Sanskrutam

Sanskrutam

संस्कृत साधना : पाठ २९ (तिङन्त-प्रकरण १४ :: लुट् लकार अभ्यास )

Sanskrut_29

भू धातु, लुट् लकार

भविता भवितारौ भवितारः 
भवितासि भवितास्थः भवितास्थ
भवितास्मि भवितास्वः भवितास्मः

शब्दकोश :
=======

रात्रि के पर्यायवाची शब्द –
१) शर्वरी
२) निशा
३) निशीथिनी
४) रात्रिः
५) त्रियामा
६) क्षणदा
७) क्षपा
८) विभावरी
९) तमस्विनी
१०) रजनी
११) यामिनी
१२) तमी
* सभी शब्द स्त्रीलिंग में।

‘नक्तम्’ का अर्थ भी ‘रात्रि’ होता है और यह शब्द अव्यय होता है। वाक्य में इसका प्रयोग यथावत् कर सकते हैं। यदि आपको उपर्युक्त रात्रिवाची शब्दों के रूप न पता हों तो सर्वत्र ‘नक्तम्’ का प्रयोग कीजिए।
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वाक्य अभ्यास :
===========

तेरा यह कार्य परसों रात में होगा।
= तव इदं कार्यं परश्वः निशायां भविता।

आप दोनों कल रात प्रयाग में नहीं होंगे क्या ?
= भवन्तौ श्वः रात्रौ प्रयागे न भवितारौ किम् ?

वे सब तो परसों रात प्रयाग में ही होंगे।
= ते तु परश्वः क्षपायां प्रयागे एव भवितारः।

हम भी वहीं होंगे।
= वयम् अपि तत्र एव भवितास्मः।

यह योगी कल रात कहाँ होगा ?
= एषः योगी श्वः क्षणदायां कुत्र भविता ?

तुम परसों रात विमान में होगे।
= त्वं परश्वः नक्तं विमाने भवितासि।

तुम दोनों तो रेलगाड़ी में होगे।
= युवां तु रेलगन्त्र्यां भवितास्थः।

परसों रात ही उत्सव होगा।
= परश्वः नक्तम् एव उत्सवः भविता।

हम दोनों उस उत्सव में नहीं होंगे।
= आवां तस्मिन् उत्सवे न भवितास्वः।

बाकी सब तो होंगे ही।
= अन्याः सर्वे तु भवितारः एव।

तुम दोनों उस उत्सव में क्यों नहीं होगे ?
= युवां तस्मिन् उत्सवे कथं न भवितास्थः ?

हम दोनों मथुरा में होंगे, इसलिए।
= आवां मथुरायां भवितास्वः, अत एव।

उसके बाद हम सब तुम्हारे घर होंगे।
= तत्पश्चात् वयं तव भवने भवितास्मः।

हमारा स्वागत होगा कि नहीं ??
= अस्माकं स्वागतं भविता वा न वा ??

अवश्य होगा।
= अवश्यं भविता।

हम आप सबको देखकर बहुत प्रसन्न होंगे।
= वयं भवतः दृष्ट्वा भूरि प्रसन्नाः भवितास्मः।
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श्लोक :
====

न च तस्मात् मनुष्येषु
कश्चित् मे प्रियकृत्तमः।
‘भविता’ न च मे तस्मात्
अन्यः प्रियतरो भुवि॥

( श्रीमद्भगवद्गीता १८.६९ )

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १९ (तिङन्त-प्रकरण ५ :: विशेष नियम)

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नमः संस्कृताय !
पिछले पाठ में आपने लुङ् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। लुङ् लकार सामान्य भूतकाल के लिए प्रयुक्त होता है। आशा करता हूँ कि आपने इस लकार से सम्बन्धित नियमों को बुद्धि में स्थिर कर लिया है। आज लङ् लकार की चर्चा करते हैं। यह भी भूतकाल के लिए प्रयुक्त होता है, किन्तु निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

१) लङ् लकार अनद्यतन भूतकाल के लिए प्रयुक्त किया जाता है। ‘अनद्यतन भूतकाल’ अर्थात् ऐसा भूतकाल जो आज से पहले का हो।

जैसे –
वह कल हुआ था = सः ह्यः अभवत्।
वे दोनों परसों हुए थे = तौ परह्यः अभवताम्।
वे सब गतवर्ष हुए थे = ते गतवर्षे अभवन्।

जहाँ आज के भूतकाल की बात कही जाए वहाँ लङ् लकार का प्रयोग नहीं करना।

२) यदि लङ् लकार के रूप के साथ “मा स्म” का प्रयोग कर दिया जाय तो यह निषेध अर्थ वाला हो जाता है। जैसे – दुःखी मत होओ = खिन्नः मा स्म भवः।
ध्यान रहे जब “मा स्म” का प्रयोग करेंगे तो लङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा।

प्राचीन ग्रन्थों में “मा स्म” के साथ लुङ् लकार का भी प्रयोग देखा जाता है, जैसे – “क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ” (श्रीमद्भगवद्गीता २.३)

भू धातु लङ् लकार

अभवत् अभवताम् अभवन्
अभवः अभवतम् अभवत
अभवम् अभवाव अभवाम

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शब्दकोश :
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पैर के लिए संस्कृत शब्द –

१) पादः ( पुँल्लिंग )
२) पद् ( पुँल्लिंग )
३) अङ्घ्रिः ( पुँल्लिंग )
४) चरणः/चरणम् (पुँल्लिंग/नपुंसकलिंग)

‘टखने’ (जो एड़ी के ठीक ऊपर होते हैं) के नाम –

१) घुटिका (स्त्रीलिंग)
२) गुल्फः/गुल्फम् (पुँल्लिंग/नपुंसकलिंग)
ये सदैव द्विवचन में प्रयुक्त होते हैं क्योंकि ये दो दो होते हैं।

एड़ी = पार्ष्णिः (पुँल्लिंग)

घुटना-
१) जानुः/जानु (पुँल्लिंग/नपुंसकलिंग )
२) ऊरुपर्वन् (पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग )
३) अष्ठीवत् (पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग )

ह्यः = बीता हुआ कल
परह्यः = बीता हुआ परसों
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वाक्य अभ्यास :
===========

कल मेरे पैर बहुत थक गए थे।
= ह्यः मम चरणौ भूरि श्रान्तौ अभवताम्।

परसों मेरे टखनों में बहुत पीड़ा हुई।
= परह्यः मम गुल्फयोः महती पीडा अभवत्।

इस कारण तुम भी दुःखी हुए।
= अनेन कारणेन त्वम् अपि दुःखी अभवः।

अब दुःखी मत होओ।
= सम्प्रति दुःखी मा स्म भवः।

तुम दोनों बीते वर्ष प्रथमश्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे।
= युवां व्यतीते वर्षे प्रथमश्रेण्याम् उत्तीर्णौ अभवतम्।

मैं तो अनुत्तीर्ण हो गया था भाई !!
= अहं तु अनुत्तीर्णः अभवं भ्रातः !!

तुम सब प्रसन्न हुए थे,
= यूयं प्रसन्नाः अभवत,

हम सब दुःखी हुए थे।
= वयं खिन्नाः अभवाम।

मेरे दोनों घुटनों में बहुत दर्द हुआ।
= मम जान्वोः महती पीडा अभवत्।

परसों मेरे गायन से सब लोग प्रसन्न हुए थे।
= परह्यः मम गायनेन सर्वे जनाः प्रसन्नाः अभवन्।

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श्लोक :
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अभूत् सीतापती रामः
अभूतां तौ सुदम्पती।
भूयोऽभूवन् महामोदाः
मा भूः खिन्नः प्रसीद च॥ (स्वस्य)

राम सीता के पति हुए, वे दोनों सुन्दर दम्पती हुए। बहुत महान् आमोद प्रमोद हुए। तुम दुःखी मत होओ प्रसन्न होओ।

इस श्लोक में भू धातु के प्रथम पुरुष के सारे रूप और मध्यम पुरुष एकवचन का रूप है। बहुधा इन्हीं रूपों का प्रयोग होता है, स्मरण कर लीजिए।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ११ (अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ))

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नमः संस्कृताय !
आज आपको अस्मद् ( मैं ) और युष्मद् ( तुम ) सर्वनामों के रूप बताएँगे और इनका वाक्यों में अभ्यास भी करवायेंगे। आज से आपको अमरकोष या आधुनिक शब्दकोशों से प्रतिदिन कुछ शब्द बताया करेंगे जिससे आपका शब्दभण्डार बढ़े। क्योंकि किसी भी भाषा को सीखने के लिए दो वस्तुएँ अनिवार्य हैं- व्याकरण और शब्दकोश। कहा जाता है न कि “अवैयाकरणस्त्वन्धः बधिरः कोशवर्जितः” अर्थात् व्याकरण न जानने वाला अन्धा है , वह साधु असाधु शब्दों में भेद नहीं कर सकता और शब्दकोश के बिना बधिर, न वह अपने विचार अच्छी प्रकार व्यक्त कर सकता है और न ही दूसरों के विचार समझ सकता है। इसलिए अपना शब्दभण्डार बढ़ाते रहिये। संस्कृतभाषा में संसार के सबसे अधिक शब्द हैं। इसे ‘शब्दसन्दोहप्रसविनी’ अर्थात् ‘शब्दों के समूहों को उत्पन्न करने वाली’ कहा जाता है।

१ ) अस्मद् और युष्मद् के रूप तीनों लिंगों में एक जैसे होते हैं ।

अस्मद्

अहम् आवाम् वयम्
माम्/मा आवाम्/नौ अस्मान्/नः
मया आवाभ्याम् अस्माभिः
मह्यम्/मे आवाभ्याम्/नौ अस्मभ्यम्/नः
मत् आवाभ्याम् अस्मत्
मम/मे आवयोः/नौ अस्माकम्/नः
मयि आवयोः अस्मासु

युष्मद्

त्वम् युवाम् यूयम्
त्वाम्/त्वा युवाम्/वाम् युष्मान्/वः
त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः
तुभ्यम्/ते युवाभ्याम्/वाम् युष्मभ्यम्/वः
त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्
तव/ते युवयोः/वाम् युष्माकम्/वः
त्वयि युवयोः युष्मासु
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शब्दकोश :
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मिठाइयाँ, खाद्य /मिष्टान्नानि, खाद्याः

1) रसगुल्ला – रसगोलः
2) लड्डू – मोदकम्
3) जलेबी – कुण्डलिका,
4) खीर – पायसम्
5) बर्फी – हैमी
6) रबड़ी – कूर्चिका
7) श्रीखंड – श्रीखण्डम्

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वाक्य अभ्यास :
===========

तुम दोनों मुझे खीर देते हो।
= युवां मह्यं पायसं यच्छथः। ( यच्छ् – देना )

हम दोनों तुम सबको सेवइयाँ देते हैं।
= आवां युष्मभ्यं सूत्रिकाः यच्छावः।

क्या तुझमें बुद्धि नहीं है ?
= किं त्वयि बुद्धिः नास्ति ?

मुझमें बुद्धि है, तुम क्यों कुपित होते हो ?
= मयि बुद्धिः अस्ति, त्वं कथं कुपितः भवसि ?

तुम ये मिठाईयाँ अकेले ही खाते हो ?
= त्वम् इमानि मिष्टान्नानि एकाकी एव खादसि ?

हाँ, क्यों ?
= आम्, कथमिव ?

क्या तुम शास्त्र का यह वाक्य नहीं मानते ?
= किं त्वं शास्त्रस्य इदं वाक्यं न मन्यसे ?

कि- “स्वादिष्ट चीज अकेले नहीं खानी चाहिए”- ऐसा।
= यत् – “एकः स्वादु न भुञ्जीत” इति।

ओह ! अब समझा !
= अहो ! इदानीम् अवगतम् !

ये रसगुल्ले हम दोनों के हैं।
= इमे रसगोलाः आवयोः सन्ति।

किन्तु ये लड्डू हमारे नहीं हैं।
= किन्तु इमानि मोदकानि आवयोः न सन्ति।

ये मीठी जलेबियाँ तुम्हारी ही हैं।
= इमाः मधुराः कुण्डलिकाः तव एव सन्ति।

मैं तो इन्हें तुम्हें भी देता हूँ।
= अहं तु इमाः तुभ्यम् अपि ददामि।

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श्लोक :

दैवी ह्येषा गुणमयी
मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ते
मायाम् एतां तरन्ति ते॥

( श्रीमद्भगवद्गीता 7.14 )

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ १७ (तिङन्त-प्रकरण ३ :: विशेष नियम)

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नमस्कार मित्रों !
पिछले पाठ में आपने तिङ् प्रत्ययों और आत्मनेपद परस्मैपद के विषय में जाना। कौन सी धातुएँ आत्मनेपदी होती है और कौन परस्मैपदी अथवा उभयपदी, यह आप तभी जान पायेंगे जब आप धातुपाठ का अध्ययन करेंगे। किन्तु जब हम आपको धातुओं के रूपों का अभ्यास करायेंगे तब आपको उस धातु के विषय में यह सभी बातें बताते चलेंगे। आज से हम आपको दसों लकारों के प्रयोग से सम्बन्धित नियमों के विषय में बतायेंगे। सबसे पहला है लट् लकार। इसके विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए-

१) लट् लकार वर्तमान काल में होता है। क्रिया के आरम्भ से लेकर समाप्ति तक के काल को वर्तमान काल कहते हैं। जब हम कहते हैं कि ‘रामचरण पुस्तक पढ़ता है या पढ़ रहा है’ तो पढ़ना क्रिया वर्तमान है अर्थात् अभी समाप्त नहीं हुई। और जब कहते हैं कि ‘रामचरण ने पुस्तक पढ़ी’ तो पढ़ना क्रिया समाप्त हो चुकी अर्थात् यह भूतकाल की क्रिया हो गयी।

२) यदि लट् लकार के रूप के साथ ‘स्म’ लगा दिया जाय तो लट् लकार वाले रूप का प्रयोग भूतकाल के लिए हो जायेगा। जैसे – ‘पठति स्म’ = पढ़ता था।

३) सर्वप्रथम हम आपको ‘भू’ धातु के रूप बतायेंगे। ‘भू’ धातु का अर्थ है ‘होना’ , किसी की सत्ता या अस्तित्व को बताने के लिए इस धातु का प्रयोग होता है। यह धातु परस्मैपदी है अतः इसमें तिङ् प्रत्ययों में से प्रथम नौ प्रत्यय लगेंगे। देखिए –

प्रथमपुरुष भू+ तिप् भू+ तस् भू+ झि
मध्यमपुरुष भू+सिप् भू+थस् भू+ थ
उत्तमपुरुष भू+मिप् भू+वस् भू+मस्

व्याकरणशास्त्र की रूपसिद्धि प्रक्रिया को न बताते हुए आपको सिद्ध रूपों को बतायेंगे। रूपसिद्धि की प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। लट् लकार में निम्नलिखित रूप बनेंगे, पुरुष वचन आदि पूर्ववत् रहेंगे-

भवति भवतः भवन्ति
भवसि भवथः भवथ
भवामि भवावः भवामः

इन रूपों का वाक्यों में अभ्यास करने पर आपको उपर्युक्त नियम अभ्यस्त हो जायेंगे।
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शब्दकोश :
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पुत्र के पर्यायवाची शब्द –
१) आत्मजः
२) तनयः
३) सूनुः
४) सुतः
५) पुत्रः

* उपर्युक्त शब्दों को यदि स्त्रीलिंग में बोला जाए तो इनका अर्थ ‘पुत्री’ हो जाता है। जैसे – आत्मजा, सूनू , तनया, सुता, पुत्री । ‘दुहितृ’ माने भी पुत्री होता है।

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वाक्य अभ्यास :
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जब मैं यहाँ होता हूँ तब वह दुष्ट भी यहीं होता है।
= यदा अहम् अत्र भवामि तदा सः दुष्टः अपि अत्रैव भवति।

जब हम दोनों विद्यालय में होते हैं…
= यदा आवां विद्यालये भवावः …

तब तुम दोनों विद्यालय में क्यों नहीं होते हो ?
= तदा युवां विद्यालये कथं न भवथः ?

जब हम सब प्रसन्न होते हैं तब वे भी प्रसन्न होते हैं।
= यदा वयं प्रसन्नाः भवामः तदा ते अपि प्रसन्नाः भवन्ति।

प्राचीन काल में हर गाँव में कुएँ होते थे।
= प्राचीने काले सर्वेषु ग्रामेषु कूपाः भवन्ति स्म।

सब गाँवों में मन्दिर होते थे।
= सर्वेषु ग्रामेषु मन्दिराणि भवन्ति स्म।

मेरे गाँव में उत्सव होता था।
= मम ग्रामे उत्सवः भवति स्म।

आजकल मनुष्य दूसरों के सुख से पीड़ित होता है।
= अद्यत्वे मर्त्यः परेषां सुखेन पीडितः भवति।

जो परिश्रमी होता है वही सुखी होता है।
= यः परिश्रमी भवति सः एव सुखी भवति।

केवल बेटे ही सब कुछ नहीं होते…
= केवलं पुत्राः एव सर्वं न भवन्ति खलु…

बेटियाँ बेटों से कम नहीं होतीं।
= सुताः सुतेभ्यः न्यूनाः न भवन्ति।

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श्लोक :
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अन्नात् भवन्ति भूतानि
पर्जन्यात् अन्नसम्भवः।
यज्ञात् भवति पर्जन्यः
यज्ञः कर्म समुद्भवः ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ३.१४)

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २१ (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार अभ्यास)

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॥ लिट् लकार अभ्यास ॥

कुछ स्मरणीय बातें –

१) संस्कृत लिखते समय स्वरों, ह्रस्व दीर्घ मात्राओं , अनुस्वार, विसर्ग और हलन्त पर विशेष ध्यान दें। इनका उचित प्रयोग करें। कुछ लोग ‘मम’ के स्थान पर ‘मम्’ लिख देते हैं और ‘प्रणाम’ के स्थान पर ‘प्रणाम्’ – यहाँ अनावश्यक हलन्त लगा दिया गया। उसी प्रकार कुछ लोग ‘आम्’ (हाँ) के स्थान पर ‘आम’ और ‘किम्’ के स्थान पर ‘किम’ लिख देते हैं- यहाँ हलन्त लगाना भूल जाते हैं। इसी प्रकार विसर्ग और मात्रा आदि के विषय में जानना चाहिए।

२) संस्कृत में ‘ ड़ ‘ और ‘ ढ़ ‘ अक्षर नहीं होते अतः इनका प्रयोग न करें। ‘ ड़ ‘ और ‘ ङ ‘ तथा ‘ ढ़ ‘ और ‘ ढ ‘ के अन्तर को तो आप जानते ही होंगे।
‘पीड़ा’ को संस्कृत में ‘पीडा’ लिखा जाता है।
‘गूढ़’ को संस्कृत में ‘गूढ’ लिखा जाता है। इसी प्रकार ‘ड’ और ‘ङ’ , ‘व’ और ‘ब’ तथा श ष स का भी ध्यान रखें।

३) संस्कृत लिखने के लिए आपको पुरुष, वचन, लिंग, विशेष्य, विशेषण, सर्वनाम, कर्त्ता, कर्म, क्रिया, कारक-विभक्ति, धातुरूप (लकार) और शब्दरूप – इतनी बातें जानना अति आवश्यक है। इनमें से अधिकांश बातें मैं समझा चुका हूँ। अब केवल धातुरूप, शब्दरूप और कारकविभक्ति विस्तार से समझाना रह गया है। इसके बाद की बातें सन्धि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग, वाच्यपरिवर्तन आदि प्रौढ संस्कृत लिखने के लिए हैं, इन्हें सीख लेने पर भाषा में प्रौढता आ जाती है।

४) संस्कृत में किस क्रिया के लिए कौन सी धातु है- यह स्मरण रखेंगे तो अनुवाद करना बहुत सहज हो जाएगा। आगामी पाठों में यह बताते चलेंगे।

भू धातु-
बभूव (वह हुआ)/ बभूवतुः (वे दो हुए)/बभूवुः (वे सब हुए)

शब्दकोश :
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‘विद्वान्’ के पर्यायवाची शब्द –

१] विद्वान्
२] विपश्चित्
३] दोषज्ञः
४] सत्
५] सुधीः
६] कोविदः
७] बुधः
८] धीरः
९] मनीषी
१०] ज्ञः
१२] प्राज्ञः
१३] सङ्ख्यावान्
१४] पण्डितः
१५] कविः
१६] धीमान्
१७] सूरिः
१८] कृती
१८] कृष्टिः
१९] लब्धवर्णः
२०] विचक्षणः
२१] दूरदर्शी
२२] दीर्घदर्शी

ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

भारत में अनेक विद्वान् हुए।
= भारते अनेके कोविदाः बभूवुः।

उन विद्वानों में कुछ वैयाकरण हुए।
= तेषु बुधेषु केचित् वैयाकरणाः बभूवुः।

कुछ न्यायदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् न्यायदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

कुछ साङ्ख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

आचार्य व्याघ्रभूति वैयाकरण हुए।
आचार्यः व्याघ्रभूतिः वैयाकरणः बभूव।

आचार्य अक्षपाद नैयायिक हुए।
= आचार्यः अक्षपादः नैयायिकः बभूव।

आचार्य पञ्चशिख सांख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= आचार्यः पञ्चशिखः साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डितः बभूव।

वाचक्नवी गार्गी मन्त्रों की विदुषी हुई थी।
= वाचक्नवी गार्गी मन्त्राणां विचक्षणा बभूव।

पाण्डु के पाँच पुत्र हुए।
= पाण्डोः पञ्च सुताः बभूवुः।

वे सभी विद्वान् हुए।
= ते सर्वे प्राज्ञाः बभूवुः।

युधिष्ठिर धर्मशास्त्र और द्यूतविद्या के जानकार हुए।
= युधिष्ठिरः धर्मशास्त्रस्य द्यूतविद्यायाः च कोविदः बभूव।

भीम मल्लविद्या और पाकशास्त्र के वेत्ता हुए।
= भीमसेनः मल्लविद्यायाः पाकशास्त्रस्य च सूरिः बभूव।

सुकेशा ऋषि पाकशास्त्र के उपदेशक हुए थे।
= सुकेशा ऋषिः पाकशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

श्रीकृष्ण भीमसेन का रसाला खाकर बहुत प्रसन्न हुए थे।
= श्रीकृष्णः भीमसेनस्य रसालं भुक्त्वा भूरि प्रसन्नः बभूव।

अर्जुन धनुर्वेद और गन्धर्ववेद के जानकार हुए।
= फाल्गुनः धनुर्वेदस्य गन्धर्ववेदस्य च विपश्चित् बभूव।

नकुल अश्वविद्या के ज्ञानी हुए।
= नकुलः अश्वविद्यायाः कोविदः बभूव।

आचार्य शालिहोत्र अश्वविद्या के प्रसिद्ध जानकार थे।
= आचार्यः शालिहोत्रः अश्वविद्यायाः प्रथितः पण्डितः बभूव।

सहदेव पशुचिकित्सा और शकुनशास्त्र के विद्वान् थे।
= सहदेवः पशुचिकित्सायाः शकुनशास्त्रस्य च ज्ञः बभूव।

कुन्ती अथर्ववेदीय मन्त्रों की विदुषी हुई।
= पृथा अथर्ववेदीयानां मन्त्राणां पण्डिता बभूव।

लल्लाचार्य और उत्पलाचार्य प्रसिद्ध गणितज्ञ हुए।
= लल्लाचार्यः उत्पलाचार्यः च प्रसिद्धौ गणितज्ञौ बभूवतुः।

मण्डनमिश्र की पत्नी भारती बड़ी विदुषी हुई।
= मण्डनमिश्रस्य पत्नी भारती महती पण्डिता बभूव।

भरद्वाज और शाकटायन वैमानिकरहस्य के ज्ञाता हुए।
= भरद्वाजः शाकटायनः च वैमानिकरहस्यस्य विचक्षणौ बभूवतुः।

शाकपूणि निरुक्त के प्रसिद्ध जानकार हुए थे।
= शाकपूणिः निरुक्तस्य प्रथितः कृष्टिः बभूव।

ऋतुध्वज की महारानी मदालसा तत्त्वज्ञ थी।
= ऋतुध्वजस्य पट्टराज्ञी मदालसा तत्त्वज्ञा बभूव।

भारत में एक नहीं, दो नहीं वरन् सहस्रों विद्वान् हुए हैं।
= भारते एकः न, द्वौ न अपितु सहस्रशाः कोविदाः बभूवुः।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १५ (तिङन्त-प्रकरण)

Sanskrut_15

नमः संस्कृताय !!
पिछले पाठों में आपने सर्वनाम के विषय में जाना। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सर्वनामों के रूपों का अभ्यास भी आपने किया। मुझे विश्वास है कि आप इस विषय को भलीभाँति समझ गये हैं। जिन सर्वनामों के रूप आपको बताये गये हैं उनका प्रयोग स्थान स्थान पर होता ही रहेगा। अब हम बहुत महत्त्वपूर्ण विषय में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ‘तिङन्त-प्रकरण’ की चर्चा करेंगे। संस्कृतभाषा में यदि आप तिङन्त, कारक और शब्दरूप- ये तीन बातें भली प्रकार जान गये तो समझिए कि संस्कृत के विशाल प्रासाद में प्रवेश कर गए। तब आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।

१) पिछले पाठों में हमने आपको धातुओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। आपने विस्मृत तो नहीं कर दिया ? चलिये पुनः बता देते हैं । क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द ‘धातु’ कहे जाते हैं, जैसे- भू , अस् , पठ् , पा इत्यादि। अब इन मूल शब्दों अर्थात् धातुओं से- भवति, अस्ति, पठति, पिबति इत्यादि रूप कैसे बन जाते हैं- यह बात आपके मस्तिष्क में कभी न कभी आयी ही होगी ! है कि नहीं ? तो इसका उत्तर है- ‘लकार’ । अब यह ‘लकार’ क्या है, यह बताते हैं-

२) लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में ‘ङ्’ है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

३) इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे। इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, आप एक श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे
भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ
लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥

अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।

आने वाले पाठों में हम प्रत्येक लकार के प्रयोगों के नियमों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही आपको आत्मनेपद – परस्मैपद, धातुओं के दस गणों, सेट् और अनिट् धातुओं के विषय में भी समझायेंगे। इस प्रकरण में आपको विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह तिङन्त-प्रकरण ही संस्कृत का प्राण है।
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शब्दकोश :
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‘स्त्री’ के पर्यायवाची शब्द-

१ योषित् २ अबला
३ योषा ४ नारी
५ सीमन्तिनी ६ वधूः
७ प्रतीपदर्शिनी ८ वामा
९ वनिता १० महिला
११ प्रिया १२ रामा
१३ जनिः १४ जनी
१५ योषिता १६ जोषित्
१७ जोषा १८ जोविता
१९ वनिका २० महेलिका
२१ महेला २२ शर्व्वरी
२३ सिन्दूरतिलका २४ सुभ्रूः (सुन्दर भौंह वाली)
२५ सुनयना २६ वामदृक्
२७ अङ्गना २८ ललना
२९ कान्ता ३० पुरन्ध्री
३१ वरवर्णिनी ३२ सुतनुः
३३ तन्वी ३४ तनुः
३५ कामिनी ३६ तन्वङ्गी
३७ रमणी ३८ कुरङ्गनयना
३९ भीरुः ४० भाविनी
४१ विलासिनी ४२ नितम्बिनी
४३ मत्तकासिनी ४४ सुनेत्रा
४५ प्रमदा ४६ सुन्दरी
४७ अञ्चितभ्रूः ४८ ललिता
४९ वासिता ५० भामिनी
५१ वरारोहा ५२ नताङ्गी
५३ त्रिनता ५४ वरा
५५ श्यामा ५६ चारुवदना

* सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द जैसे – भीरुः, सुभ्रूः आदि शब्द विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

यह स्त्री बुद्धिमती है।
= एषा नारी बुद्धिमती अस्ति।

वे दो नारियाँ शिक्षका हैं।
= ते वनिते शिक्षिके स्तः।

वे नारियाँ मधुर गीत गाती हैं।
= ताः प्रमदाः मधुरं गीतं गायन्ति।

उस स्त्री से यह सुन्दर भौहों वाली स्त्री पूछती है..
= तां महिलाम् एषा सुभ्रूः पृच्छति…

कि वे स्त्रियाँ किस गीत को गाती हैं ?
= यत् ताः प्रमदाः कं गीतं गायन्ति ?

ये दो स्त्रियाँ उन दो स्त्रियों को फल देती हैं।
= एते प्रमदे ताभ्यां ललनाभ्यां फलानि यच्छतः।

एक स्त्री रोटी पकाती है और एक दाल पकाती है।
= एका जोषा रोटिकाः पचति एका च सूपं पचति।

दो स्त्रियाँ इन स्त्रियों से भोजन पकवाती हैं।
= द्वे अङ्गने एताभिः वनिताभिः भोजनं पाचयतः।

सभी स्त्रियाँ परस्पर बातें करती हैं।
= सर्वाः जोषिताः परस्परं वार्तालापं कुर्वन्ति।

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श्लोक :
====

यः प्रीणाति सुचरितैः पितरं स पुत्रः
यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रम् आपदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

जो अपने सुन्दर आचरणों से पिता को प्रसन्न करे वह पुत्र, जो पति के ही हित को चाहे वह पत्नी, जो सम्पत्ति और विपत्ति में समान व्यवहार करे वह मित्र, इन तीनों को संसार में बहुत पुण्य करने वाला व्यक्ति (ही) प्राप्त करता है।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १४ (अभ्यास)

Sanskrut_14

अभ्यास :
~~~~~~~

इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए ।

इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु
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शब्दकोश :
~~~~~~~

‘पक्षी’ के पर्यायवाची शब्द –

1] खगः 2] विहङ्गः 3] विहगः
4] विहङ्गमः 5] विहायस् 6] शकुन्तिः
7] पक्षिन् 8] शकुनिः 9] शकुन्तः
10] शकुनः 11] द्विजः 12] पतत्रिन्
13] पत्रिन् 14] पतङ्गः 15] पतत्
16] पत्ररथः 17] अण्डजः 18] नगौकस्
19] वाजिन् 20] विकिरः 21] विः
22] विष्किरः 23] पतत्रिः 24] नीडोद्भवः
25] गरुत्मत् 26] पित्सित् 27] नभसङ्गमः

* ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

वे पक्षी तीव्र वेग से उड़ते हैं।
= अमी खगाः तीव्रवेगेन उड्डयन्ति।

ये पक्षी खेत में बैठे हैं।
= इमे विहङ्गाः क्षेत्रे आसीनाः सन्ति।

इन पक्षियों को दाना देता हूँ।
= एभ्यः विहगेभ्यः अन्नकणान् ददामि।

इस खेत से पक्षी चले गए हैं।
= अस्मात् क्षेत्रात् पत्ररथाः गताः सन्ति।

इस वाटिका में पक्षी कूजते हैं।
= अस्यां वाटिकायां शकुन्ताः कूजन्ति।

इस वृक्ष पर बहुत पक्षी रहते हैं।
= अस्मिन् वृक्षे बहवः अण्डजाः वसन्ति।

उस बरगद पर बहुत से पक्षी रहते हैं।
= अमुष्मिन् न्यग्रोधे बहवः विष्किराः वसन्ति।

ये पक्षी उन पीपल के वृक्षों पर रहते हैं।
= इमे अण्डजाः अमीषु अश्वत्थेषु वसन्ति।

ये व्याध उन पक्षियों को मारते हैं।
= इमे व्याधाः अमून् अण्डजान् घ्नन्ति।

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श्लोक :
====

उदेति सविता ताम्रः
ताम्रम् एवास्तम् एति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च
महताम् एकरूपता ॥

सूर्य रक्तवर्ण ही उदित होता है और रक्तवर्ण ही अस्त होता है। सम्पत्ति और विपत्ति में सज्जन एक समान रहते हैं।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ २५ (तिङन्त-प्रकरण १० :: आशीर्लिङ् अभ्यास)

Sanskrut_25

भू धातु, आशीर्लिङ्

भूयात् भूयास्ताम् भूयासुः
भूयाः भूयास्तम् भूयास्त
भूयासम् भूयास्व भूयास्म

शब्दकोश :
=======

‘यशस्वी’ के पर्यायवाची शब्द –
१) कीर्तिमान्
२) यशस्वी
३) समज्ञावान्

‘आयुष्मान्’ के पर्यायवाची शब्द –
१) चिरजीवी
२) दीर्घायुः
३) जैवातृकः
४) चिरञ्जीवी
५) आयुष्मान्

सभी शब्द विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं अतः तीनों लिंगों में रूप चलेंगे। स्त्रीलिंग में आयुष्मती, कीर्तिमती, दीर्घजीविनी आदि। शब्दरूप प्रकरण में रूप किस प्रकार चलते हैं यह बतायेंगे, अभी आप लकारों पर ध्यान दीजिए।
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वाक्य अभ्यास :
===========

तेरा पुत्र यशस्वी हो।
= तव पुत्रः यशस्वी भूयात्।

तुम्हारी दोनों पुत्रियाँ यशस्विनी हों।
= तव उभे सुते कीर्तिमत्यौ भूयास्ताम्।

आपके सभी पुत्र दीर्घायु हों।
= भवतः सर्वे तनयाः चिरञ्जीविनः भूयासुः।

तू आयुष्मान् हो।
= त्वं जैवातृकः भूयाः।

तुम दोनों यशस्वी होओ।
= युवां समज्ञावन्तौ भूयास्तम्।

तुम सब दीर्घायु होओ।
= यूयं जैवातृकाः भूयास्त।

मैं दीर्घायु होऊँ।
= अहं चिरजीवी भूयासम्।

हम दोनों यशस्वी होवें।
= आवां समज्ञावन्तौ भूयास्व ।

हम सब आयुष्मान् हों।
= वयम् आयुष्मन्तः भूयास्म।
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श्लोक :
=====
पठन् द्विजः वागृषभत्वम् ईयात्
स्यात् क्षत्त्रियः भूमिपतित्वम् ईयात्।
वणिग्जनः पण्यफलत्वम् ईयात्
जनः च शूद्रः अपि महत्त्वम् ईयात्॥
( रामायणम् बालकाण्डम् १।७९ )

ब्राह्मण इस काव्य को पढ़ता हुआ वाणी में निपुणता प्राप्त करे, क्षत्रिय हो तो भूमिपति होवे, वैश्य व्यापार का फल पाये और शूद्र भी महत्त्व को प्राप्त हो।

ईयात् = इण् गतौ ( जाना ) आशीर्लिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन ( ‘प्राप्त हो’ ‘जाये’ ऐसा अर्थ होगा )

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १८ (तिङन्त-प्रकरण ४ :: विशेष नियम)

Sanskrut_18

नमस्कार मित्रों !
पिछले पाठ में आपने लट् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। ‘भू’ धातु के लट् लकार में बनने वाले रूपों को जाना और उनका वाक्यों में अभ्यास भी किया। स्मरण करा दूँ कि “अनभ्यासे विषं विद्या” अभ्यास न करने पर विद्या विष का काम करती है। आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों ? मान लीजिये कि आप किसी सभा या गोष्ठी में बैठे हैं और सम्बन्धित विद्या का प्रसंग चल गया और आप अनभ्यास के कारण उसमें भ्रमित हो गये, तो बिना अपमानित हुए न बचेंगे। और “सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।” अकीर्ति या अपमान मरण से भी बढ़कर है। अतः अनभ्यास में विद्या हो गयी न विष के समान ! अतः अभ्यास बहुत आवश्यक है। मैंने एक श्लोक आपको बताया था-
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥

इस श्लोक को आप ठीक से स्मरण रखिए। वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में बता दिया गया। लेट् लकार केवल और केवल वेद में ही पाया जाता है अतः उसके विषय में नहीं बतायेंगे। जब कभी वैदिक व्याकरण सिखायेंगे तब उसके विषय में विस्तार से समझायेंगे। अब भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लकारों के विषय में समझाते हैं। भूतकाल के लिए तीन लकार प्रयुक्त होते हैं- “भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा” सबसे पहला है लुङ् लकार, इसी के विषय में आज चर्चा करते हैं। सामान्य रूप से आप भूतकाल के लिए इन तीनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष नियम जान लीजिए जिससे भाषा में उत्कृष्टता आ जाएगी। संस्कृत में हलन्त, अनुस्वार और विसर्ग पर विशेष ध्यान देना है।

भू (होना), लुङ् लकार

अभूत् (वह हुआ)/ अभूताम् (वे दो हुए) /अभूवन् (वे सब हुए)
अभूः (तू हुआ)/ अभूतम् ( तुम दो हुए)/ अभूत (तुम सब हुए)
अभूवम् (मैं हुआ)/ अभूव (हम दो हुए)/ अभूम (हम सब हुए)

लुङ् लकार के विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए –

१) सबसे पहली बात तो यह स्मरण रखिए कि लुङ् लकार का प्रयोग ‘सामान्य भूतकाल’ के लिए होता है। ‘सामान्य भूतकाल’ का अर्थ है कि जब भूतकाल के साथ ‘कल’ ‘परसों’ आदि विशेषण न लगे हों। बोलने वाला व्यक्ति चाहे अपना अनुभव बता रहा हो अथवा किसी अन्य व्यक्ति का, अभी बीते हुए का वर्णन हो या पहले बीते हुए का, सभी जगह लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है। भले ही घटना साल भर पहले की हो किन्तु यदि कोई विशेषण नहीं लगा है तो लुङ् लकार का ही प्रयोग होगा।

२) ‘आज गया’ , ‘आज पढ़ा’ , ‘आज हुआ’ आदि अद्यतन (आज वाले) भूतकाल के लिए भी लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है, लङ् या लिट् का नहीं।

३) लुङ् लकार के रूप के साथ यदि ‘माङ्’ अव्यय ( मा शब्द ) लगा दें तो उसका अर्थ निषेधात्मक हो जाता है और तब इसका प्रयोग भूतकाल के लिए नहीं अपितु ‘आज्ञा’ या ‘विधि’ अर्थ हो जाता है, जैसे – ” दुःखी मत होओ” = “खिन्नः मा भूः” । एक बात ध्यान रखनी है कि जब माङ् का प्रयोग करेंगे तो लुङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा। अभूत् – मा भूत्, अभूः – मा भूः ।
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शब्दकोश :
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‘सन्तान’ के पर्यायवाची शब्द –

१) सन्तानः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग में)
२) अपत्यम् ( नपुंसकलिंग )
३) तोकम् ( नपुंसकलिंग )

‘देह’ (शरीर) के पर्यायवाची शब्द –

१) कलेवरम् ( नपुंसकलिंग )
२) गात्रम् ( नपुंसकलिंग )
३) वपुष् ( नपुंसकलिंग )
४) संहननम् ( नपुंसकलिंग )
५) शरीरम् ( नपुंसकलिंग )
६) वर्ष्मन् ( नपुंसकलिंग )
७) विग्रहः ( पुँल्लिंग )
८) कायः ( पुँल्लिंग )
९) देहः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग (देहम्) )
१०) मूर्तिः ( स्त्रीलिंग )
११) तनुः ( स्त्रीलिंग )
१२) तनूः ( स्त्रीलिंग )

_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
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तुम्हारे घर सन्तान हुई।
= तव गृहे सन्तानः अभूत्।

महान् उत्सव हुआ।
= महान् उत्सवः अभूत्।

तुम्हारे माता और पिता आनन्दित हुए।
= तव माता च पिता च आनन्दितौ अभूताम्।

सभी आनन्दमग्न हो गए।
= सर्वे आनन्दमग्नाः अभूवन्।

तुम भी प्रसन्न हुए।
= त्वम् अपि प्रसन्नः अभूः।

तुम दोनों बहुत आनन्दित हुए।
= युवां भूरि आनन्दितौ अभूतम्।

तुम सब थकित हो गये थे।
= यूयं श्रान्ताः अभूत ।

मैं भी थकित हो गया था।
= अहम् अपि श्रान्तः अभूवम्।

हम दोनों उत्सव से हर्षित हुए।
= आवाम् उत्सवेन हर्षितौ अभूव।

हम सब आनन्दित हुए।
= वयम् आनन्दिताः अभूम।
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श्लोक :
====

गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥

चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, न चलता हुआ गरुड भी एक पग नहीं जाता । इसलिए चलते रहो।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ३१ (तिङन्त-प्रकरण १६ :: लृट् लकार अभ्यास )

Sanskrut_31

#संस्कृतशिक्षण – 31 [लृट् लकार अभ्यास]

भू धातु, लृट् लकार

भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति
भविष्यसि भविष्यथः भविष्यथ
भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः

शब्दकोश :
=======

नट के नाम –
१] शैलाली
२] शैलूषः
३] जायाजीवः
४] कृशाश्वी
५] भरतः
६] सर्व्ववेशी
७] भरतपुत्त्रकः
८] धात्रीपुत्त्रः
९] रङ्गजीवः
१०] रङ्गावतारकः
११] नर्तकः

सभी पुँल्लिंग में।

आश्चर्यजनक खेल तमाशे के नाम –
१ ] कौतूहलम् (नपुंसकलिंग )
२ ] कौतुकम् (नपुंसकलिंग )
३ ] कुतुकम् (नपुंसकलिंग )
४ ] कुतूहलम् (नपुंसकलिंग )

बच्चों के खेल कूद के नाम –
१ ] क्रीडा (स्त्रीलिंग )
२ ] खेला (स्त्रीलिंग )
३ ] कूर्दनम् (नपुंसकलिंग )
___________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

आप आज दोपहर में कहाँ होंगे ?
= भवान् अद्य मध्याह्ने कुत्र भविष्यति ?

आज दोपहर मैं खेल के मैदान में होऊँगा।
= अद्य मध्याह्ने अहं क्रीडाक्षेत्रे भविष्यामि।

तुम कहाँ होओगे ?
= त्वं कुत्र भविष्यसि ?

मैं भी वहीं होऊँगा।
= अहम् अपि तत्र एव भविष्यामि।

वहाँ नटों का खेल होगा।
= तत्र शैलूषाणां कौतुकं भविष्यति।

उसके बाद बच्चों का खेल होगा।
= तत्पश्चात् बालकानां खेला भविष्यति।

वहाँ तो बहुत से नट होंगे।
= तत्र तु बहवः रङ्गजीवाः भविष्यन्ति खलु।

तुम दोनों भी वहाँ होगे कि नहीं ?
= युवाम् अपि तत्र एव भविष्यथः वा न वा ?

हाँ हम दोनों भी वहीं होंगे।
= आम्, आवाम् अपि तत्र एव भविष्यावः।

हम सब भी अध्यापकों के साथ वहाँ होंगें।
= वयम् अपि उपाध्यायैः सह तत्र भविष्यामः।

बच्चों का खेल कब होगा?
= बालानां कूर्दनं कदा भविष्यति ?

नटों के खेल के बाद ही होगा।
= भरतानां कुतकस्य पश्चात् एव भविष्यति।

तब तो बहुत आनन्द होगा।
= तर्हि तु भूरि मोदः भविष्यति।

हाँ, आओ चलते हैं।
= आम्, एहि चलामः।

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श्लोक :
====

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान् समाहर्तुम् इह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ११।३२॥)

पुस्तक में एक एक शब्द का अर्थ देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

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