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Flood

“Your village is on the bank of river. You guys must be scared of flood water.”

“Sahib, flood may be scary for you in your artificial life in City, having no meaningful attention for rivers passing by. We don’t worry about flood. In fact, we wait for flood. Its been 7 years for last occurrence of flood in our mother river.”

“I don’t understand this. How can flood do good to you? We are taught(By media and govt text books) that flood can wipe out entire villages and it dents Economy significantly. And govt dole out packages too.”

“Haha! Govt packages never reach to us! As I said, it(Flood is bad) might be true for you. It might be true for those villages who are on the banks of dammed rivers and water control is in men’s hands. Not for us. Our forefathers were intelligent and so they developed our village on such heights that we hardly get affected by water. But thanks to flood, we regularly get 7 to 10 inches of new fertile soil flushed with water. Flood rejuvenates our land! Flood is good. Nature is our mother and mother cannot act cruel for her children.”

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Wisdom is not exclusive property of book-worms. It is Nature’s bias-free gift. It is up to us, to use it or ignore it. So called illiterate farmer taught a good lesson.

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मरुत, गौ & वृष्टि (Cow dung based Microbes’ role in rainfall)

Airborne bacteria may play large role in precipitation

Biological precipitation, or the “bio-precipitation” cycle, as Sands calls it, basically is this: bacteria form little groups on the surface of plants. Wind then sweeps the bacteria into the atmosphere, and ice crystals form around them. Water clumps on to the crystals, making them bigger and bigger. The ice crystals turn into rain and fall to the ground. When precipitation occurs, then, the bacteria have the opportunity to make it back down to the ground. If even one bacterium lands on a plant, it can multiply and form groups, thus causing the cycle to repeat itself.

“We think if (the bacteria) couldn’t cause ice to form, they couldn’t get back down to the ground,” Sands said. “As long as it rains, the bacteria grow.”

The team’s work is far-reaching. Sands and his colleagues have found the bacteria all over the world, including Montana, California, the eastern U.S., Australia, South Africa, Morocco, France and Russia.

The team’s research also shows that most known ice-nucleating bacteria are associated with plants and some are capable of causing disease.

“Bacteria have probably been around for a million years,” Sands said. “They live on the surface of plants, and may occasionally cause plant disease. But their role in rain-making may be more important.”

https://www.eurekalert.org/pub_releases/2008-02/msu-abm022808.php

Microbes Hitchhiking On Hailstones

Snow and ice usually form around a nucleus of dust, which helps the ice crystals aggregate—but pollen, spores and bacteria can serve as the nuclei of precipitation too. Montana State University Ph.D. student Alex Michaud discusses his search for microbes in hailstones.

Surprising Find: Live Bacteria Help Create Rain, Snow & Hail

http://www.livescience.com/14299-bacteria-create-rain-snow-hail.html

Plant Growth Promoting Bacteria from Cow Dung Based Biodynamic Preparations

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4186930/

Indigenous formulations based on cow dung fermentation are commonly used in organic farming. Three biodynamic preparations viz., Panchagavya (PG), BD500 and ‘Cow pat pit’ (CPP) showed high counts of lactobacilli (109 ml−1) and yeasts (104 ml−1). Actinomycetes were present only in CPP (104 ml−1) and absent in the other two. Seven bacterial isolates from these ferments were identified by a polyphasic approach: Bacillus safensis (PG1), Bacillus cereus (PG2, PG4 PG5), Bacillus subtilis (BD2) Lysinibacillus xylanilyticus (BD3) and Bacillus licheniformis (CPP1). This is the first report of L. xylanilyticus and B. licheniformis in biodynamic preparations. Only three carbon sources—dextrose, sucrose and trehalose out of 21 tested were utilized by all the bacteria. None could utilize arabinose, dulcitol, galactose, inositol, inulin, melibiose, raffinose, rhamnose and sorbitol. All the strains produced indole acetic acid (1.8–3.7 μg ml−1 culture filtrate) and ammonia. None could fix nitrogen; but all except B. safensis and B. licheniformis could solubilize phosphorous from insoluble tri-calcium phosphate. All the strains except L. xylaniliticus exhibited antagonism to the plant pathogen Rhizoctonia bataticola whereas none could inhibit Sclerotium rolfsi. In green house experiment in soil microcosms, bacterial inoculation significantly promoted growth of maize; plant dry weight increased by ~21 % due to inoculation with B. cereus (PG2). Results provide a basis for understanding the beneficial effects of biodynamic preparations and industrial deployment of the strains.


This remind me वृष्टि सूक्त from Atharva Veda

1. समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वतीः सं अभ्राणि वातजूतानि यन्तु ।
महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु । ।AV4.15.1
(वर्षा के जल ) बादलों से युक्त उमड़ कर उठें, वायु से सेवित मेघ मिल कर बड़े वृषभों की तरह गर्जन करते हुए आएं, वेगवती जल की धाराओं से पृथ्वी को तृप्त करें.

2. सं ईक्षयन्तु तविषाः सुदानवोऽपां रसा ओषधीभिः सचन्तां ।
वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग्जायन्तां ओषधयो विश्वरूपाः । । AV4.15.2
बड़े बलशाली महान दान शील मरुत ( सूक्ष्माणु) भलीभांति वर्षा की बौछारों को औषधि तत्वों से परिपूर्ण कर के भिन्न भिन्न स्थानों पर उत्पन्न होने वाले अन्न और औषधीय लताओं वनस्पतियों की वृद्धि करें .
वर्षा के लोक गीत
3. सं ईक्षयस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद्विजन्तां ।
वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग्जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः । । AV4.15.3
आकाश में मेघों को देखने की, भिन्न भिन्न स्थानों पर वेग पूर्वक वर्षा की धारओं से विविध रूप वाली वनस्पतियों के उत्पन्न होने की आकांक्षा गायन द्वारा स्तुति की प्रेरणा दें.
वर्षा के लोक गीत
4. गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक् ।
सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीं अनु । । AV4.15.4
पृथक पृथक स्थानों पर वर्षा के , मेघों के पृथ्वी पर बरसने के यशोगान हों .
सूक्ष्माणु द्वारा वाष्पी करण
5. उदीरयत मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत्पातयाथ ।
महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु । । AV4.15.5
समुद्र से जलों को ऊपर अंतरिक्ष में चमकते हुए सूर्य के साथ सूक्ष्माणु गरजते हुए बादलों से वेगवती जल की धाराओं से भूमि को तृप्त करें
गोचर की समृद्धि
6. अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधिं भूमिं पर्जन्य पयसा सं अङ्धि ।
त्वया सृष्टं बहुलं ऐतु वर्षं आशारैषी कृशगुरेत्वस्तं । । AV4.15.6
गर्जना करते हुए, कड़कते हुए बादल समुद्र को हिला दें. जल से भूमि को कांतिमयि बना दें. वर्षा की झड़ी से दुर्बल गौओं के लिए गोपालक (गोचर के लिए) अच्छी वर्षा की इच्छा करता है .

7. सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत ।
मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीं अनु । । AV4.15.7
अजगर के समान मोटेमोटे जल आकाश से गिरती हुइ जल की धाराएं सूक्ष्माणुओं से संचालित मेघ पृथ्वी पर सुरक्षा के लिए अनुकूल वर्षा करें

8. आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः ।
मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीं अनु । । AV4.15.8
आकाश में सब दिशाओं में बिजली चमके,सब दिशाओं मे वायु चले, सूक्ष्माणुओं से प्रेरित मेघ भूमि को अनुकूल बनाने के लिए आएं.

9. आपो विद्युदभ्रं वर्षं सं वोऽवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत ।
मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः प्रावन्तु पृथिवीं अनु । । AV4.15.9
सूक्ष्माणुओं से प्रेरित मेघों में विद्युत, अजगर के समान मोटे मोटे जल का दान करने वाले वर्षा के झरने पृथ्वी को अनुकूल बना कर रक्षा करें.
वर्षा जल का महत्व
10. अपां अग्निस्तनूभिः संविदानो य ओषधीनां अधिपा बभूव ।
स नो वर्षं वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि । । AV4.15.10
(वर्षा के ) जलों में जो अग्नि गुण हैं ,जलों के शरीरभूत बादलों से मिली हुई , जो इस जलों को ओषधि गुण द्वारा वनस्पतियों की रक्षक और पालक होती हैं वह अग्नि प्रकट हो कर हमें वर्षा को प्रदान करे. वे जल बुद्धि मान जन जानते हैं कि वे द्युलोक से आने वाले अमृत रूप धारण करके प्रजा के प्राण हैं .
वर्षा का जल पृथ्वी का वीर्य
11. प्रजापतिः सलिलादा समुद्रादाप ईरयन्नुदधिं अर्दयाति ।
प्र प्यायतां वृष्णो अश्वस्य रेतोऽर्वानेतेन स्तनयित्नुनेहि । । AV4.15.11
(प्रजापति) प्रजा का रक्षक परमेश्वर (सलिल) साधारण जल को समुद्र को पीड़ित कर-वाष्प बना कर व्यापनशील मेघ के रूप में अन्तरिक्ष की ओर ले जा कर गर्जने वाले मेघ से वीर्य की भांति खूब वृद्धि के लिए पृथ्वी की ओर नीचे वर्षा करता है.
12. अपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः श्वसन्तु गर्गरा अपां वरुणाव नीचीरपः सृज।
वदन्तु पृश्निबाहवो मण्डूका इरिणानु । । AV4.15.12
वर्षा का जल प्राणों को देने वाले मेघ से उत्पन्न हमारा पिता-समान है , जो बादलों की गड़गड़ाहट की ध्वनि से जलों को नीचे की ओर छोड़ता है, पृथ्वी पर गड्ढों में रहने वाले भिन्न भिन्न रंग बिरंगे मेंढक इत्यादि हर्षसे खूब टर्र टर्र करते हैं .

13. संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः ।
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्दूका अवादिषुः । । AV4.15.13
वृष्टि के लिए वार्षिक व्रत सम्पन्न करने वाले ब्राह्मणो की नांई, साल भर सोये पड़े मेंढक वर्षा से तृप्त हुई वाणीको खूब ज़ोर से बोलते हैं.

14. उपप्रवद मण्डूकि वर्षं आ वद तादुरि ।
मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः । । AV4.15.14
हे मेंढक मेंढकी के परिवार वर्षा को देख कर आनंद से चारों पैर फैला कर खूब क्रीड़ा करो और बोलो .
वर्षा की कामना
15. खण्वखा३इ खैमखा३इ मध्ये तदुरि ।
वर्षं वनुध्वं पितरो मरुतां मन इछत । । AV4.15.15
(खण्वखा३इ खैमखा३इ मध्ये तदुरि) ईड़ा पिंगला सुषम्ना के मध्य , मन को केंद्रित कर के मरुतों से अनुकूल हो कर वर्षा द्वारा हमारा पितरों कि तरह पालन करने की कामना करो..

16. महान्तं कोशं उदचाभि षिञ्च सविद्युतं भवतु वातु वातः ।
तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दिनीरोषधयो भवन्तु । । AV4.15.16
(आप लोग) खूब यज्ञादि कर के महान आनंद दायक समृद्धि और ओषधि के कोष को विद्युत और पवन के साथ वर्षा की धाराओं द्वारा समस्त संसार को सींचो

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