Sanskrutam

Sanskrutam

संस्कृत साधना : पाठ १६ (तिङन्त-प्रकरण २ :: विशेष नियम)

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पिछले पाठ में आपने लकारों के विषय में जाना। ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं से जुड़ते हैं। अब आपको कुछ विशेष बातें बताते हैं-

१) जब हम किसी धातु से कोई लकार जोड़ते हैं तब उस लकार का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अट्ठारह प्रत्ययों का प्रयोग होता है। इन प्रत्ययों को संक्षेप में तिङ् कहा जाता है। जैसे हम हिन्दी आदि भाषाओं में संक्षिप्त नामों का प्रयोग करते हैं वैसे ही संस्कृतभाषा में भी संक्षिप्त नामों का प्रयोग होता था। आप कह सकते हैं कि यह प्रवृत्ति संस्कृत से ही आयी। चूँकि इन अट्ठारह प्रत्ययों में से पहला है ‘तिप्’ और अन्तिम है ‘महिङ्’ तो तिप् का ति ले लिया और महिङ् का ङ् ले लिया जिससे ‘तिङ्’ यह संक्षिप्त नाम हो गया इन प्रत्ययों का। सारा खेल इन तिङ् प्रत्ययों का ही है। कोई भी क्रियापद इन तिङ् प्रत्ययों के बिना नहीं बन सकता। धातु के अन्त में तिङ् जोड़ना ही होता है अतः इस प्रकरण को तिङन्त-प्रकरण कहा जाता है। तिङन्त अर्थात् तिङ् प्रत्यय हैं जिनके अन्त में ‘तिङ्+अन्त’।

२) इन अट्ठारह प्रत्ययों के आरम्भिक नौ प्रत्यय ‘परस्मैपद’ और अन्तिम नौ प्रत्यय ‘आत्मनेपद’ कहलाते हैं। यह भी स्मरण रखिए कि जिन धातुओं से परस्मैपद प्रत्यय होते हैं उन धातुओं को ‘परस्मैपदी’ कहा जाता है और जिन धातुओं से आत्मनेपद प्रत्यय जुड़ते हैं उन्हें ‘आत्मनेपदी’ कहा जाता है और जिन
धातुओं से दोनों प्रकार के प्रत्यय होते हैं उन धातुओं को ‘उभयपदी’ धातु कहा जाता है।

परस्मैपद प्रत्यय
(१) (२) (३४५…)
प्रथमपुरुष तिप् तस् झि
मध्यमपुरुष सिप् थस् थ
उत्तमपुरुष मिप् वस् मस्

आत्मनेपद प्रत्यय
(१) (२) (३४५…)
प्रथमपुरुष ता आताम् झ
मध्यमपुरुष थास् आथाम् ध्वम्
उत्तमपुरुष इट् वहि महिङ्

पुरुष और वचन के विषय में आपको पहले ही बताया जा चुका है। पुरुष और वचन के अनुसार ही इन प्रत्ययों को धातु से जोड़ा जाता है। यह तो आपको लकार, तिङ् प्रत्ययों और आत्मनेपद परस्मैपद के विषय में समझाया। अगामी पाठों में आपको लकारों के प्रयोग के नियमों से अवगत करायेंगे।
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शब्दकोश :
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‘मनुष्य’ के पर्यायवाची शब्द –

१) मनुष्यः
२) मानुषः
३) मर्त्यः
४) मनुजः
५) मानवः
६) नरः

‘पुरुष’ के पर्यायवाची शब्द –

१) पुंस्
२) पञ्चजनः
३) पुरुषः
४) पूरुषः
५) नृ

* उपर्युक्त सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं।
= मनुजाः उत्सवप्रियाः भवन्ति।

प्रतिदिन सैकड़ो मनुष्य जन्मते और मरते हैं।
= प्रतिदिनं शतानि मानुषाः जायन्ते म्रियन्ते च।

मनुष्यों में कुछ तो सज्जन होते हैं,
= मानवेषु केचित् तु सज्जनाः भवन्ति,

और कुछ मनुष्य धूर्त होते हैं।
= केचित् नराः धूर्ताः च भवन्ति।

सैकडों मनुष्य धन के लिए ही मरते हैं।
= शतानि मनुजाः धनाय एव म्रियन्ते।

किन्तु उन मनुष्यों को कोई नहीं जानता।
= किन्तु तान् मनुजान् कोऽपि न जानाति।

धूर्त मनुष्य आपसी स्नेह को फाड़ देते हैं।
= धूर्ताः मनुजाः पारस्परिकं स्नेहं भिन्दन्ति।

सत्पुरुषों के लिए तो सारी पृथ्वी कुटुम्ब है।
= सत्पुरुषेभ्यः तु समग्रा वसुधा कुटुम्बकम् एव अस्ति।

वे दो ठग पुरुष उस भले पुरुष को ठगते हैं।
= तौ वञ्चकौ पुरुषौ तं भद्रं पुरुषं वञ्चयतः।

इस भले आदमी में कोई दुर्गुण नहीं है।
= अस्मिन् भद्रे पूरुषे कोऽपि दुर्गुणः न अस्ति।

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श्लोक :
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यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥३.२३॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४.११॥

(श्रीमद्भगवद्गीता)

पुस्तक में से एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २४ (तिङन्त-प्रकरण ९ :: आशीर्लिङ्)

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नमः संस्कृताय मित्राणि !
लकारों के क्रम में लिङ् लकार के विषय में समझाते हुए हमने इसके दो भेदों का उल्लेख किया था- विधिलिङ् और आशीर्लिङ्। विधिलिङ् लकार के प्रयोग के नियम तो आपने जान लिये। अब आशीर्लिङ् के विषय में बताते हैं। आपने यह वेदमन्त्र तो कभी न कभी सुना ही होगा –

मधुमन्मे निष्क्रमणं मधुमन्मे परायणम्।
वाचा वदामि मधुमद् ‘भूयासं’ मधुसंदृशः॥

( मेरा जाना मधुर हो, मेरा आना मधुर हो। मैं मधुर वाणी बोलूँ, मैं मधु के सदृश हो जाऊँ। अथर्ववेद १।३४।३॥ )

इसमें जो ‘भूयासम्’ शब्द है, वह भू धातु के आशीर्लिङ् के उत्तमपुरुष एकवचन का रूप है। भू धातु के आशीर्लिङ् में रूप देखिए –

भूयात् भूयास्ताम् भूयासुः
भूयाः भूयास्तम् भूयास्त
भूयासम् भूयास्व भूयास्म

१) इस लकार का प्रयोग केवल आशीर्वाद अर्थ में ही होता है। महामुनि पाणिनि जी ने सूत्र लिखा है – “आशिषि लिङ्लोटौ।३।३।१७२॥” अर्थात् आशीर्वाद अर्थ में आशीर्लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग करते हैं। जैसे – सः चिरञ्जीवी भूयात् = वह चिरञ्जीवी हो।

२) इस लकार के प्रयोग बहुत कम दिखाई पड़ते हैं, और जो दिखते भी हैं वे बहुधा भू धातु के ही होते हैं। अतः आपको भू धातु के ही रूप स्मरण कर लेना है बस।
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शब्दकोश :
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‘गर्भवती’ के पर्यायवाची शब्द –
१) आपन्नसत्त्वा
२) गुर्विणी
३) अन्तर्वत्नी
४) गर्भिणी
५) गर्भवती

पतिव्रता स्त्री के पर्यायवाची-
१) सुचरित्रा
२) सती
३) साध्वी
४) पतिव्रता

स्वयं पति चुनने वाली स्त्री के लिए संस्कृत शब्द –
१) स्वयंवरा
२) पतिंवरा
३) वर्या

वीरप्रसविनी – वीर पुत्र को जन्म देने वाली
बुधप्रसविनी – विद्वान् को जन्म देने वाली

उपर्युक्त सभी शब्द स्त्रीलिंग में होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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यह गर्भिणी वीर पुत्र को उत्पन्न करने वाली हो।
= एषा आपन्नसत्त्वा वीरप्रसविनी भूयात्।

ये सभी स्त्रियाँ पतिव्रताएँ हों।
= एताः सर्वाः योषिताः सुचरित्राः भूयासुः।

ये दोनों पतिव्रताएँ प्रसन्न रहें।
= एते सुचरित्रे मुदिते भूयास्ताम्।

हे स्वयं पति चुनने वाली पुत्री ! तू पति की प्रिय होवे।
= हे पतिंवरे पुत्रि ! त्वं भर्तुः प्रिया भूयाः।

तुम दोनों पतिव्रताएँ होवो ।
= युवां सत्यौ भूयास्तम् ।

वशिष्ठ ने दशरथ की रानियों से कहा –
= वशिष्ठः दशरथस्य राज्ञीः उवाच –

तुम सब वीरप्रसविनी होओ।
= यूयं वीरप्रसविन्यः भूयास्त ।

मैं मधुर बोलने वाला होऊँ।
= अहं मधुरवक्ता भूयासम्।

सावित्री ने कहा –
सावित्री उवाच

मैं स्वयं पति चुनने वाली होऊँ।
= अहं वर्या भूयासम्।

माद्री और कुन्ती ने कहा –
माद्री च पृथा च ऊचतुः –

हम दोनों वीरप्रसविनी होवें।
= आवां वीरप्रसविन्यौ भूयास्व ।

हम सब राष्ट्रभक्त हों।
वयं राष्ट्रभक्ताः भूयास्म ।

हम सब चिरञ्जीवी हों।
= वयं चिरञ्जीविनः भूयास्म।
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श्लोक :
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एकः स्वादु न भुञ्जीत नैकः सुप्तेषु जागृयात्।
एको न गच्छेत् अध्वानं नैकः चार्थान् प्रचिन्तयेत्॥
(पञ्चतन्त्र)

स्वादिष्ट भोजन अकेले नहीं खाना चाहिए, सोते हुए लोगों में अकेले नहीं जागना चाहिए, यात्रा में अकेले नहीं जाना चाहिए और गूढ़ विषयों पर अकेले विचार नहीं करना चाहिए।

इस श्लोक में जितने भी क्रियापद हैं वे सभी विधिलिङ् लकार प्रथमपुरुष एकवचन के हैं।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ३२ (तिङन्त-प्रकरण १७ :: लृङ् लकार )

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#संस्कृतशिक्षण – 32 [लृङ् लकार]

नमः संस्कृताय!
लृङ् लकार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। कारण और फल के विवेचन के सम्बन्ध में जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो अर्थात् क्रिया न हो सकी हो तो ऐसे भूतकाल में लृङ् लकार का प्रयोग होता है। “यदि ऐसा होता तो वैसा होता” -इस प्रकार के भविष्यत् के अर्थ में भी इस लकार का प्रयोग होता है।
जैसे –
“यदि तू विद्वान् बनता तो सुख पाता।”
= यदि त्वं अभविष्यः तर्हि सुखं प्राप्स्यः।

यदि अच्छी वर्षा होती तो अच्छा अन्न होता।
= सुवृष्टिः चेत् अभविष्यत् तर्हि सुभिक्षः अभविष्यत्।

लृङ् लकार भूत या भविष्यत् अर्थ में प्रयुक्त होता है। चन्द्र ऋषि द्वारा बनाये गये व्याकरण को मानने वाले वैयाकरण भविष्यत् काल के लिए लृङ् का प्रयोग नहीं करते अपितु लृट् का ही प्रयोग करते हैं।

भू धातु , लृङ् लकार

अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन्
अभविष्यः अभविष्यतम् अभविष्यत
अभविष्यम् अभविष्याव अभविष्याम

यदि आप ध्यानपूर्वक देखेंगे तो पायेंगे कि ये रूप लङ् लकार की भाँति ही हैं, केवल ‘इष्य’ अधिक जुड़ गया है। तुलना करके देखिए –

अभवत् अभवताम् अभवन्
अभवः अभवतम् अभवत
अभवम् अभवाव अभवाम

भक्ष् (खाना) धातु, लृङ् लकार

अभक्षयिष्यत् अभक्षयिष्यताम् अभक्षयिष्यन्
अभक्षयिष्यः अभक्षयिष्यतम् अभक्षयिष्यत
अभक्षयिष्यम् अभक्षयिष्याव अभक्षयिष्याम
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शब्दकोश :
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फलों के नाम

कैथा-
१] कपित्थः
२] ग्राही
३] मन्मथः
४] दधिफलः
५] पुष्पफलः
६] दन्तशठः
७] दधित्थः

गूलर-
१] उदुम्बरः
२] हेमदुग्धः
३] जन्तुफलः
४] यज्ञाङ्गः
५] यज्ञयोग्यः

नींबू-
१] दन्तशठः
२] जम्भः
३] जम्भीरः
४] जम्भलः
५] जम्भी
६] रोचनकः
७] शोधी
८] जाड्यारिः
९] दन्तहर्षणः
१०] गम्भीरः
११] जम्बिरः
१२] दन्तकर्षणः
१३] रेवतः
१४] वक्त्रशोधी
१५] दन्तहर्षकः

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वाक्य अभ्यास :
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यदि वह कच्चा कैथा खाता तो कफ न होता।
= यदि असौ आम-कपित्थम् अभक्षयिष्यत् तर्हि कफः न अभविष्यत्।

यदि तुम कैथा खाते तो हिचकी ठीक हो जाती।
= यदि त्वं दधित्थम् अभक्षयिष्यः तर्हि हिक्का सुष्ठु अभविष्यत्।

यदि वे पके गूलर खाते तो उनका दाह ठीक हो जाता।
= यदि अमी पक्वान् उदुम्बरान् अभक्षयिष्यन् तर्हि तेषां दाहः सुष्ठु अभविष्यत्।

यदि तुम गूलर खाते तो पुष्ट हो जाते।
= यदि त्वं हेमदुग्धान् अभक्षयिष्यः तर्हि पुष्टः अभविष्यः।

तुम सब यदि नींबू खाते तो मुँह में दुर्गन्ध न होती।
= यूयं यदि जम्भलम् अभक्षयिष्यत तर्हि मुखे दुर्गन्धः न अभविष्यत्।

यदि मैं नींबू खाता तो मन्दाग्नि न होती।
= यदि अहं जम्बीरम् अभक्षयिष्यम् तर्हि मन्दाग्निः न अभविष्यत्।

यदि तुम दोनों भी नींबू खाते तो हृदयशूल न होता।
= यदि युवाम् अपि रेवतम् अभक्षयिष्यतम् तर्हि हृदयशूलः न अभविष्यत्।

यदि हम दोनों खेत में होते तो कैथे खाते।
= यदि आवां क्षेत्रे अभविष्याव तर्हि दधिफलान् अभक्षयिष्याव।

हम सब वहाँ होते तो गूलर खाते।
= वयं तत्र अभविष्याम तर्हि जन्तुफलान् अभक्षयिष्याम।

तुम होते तो तुम भी खाते।
= त्वम् अभविष्यः तर्हि त्वम् अपि अभक्षयिष्यः।

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श्लोक :
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अभक्षयिष्यं यदि दुग्धदाधिकं
घृतं रसालं ह्यपि हेमभस्मकम्।
बताभविष्यं न कदापि दुर्बलः
यथा त्विदानीं तनुविग्रहोऽभवम्॥

यदि मैंने दूध-लस्सी, घी, रसीले आम और सुवर्णभस्म खाया होता तो हाय ! मैं कभी दुर्बल न होता जैसे आज सुखड़े शरीर वाला मैं हो गया हूँ।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

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नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
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उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २२ (तिङन्त-प्रकरण ७ :: लिङ् लकार (विधिलिङ्))

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नमः संस्कृताय !

लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् और लिट् लकार के विषय में जाना। लकारों से सम्बन्धित जो श्लोक मैंने बताया था उसका आधा भाग आपने जान लिया- “लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।” साथ ही आपने भू धातु के रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया। अब श्लोक का तृतीय चरण देखिए- “विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ” अर्थात् ‘विधि’ और ‘आशीर्वाद’ अर्थ में लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग होता है। तो आज आपको लिङ् लकार के विषय में बताते हैं। आगामी पाठों में लोट् और अन्य लकारों के विषय में क्रमशः बताएँगे। स्मृतिग्रन्थों में तथा अन्य विधिनिषेध का विधान करने वाले शास्त्रों में विधिलिङ् लकार के प्रचुर प्रयोग मिलते हैं।

१) सर्वप्रथम तो आप यह जान लीजिए कि इस लकार के दो भेद हैं- १. विधिलिङ् २. आशीर्लिङ् । आज केवल विधिलिङ् लकार की चर्चा करते हैं।

२) जिसके द्वारा किसी बात का विधान किया जाता है उसे विधि कहते हैं। जैसे – ‘स्वर्गकामः यजेत्’ स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे। यहाँ यज्ञ करने का विधान किया गया है अतः यज् (यजन करना) धातु में विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार यदि किसी चीज का निषेध करना हो तो वाक्य में निषेधार्थक शब्द का प्रयोग करके विधिलिङ् लकार का प्रयोग करना चाहिए, जैसे -” मांसं न भक्षेत् ” मांस नहीं खाना चाहिए/ न खाये।

मोटे तौर पर आप यह ध्यान में रखिए कि जहाँ “चाहिए” ऐसा बोला जा रहा हो , वहाँ इस लकार का प्रयोग होगा। हिन्दी में ‘करे’ और ‘करना चाहिए’ दोनों लगभग समान अर्थ वाले हैं।

३) जहाँ किसी बात की सम्भावना की जाए वहाँ भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है, जैसे – ” अद्य वर्षः भवेत् ” सम्भव है आज वर्षा हो।

४) योग्यता बतलाने के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है। जैसे – “भवान् पारितोषिकं लभेत् ” – आप पुरस्कार पाने योग्य हैं।

५) आमन्त्रित, निमन्त्रित करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे -” भवान् अद्य मम गृहम् आगच्छेत्” आज आप मेरे घर आयें।

६) इच्छा, कामना करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे – “भवान् शीघ्रं स्वस्थः भवेत्” आप शीघ्र स्वस्थ हों।

७) आज्ञा के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया जाता है।

८) अच्छी प्रकार स्मरण रखिए कि “आशीर्वाद” के अर्थ में इस लकार का प्रयोग नहीं होता। आशीर्वाद के लिए आशीर्लिङ् और कभी कभी लोट् लकार का प्रयोग होता है।

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत्
भवेयम् भवेव भवेम
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शब्दकोश :
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जासूस, भेदिया, गुप्तचर के लिए संस्कृत शब्द –

१] यथार्हवर्णः
२] प्रणिधिः
३] अपसर्पः
४] चरः
५] स्पशः
६] चारः
७] गूढपुरुषः

*ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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वह जासूस होवे। ( इच्छा )
= सः गूढपुरुषः भवेत् ।

वे दोनों जासूस सफल हों। (इच्छा)
= तौ यथार्हवर्णौ सफलौ भवेताम् ।

उन सारे गुप्तचरों को राष्ट्रभक्त होना चाहिए। (विधि)
= ते सर्वे स्पशाः राष्ट्रभक्ताः भवेयुः।

तुम्हें गुप्तचर के घर में होना चाहिए। (विधि)
= त्वं गूढपुरुषस्य गृहे भवेः।

तुम दोनों को भेदिया होना चाहिए। (सम्भावना)
= युवां स्पशौ भवेतम् ।

तुम सबको भेदियों से दूर रहना चाहिए।(विधि, आज्ञा)
= यूयं चारेभ्यः दूरं भवेत।

सोचता हूँ, मैं जासूस होऊँ। (इच्छा, सम्भावना)
= मन्ये अहं प्रणिधिः भवेयम्।

हम दोनों भेदियों के भी भेदिये होवें। (इच्छा)
= आवां चाराणाम् अपि चारौ भवेव ।

हम सब गुप्तचरों के प्रशंसक हों।(इच्छा, विधि)
= वयम् अपसर्पाणां प्रशंसकाः भवेम ।
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श्लोक :
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दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेत् युगपद् उत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासः तस्य महात्मनः॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।१२ )

पुस्तक से देखकर सभी शब्दों का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

WhySanskrit

संस्कृत साधना : पाठ ११ (अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ))

Sanskrut_11

नमः संस्कृताय !
आज आपको अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ) सर्वनामों के रूप बताएँगे और इनका वाक्यों में अभ्यास भी करवायेंगे। आज से आपको अमरकोष या आधुनिक शब्दकोशों से प्रतिदिन कुछ शब्द बताया करेंगे जिससे आपका शब्दभण्डार बढ़े। क्योंकि किसी भी भाषा को सीखने के लिए दो वस्तुएँ अनिवार्य हैं- व्याकरण और शब्दकोश। कहा जाता है न कि “अवैयाकरणस्त्वन्धः बधिरः कोशवर्जितः” अर्थात् व्याकरण न जानने वाला अन्धा है , वह साधु असाधु शब्दों में भेद नहीं कर सकता और शब्दकोश के बिना बधिर, न वह अपने विचार अच्छी प्रकार व्यक्त कर सकता है और न ही दूसरों के विचार समझ सकता है। इसलिए अपना शब्दभण्डार बढ़ाते रहिये। संस्कृतभाषा में संसार के सबसे अधिक शब्द हैं। इसे ‘शब्दसन्दोहप्रसविनी’ अर्थात् ‘शब्दों के समूहों को उत्पन्न करने वाली’ कहा जाता है।

१ ) अस्मद् और युष्मद् के रूप तीनों लिंगों में एक जैसे होते हैं ।

अस्मद्

अहम् आवाम् वयम्
माम्/मा आवाम्/नौ अस्मान्/नः
मया आवाभ्याम् अस्माभिः
मह्यम्/मे आवाभ्याम्/नौ अस्मभ्यम्/नः
मत् आवाभ्याम् अस्मत्
मम/मे आवयोः/नौ अस्माकम्/नः
मयि आवयोः अस्मासु

युष्मद्

त्वम् युवाम् यूयम्
त्वाम्/त्वा युवाम्/वाम् युष्मान्/वः
त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः
तुभ्यम्/ते युवाभ्याम्/वाम् युष्मभ्यम्/वः
त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्
तव/ते युवयोः/वाम् युष्माकम्/वः
त्वयि युवयोः युष्मासु
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शब्दकोश :
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मिठाइयाँ, खाद्य /मिष्टान्नानि, खाद्याः

1) रसगुल्ला – रसगोलः
2) लड्डू – मोदकम्
3) जलेबी – कुण्डलिका,
4) खीर – पायसम्
5) बर्फी – हैमी
6) रबड़ी – कूर्चिका
7) श्रीखंड – श्रीखण्डम्

______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

तुम दोनों मुझे खीर देते हो।
= युवां मह्यं पायसं यच्छथः। ( यच्छ् – देना )

हम दोनों तुम सबको सेवइयाँ देते हैं।
= आवां युष्मभ्यं सूत्रिकाः यच्छावः।

क्या तुझमें बुद्धि नहीं है ?
= किं त्वयि बुद्धिः नास्ति ?

मुझमें बुद्धि है, तुम क्यों कुपित होते हो ?
= मयि बुद्धिः अस्ति, त्वं कथं कुपितः भवसि ?

तुम ये मिठाईयाँ अकेले ही खाते हो ?
= त्वम् इमानि मिष्टान्नानि एकाकी एव खादसि ?

हाँ, क्यों ?
= आम्, कथमिव ?

क्या तुम शास्त्र का यह वाक्य नहीं मानते ?
= किं त्वं शास्त्रस्य इदं वाक्यं न मन्यसे ?

कि- “स्वादिष्ट चीज अकेले नहीं खानी चाहिए”- ऐसा।
= यत् – “एकः स्वादु न भुञ्जीत” इति।

ओह ! अब समझा !
= अहो ! इदानीम् अवगतम् !

ये रसगुल्ले हम दोनों के हैं।
= इमे रसगोलाः आवयोः सन्ति।

किन्तु ये लड्डू हमारे नहीं हैं।
= किन्तु इमानि मोदकानि आवयोः न सन्ति।

ये मीठी जलेबियाँ तुम्हारी ही हैं।
= इमाः मधुराः कुण्डलिकाः तव एव सन्ति।

मैं तो इन्हें तुम्हें भी देता हूँ।
= अहं तु इमाः तुभ्यम् अपि ददामि।

____________________________________

श्लोक :

दैवी ह्येषा गुणमयी
मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ते
मायाम् एतां तरन्ति ते॥

( श्रीमद्भगवद्गीता 7.14 )

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ७ (सिंहावलोकन & परिशोधन)

Sanskrut_७

नमः संस्कृताय मित्राणि !!
पिछले दो पाठों में हमने सकर्मक अकर्मक क्रियाओं के विषय समझाया। आशा करता हूँ कि यह विषय आपने हृदयंगम कर लिया है। आज कोई विशेष नियम की चर्चा न करके आपसे निवेदन करता हूँ कि आपने अब तक जो भी अध्ययन किया है उसका “सिंहावलोकन” कर लें। जैसे सिंह अपने मार्ग पर जाते हुए बीच बीच में रुककर पीछे मुड़कर देख लेता है, उसी प्रकार आपको भी चाहिए कि अधीत विषय को एक बार पीछे मुड़कर देखते चलें। इस प्रक्रिया को “सिंहावलोकन” कहते हैं। इससे अधीत विषय पूर्णरूपेण बुद्धि में स्थिर हो जाता है।

१) आज आपको शब्दरूपों के विषय में थोड़ा सा बतायेंगे। यह विषय बिल्कुल सरल है और अभ्यास पर आश्रित है। आपको बताया गया था कि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के रूप चलते हैं। सात विभक्तियाँ और तीन वचन। साथ ही प्रत्येक शब्द का लिंग भी निश्चित होता है कि वह पुँल्लिंग है अथवा स्त्रीलिंग अथवा नपुसंकलिंग।

२) सबसे पहले अकरान्त पुँल्लिंग ‘राम’ शब्द, आकारान्त स्त्रीलिंग ‘रमा’ शब्द और अकारान्त नपुसंकलिंग ‘पुस्तक’ शब्द के रूप बताते हैं।

३) संस्कृत भाषा में जितने भी अकारान्त (जिसके अन्त में अकार हो) पुँल्लिंग शब्द हैं , उन सबके रूप ‘राम’ शब्द की भाँति ही चलेंगे। आपको “रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे”– वाला श्लोक तो याद ही होगा , तो बस ये रूप याद करना एकदम आसान है।

विभक्ति/कारक एकवचन द्विवचन बहुवचन
१/कर्त्ता रामः रामौ रामाः
२/कर्म रामम् रामौ रामान्
३/करण रामेण रामाभ्याम् रामैः
४/सम्प्रदान रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः
५/अपादान रामात् रामाभ्याम् रामेभ्यः
६/सम्बन्ध* रामस्य रामयोः रामाणाम्
७/अधिकरण रामे रामयोः रामेषु
१/सम्बोधन हे राम ! हे रामौ ! हे रामाः !

४) आकारान्त स्त्रीलिंग ‘रमा’ की भाँति ही समस्त आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप चलेंगे-

रमा रमे रमाः
रमाम् रमे रमाः
रमया रमाभ्याम् रमाभिः
रमायै रमाभ्याम् रमाभ्यः
रमायाः रमाभ्याम् रमाभ्यः
रमायाः रमयोः रमाणाम्
रमायाम् रमयोः रमासु
हे रमे ! हे रमे ! हे रमाः

५) अकारान्त नपुसंकलिंग शब्दों के रूप आपको केवल दो विभक्तियों ‘प्रथमा’ और ‘द्वितीया’ के याद करने हैं, शेष सभी विभक्तियों में पुँल्लिंग की भाँति ही चलेंगे-

पुस्तकम् पुस्तके पुस्तकानि
पुस्तकम् पुस्तके पुस्तकानि
_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

आप शीतकाल में आइस्क्रीम क्यों खाते हैं ?
= भवान् शीतकाले पयोहिमं कथं खादति ?

मैं शीतकाल में गाय का दूध पीता हूँ।
= अहं शीतकाले धेनोः दुग्धं पिबामि।

तुम दोनो माघ मास में गंगा यमुना के संगम में नहाते हो।
= युवां माघमासे गङ्गायमुनयोः सङ्गमे मज्जथः।

मैं प्रयागराज में रहता हूँ।
= अहं प्रयागराजे वसामि।

तुम सब कहाँ रहते हो ?
= यूयं कुत्र निवसथ ?

मुदित राजस्थान के जयपुर नगर में रहता है।
= मुदितः राजस्थानस्य जयपुरनगरे वसति।

साकेत और अभय लखनऊ की लस्सी पीते हैं।
= साकेतः अभयः च लक्ष्मणपुरस्य दाधिकं पिबतः।

अरविंद केजरीवाल को कुमार विश्वास रायता देता है।
= अरविन्द-केजरीवालाय कुमारविश्वासः राज्यक्तं ददाति।

हम दोनों भरद्वाज का विमानशास्त्र पढ़ते हैं।
= आवां भरद्वाजस्य विमानशास्त्रं पठावः।

तुम दोनों भौतिकविज्ञान पढ़ते हो।
युवां भौतशास्त्रं पठथः।

हम सब चाणक्य का नीतिशास्त्र प्रतिदिन पढ़ते हैं।
वयं चाणक्यस्य नीतिशास्त्रं प्रतिदिनं पठामः।
_______________________________________

श्लोक :

*वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि
*पाण्डवानां धनञ्जयः।
*मुनीनाम् अप्यहं व्यासः
*कवीनाम् उशना कविः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १०।३७॥)

उपर्युक्त श्लोक में * चिह्न वाले शब्द षष्ठी बहुवचन के हैं। अन्य षष्ठी बहुवचन के रूप देखने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का दशम अध्याय पढ़िये।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ १८ (तिङन्त-प्रकरण ४ :: विशेष नियम)

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नमस्कार मित्रों !
पिछले पाठ में आपने लट् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। ‘भू’ धातु के लट् लकार में बनने वाले रूपों को जाना और उनका वाक्यों में अभ्यास भी किया। स्मरण करा दूँ कि “अनभ्यासे विषं विद्या” अभ्यास न करने पर विद्या विष का काम करती है। आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों ? मान लीजिये कि आप किसी सभा या गोष्ठी में बैठे हैं और सम्बन्धित विद्या का प्रसंग चल गया और आप अनभ्यास के कारण उसमें भ्रमित हो गये, तो बिना अपमानित हुए न बचेंगे। और “सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।” अकीर्ति या अपमान मरण से भी बढ़कर है। अतः अनभ्यास में विद्या हो गयी न विष के समान ! अतः अभ्यास बहुत आवश्यक है। मैंने एक श्लोक आपको बताया था-
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥

इस श्लोक को आप ठीक से स्मरण रखिए। वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में बता दिया गया। लेट् लकार केवल और केवल वेद में ही पाया जाता है अतः उसके विषय में नहीं बतायेंगे। जब कभी वैदिक व्याकरण सिखायेंगे तब उसके विषय में विस्तार से समझायेंगे। अब भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लकारों के विषय में समझाते हैं। भूतकाल के लिए तीन लकार प्रयुक्त होते हैं- “भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा” सबसे पहला है लुङ् लकार, इसी के विषय में आज चर्चा करते हैं। सामान्य रूप से आप भूतकाल के लिए इन तीनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष नियम जान लीजिए जिससे भाषा में उत्कृष्टता आ जाएगी। संस्कृत में हलन्त, अनुस्वार और विसर्ग पर विशेष ध्यान देना है।

भू (होना), लुङ् लकार

अभूत् (वह हुआ)/ अभूताम् (वे दो हुए) /अभूवन् (वे सब हुए)
अभूः (तू हुआ)/ अभूतम् ( तुम दो हुए)/ अभूत (तुम सब हुए)
अभूवम् (मैं हुआ)/ अभूव (हम दो हुए)/ अभूम (हम सब हुए)

लुङ् लकार के विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए –

१) सबसे पहली बात तो यह स्मरण रखिए कि लुङ् लकार का प्रयोग ‘सामान्य भूतकाल’ के लिए होता है। ‘सामान्य भूतकाल’ का अर्थ है कि जब भूतकाल के साथ ‘कल’ ‘परसों’ आदि विशेषण न लगे हों। बोलने वाला व्यक्ति चाहे अपना अनुभव बता रहा हो अथवा किसी अन्य व्यक्ति का, अभी बीते हुए का वर्णन हो या पहले बीते हुए का, सभी जगह लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है। भले ही घटना साल भर पहले की हो किन्तु यदि कोई विशेषण नहीं लगा है तो लुङ् लकार का ही प्रयोग होगा।

२) ‘आज गया’ , ‘आज पढ़ा’ , ‘आज हुआ’ आदि अद्यतन (आज वाले) भूतकाल के लिए भी लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है, लङ् या लिट् का नहीं।

३) लुङ् लकार के रूप के साथ यदि ‘माङ्’ अव्यय ( मा शब्द ) लगा दें तो उसका अर्थ निषेधात्मक हो जाता है और तब इसका प्रयोग भूतकाल के लिए नहीं अपितु ‘आज्ञा’ या ‘विधि’ अर्थ हो जाता है, जैसे – ” दुःखी मत होओ” = “खिन्नः मा भूः” । एक बात ध्यान रखनी है कि जब माङ् का प्रयोग करेंगे तो लुङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा। अभूत् – मा भूत्, अभूः – मा भूः ।
______________________________________

शब्दकोश :
=======

‘सन्तान’ के पर्यायवाची शब्द –

१) सन्तानः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग में)
२) अपत्यम् ( नपुंसकलिंग )
३) तोकम् ( नपुंसकलिंग )

‘देह’ (शरीर) के पर्यायवाची शब्द –

१) कलेवरम् ( नपुंसकलिंग )
२) गात्रम् ( नपुंसकलिंग )
३) वपुष् ( नपुंसकलिंग )
४) संहननम् ( नपुंसकलिंग )
५) शरीरम् ( नपुंसकलिंग )
६) वर्ष्मन् ( नपुंसकलिंग )
७) विग्रहः ( पुँल्लिंग )
८) कायः ( पुँल्लिंग )
९) देहः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग (देहम्) )
१०) मूर्तिः ( स्त्रीलिंग )
११) तनुः ( स्त्रीलिंग )
१२) तनूः ( स्त्रीलिंग )

_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

तुम्हारे घर सन्तान हुई।
= तव गृहे सन्तानः अभूत्।

महान् उत्सव हुआ।
= महान् उत्सवः अभूत्।

तुम्हारे माता और पिता आनन्दित हुए।
= तव माता च पिता च आनन्दितौ अभूताम्।

सभी आनन्दमग्न हो गए।
= सर्वे आनन्दमग्नाः अभूवन्।

तुम भी प्रसन्न हुए।
= त्वम् अपि प्रसन्नः अभूः।

तुम दोनों बहुत आनन्दित हुए।
= युवां भूरि आनन्दितौ अभूतम्।

तुम सब थकित हो गये थे।
= यूयं श्रान्ताः अभूत ।

मैं भी थकित हो गया था।
= अहम् अपि श्रान्तः अभूवम्।

हम दोनों उत्सव से हर्षित हुए।
= आवाम् उत्सवेन हर्षितौ अभूव।

हम सब आनन्दित हुए।
= वयम् आनन्दिताः अभूम।
_______________________________________

श्लोक :
====

गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥

चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, न चलता हुआ गरुड भी एक पग नहीं जाता । इसलिए चलते रहो।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १२ (अभ्यास – तद् और एतद्)

Sanskrut_12

अभ्यास :
~~~~~~
तद् और एतद् के रूपों का वाक्यों में प्रयोग। दोनों सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद करिये।

तद् = दूर स्थित व्यक्ति-वस्तु
एतद् = समीपस्थ व्यक्ति-वस्तु

शब्दकोश :
~~~~~~~
गृहम् (घर) के पर्यायवाची शब्द –

1] गृहम् (नपुसंकलिंग)
2] गेहम् (नपुसंकलिंग)
3] उदवसितम् (नपुसंकलिंग)
4] वेश्मन् (नपुसंकलिंग)
5] सद्मन् (नपुसंकलिंग)
6] निकेतनम् (नपुसंकलिंग)
7] निशान्तम् (नपुसंकलिंग)
8] पस्त्यम् (नपुसंकलिंग)
9] सदनम् (नपुसंकलिंग)
10] भवनम् (नपुसंकलिंग)
11] आगारम् (नपुसंकलिंग)
12] मन्दिरम् (नपुसंकलिंग और पुँल्लिंग भी)
13] गृहाः (पुँल्लिंग, सदैव बहुवचन में)
14] निकाय्यः (पुँल्लिंग)
15] निलयः (पुँल्लिंग)
16] आलयः (पुँल्लिंग)
_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

उस बालक का नाम अनिरुद्ध है।
= तस्य बालकस्य नाम अनिरुद्धः अस्ति।

उस बालिका का नाम राधिका है।
= तस्याः बालिकायाः नाम राधिका अस्ति।

वे दोनों इस घर में रहते हैं।
= तौ एतस्मिन् भवने निवसतः।

इस बालिका के पिता उस घर में रहते हैं।
= एतस्याः बालिकायाः पिता तस्मिन् गेहे निवसति।

इन दो बालकों को तुम ये फल देते हो।
= एताभ्यां बालकाभ्यां त्वं एतानि फलानि यच्छसि।

इन घरों में वे बालक रहते हैं।
= एतेषु सदनेषु ते बालकाः निवसन्ति।

उस घर में तुम रहते हो, इस घर में मैं रहता हूँ।
= तस्मिन् निलये त्वं वससि, एतस्मिन् निलये अहं वसामि।

यह घर इस बालिका का है।
= एतत् निकेतनम् अस्याः बालिकायाः अस्ति।

ये हमारे घर हैं।
= एते अस्माकं निलयाः सन्ति।

इनमें हम रहते हैं।
= एतेषु वयं निवसामः।

मोहन उस घर से वस्तुएँ लाकर इस घर में रखता है,
= मोहनः तस्मात् गृहात् वस्तूनि नीत्वा एतस्मिन् गृहे स्थापयति,

और इस घर से वस्तुएँ लेकर उस घर में रखता है।
= तथा च एतस्मात् गृहात् वस्तूनि आदाय तस्मिन् गृहे स्थापयति।

मैं इस घर से विद्यालय जाता हूँ, वह उस घर से विद्यालय जाता है।
= अहम् एतस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छामि , सः तस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छति।

इन दो घरों का स्वामी कौन है ?
= एतयोः भवनयोः स्वामी कः अस्ति ?

इस घर से क्या तू राजा हो जाएगा ?
= एतेन गृहेण किं त्वं राजा भविष्यसि वा ?

** इसी प्रकार आप भी तद् और एतद् सर्वनामों के प्रयोग से कम से कम पाँच वाक्य संस्कृत में बनाइये।
_______________________________________

श्लोक :

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनम् आत्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥
एतैः विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैः त्रिभिः नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयः ततः याति परां गतिम्॥
( श्रीमद्भगवद्गीता १६.२१-२२ )

पुस्तक में अर्थ देखें और सर्वनाम शब्दों को ढूँढकर अपनी कॉपी में लिखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २३ (तिङन्त-प्रकरण ८ :: विधिलिङ् लकार अभ्यास)

Sanskrut_23

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत
भवेयम् भवेव भवेम

शब्दकोश :
=======

‘रोगहीनता’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) अनामयम् ( नपुंसकलिंग )
२ ) आरोग्यम् ( नपुंसकलिंग )

रोग दूर करना –
१ ) चिकित्सा ( स्त्रीलिंग )
२ ) रुक्प्रतिक्रिया ( स्त्रीलिंग )

*ज्ञातव्य : आयुर्वेद के दो विभाग होते हैं। एक तो ‘निदान’ जिसमें रोगों की पहचान करने के लिए उनके लक्षणों का वर्णन होता है, जैसे ‘माधवनिदानम्’ नामक ग्रन्थ इसी प्रकार का ग्रन्थ है। दूसरा विभाग है ‘चिकित्सा’ जिसमें विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न औषधों की व्यवस्था होती है। भावप्रकाश में लिखा है “या क्रिया व्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते” अर्थात् जो क्रिया जो व्याधि का हरण करे उसे चिकित्सा कहते हैं । और भैषज्यरत्नावली नामक ग्रन्थ में तीन प्रकार की चिकित्सा बतायी गयी है-
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता।
शस्त्रैः कषायैः लोहाद्यैः क्रमेणान्त्या सुपूजिता॥

जिसमें शस्त्रों से चीर फाड़ (operation) हो – आसुरी
विभिन्न रसों के माध्यम से – मानुषी
पारे आदि धातुओं से – दैवी

दवा के लिए संस्कृत शब्द –
१ ) भेषजम् ( नपुंसकलिंग )
२ ) औषधम् ( नपुंसकलिंग )
३ ) भैषज्यम् (नपुंसकलिंग )
४ ) अगदः ( पुँल्लिंग )
५ ) जायुः ( पुँल्लिंग )

‘रोग’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) रुज् ( स्त्रीलिंग )
२ ) रुजा (स्त्रीलिंग )
३ ) उपतापः ( पुँल्लिंग )
४ ) रोगः ( पुँल्लिंग )
५ ) व्याधिः ( पुँल्लिंग )
६ ) गदः ( पुँल्लिंग )
७ ) आमयः ( पुँल्लिंग )

‘वैद्य’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) रोगहारी ( पुँल्लिंग )
२ ) अगदङ्कारः ( पुँल्लिंग )
३ ) भिषक् ( पुँल्लिंग )
४ ) वैद्यः ( पुँल्लिंग )
५ ) चिकित्सकः ( पुँल्लिंग )
_________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

हमारे देश में निपुण वैद्य होवें।
= अस्माकं देशे निपुणाः वैद्याः भवेयुः।

कोई भी वैद्य धूर्त न हो ।
= कः अपि चिकित्सकः धूर्तः न भवेत्।

सभी वैद्य धार्मिक होवें।
सर्वे अपि अगदङ्काराः धार्मिकाः भवेयुः।

तू दक्ष वैद्य होवे।
= त्वं दक्षः भिषक् भवेः ।

तुम दोनों लोभी वैद्य न होओ।
= युवां लोलुपौ चिकित्सकौ न भवेतम् ।

तुम सुवर्णभस्म खाकर पुष्ट होओ।
= त्वं काञ्चनभस्मं भुक्त्वा पुष्टः भवेः।

यह दवा खाकर तो दुर्बल भी बलवान् हो जाए।
= एतत् औषधं भुक्त्वा दुर्बलः अपि बलवान् भवेत्।

यह दवा तेरे लिए पुष्टिकर होवे।
= एतत् भेषजं तुभ्यं पुष्टिकरं भवेत्।

सभी रोगहीन होवें।
= सर्वे अपि अनामयाः भवेयुः।

लगता है, इस चिकित्सालय में अच्छी चिकित्सा होगी।
= मन्ये , अस्मिन् चिकित्सालये सुष्ठु रुक्प्रतिक्रिया भवेत् ।

ये दवाएँ इस रोग के लिए पर्याप्त होनी चाहिए।
= एतानि भैषज्यानि एतस्मै उपतापाय अलं भवेयुः।

हम योगी हों।
= वयं योगिनः भवेम।

जिससे रोग न हों।
= येन रुजाः न भवेयुः।

हम दोनों सदाचारी होवें।
= आवां सदाचारिणौ भवेव।

जिससे रोग न हों।
= येन आमयाः न भवेयुः।

मैं आयुर्वेद की बात मानने वाला होऊँ।
= अहं आयुर्वेदस्य वचनकरः भवेयम्।

तुम दोनों इस रोग से शीघ्र मुक्त होओ।
= युवाम् अस्मात् गदात् शीघ्रं मुक्तौ भवेतम् ।

हे भगवान् ! मैं इस रोग से जल्दी छूट जाऊँ।
= हे भगवन् ! अहं अस्मात् आमयात् शीघ्रं मुक्तः भवेयम्।
________________________________________

श्लोक :
=====

इस श्लोक में अर्जुन ‘भवेत्’ का प्रयोग किस अर्थ में कर रहे हैं, सोचकर बताइये –

यदि माम् अप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्राः रणे हन्युः तत् मे क्षेमकरं भवेत् ॥
( श्रीमद्भगवद्गीता १।४६ )

॥ शिवोऽवतु ॥

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