः
१९] लब्धवर्णः
२०] विचक्षणः
२१] दूरदर्शी
२२] दीर्घदर्शी

ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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भारत में अनेक विद्वान् हुए।
= भारते अनेके कोविदाः बभूवुः।

उन विद्वानों में कुछ वैयाकरण हुए।
= तेषु बुधेषु केचित् वैयाकरणाः बभूवुः।

कुछ न्यायदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् न्यायदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

कुछ साङ्ख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

आचार्य व्याघ्रभूति वैयाकरण हुए।
आचार्यः व्याघ्रभूतिः वैयाकरणः बभूव।

आचार्य अक्षपाद नैयायिक हुए।
= आचार्यः अक्षपादः नैयायिकः बभूव।

आचार्य पञ्चशिख सांख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= आचार्यः पञ्चशिखः साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डितः बभूव।

वाचक्नवी गार्गी मन्त्रों की विदुषी हुई थी।
= वाचक्नवी गार्गी मन्त्राणां विचक्षणा बभूव।

पाण्डु के पाँच पुत्र हुए।
= पाण्डोः पञ्च सुताः बभूवुः।

वे सभी विद्वान् हुए।
= ते सर्वे प्राज्ञाः बभूवुः।

युधिष्ठिर धर्मशास्त्र और द्यूतविद्या के जानकार हुए।
= युधिष्ठिरः धर्मशास्त्रस्य द्यूतविद्यायाः च कोविदः बभूव।

भीम मल्लविद्या और पाकशास्त्र के वेत्ता हुए।
= भीमसेनः मल्लविद्यायाः पाकशास्त्रस्य च सूरिः बभूव।

सुकेशा ऋषि पाकशास्त्र के उपदेशक हुए थे।
= सुकेशा ऋषिः पाकशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

श्रीकृष्ण भीमसेन का रसाला खाकर बहुत प्रसन्न हुए थे।
= श्रीकृष्णः भीमसेनस्य रसालं भुक्त्वा भूरि प्रसन्नः बभूव।

अर्जुन धनुर्वेद और गन्धर्ववेद के जानकार हुए।
= फाल्गुनः धनुर्वेदस्य गन्धर्ववेदस्य च विपश्चित् बभूव।

नकुल अश्वविद्या के ज्ञानी हुए।
= नकुलः अश्वविद्यायाः कोविदः बभूव।

आचार्य शालिहोत्र अश्वविद्या के प्रसिद्ध जानकार थे।
= आचार्यः शालिहोत्रः अश्वविद्यायाः प्रथितः पण्डितः बभूव।

सहदेव पशुचिकित्सा और शकुनशास्त्र के विद्वान् थे।
= सहदेवः पशुचिकित्सायाः शकुनशास्त्रस्य च ज्ञः बभूव।

कुन्ती अथर्ववेदीय मन्त्रों की विदुषी हुई।
= पृथा अथर्ववेदीयानां मन्त्राणां पण्डिता बभूव।

लल्लाचार्य और उत्पलाचार्य प्रसिद्ध गणितज्ञ हुए।
= लल्लाचार्यः उत्पलाचार्यः च प्रसिद्धौ गणितज्ञौ बभूवतुः।

मण्डनमिश्र की पत्नी भारती बड़ी विदुषी हुई।
= मण्डनमिश्रस्य पत्नी भारती महती पण्डिता बभूव।

भरद्वाज और शाकटायन वैमानिकरहस्य के ज्ञाता हुए।
= भरद्वाजः शाकटायनः च वैमानिकरहस्यस्य विचक्षणौ बभूवतुः।

शाकपूणि निरुक्त के प्रसिद्ध जानकार हुए थे।
= शाकपूणिः निरुक्तस्य प्रथितः कृष्टिः बभूव।

ऋतुध्वज की महारानी मदालसा तत्त्वज्ञ थी।
= ऋतुध्वजस्य पट्टराज्ञी मदालसा तत्त्वज्ञा बभूव।

भारत में एक नहीं, दो नहीं वरन् सहस्रों विद्वान् हुए हैं।
= भारते एकः न, द्वौ न अपितु सहस्रशाः कोविदाः बभूवुः।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत गोवीथी : गव्य 1

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शब्द सागर


  • गोवीथी – cow-path, that portion of the moon’s path which contains the asterisms Bhadra-padā, Revatī, andᅠ Aṡvinī (orᅠ according to others, Hasta, Citrā, andᅠ Svātī)
  • गव्य – That which belongs to cow, that is which suits to cows, that which is received from cow

पाठ १.१


शब्द

  • सः
  • त्वम्
  • अहम्
  • गच्छति
  • गच्छसि
  • गच्छामि

वाक्य

  • अहं गच्छामि |
  • त्वं गच्छसि |
  • स: गच्छति |

सुभाषित

Memorize


पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः ।
न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः ॥

 


गीता पाठ

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मूल श्लोकः

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।

English Commentary By Swami Sivananda


1.1 धर्मक्षेत्रे on the holy plain? कुरुक्षेत्रे in Kurukshetra? समवेताः assembled together? युयुत्सवः desirous to fight? मामकाः my people? पाण्डवाः the sons of Pandu? च and? एव also? किम् what? अकुर्वत did do? सञ्जय O Sanjaya.

Commentary Dharmakshetra — that place which protects Dharma is Dharmakshetra. Because it was in the land of the Kurus? it was called Kurukshetra.

Sanjaya is one who has conered likes and dislikes and who is impartial.

Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta


।।1.1।।धर्मक्षेत्र इति। अत्र केचित् व्याख्याविकल्पमाहुः कुरूणां करणानां यत् क्षेत्रमनुग्राहकं अतएव सांसारिकधर्माणां (S सांसारिकत्वधर्माणां) सर्वेषां क्षेत्रम् उत्पत्तिनिमित्तत्वात्। अयं स परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् (या. स्मृ. I 8) इत्यस्य च धर्मस्य क्षेत्रम् समस्तधर्माणां क्षयात् अपवर्गप्राप्त्या त्राणभूतं तदधिकारिशरीरम्। सर्वक्षत्राणां क्षदेः हिंसार्थत्वात् परस्परं वध्यघातकभावेन (S परस्परवध्य ) वर्तमानानां रागवैराग्यक्रोधक्षमाप्रभृतीनां समागमो यत्र तस्मिन् स्थिता ये मामका अविद्यापुरुषोचिता अविद्यामयाः संकल्पाः पाण्डवाः शुद्धविद्यापुरुषोचिता विद्यात्मानः ते किमकुर्वत कैः खलु के जिताः इति। मामकः अविद्यापुरुषः पाण्डुः शुद्धः।

Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas

1।।व्याख्या धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे कुरुक्षेत्रमें देवताओंने यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है।

यहाँ धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे पदोंमें क्षेत्र शब्द देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है प्रत्युत तीर्थभूमि भी है जिसमें प्राणी जीतेजी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये यह भूमि चुनी गयी है।

संसारमें प्रायः तीन बातोंको लेकर लड़ाई होती है भूमि धन और स्त्री। इस तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ कुरुक्षेत्रे पद देनेका तात्पर्य भी जमीनको लेकर ल़ड़नेमें है। कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात् राजा कुरुकी जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवों द्वारा पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके लिये लड़ाई करने आये हुए हैं।

यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये कुरुक्षेत्रे पद देना युक्तिसंगत न्यायसंगत है तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही होता है। युद्धजैसा कार्य भी धर्मभूमि तीर्थभूमिमें ही करते हैं जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ धर्मक्षेत्रे पद आया है।

यहाँ आरम्भ में धर्म पदसे एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भके धर्म पदमेंसे धर् लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके मम पदोंसे लिया जाय तो धर्म शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है अर्थात् धर्मका पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेसे धर्मका अनुष्ठान हो जाता है।

इन धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे पदोंसे सभी मनुष्योंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये केवल अपने सुखआरामकी दृष्टिसे नहीं और कर्तव्यअकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता 16। 24)।

समवेता युयुत्सवः राजाओंके द्वारा बारबार सन्धिका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्धके मैं तीखी सूईकी नोकजितनी जमीन भी पाण्डवोंको नहीं दूँगा। (टिप्पणी प0 2.1) तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं।

दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्यप्राप्तिका ही था। वह राज्यप्राप्ति धर्मसे हो चाहे अधर्मसे न्यायसे हो चाहे अन्यायसे विहित रीतिसे हो चाहे निषिद्ध रीतिसे किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना चाहिये ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात् युद्धकी इच्छावाला था।

पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवननिर्वाह कर लेंगे पर अपने धर्ममें बाधा नहीं आने देंगे धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु जिस माँकी आज्ञासे युधिष्ठिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे विवाह किया था उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी (टिप्पणी प0 2.2) अर्थात् केवल माँके आज्ञापालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुये हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही युयुत्सु थे पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे।

मामकाः पाण्डवाश्चैव पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचितअनुचितका विचार न करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ मामकाः पदके अन्तर्गत कौरव (टिप्पणी प0 3.1) और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी पाण्डवाः पद अलग देनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमें समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे पर पाण्डवोंको अपना नहीं मानते थे। (टिप्पणी प0 3.2) इस कारण उन्होंने अपने पुत्रोंके लिये मामकाः और पाण्डुपुत्रोंके लिये पाण्डवा पदका प्रयोग किया है क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह अपने घरोंमें मुहल्लोंमें गाँवोंमें प्रान्तोंमें देशोंमें सम्प्रदायोंमें द्वैधीभाव अर्थात् ये अपने हैं ये दूसरे हैं ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है।

यहाँ पाण्डवाः पदके साथ एव पद देनेका तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया

मामकाः और पाण्डवाः (टिप्पणी प0 3.3) इनमेंसे पहले मामकाः पदका उत्तर सञ्जय आगेके (दूसरे) श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेना को देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्यमुख्य सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी सेनाके मुख्यमुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रणकौशल आदिकी प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर कौरवसेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक पाण्डवाः पदका उत्तर देंगे कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय श्रीकृष्णने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन भीम युधिष्ठिर नकुल सहदेव आदिने अपनेअपने शंख बजाये जिससे दुर्योधनकी सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी सञ्जय पाण्डवोंकी बात कहतेकहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका प्रसङ्ग आरम्भ कर देंगे।

किमकुर्वत किम् शब्दके तीन अर्थ होते हैं विकल्प निन्दा (आक्षेप) और प्रश्न।

युद्ध हुआ कि नहीं इस तरहका विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता क्योंकि दस दिनतक युद्ध हो चुका है और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद सञ्जय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना रहे हैं।

मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने यह क्या किया जो कि युद्ध कर बैठे उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता क्योंकि युद्ध तो चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था।

यहाँ किम् शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता है। धृतराष्ट्र सञ्जयसे भिन्नभिन्न प्रकारकी छोटीबड़ी सब

घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीकठीक जाननेके लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।

सम्बन्ध धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर सञ्जय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।

संस्कृत साधना : पाठ ३० (तिङन्त-प्रकरण १५ :: लृट् लकार )

Sanskrut_30

नमः संस्कृताय!
आज लृट् लकार की बात करते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। सामान्य भविष्यत् काल के लिए लृट् लकार का प्रयोग किया जाता है। जहाँ भविष्यत् काल की कोई विशेषता न कही जाए वहाँ लृट् लकार ही होता है। कल, परसों आदि विशेषण न लगे हों। भले ही घटना दो पल बाद की हो अथवा वर्ष भर बाद की, बिना किसी विशेषण वाले भविष्यत् में लृट् का प्रयोग करना है। ‘आज होगा’ – इस प्रकार के वाक्यों में भी लृट् होगा।

भू धातु, लृट् लकार

भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति
भविष्यसि भविष्यथः भविष्यथ
भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः

आज मैं विद्यालय में होऊँगा।
= अद्य अहं विद्यालये भविष्यामि।

मैं विद्यालय में होऊँगा।
= अहं विद्यालये भविष्यामि।

कल मैं विद्यालय में होऊँगा।
= श्वः अहं विद्यालये भवितास्मि। (लुट् लकार)
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शब्दकोश :
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‘दिन’ के पर्यायवाची –
१] घस्रः ( पुँल्लिंग )
२] दिनम् (नपुंसकलिंग )
३] अहन् (अहः) (नपुंसकलिंग )
४] दिवसः/दिवसम् (पुँल्लिंग / नपुंसकलिंग )
५] वासरः/वासरम् ( पुँल्लिंग / नपुंसकलिंग )
६] भास्वरः (पुँल्लिंग )
७] दिवा (अव्यय)
८] अंशकम् (नपुंसकलिंग )
९] द्यु (नपुंसकलिंग )
१०] वारः (पुँल्लिंग )

सायम् – दिन का अन्तिम भाग (अव्यय )
प्राह्णः – प्रातःकाल (पुँल्लिंग )
मध्याह्नः – दोपहर ( पुँल्लिंग )
अपराह्णः – दिन का द्वितीय अर्द्धभाग (पुँल्लिंग )

रात्रि के आरम्भिक काल के नाम –
१ ] प्रदोषः (पुँल्लिंग )
२ ] रजनीमुखम् (नपुंसकलिंग )
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वाक्य अभ्यास :
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आज सन्ध्या को वह उद्यान में होगा।
= अद्य सायं सः उद्याने भविष्यति।

प्रातः वे दोनों मन्दिर में होंगे।
= प्राह्णे तौ मन्दिरे भविष्यतः।

दिन में वे कहाँ होंगे ?
= दिवसे ते कुत्र भविष्यन्ति ?

आज दोपहर तुम कहाँ होगे ?
= अद्य मध्याह्ने त्वं कुत्र भविष्यसि ?

आज दोपहर मैं विद्यालय में होऊँगा ।
= अद्य मध्याह्ने अहं विद्यालये भविष्यामि।

तुम दोनों सायंकाल कहाँ होगे ?
= युवां प्रदोषे कुत्र भविष्यथः ?

हम दोनो तो सन्ध्यावन्दन में होंगे।
= आवां तु सन्ध्यावन्दने भविष्यावः।

क्या तुम वहाँ नहीं होगे ?
= किं त्वं तत्र न भविष्यसि ?

हाँ, मैं भी होऊँगा।
= आम्, अहम् अपि भविष्यामि।

हम सब दिन में वहीं होंगे।
= वयं दिवा तत्र एव भविष्यामः।

तुम सब तो सायंकाल में अपने घर होगे।
= यूयं तु रजनीमुखे स्वगृहे भविष्यथ।

और हम अपने घर होंगे।
= वयं च स्वभवने भविष्यामः।

तो उत्सव कैसे होगा ?
= तर्हि उत्सवः कथं भविष्यति ?

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श्लोक :
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न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न ‘भविष्यामः’ सर्वे वयमतः परम् ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता २।१२)

॥ शिवोऽवतु ॥

अतुल्य संस्कृत, अमर संस्कृति – १

||श्री गणेशाय नम:||

शुभ प्रभात मित्रो,

We are starting yet another tryst with वाक् आधार, भाषा संस्कृत. In this series, we will understand, revere and try to revive roots of our संस्कृति, protected in देव भाषा संस्कृत.

It is also one more effort to learn Sanskrit but in informal way. Let the glorious past’s hints guide us. May Ganesha Deva & Maa Saraswati bless us!

Atulya_1

In praise of Mathematics:

यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा ।

तद् वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि वर्तते ॥
जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है ।

 

Like the crest of the peacock, like the gem on the head of
a snake, so is mathematics at the head of all knowledge based on Veda

 

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ११ (हनुमान विशेष)

Gavya11

 


शब्द सिन्धु


अघंमनः (aghaMmanaH) = (adj) evil-minded
अघं (aghaM) = grievous sins
अघायुः (aghaayuH) = whose life is full of sins
अङ्क (a.nka) = number
अङ्ग (a.nga) = a limb, or body part
अङ्गं (a.ngaM) = limb(s)
अङ्गानि (a.ngaani) = limbs
अङ्गुल (a.ngula) = a finger
अङ्गुष्ठ (a.ngushhTha) = the big toe
अङ्गुष्ठः (a.ngushhThaH) = (m) thumb
अचरं (acharaM) = and not moving
अचरस्य (acharasya) = and nonmoving
अचल (achala) = (adj) still, stationary
अचलं (achalaM) = unmoving
अचलः (achalaH) = immovable
अचलप्रतिष्ठं (achalapratishhThaM) = steadily situated
अचला (achalaa) = unflinching
अचलेन (achalena) = without its being deviated
अचक्षुस् (achakShus.h) = one without an eye
अचापलं (achaapalaM) = determination
अचिन्त्य (achintya) = inconceivable
अचिन्त्यं (achintyaM) = beyond contemplation
अचिन्त्यः (achintyaH) = inconceivable
अचिराद् (achiraad.h) = without delay/in no time
अचिराद्भव (achiraadbhava) = in no time from the cycle of birth\death
अचिरेण (achireNa) = very soon
अचेतसः (achetasaH) = without KRishhNa consciousness
अच्छेद्यः (achchhedyaH) = unbreakable
अच्युत (achyuta) = O infallible one
अच्युतम् (achyutam.h) = the who does not slip
अज (aja) = goat
अजं (ajaM) = unborn
अजः (ajaH) = unborn
अजगरः (ajagaraH) = (m) python
अजपा (ajapaa) = involuntary repetition (as with a mantra)
अजस्रं (ajasraM) = the unborn one
अजा (ajaa) = (f) goat
अजानं (ajaanaM) = do not understand
अजानत् (ajaanat.h) = knew
अजानता (ajaanataa) = without knowing
अजानन्तः (ajaanantaH) = without knowing
अञ्चलः (aJNchalaH) = (m) aanchal in Hindi
अञ्जन (aJNjana) = the name of the mother of Hanuman
अञ्जनेयासन (aJNjaneyaasana) = the splits
अञ्जलि (aJNjali) = (m) folded hands


पाठ


आत्मीयप्रकरणम्

पुस्तक : संस्कृतवाक्यप्रबोधः

तव ज्येष्टो बन्धुर्भगिनी च कास्ति ? तेरा बड़ा भाई और बहिन कौन है ?
देवदत्तस्सुशीला च । देवदत्त और सुशीला ।
भो बन्धो ! अहं पाठाय व्रजामि । हे भाई ! मैं पढने को जाता हूं ।
गच्छ प्रिय ! पूर्णां विद्यां कृत्वागन्तव्यम् । जा प्यारे ! पूरी विद्या करके आना ।
भवतः कन्याः अद्यश्वः किं पठन्ति ? आपकी बेटियां आजकल क्या पढ़ती हैं ?
वर्णोच्चारणशिक्षादिकं दर्शनशास्त्राणि चाधीत्येदानीं धर्मपाकशिल्पगणितविद्या अधीयते । वर्णोच्चारणशिक्षादिक तथा न्याय आदि शास्त्र पढ़कर अब धर्म, पाक, शिल्प और गणितविद्या पढ़ती हैं ।
भवज्ज्येष्ठया भगिन्या किं किमधीतमिदानीञ्च तया किं क्रियते ? आपकी बड़ी बहिन ने क्या-क्या पढ़ा है और अब वह क्या करती है ?
वर्णज्ञानमारभ्य वेदपर्यन्ताः सर्वा विद्या विदित्वेदानीं बालिकाः पाठयति । अक्षराभ्यास से लेके वेद तक सब पूरी विद्या पढ़के अब कन्याओं को पढ़ाया करती है ।
तया विवाहः कृतो न वा ? उसने विवाह किया वा नहीं ?
इदानीं तु न कृतः परन्तु वरं परीक्ष्य स्वयंवरं कर्तुमिच्छति । अभी तो नहीं किया, परन्तु वर की परीक्षा करके स्वयंवर करने की इच्छा करती है ।
यदा कश्चित् स्वतुल्यः पुरुषो मिलिष्यति तदा विवाहं करिष्यति । जब कोई अपने सदृश पुरुष मिलेगा तब विवाह करेगी ।
तव मित्रैरधीतं न वा ? तेरे मित्रों ने पढ़ा है वा नहीं ?
सर्व एव विद्वांसो वर्त्तन्ते यथाऽहं तथैव तेऽपि, समानस्वभावेषु मैत्र्यास्समभवात् । सब ही विद्वान हैं, जैसा मैं हूं वैसे वे भी हैं, क्योंकि तुल्य स्वभाववालों में मित्रता का सम्भव है ।
तव पितृव्यः किं करोति ? तेरा चाचा क्या करता है ?
राज्यव्यवस्थाम् । राज्य का कारवार ।
इमे किं तव मातुलादयः ? ये क्या तेरे मामा आदि हैं ?
बाढमयं मम मातुल इयं पितृष्वसेयं मातृष्वसेयं गुरुपत्‍न्ययं च गुरुः । ठीक यह मेरा मामा, यह बाप की बहिन भूआ, यह मता की बहिन मौसी, यह गुरु की स्त्री और यह गुरु है ।
इदानीमेते कस्मै प्रयोजनायैकत्र मिलिताः ? इस समय ये सब किसलिये मिलकर इक्ट्ठे हुए हैं ?
मया सत्कारायाऽऽहूताः सन्त आगताः । मैंने सत्कार के अर्थ बुलाये हैं सो ये सब आये हैं ।
इमे मे मम पितृश्वश्रूश्वसुरश्यालदयः सन्ति । ये सब मेरे पिता की सास-ससुर और साले आदि हैं ।
इमे मम मित्रस्य स्त्रीभगिनीदुहितृजामातरः सन्ति । ये मेरे मित्र की स्त्री, बहिन, लड़की और जमाई हैं ।
इमौ मम पितुः श्यालदौहित्रौ स्तः । ये मेरे मामा और भानजे हैं ।

 

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सुभाषित – हनुमान


तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम् |
प्रदेहि सुभगे हारन् यस्य तुष्टासि भामिनि || ६-१२८-८१
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः |
पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा || ६-१२८-८२

Looking at her, Rama who was acquainted with the gesture of another spoke to Seetha as follows: “Dear Seetha! Give the pearl-necklace to a person, with whom you are pleased and in whom the following viz. sharpness, firmness, renown, dexterity, competence, modesty, prudence, virility, prowess and intelligence are ever present.”

हनुमान = प्राण that has following present: तेज,धृति,यश,चतुरता,शक्ति,विनय,निति,पुरुषार्थ,पराक्रम,उत्तम बुध्धि


पठन/मनन/स्मरण – हनुमान


॥ श्रीहनुमद्ध्यानम् मार्कण्डेयपुराणतः ॥

मरकतमणिवर्णं दिव्यसौन्दर्यदेहं
नखरदशनशस्त्रैर्वज्रतुल्यैः समेतम् ।
तडिदमलकिरीटं मूर्ध्नि रोमाङ्कितं च
हरितकुसुमभासं नेत्रयुग्मं सुफुल्लम् ॥ १॥

अनिशमतुलभक्त्या रामदेवस्य योग्या-
न्निखिलगुरुचरित्राण्यास्यपद्माद्वदन्तम् ।
स्फटिकमणिनिकाशे कुण्डले धारयन्तं
गजकर इव बाहुं रामसेवार्थजातम् ॥ २॥

अशनिसमद्रढिम्नं दीर्घवक्षःस्थलं च
नवकमलसुपादं मर्दयन्तं रिपूंश्च ।
हरिदयितवरिष्ठं प्राणसूनुं बलाढ्यं
निखिलगुणसमेतं चिन्तये वानरेशम् ॥ ३॥

इति मार्कण्डेयपुराणतः श्रीहनुमद्ध्यानम् ।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४५ : कृष्ण जन्म विशेष : श्रीनन्दकुमाराष्टकम्

Gavya45

Resuming posts on Sanskrit learning. We have covered enough basic lessons. I wish, learners now carve their own path ahead.

I will share something unique that I encounter in Sanskrit everyday here. Some special chapters.

For example, for next few days, we will engross in Shri Krishna bhakti!

॥ श्रीनन्दकुमाराष्टकम् ॥

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम् ।
वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम् ॥

वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ।
भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम् ॥ १॥

सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम् ।
गुञ्जाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम् ॥

वल्लभपटपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं विबुधवरम् ॥ २॥

शोभितमुखधुलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदतरम् ।
मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरसुरम् ।
वल्लभमतिविमलं शुभपदकमलं नखरुचि अमलं तिमिरहरम् ॥ ३॥

शिरमुकुटसुदेशं कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम् ।
मायाकृतमनुजं हलधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ॥ ४॥

इन्दीवरभासं प्रकटसुरासं कुसुमविकासं वंशिधरम् ।
हृत्मन्मथमानं रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभमृदुहासं कुञ्जनिवासं विविधविलासं केलिकरम् ॥ ५॥

अतिपरमप्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्मकरम् ।
मोहनमतिधीरं फणिबलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ।
वल्लभव्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरम् ॥ ६॥

जलधरद्युतिअङ्गं ललितत्रिभङ्गं बहुकृतरङ्गं रसिकवरम् ।
गोकुलपरिवारं मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ।
वल्लभव्रजचन्द्रं सुभगसुछन्दं कृतआनन्दं भ्रान्तिहरम् ॥ ७॥

वन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् ।
कालियशिरगमनं कृतफणिनमनं घातितयमनं मृदुलतरम् ।
वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरम् ॥ ८॥

॥ इति श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यविरचितं
श्रीनन्दकुअमराष्टकं सम्पूर्णम्॥

श्रीनन्दकुमाराष्टकम् 
Nandakumarshtakam

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम् ।
वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम् ॥
वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ।
भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम् ॥ १॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who is the pretty cowherd, who wears garland of forest flowers, Who has very broad eyes, who is killer of all sorrow, Who is the moon of Brindavana, who is essence of happiness, Who is the ultimate of happiness, who is the supporter of the world, Who is black, who is loved by all, who is the complete pleasure, Who is pretty every moment and who pleases every one.

सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम् ।
गुञ्जाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम् ॥
वल्लभपटपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं विबुधवरम् ॥ २॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who has pretty lotus like face, who defeats god of love in beauty, Who is store house of happiness, who wears the crown, Who wears garland made of gunja, who roams about in the garden, Who is greatly benevolent, who steals the dresses of gopis, Who likes the silk cloths, who wears the holy thread, Who has butter in his hand and the lord who gives boons.

शोभितमुखधुलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदतरम् ।
मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरसुरम् ।
वल्लभमतिविमलं शुभपदकमलं नखरुचि अमलं तिमिरहरम् ॥ ३॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who shines with dust of Yamuna on his face, whose voice is incomparable, Who blesses people with pleasure, whose face is coated with pollen grains,Who looks after cows, who plays flute with sweetest notes, who is very pure, Who has feet as pretty as a lotus, who has shining nail and who removes darkness.

शिरमुकुटसुदेशं कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम् ।
मायाकृतमनुजं हलधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ॥ ४॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who has crown on his pretty head, who has curly hair, Who is dressed up like an actor, who is more pretty than god of love, Who by illusion looks human, who is the brother of Balarama, Who lightens earth by killing asuras, who takes care of the people of vruja, Who is a dear, who walks prettily, Who wants good always and who is good.

इन्दीवरभासं प्रकटसुरासं कुसुमविकासं वंशिधरम् ।
हृत्मन्मथमानं रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभमृदुहासं कुञ्जनिवासं विविधविलासं केलिकरम् ॥ ५॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who has shine like blue lotus flower, who by nature is divine, Who looks like a opened lotus flower, who holds a flute, Who destroys the pride of god of love, who has a pleasant calm look, Who steals the mind by playing soulful music, Who is witty but soft and who lives on Kuncha vine and plays various roles.

अतिपरमप्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्मकरम् ।
मोहनमतिधीरं फणिबलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ।
वल्लभव्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरम् ॥ ६॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who is a great expert who takes care of oppressed people, Who obeys his devotees, who is engaged in doing his duty, Who is pretty and very brave, who is very heroic Adisesha, Who kills all his enemies, who is extremely fickle,Who entertains the Vraja, Who has a face like a lotus flower, Who pacifies Bala Rama and who carried a mountain.

जलधरद्युतिअङ्गं ललितत्रिभङ्गं बहुकृतरङ्गं रसिकवरम् ।
गोकुलपरिवारं मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ।
वल्लभव्रजचन्द्रं सुभगसुछन्दं कृतआनन्दं भ्रान्तिहरम् ॥ ७॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Whose limbs shine like a rich cloud, Who can be easily defeated by love, Who lives in different places, who is a great connoisseur, Whose family is in Gokula, Who looks like the god of love, Who lives in kuncha, who is great in hiding himself, Who is the moon of the vruja, who is like the pretty verse, Who makes everyone happy and who drives away illusion.

वन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् ।
कालियशिरगमनं कृतफणिनमनं घातितयमनं मृदुलतरम् ।
वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरम् ॥ ८॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Whose feet are fit to be saluted, who makes everything holy, Who takes care of the world, who is carried in mind by pure people, Who climbed up on the head of Kaliya, who is saluted by Adhi Sesha, Who killed Kala yavana, who is extremely soft by nature, Who steals away our sorrow, who has a very pure feet, Who is the solace for the oppressed and who leads us to salvation.

॥ इति श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यविरचितं श्रीनन्दकुअमराष्टकं सम्पूर्णम्।

Thus ends the octet on the son of Nanda, Composed by Sri Vallabacharya.

–       Translation by P. R. Ramachander

संस्कृत साधना : पाठ १० (सर्वनाम विशेषण-२)

Sanskrut_10

नमः संस्कृताय !!
कल आपने ‘सर्वनाम विशेषण’ के विषय में जाना और तद् , एतद्, यद् और किम् के रूप भी जान लिये। मुझे आभास हो रहा है कि सर्वनाम वाला प्रसंग आपको थोड़ा सा कठिन लग रहा है। किन्तु घबराइये बिल्कुल नहीं। धैर्य रखिए। धैर्य बहुत महान् गुण है। धैर्य, ध्यान और अभ्यास ये तीन आपके मित्र हैं। इन सर्वनाम शब्दों के रूप आपको याद नहीं हुए हैं तो कोई बात नहीं। वाक्यों द्वारा जब आपको अभ्यास करायेंगे तो ये सारे शब्द आपकी जिह्वा पर स्थिर हो जाएँगे। इन्हें याद करने का सबसे सरल उपाय है इनका बारम्बार अभ्यास। अथवा आप इन्हें दिन भर में किन्हीं पाँच व्यक्तियों को सुना दें। इससे आपका अभ्यास भी हो जाएगा और संस्कृत का प्रचार भी।

१) आज आपको इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप बताते हैं।
इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

२) अब आपको एक श्लोक बता देते हैं जिससे आपको यह बात पक्की हो जाएगी कि इदम् , एतद् , अदस् और तद् का प्रयोग कब और कहाँ करना चाहिए।

“इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥”

(इदम् अस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति च एतदः रूपम्।
अदसः तु विप्रकृष्टे तद् इति परोक्षे विजानीयात् ॥)

अर्थात् –
१] इदम् = समीपस्थ वस्तु के लिए
२] एतद् = अत्यन्त समीपस्थ वस्तु के लिए
३] अदस् = दूरस्थ वस्तु के लिए
४] तद् = परोक्ष अर्थात् जो आपको दिखाई न दे ऐसी वस्तु के लिए।

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

* ध्यानपूर्वक देखिए , आप पाएँगे कि स्त्रीलिंग के द्विवचन के सभी रूप पुँल्लिंग की भाँति ही हैं। एकवचन और बहुवचन में भी थोड़ा सा ही अन्तर है।

अब कल आपको युष्मद् ( तुम ) और अस्मद्( मैं ) के रूप बताकर कुछ दिनों तक केवल अभ्यास करवायेंगे अन्यथा यह सब सिर के ऊपर से चला जाएगा। बुद्धि में कुछ भी न टिकेगा। उपर्युक्त सर्वनामों के कुछ वैकल्पिक रूप भी होते हैं। इन वैकल्पिक रूपों को अभ्यास कराते समय बताएँगे।
________________________________________

श्लोक : अयम् = यह (इदम् का पुँल्लिंग एकवचन)

अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम्
अक्लेद्यः अशोष्यः एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुः
अचलः अयं सनातनः ॥
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम्
अविकार्यः अयम् उच्यते।
तस्मात् एवं विदित्वा एनम्*
न अनुशोचितुम् अर्हसि॥

*एनम् = इसको (इमम् का वैकल्पिक रूप)
(श्रीमद्भगवद्गीता २।२४-२५॥)

इस प्रकार के और भी श्लोक आप ढूँढकर लिख सकते हैं जिनमें उपर्युक्त सर्वनामों का प्रयोग किया गया हो।

॥शिवोऽवतु॥

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