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Rama-Meets-Hanuman

तीर्थाटन / तीर्थयात्रा /वन यात्रा – There are different ways by which प्रवास/travel is prescribed. वसंत ऋतू is ideal as it is good time to burn excess cough by यात्रा.

जिन्होंने भारत में भ्रमण ही नहीं किया, यहाँ के कोस कोस में बदलती रुत का अनुभव नहीं किया….. यहाँ के आचार-विचार-व्यवहार को समझने की कभी चेष्टा नहीं की…
ऐसे लोग अब हमें बताएंगे, कि हमारा समाज कैसा है……. हमारा दर्शन क्या है…?

Rama, Krishna, Shankracharya…we have examples from all ages.

यो न संचरते देशान् सेवते यो न पण्डीतान् |
तस्य संकुचिता बुधिर्धृतबिन्दुरिवाम्भसि ||

यस्तु संचरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् |
तस्य विस्तारिता बुधिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ||

Those who do not travel (for the cause of self-realization) and do satsang with different regions’ experts (Pandits of different fields), their intellect is like a drop of clarified butter in water, limited, narrow, strictured.

Those who do travel (for the cause of self-realization) and do satsang with different regions’ experts (Pandits of different fields), their intellect is like a drop of oil in water, -mingled with water, expanded, broader.


शास्त्र दर्शनम् wrote in Feb 2015

माध्यम को उद्देश्य बनाकर कार्य करना सबसे बड़ी भूल है.

सामाजिक और दर्शन की पुस्तकें उठाकर देखिये. ये कूड़ा लिखने वाले कौन हैं ?
जिन्होंने भारत में भ्रमण ही नहीं किया, यहाँ के कोस कोस में बदलती रुत का अनुभव नहीं किया….. यहाँ के आचार-विचार-व्यवहार को समझने की कभी चेष्टा नहीं की…
ऐसे लोग अब हमें बताएंगे, कि हमारा समाज कैसा है……. हमारा दर्शन क्या है…

दर्शन और सामाजिक पर किसे लिखना चाहिए ?
जिसने घाट-घाट का पानी पिया हो, जो भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों में घूमा हो, लोगों के पास रहा हो, उन्हें समझा हो….. उनके जीवन-सिद्धान्तों को ग्रहण किया हो….

ऐसे मूर्ख लोग लिखने को उद्देश्य बना लेते हैं…… अरे, लिखता तो वो है, जिसने अनुभव किया हो ! लिखना वास्तव में, अनुभव सांझा करना है.

लेकिन तुमने तो साहित्य को अपने छिपे षड्यन्त्र का साधन बना लिया है, लिखने के नाम पर तुम्हारे पास सिर्फ तुम्हारा छिपा हुआ agenda है. तुम्हारी पुस्तकें पढ़कर कोई जान नही पाएगा कि भारत में सामाजिकता कैसी है, दर्शन कैसा है… वो तो अभी भी अनछुआ ही है…

और तुम्हारी औकात सिर्फ साहित्य तक ही सीमित है, पता है क्यूँ ?
क्यूंकि लफ्फाजी करना बहुत आसान है, अनुभव लिखने के लिए अनुभव की साधना करनी पड़ती है, विदित करना होता है……. प्रत्यक्ष…… जलता दीया ही प्रज्वलित करने की क्षमता रखता है……..

लेकिन तुम क्या लिख सकोगे विज्ञान में, संस्कृत में, संगीत में, अभियांत्रिकी में, कला में, सृजन में …. सरस्वती सदा रुष्ट रहेगी मेरा श्राप है

तुम तो बस लफ्फाजी के मेघ ही बनाने योग्य हो….

हर बाला देवी की प्रतिमा
बच्चा-बच्चा राम है…….

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