Sanskrutam

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संस्कृत साधना : पाठ १३ (कारक-विभक्ति)

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नमः संस्कृताय मित्रों !
संस्कृतभाषा की वाक्यरचना हिन्दी से बहुत भिन्न है, यह बात आपको सदैव याद रखनी चाहिए। हिन्दी में अपादान कारक को छोड़कर शेष सभी कारकों में ‘को’ अथवा अन्य चिह्न भी देखने में आते हैं। किन्तु संस्कृत में उसका अनुवाद करते समय आपको यह बात ध्यान रखनी है कि क्रिया के सम्पादन में वह शब्द किस कारक की भूमिका में है। यदि इसका ध्यान रखेंगे तो भ्रमित नहीं होंगे। अगले पाठों में आपको कारक-विभक्ति के विषय में समझाया जाएगा जिससे आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि कब किस पदार्थ को कौन सा कारक माना जाएगा। अभी आप लिंग, वचन, पुरुष, विशेषण, सर्वनाम विशेषण और शब्दकोश पर ध्यान देते जाइये।

अभ्यास :
~~~~~~~

यद् ( जो ), तद् ( वह ) और किम् ( कौन ) के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए।

शब्दकोश :
~~~~~~~~

वनम् (वन) के पर्यायवाची शब्द –
1] अटवी ( स्त्रीलिंग )
2] अरण्यम् ( नपुसंकलिंग )
3] विपिनम् (नपुसंकलिंग )
4] गहनम् (नपुसंकलिंग )
5] काननम् (नपुसंकलिंग )
6] वनम् ( नपुसंकलिंग )

भारी वन के नाम –
1] महारण्यम् (नपुसंकलिंग )
2] अरण्यानी (स्त्रीलिंग)

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वाक्य अभ्यास :
===========

(निम्नलिखित वाक्यों में कुछ पशु-पक्षियों के नाम हैं उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िये ।)

जो भालू बैठा है वह किस वन में रहता है ?
= यः भल्लूकः आसीनः अस्ति सः कस्मिन् कानने निवसति ?

जिस वन में सिंह रहता है उसी वन में खरगोश भी रहता है।
= यस्मिन् अरण्ये सिंहः वसति तस्मिन् एव अरण्ये शशकः अपि वसति।

जिसका नाम पिंगलक है वह सिंह किस वन से आया है ?
= यस्य नाम पिङ्गलकः अस्ति सः कस्मात् विपिनात् आगतः अस्ति ?

जिस मोरनी का नाम चारुपर्णा है वह किस वन से आयी है ?
= यस्याः मयूर्याः नाम चारुपर्णा अस्ति सा कस्मात् अरण्यात् आगता अस्ति ?

जिस वन से वह कौआ आया है उसी वन से वह गौरैया भी आयी है।
= यस्मात् विपिनात् सः वायसः आगतः अस्ति तस्मात् एव विपिनात् सा चटका अपि आगता अस्ति।

जिन पंखों से हंस उड़ता है उन्हीं पंखों से बगुला भी उड़ता है।
= याभ्यां पक्षाभ्यां हंसः उड्डयति ताभ्याम् एव पक्षाभ्यां बकः अपि उड्डयति ।

वह ऊँट किस विधि से काँटे खाता है ?
= सः क्रमेलकः केन विधिना कण्टकानि खादति ?

जिस विधि से सिंह मांस खाता है उसी विधि से ऊँट काँटे खाता है।
= येन विधिना मृगेन्द्रः मांसं खादति तेन एव विधिना उष्ट्रः कण्टकानि खादति।

जो बन्दर लाल मुँह वाला है, वह किस वृक्ष पर चढ़ता है ?
= यः वानरः रक्तमुखः अस्ति सः कं वृक्षम् आरोहति ?

वे भयंकर सुअर जिनके दाँत टेढ़े हैं, किन महावनों में रहते हैं ?
= ते भयङ्कराः कोलाः येषां दन्ताः वक्राः सन्ति, केषु महारण्येषु वसन्ति ?

वे काले हिरन किन वनों से आये हैं ?
= ते कृष्णसाराः केभ्यः गहनेभ्यः आगताः सन्ति ?

वह नेता नहीं वह तो गिरगिट है जो सच्ची बात वाला नहीं है।
= सः नेता नैव स तु सरटः अस्ति यः सत्यवाक्यः नास्ति।
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श्लोक :

यः यः यां यां तनुं भक्तः
श्रद्धयाऽर्चितुम् इच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां
ताम् एव विदधाम्यहम्॥

(श्रीमद्भगवद्गीता 7.21)

पुस्तक में एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत : Language that cures and slows down aging

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One of the most powerful way to enslave population is to kill their अस्मिता for the roots. As if leaves of the tree think that: “who the hell are roots? We  do the photosynthesis! Roots are useless”. 🙂 Similarly, educated Indians are largely brainwashed. For them, संस्कृत is ancient language with no use in modern times!

Many of them feel great status for learning foreign language but Sanskrit?

Vedic Science or Vedic Mathematics does not mean that science mentioned in Veda(s). That will be actually insult to great source of knowledge.

What does it mean to me is: Veda is source of inspiration. A mental plane nurtured using Vedic rituals/Sanskrit recitations, potent enough to do many wonders, including scientific inquiry.

Besides, it is well known tradition in our culture to revere the source of the knowledge.

संस्कृत is the key to connect mass to the roots.

Except few genuine souls dedicating own success to संस्कृत like (Manjul Bhargava, A professor who sees common thread in Sanskrit, music and mathematics), problem with Indian scientists trained in western education system is that for them their world of science history starts with text books presented to them. Without any independent inquiry.

“I had also noticed that the more Sanskrit I studied and translated, the better my verbal memory seemed to become.”

Instead of experimenting with the संस्कृत and ancient roots, they blindly reject the claims.

My friend, Paramtap summarize correctly:

“Until it comes as prescription from Ivy leagues, Dhimmi Hindu with colonised mindset will consider what we practice as regressive and unhip.

There is massive long term benefits, but in short nearsightedness crucial components are missed or misused.

What we discovered from the structural MRI scanning was remarkable. Numerous regions in the brains of the pandits were dramatically larger than those of controls, with over 10 percent more grey matter across both cerebral hemispheres, and substantial increases in cortical thickness. Although the exact cellular underpinnings of gray matter and cortical thickness measures are still under investigation, increases in these metrics consistently correlate with enhanced cognitive function.

There are fake gurus who are saying it proudly, that I never read Sanskrit because it distorts your perception. But science now is going against false personal anecdote or pseudoscience. In fact, opposite results is happening it is improving significantly the perception and awareness and ability to think in coherence.

Go back to roots, I encourage hypothesis saying specific mantra or meter activates or resonance specific brain areas. Resonance or vibration is the best exercise for the subtle body parts. As already mentioned by our several gurus, mentioned in Vedas.”

Please read this research. Revive the soul of Deva. They want to speak to you, converse with you, bless you and the bridge-link is संस्कृत.

At Prachodayat, we are focused to study, research and experiment. Here are some old notes on same topic.

Devbhasha

Conch-shell, Sound and Microbes

Sound of Mother’s voice : Aid for Fetal Brain growth

Research: Sound waves control brain cells

Sandhya, Meditation And Slowdown Brain Aging

Why Recitation of Mahakavya? The speaker–listener neural coupling

 


Research


A Neuroscientist Explores the “Sanskrit Effect”

MRI scans show that memorizing ancient mantras increases the size of brain regions associated with cognitive function

https://blogs.scientificamerican.com/observations/a-neuroscientist-explores-the-sanskrit-effect/?utm_source=twitter&utm_medium=social&utm_campaign=sa-editorial-social&utm_content&utm_term=mind_blog_&sf177940867=1

Brains of verbal memory specialists show anatomical differences in language, memory and visual systems.

We studied a group of verbal memory specialists to determine whether intensive oral text memory is associated with structural features of hippocampal and lateral-temporal regions implicated in language processing. Professional Vedic Sanskrit Pandits in India train from childhood for around 10years in an ancient, formalized tradition of oral Sanskrit text memorization and recitation, mastering the exact pronunciation and invariant content of multiple 40,000-100,000 word oral texts. We conducted structural analysis of gray matter density, cortical thickness, local gyrification, and white matter structure, relative to matched controls. We found massive gray matter density and cortical thickness increases in Pandit brains in language, memory and visual systems, including i) bilateral lateral temporal cortices and ii) the anterior cingulate cortex and the hippocampus, regions associated with long and short-term memory. Differences in hippocampal morphometry matched those previously documented for expert spatial navigators and individuals with good verbal working memory. The findings provide unique insight into the brain organization implementing formalized oral knowledge systems.

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/26188261

 

संस्कृत साधना : पाठ १२ (अभ्यास – तद् और एतद्)

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अभ्यास :
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तद् और एतद् के रूपों का वाक्यों में प्रयोग। दोनों सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद करिये।

तद् = दूर स्थित व्यक्ति-वस्तु
एतद् = समीपस्थ व्यक्ति-वस्तु

शब्दकोश :
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गृहम् (घर) के पर्यायवाची शब्द –

1] गृहम् (नपुसंकलिंग)
2] गेहम् (नपुसंकलिंग)
3] उदवसितम् (नपुसंकलिंग)
4] वेश्मन् (नपुसंकलिंग)
5] सद्मन् (नपुसंकलिंग)
6] निकेतनम् (नपुसंकलिंग)
7] निशान्तम् (नपुसंकलिंग)
8] पस्त्यम् (नपुसंकलिंग)
9] सदनम् (नपुसंकलिंग)
10] भवनम् (नपुसंकलिंग)
11] आगारम् (नपुसंकलिंग)
12] मन्दिरम् (नपुसंकलिंग और पुँल्लिंग भी)
13] गृहाः (पुँल्लिंग, सदैव बहुवचन में)
14] निकाय्यः (पुँल्लिंग)
15] निलयः (पुँल्लिंग)
16] आलयः (पुँल्लिंग)
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वाक्य अभ्यास :
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उस बालक का नाम अनिरुद्ध है।
= तस्य बालकस्य नाम अनिरुद्धः अस्ति।

उस बालिका का नाम राधिका है।
= तस्याः बालिकायाः नाम राधिका अस्ति।

वे दोनों इस घर में रहते हैं।
= तौ एतस्मिन् भवने निवसतः।

इस बालिका के पिता उस घर में रहते हैं।
= एतस्याः बालिकायाः पिता तस्मिन् गेहे निवसति।

इन दो बालकों को तुम ये फल देते हो।
= एताभ्यां बालकाभ्यां त्वं एतानि फलानि यच्छसि।

इन घरों में वे बालक रहते हैं।
= एतेषु सदनेषु ते बालकाः निवसन्ति।

उस घर में तुम रहते हो, इस घर में मैं रहता हूँ।
= तस्मिन् निलये त्वं वससि, एतस्मिन् निलये अहं वसामि।

यह घर इस बालिका का है।
= एतत् निकेतनम् अस्याः बालिकायाः अस्ति।

ये हमारे घर हैं।
= एते अस्माकं निलयाः सन्ति।

इनमें हम रहते हैं।
= एतेषु वयं निवसामः।

मोहन उस घर से वस्तुएँ लाकर इस घर में रखता है,
= मोहनः तस्मात् गृहात् वस्तूनि नीत्वा एतस्मिन् गृहे स्थापयति,

और इस घर से वस्तुएँ लेकर उस घर में रखता है।
= तथा च एतस्मात् गृहात् वस्तूनि आदाय तस्मिन् गृहे स्थापयति।

मैं इस घर से विद्यालय जाता हूँ, वह उस घर से विद्यालय जाता है।
= अहम् एतस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छामि , सः तस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छति।

इन दो घरों का स्वामी कौन है ?
= एतयोः भवनयोः स्वामी कः अस्ति ?

इस घर से क्या तू राजा हो जाएगा ?
= एतेन गृहेण किं त्वं राजा भविष्यसि वा ?

** इसी प्रकार आप भी तद् और एतद् सर्वनामों के प्रयोग से कम से कम पाँच वाक्य संस्कृत में बनाइये।
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श्लोक :

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनम् आत्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥
एतैः विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैः त्रिभिः नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयः ततः याति परां गतिम्॥
( श्रीमद्भगवद्गीता १६.२१-२२ )

पुस्तक में अर्थ देखें और सर्वनाम शब्दों को ढूँढकर अपनी कॉपी में लिखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ६ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक-२)

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नमः संस्कृताय !!
सुधी मित्रों ! पिछले पाठ में मैंने क्रियाओं के विषय में थोड़ी चर्चा की थी। मैंने बताया था कि “कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व को ‘क्रिया’ कहते हैं।” यह भी बताया था कि ‘अकर्मक’ और ‘सकर्मक’ भेद से क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं। अब बताएँगे कि कौन सी क्रियाएँ ‘अकर्मक’ होती हैं और कौन सी ‘सकर्मक’।

१) पहले तो यह जान लीजिए कि इन दोनों प्रकार की क्रियाओं को बताने के लिए या इनका वर्णन करने के लिए जिन ( पठति, खादति, हसति, खेलति आदि ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उनके मूल अंश को ‘धातु’ कहते हैं।

२) ये धातुएँ लगभग द्विसहस्र हैं। बहुत से आचार्यों ने इनका अर्थसहित संग्रह किया था। किन्तु सबसे प्रसिद्ध संग्रह महर्षि पाणिनि का ‘धातुपाठ’ है। यह ‘धातुपाठ’ उन्हीं के महान् ग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ का परिशिष्ट है। यह ग्रंथ आपको अपने पास अवश्य रखना चाहिए।

३) जब क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं तो उनका वर्णन करने वाली धातुएँ भी दो प्रकार की हुईं- अकर्मक और सकर्मक। अकर्मक क्रियाएँ बहुत थोड़ी ही हैं, जबकि सकर्मक बहुत सी हैं। इसलिए अकर्मक धातुओं को स्मरण रखने के लिए एक श्लोक में इकट्ठा कर दिया गया है-

लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं
वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं
धातुगणं तेऽकर्मकम् आहुः ॥

४) उपर्युक्त श्लोक में जितने अर्थ गिनाए गये हैं, उन अर्थों वाली धातुएँ ‘अकर्मक’ होती हैं। देखिए-
लज्जा अर्थ वाली—- लज्ज् , ह्री
सत्ता अर्थ वाली—– भू , अस् , विद् , वृतु
स्थिति अर्थ वाली—- स्था
जागरण अर्थ वाली— जागृ
वृद्धि अर्थ वाली—— वृध् , एध् , प्याय्
क्षय अर्थ वाली—— क्षि
भय अर्थ वाली——- भी
जीवन अर्थ वाली—– जीव् , अन्
मरण अर्थ वाली—— मृङ्
शयन अर्थ वाली—— शीङ् , स्वप् , सस्
क्रीडा अर्थ वाली—— क्रीड् , खेल् , रम्
रुचि अर्थ वाली——- रुच्
दीप्ति अर्थ वाली——- दीप् , ज्वल्

आगामी पाठों में इनका प्रयोग भी आपको करवायेंगे । केवल इस श्लोक में गिनाए गये अर्थों वाली धातुएँ ही अकर्मक नहीं हैं अपितु कुछ अन्य अकर्मक धातुएँ भी हैं, जिनका ज्ञान आपको यथास्थान होता रहेगा।

५) ध्यातव्य : यदि आपसे कहा जाए कि “महेन्द्र फुटबॉल खेलता है” इस वाक्य में खेलता है क्रिया सकर्मक है अथवा अकर्मक ? तो आप यह सोचकर भ्रमित न होइयेगा कि ‘फुटबॉल को खेलता है’ इसलिए यह सकर्मक क्रिया है। वास्तव में वह फुटबॉल “से” खेलता है। फुटबॉल “खेलना” क्रिया का करण (साधन) है।

६) उपर्युक्त धातुओं के अतिरिक्त धातुओं को सकर्मक समझना चाहिए।

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वाक्य अभ्यास :
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“तुम गड्डमड्ड वाक्यों से मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हो।”
‘तुम’ कर्त्ता, ‘गड्डमड्ड वाक्य’ करण, ‘मेरी’ सम्बन्ध, ‘बुद्धि’ कर्म, ‘मोहित कर रहे हो’ सकर्मक क्रिया।
= त्वं व्यामिश्रैः वाक्यैः मम बुद्धिं मोहयसि।

“हे केशव ! तुम मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हो ?”
‘हे केशव’ सम्बोधन, ‘तुम’ कर्त्ता, ‘मुझे’ कर्म, ‘घोर कर्म’ अधिकरण, ‘क्यों’ अव्यय, ‘लगाते हो’ सकर्मक क्रिया।
हे केशव ! त्वं माम् घोरे कर्मणि कथं नियोजयसि ?

“बन्दर पैरों से चलता है और दो हाथों से फल खाता है।”
‘बन्दर’ कर्त्ता, ‘पैर’ करण, ‘चलता है’ अकर्मक क्रिया, ‘और’ अव्यय, ‘दो हाथ’ करण, ‘फल’ कर्म, ‘खाता है’ सकर्मक क्रिया।
वानरः पादाभ्यां चलति हस्ताभ्यां च फलानि खादति।

“धूर्तों के हृदय में दया नहीं होती है।”
‘धूर्त’ सम्बन्ध, ‘हृदय’ अधिकरण, ‘दया’ कर्त्ता, ‘होती है’ अकर्मक क्रिया।
धूर्तानां हृदये दया न भवति।

विद्यालय के अध्यापकों को मैं जानता हूँ ।
‘विद्यालय’ सम्बन्ध, ‘अध्यापकों को’ कर्म, ‘मैं’ कर्त्ता, ‘जानता हूँ’ सकर्मक क्रिया।
विद्यालयस्य अध्यापकान् अहं जानामि।

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श्लोक :

यत् करोषि* यत् अश्नासि*
यत् जुहोषि* ददासि* यत्।
यत् तपस्यसि* कौन्तेय
तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ९।२७॥)

इस श्लोक में * चिह्न वाली क्रियाएँ लट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन की हैं। अर्थ पुस्तक में ढूँढकर देखें।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

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नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
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उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ११ (अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ))

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नमः संस्कृताय !
आज आपको अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ) सर्वनामों के रूप बताएँगे और इनका वाक्यों में अभ्यास भी करवायेंगे। आज से आपको अमरकोष या आधुनिक शब्दकोशों से प्रतिदिन कुछ शब्द बताया करेंगे जिससे आपका शब्दभण्डार बढ़े। क्योंकि किसी भी भाषा को सीखने के लिए दो वस्तुएँ अनिवार्य हैं- व्याकरण और शब्दकोश। कहा जाता है न कि “अवैयाकरणस्त्वन्धः बधिरः कोशवर्जितः” अर्थात् व्याकरण न जानने वाला अन्धा है , वह साधु असाधु शब्दों में भेद नहीं कर सकता और शब्दकोश के बिना बधिर, न वह अपने विचार अच्छी प्रकार व्यक्त कर सकता है और न ही दूसरों के विचार समझ सकता है। इसलिए अपना शब्दभण्डार बढ़ाते रहिये। संस्कृतभाषा में संसार के सबसे अधिक शब्द हैं। इसे ‘शब्दसन्दोहप्रसविनी’ अर्थात् ‘शब्दों के समूहों को उत्पन्न करने वाली’ कहा जाता है।

१ ) अस्मद् और युष्मद् के रूप तीनों लिंगों में एक जैसे होते हैं ।

अस्मद्

अहम् आवाम् वयम्
माम्/मा आवाम्/नौ अस्मान्/नः
मया आवाभ्याम् अस्माभिः
मह्यम्/मे आवाभ्याम्/नौ अस्मभ्यम्/नः
मत् आवाभ्याम् अस्मत्
मम/मे आवयोः/नौ अस्माकम्/नः
मयि आवयोः अस्मासु

युष्मद्

त्वम् युवाम् यूयम्
त्वाम्/त्वा युवाम्/वाम् युष्मान्/वः
त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः
तुभ्यम्/ते युवाभ्याम्/वाम् युष्मभ्यम्/वः
त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्
तव/ते युवयोः/वाम् युष्माकम्/वः
त्वयि युवयोः युष्मासु
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शब्दकोश :
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मिठाइयाँ, खाद्य /मिष्टान्नानि, खाद्याः

1) रसगुल्ला – रसगोलः
2) लड्डू – मोदकम्
3) जलेबी – कुण्डलिका,
4) खीर – पायसम्
5) बर्फी – हैमी
6) रबड़ी – कूर्चिका
7) श्रीखंड – श्रीखण्डम्

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वाक्य अभ्यास :
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तुम दोनों मुझे खीर देते हो।
= युवां मह्यं पायसं यच्छथः। ( यच्छ् – देना )

हम दोनों तुम सबको सेवइयाँ देते हैं।
= आवां युष्मभ्यं सूत्रिकाः यच्छावः।

क्या तुझमें बुद्धि नहीं है ?
= किं त्वयि बुद्धिः नास्ति ?

मुझमें बुद्धि है, तुम क्यों कुपित होते हो ?
= मयि बुद्धिः अस्ति, त्वं कथं कुपितः भवसि ?

तुम ये मिठाईयाँ अकेले ही खाते हो ?
= त्वम् इमानि मिष्टान्नानि एकाकी एव खादसि ?

हाँ, क्यों ?
= आम्, कथमिव ?

क्या तुम शास्त्र का यह वाक्य नहीं मानते ?
= किं त्वं शास्त्रस्य इदं वाक्यं न मन्यसे ?

कि- “स्वादिष्ट चीज अकेले नहीं खानी चाहिए”- ऐसा।
= यत् – “एकः स्वादु न भुञ्जीत” इति।

ओह ! अब समझा !
= अहो ! इदानीम् अवगतम् !

ये रसगुल्ले हम दोनों के हैं।
= इमे रसगोलाः आवयोः सन्ति।

किन्तु ये लड्डू हमारे नहीं हैं।
= किन्तु इमानि मोदकानि आवयोः न सन्ति।

ये मीठी जलेबियाँ तुम्हारी ही हैं।
= इमाः मधुराः कुण्डलिकाः तव एव सन्ति।

मैं तो इन्हें तुम्हें भी देता हूँ।
= अहं तु इमाः तुभ्यम् अपि ददामि।

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श्लोक :

दैवी ह्येषा गुणमयी
मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ते
मायाम् एतां तरन्ति ते॥

( श्रीमद्भगवद्गीता 7.14 )

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ १५ (तिङन्त-प्रकरण)

Sanskrut_15

नमः संस्कृताय !!
पिछले पाठों में आपने सर्वनाम के विषय में जाना। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सर्वनामों के रूपों का अभ्यास भी आपने किया। मुझे विश्वास है कि आप इस विषय को भलीभाँति समझ गये हैं। जिन सर्वनामों के रूप आपको बताये गये हैं उनका प्रयोग स्थान स्थान पर होता ही रहेगा। अब हम बहुत महत्त्वपूर्ण विषय में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ‘तिङन्त-प्रकरण’ की चर्चा करेंगे। संस्कृतभाषा में यदि आप तिङन्त, कारक और शब्दरूप- ये तीन बातें भली प्रकार जान गये तो समझिए कि संस्कृत के विशाल प्रासाद में प्रवेश कर गए। तब आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।

१) पिछले पाठों में हमने आपको धातुओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। आपने विस्मृत तो नहीं कर दिया ? चलिये पुनः बता देते हैं । क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द ‘धातु’ कहे जाते हैं, जैसे- भू , अस् , पठ् , पा इत्यादि। अब इन मूल शब्दों अर्थात् धातुओं से- भवति, अस्ति, पठति, पिबति इत्यादि रूप कैसे बन जाते हैं- यह बात आपके मस्तिष्क में कभी न कभी आयी ही होगी ! है कि नहीं ? तो इसका उत्तर है- ‘लकार’ । अब यह ‘लकार’ क्या है, यह बताते हैं-

२) लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में ‘ङ्’ है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

३) इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे। इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, आप एक श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे
भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ
लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥

अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।

आने वाले पाठों में हम प्रत्येक लकार के प्रयोगों के नियमों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही आपको आत्मनेपद – परस्मैपद, धातुओं के दस गणों, सेट् और अनिट् धातुओं के विषय में भी समझायेंगे। इस प्रकरण में आपको विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह तिङन्त-प्रकरण ही संस्कृत का प्राण है।
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शब्दकोश :
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‘स्त्री’ के पर्यायवाची शब्द-

१ योषित् २ अबला
३ योषा ४ नारी
५ सीमन्तिनी ६ वधूः
७ प्रतीपदर्शिनी ८ वामा
९ वनिता १० महिला
११ प्रिया १२ रामा
१३ जनिः १४ जनी
१५ योषिता १६ जोषित्
१७ जोषा १८ जोविता
१९ वनिका २० महेलिका
२१ महेला २२ शर्व्वरी
२३ सिन्दूरतिलका २४ सुभ्रूः (सुन्दर भौंह वाली)
२५ सुनयना २६ वामदृक्
२७ अङ्गना २८ ललना
२९ कान्ता ३० पुरन्ध्री
३१ वरवर्णिनी ३२ सुतनुः
३३ तन्वी ३४ तनुः
३५ कामिनी ३६ तन्वङ्गी
३७ रमणी ३८ कुरङ्गनयना
३९ भीरुः ४० भाविनी
४१ विलासिनी ४२ नितम्बिनी
४३ मत्तकासिनी ४४ सुनेत्रा
४५ प्रमदा ४६ सुन्दरी
४७ अञ्चितभ्रूः ४८ ललिता
४९ वासिता ५० भामिनी
५१ वरारोहा ५२ नताङ्गी
५३ त्रिनता ५४ वरा
५५ श्यामा ५६ चारुवदना

* सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द जैसे – भीरुः, सुभ्रूः आदि शब्द विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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यह स्त्री बुद्धिमती है।
= एषा नारी बुद्धिमती अस्ति।

वे दो नारियाँ शिक्षका हैं।
= ते वनिते शिक्षिके स्तः।

वे नारियाँ मधुर गीत गाती हैं।
= ताः प्रमदाः मधुरं गीतं गायन्ति।

उस स्त्री से यह सुन्दर भौहों वाली स्त्री पूछती है..
= तां महिलाम् एषा सुभ्रूः पृच्छति…

कि वे स्त्रियाँ किस गीत को गाती हैं ?
= यत् ताः प्रमदाः कं गीतं गायन्ति ?

ये दो स्त्रियाँ उन दो स्त्रियों को फल देती हैं।
= एते प्रमदे ताभ्यां ललनाभ्यां फलानि यच्छतः।

एक स्त्री रोटी पकाती है और एक दाल पकाती है।
= एका जोषा रोटिकाः पचति एका च सूपं पचति।

दो स्त्रियाँ इन स्त्रियों से भोजन पकवाती हैं।
= द्वे अङ्गने एताभिः वनिताभिः भोजनं पाचयतः।

सभी स्त्रियाँ परस्पर बातें करती हैं।
= सर्वाः जोषिताः परस्परं वार्तालापं कुर्वन्ति।

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श्लोक :
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यः प्रीणाति सुचरितैः पितरं स पुत्रः
यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रम् आपदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

जो अपने सुन्दर आचरणों से पिता को प्रसन्न करे वह पुत्र, जो पति के ही हित को चाहे वह पत्नी, जो सम्पत्ति और विपत्ति में समान व्यवहार करे वह मित्र, इन तीनों को संसार में बहुत पुण्य करने वाला व्यक्ति (ही) प्राप्त करता है।

॥ शिवोऽवतु ॥

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