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0004_Kathan_thoughts

January, 2018

Last night, he had new set of questions.

“विचार क्या है? कहाँसे आता है? विचार आने पर , मस्तिष्कमें क्या फेरफार होते है? गुस्सा विचारसे आता है?”

“विचार मनमें आते है|”

“मन शरीरमें है?मन कैसे बनता है?”

“मनोमय शरीर, शरीरका एक स्वरुप है| हे सोम्य ! यह मन अन्नमय है।[१] जो अन्न खाया जाता है, वह तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल अंश मल, मध्यम अंश रस- रक्तमांस तथा सूक्ष्म अंश मन बन जाता है।[२] हे राजन आहार शुद्धि होने पर चित्त की शुद्धि होती है। इस निर्मल चित्त से ही धर्म का प्रकाश होता है।[३]”

“अब पता चला, आप केक/चोकोलेटको न खानेको क्यूँ कहते हो|”

“सुंदर, बेटा! हमेशा मातृहृदयीके हाथ बना खाना खानेका आग्रह रखना| आहार मन विचार याद कर लेना|”

“स्कुलमें खाना बनाने वालेको भी यह समजाना पड़ेगा न पिताजी! कितने सारे बच्चे उनके हाथ बना खाते है! उनके मनके विचार हम सभी बच्चोको जाने अनजाने मिल रहे है!”

“अतिसुंदर! अपने शिक्षकसे बात करना!”

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[१]
अन्नमय हि सौम्य मन।
(छान्दोग्य)
[२]
अन्नमशितं प्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्टो
धातुस्तपुरोषं भवति यो मध्य मस्तन्मा स योगिष्टास्तन्मव। (छान्दोग्य)

[३]
आहार शुद्धया नृपते, चित्र शुद्धिश्च जायते।
शुद्धे चित्रे प्रकाश: स्थाद्धर्मस्य नृपसत्तम्।।
-देवी भागवत

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