Sanskrutam

Sanskrutam

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

Sanskrut_9

नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
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उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २२ (तिङन्त-प्रकरण ७ :: लिङ् लकार (विधिलिङ्))

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नमः संस्कृताय !

लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् और लिट् लकार के विषय में जाना। लकारों से सम्बन्धित जो श्लोक मैंने बताया था उसका आधा भाग आपने जान लिया- “लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।” साथ ही आपने भू धातु के रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया। अब श्लोक का तृतीय चरण देखिए- “विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ” अर्थात् ‘विधि’ और ‘आशीर्वाद’ अर्थ में लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग होता है। तो आज आपको लिङ् लकार के विषय में बताते हैं। आगामी पाठों में लोट् और अन्य लकारों के विषय में क्रमशः बताएँगे। स्मृतिग्रन्थों में तथा अन्य विधिनिषेध का विधान करने वाले शास्त्रों में विधिलिङ् लकार के प्रचुर प्रयोग मिलते हैं।

१) सर्वप्रथम तो आप यह जान लीजिए कि इस लकार के दो भेद हैं- १. विधिलिङ् २. आशीर्लिङ् । आज केवल विधिलिङ् लकार की चर्चा करते हैं।

२) जिसके द्वारा किसी बात का विधान किया जाता है उसे विधि कहते हैं। जैसे – ‘स्वर्गकामः यजेत्’ स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे। यहाँ यज्ञ करने का विधान किया गया है अतः यज् (यजन करना) धातु में विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार यदि किसी चीज का निषेध करना हो तो वाक्य में निषेधार्थक शब्द का प्रयोग करके विधिलिङ् लकार का प्रयोग करना चाहिए, जैसे -” मांसं न भक्षेत् ” मांस नहीं खाना चाहिए/ न खाये।

मोटे तौर पर आप यह ध्यान में रखिए कि जहाँ “चाहिए” ऐसा बोला जा रहा हो , वहाँ इस लकार का प्रयोग होगा। हिन्दी में ‘करे’ और ‘करना चाहिए’ दोनों लगभग समान अर्थ वाले हैं।

३) जहाँ किसी बात की सम्भावना की जाए वहाँ भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है, जैसे – ” अद्य वर्षः भवेत् ” सम्भव है आज वर्षा हो।

४) योग्यता बतलाने के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है। जैसे – “भवान् पारितोषिकं लभेत् ” – आप पुरस्कार पाने योग्य हैं।

५) आमन्त्रित, निमन्त्रित करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे -” भवान् अद्य मम गृहम् आगच्छेत्” आज आप मेरे घर आयें।

६) इच्छा, कामना करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे – “भवान् शीघ्रं स्वस्थः भवेत्” आप शीघ्र स्वस्थ हों।

७) आज्ञा के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया जाता है।

८) अच्छी प्रकार स्मरण रखिए कि “आशीर्वाद” के अर्थ में इस लकार का प्रयोग नहीं होता। आशीर्वाद के लिए आशीर्लिङ् और कभी कभी लोट् लकार का प्रयोग होता है।

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत्
भवेयम् भवेव भवेम
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शब्दकोश :
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जासूस, भेदिया, गुप्तचर के लिए संस्कृत शब्द –

१] यथार्हवर्णः
२] प्रणिधिः
३] अपसर्पः
४] चरः
५] स्पशः
६] चारः
७] गूढपुरुषः

*ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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वह जासूस होवे। ( इच्छा )
= सः गूढपुरुषः भवेत् ।

वे दोनों जासूस सफल हों। (इच्छा)
= तौ यथार्हवर्णौ सफलौ भवेताम् ।

उन सारे गुप्तचरों को राष्ट्रभक्त होना चाहिए। (विधि)
= ते सर्वे स्पशाः राष्ट्रभक्ताः भवेयुः।

तुम्हें गुप्तचर के घर में होना चाहिए। (विधि)
= त्वं गूढपुरुषस्य गृहे भवेः।

तुम दोनों को भेदिया होना चाहिए। (सम्भावना)
= युवां स्पशौ भवेतम् ।

तुम सबको भेदियों से दूर रहना चाहिए।(विधि, आज्ञा)
= यूयं चारेभ्यः दूरं भवेत।

सोचता हूँ, मैं जासूस होऊँ। (इच्छा, सम्भावना)
= मन्ये अहं प्रणिधिः भवेयम्।

हम दोनों भेदियों के भी भेदिये होवें। (इच्छा)
= आवां चाराणाम् अपि चारौ भवेव ।

हम सब गुप्तचरों के प्रशंसक हों।(इच्छा, विधि)
= वयम् अपसर्पाणां प्रशंसकाः भवेम ।
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श्लोक :
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दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेत् युगपद् उत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासः तस्य महात्मनः॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।१२ )

पुस्तक से देखकर सभी शब्दों का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

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संस्कृत साधना : पाठ ३० (तिङन्त-प्रकरण १५ :: लृट् लकार )

Sanskrut_30

नमः संस्कृताय!
आज लृट् लकार की बात करते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। सामान्य भविष्यत् काल के लिए लृट् लकार का प्रयोग किया जाता है। जहाँ भविष्यत् काल की कोई विशेषता न कही जाए वहाँ लृट् लकार ही होता है। कल, परसों आदि विशेषण न लगे हों। भले ही घटना दो पल बाद की हो अथवा वर्ष भर बाद की, बिना किसी विशेषण वाले भविष्यत् में लृट् का प्रयोग करना है। ‘आज होगा’ – इस प्रकार के वाक्यों में भी लृट् होगा।

भू धातु, लृट् लकार

भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति
भविष्यसि भविष्यथः भविष्यथ
भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः

आज मैं विद्यालय में होऊँगा।
= अद्य अहं विद्यालये भविष्यामि।

मैं विद्यालय में होऊँगा।
= अहं विद्यालये भविष्यामि।

कल मैं विद्यालय में होऊँगा।
= श्वः अहं विद्यालये भवितास्मि। (लुट् लकार)
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शब्दकोश :
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‘दिन’ के पर्यायवाची –
१] घस्रः ( पुँल्लिंग )
२] दिनम् (नपुंसकलिंग )
३] अहन् (अहः) (नपुंसकलिंग )
४] दिवसः/दिवसम् (पुँल्लिंग / नपुंसकलिंग )
५] वासरः/वासरम् ( पुँल्लिंग / नपुंसकलिंग )
६] भास्वरः (पुँल्लिंग )
७] दिवा (अव्यय)
८] अंशकम् (नपुंसकलिंग )
९] द्यु (नपुंसकलिंग )
१०] वारः (पुँल्लिंग )

सायम् – दिन का अन्तिम भाग (अव्यय )
प्राह्णः – प्रातःकाल (पुँल्लिंग )
मध्याह्नः – दोपहर ( पुँल्लिंग )
अपराह्णः – दिन का द्वितीय अर्द्धभाग (पुँल्लिंग )

रात्रि के आरम्भिक काल के नाम –
१ ] प्रदोषः (पुँल्लिंग )
२ ] रजनीमुखम् (नपुंसकलिंग )
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वाक्य अभ्यास :
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आज सन्ध्या को वह उद्यान में होगा।
= अद्य सायं सः उद्याने भविष्यति।

प्रातः वे दोनों मन्दिर में होंगे।
= प्राह्णे तौ मन्दिरे भविष्यतः।

दिन में वे कहाँ होंगे ?
= दिवसे ते कुत्र भविष्यन्ति ?

आज दोपहर तुम कहाँ होगे ?
= अद्य मध्याह्ने त्वं कुत्र भविष्यसि ?

आज दोपहर मैं विद्यालय में होऊँगा ।
= अद्य मध्याह्ने अहं विद्यालये भविष्यामि।

तुम दोनों सायंकाल कहाँ होगे ?
= युवां प्रदोषे कुत्र भविष्यथः ?

हम दोनो तो सन्ध्यावन्दन में होंगे।
= आवां तु सन्ध्यावन्दने भविष्यावः।

क्या तुम वहाँ नहीं होगे ?
= किं त्वं तत्र न भविष्यसि ?

हाँ, मैं भी होऊँगा।
= आम्, अहम् अपि भविष्यामि।

हम सब दिन में वहीं होंगे।
= वयं दिवा तत्र एव भविष्यामः।

तुम सब तो सायंकाल में अपने घर होगे।
= यूयं तु रजनीमुखे स्वगृहे भविष्यथ।

और हम अपने घर होंगे।
= वयं च स्वभवने भविष्यामः।

तो उत्सव कैसे होगा ?
= तर्हि उत्सवः कथं भविष्यति ?

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श्लोक :
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न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न ‘भविष्यामः’ सर्वे वयमतः परम् ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता २।१२)

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १५ (तिङन्त-प्रकरण)

Sanskrut_15

नमः संस्कृताय !!
पिछले पाठों में आपने सर्वनाम के विषय में जाना। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सर्वनामों के रूपों का अभ्यास भी आपने किया। मुझे विश्वास है कि आप इस विषय को भलीभाँति समझ गये हैं। जिन सर्वनामों के रूप आपको बताये गये हैं उनका प्रयोग स्थान स्थान पर होता ही रहेगा। अब हम बहुत महत्त्वपूर्ण विषय में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ‘तिङन्त-प्रकरण’ की चर्चा करेंगे। संस्कृतभाषा में यदि आप तिङन्त, कारक और शब्दरूप- ये तीन बातें भली प्रकार जान गये तो समझिए कि संस्कृत के विशाल प्रासाद में प्रवेश कर गए। तब आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।

१) पिछले पाठों में हमने आपको धातुओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। आपने विस्मृत तो नहीं कर दिया ? चलिये पुनः बता देते हैं । क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द ‘धातु’ कहे जाते हैं, जैसे- भू , अस् , पठ् , पा इत्यादि। अब इन मूल शब्दों अर्थात् धातुओं से- भवति, अस्ति, पठति, पिबति इत्यादि रूप कैसे बन जाते हैं- यह बात आपके मस्तिष्क में कभी न कभी आयी ही होगी ! है कि नहीं ? तो इसका उत्तर है- ‘लकार’ । अब यह ‘लकार’ क्या है, यह बताते हैं-

२) लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में ‘ङ्’ है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

३) इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे। इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, आप एक श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे
भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ
लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥

अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।

आने वाले पाठों में हम प्रत्येक लकार के प्रयोगों के नियमों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही आपको आत्मनेपद – परस्मैपद, धातुओं के दस गणों, सेट् और अनिट् धातुओं के विषय में भी समझायेंगे। इस प्रकरण में आपको विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह तिङन्त-प्रकरण ही संस्कृत का प्राण है।
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शब्दकोश :
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‘स्त्री’ के पर्यायवाची शब्द-

१ योषित् २ अबला
३ योषा ४ नारी
५ सीमन्तिनी ६ वधूः
७ प्रतीपदर्शिनी ८ वामा
९ वनिता १० महिला
११ प्रिया १२ रामा
१३ जनिः १४ जनी
१५ योषिता १६ जोषित्
१७ जोषा १८ जोविता
१९ वनिका २० महेलिका
२१ महेला २२ शर्व्वरी
२३ सिन्दूरतिलका २४ सुभ्रूः (सुन्दर भौंह वाली)
२५ सुनयना २६ वामदृक्
२७ अङ्गना २८ ललना
२९ कान्ता ३० पुरन्ध्री
३१ वरवर्णिनी ३२ सुतनुः
३३ तन्वी ३४ तनुः
३५ कामिनी ३६ तन्वङ्गी
३७ रमणी ३८ कुरङ्गनयना
३९ भीरुः ४० भाविनी
४१ विलासिनी ४२ नितम्बिनी
४३ मत्तकासिनी ४४ सुनेत्रा
४५ प्रमदा ४६ सुन्दरी
४७ अञ्चितभ्रूः ४८ ललिता
४९ वासिता ५० भामिनी
५१ वरारोहा ५२ नताङ्गी
५३ त्रिनता ५४ वरा
५५ श्यामा ५६ चारुवदना

* सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द जैसे – भीरुः, सुभ्रूः आदि शब्द विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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यह स्त्री बुद्धिमती है।
= एषा नारी बुद्धिमती अस्ति।

वे दो नारियाँ शिक्षका हैं।
= ते वनिते शिक्षिके स्तः।

वे नारियाँ मधुर गीत गाती हैं।
= ताः प्रमदाः मधुरं गीतं गायन्ति।

उस स्त्री से यह सुन्दर भौहों वाली स्त्री पूछती है..
= तां महिलाम् एषा सुभ्रूः पृच्छति…

कि वे स्त्रियाँ किस गीत को गाती हैं ?
= यत् ताः प्रमदाः कं गीतं गायन्ति ?

ये दो स्त्रियाँ उन दो स्त्रियों को फल देती हैं।
= एते प्रमदे ताभ्यां ललनाभ्यां फलानि यच्छतः।

एक स्त्री रोटी पकाती है और एक दाल पकाती है।
= एका जोषा रोटिकाः पचति एका च सूपं पचति।

दो स्त्रियाँ इन स्त्रियों से भोजन पकवाती हैं।
= द्वे अङ्गने एताभिः वनिताभिः भोजनं पाचयतः।

सभी स्त्रियाँ परस्पर बातें करती हैं।
= सर्वाः जोषिताः परस्परं वार्तालापं कुर्वन्ति।

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श्लोक :
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यः प्रीणाति सुचरितैः पितरं स पुत्रः
यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रम् आपदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

जो अपने सुन्दर आचरणों से पिता को प्रसन्न करे वह पुत्र, जो पति के ही हित को चाहे वह पत्नी, जो सम्पत्ति और विपत्ति में समान व्यवहार करे वह मित्र, इन तीनों को संसार में बहुत पुण्य करने वाला व्यक्ति (ही) प्राप्त करता है।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ५ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक)

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सुधी मित्रों ! नमः संस्कृताय !!
कल के पाठ में आपने वाक्य में कारकों को पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना सीखा। आशा करता हूँ कि आपने इसका अभ्यास भी अवश्य किया होगा। देखिए बिना अभ्यास के कोई भी विद्या कदापि नहीं आ सकती। सभी राजकुमारों को पढ़ाते तो आचार्य द्रोण ही थे, किन्तु अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ क्यों हुए ? क्योंकि उन्होंने अभ्यास की पराकाष्ठा कर दी थी। इसलिए ध्यान रहे- “अनभ्यासे विषं विद्या।”

आज क्रिया के विषय में समझाते हैं। ध्यान दीजिए, जब ‘क्रिया’ कहेंगे तब आप “धातु” न समझ बैठियेगा। कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व (सत्ता) को ‘क्रिया’ कहते हैं और इन क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द धातु कहे जाते हैं। इनका उपदेश इन्द्र, वायु, काशकृत्स्न, भरद्वाज, पाणिनि, शाकटायन आदि महान् देवताओं और ऋषियों ने किया था। संस्कृतभाषा और संसार की लगभग सभी भाषाओं का मूल यही धातुएँ हैं। किन्तु अभी तो हम “क्रिया” पर चर्चा करेंगे।

१] क्रिया दो प्रकार की होती है- अकर्मक और सकर्मक।

क) अकर्मक क्रिया : जिस क्रिया का कर्म नहीं होता अथवा जिस क्रिया का फल कर्त्ता पर ही पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे – ‘अरविन्द सोता है’ यहाँ शयन की क्रिया हो रही है। उसका फल ‘अरविन्द’ पर ही आश्रित है। यह नहीं कह सकते कि क्या सोता है ? या किसे सोता है ? या किसको सोता है ? इस क्रिया का कर्म नहीं है अतः यह क्रिया अकर्मक है।

ख) सकर्मक क्रिया : जहाँ कर्त्ता की क्रिया का फल किसी अन्य पर पड़े उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस क्रिया का कोई न कोई कर्म हो, वह सकर्मक क्रिया है। जैसे – ‘तारासिंह अशरफ़ अली को पीटता है।’ यहाँ कर्त्ता तारासिंह की क्रिया का असर अशरफ़ अली पर पड़ रहा है, इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।

२] अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं को पहचानने की सरल विधि यह है कि जहाँ वाक्य के उच्चारण करने पर ‘क्या’ ‘किसको’ का प्रश्न शेष न रहे वह अकर्मक क्रिया और जहाँ ये प्रश्न शेष रह जाएँ, वह सकर्मक क्रिया है। ‘मोहन जागता है’ ‘मोहन सोता है’ इस प्रकार के वाक्यों में ‘क्या’ जागता है या ‘किसको’ जागता है इत्यादि प्रश्न शेष नहीं रहते, अतः ‘सोना’ ‘जागना’ आदि क्रियाएँ अकर्मक हैं ।

कौन कौन सी क्रियाएँ अकर्मक होती हैं, यह कल बताएँगे।
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वाक्य अभ्यास
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वृक्षों पर पक्षी बैठते हैं।
वृक्ष अधिकरण, पक्षी कर्त्ता, ‘बैठते हैं’ क्रिया।
= वृक्षेषु खगाः उपविशन्ति।

तुम रमेश के उद्यान से फल लाते हो।
तुम कर्त्ता, रमेश सम्बन्ध, उद्यान अपादान, फल कर्म, ‘लाते हो’ क्रिया।
= त्वं रमेशस्य उद्यानात् फलानि आनयसि।

तुम दोनों पिताजी के रुपये भिखारी को देते हो।
‘तुम दोनों’ कर्ता, पिताजी सम्बन्ध, रुपये कर्म भिखारी सम्प्रदान, ‘देते हो’ क्रिया ।
= युवां पितुः रूप्यकाणि भिक्षुकाय यच्छथः।

मैं साइकिल से विश्वविद्यालय जाता हूँ।
मैं कर्त्ता, साइकिल करण, विश्वविद्यालय कर्म, ‘जाता हूँ’ क्रिया ।
= अहं द्विचक्रिकया विश्वविद्यालयं गच्छामि।

संग से काम उत्पन्न होता है।
संग अपादान, काम कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया ।
= सङ्गात् सञ्जायते कामः।

काम से क्रोध उत्पन्न होता है।
काम अपादान, क्रोध कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया।
= कामात् क्रोधः अभिजायते।

क्रोध से मोह होता है ।
= क्रोधात् भवति सम्मोहः।

मोह से स्मृतिविभ्रम होता है।
= मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।

स्मृतिनाश से बुद्धिनाश होता है।
= स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।

बुद्धिनाश से साधक नष्ट होता है ।
= बुद्धिनाशात् साधकः नश्यति।

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श्लोक :

वेशेन वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च।
वकारैः पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः॥

वेश (पहनावा), शरीर, वाणी, विद्या और विनय – इन पाँच वकारों से युक्त पुरुष पूजित (सम्मानित) होता है।

**उपर्युक्त श्लोक में विभिन्न शब्दों के तृतीया एकवचन के रूप हैं।

संस्कृत साधना : पाठ १३ (कारक-विभक्ति)

Sanskrut_13

नमः संस्कृताय मित्रों !
संस्कृतभाषा की वाक्यरचना हिन्दी से बहुत भिन्न है, यह बात आपको सदैव याद रखनी चाहिए। हिन्दी में अपादान कारक को छोड़कर शेष सभी कारकों में ‘को’ अथवा अन्य चिह्न भी देखने में आते हैं। किन्तु संस्कृत में उसका अनुवाद करते समय आपको यह बात ध्यान रखनी है कि क्रिया के सम्पादन में वह शब्द किस कारक की भूमिका में है। यदि इसका ध्यान रखेंगे तो भ्रमित नहीं होंगे। अगले पाठों में आपको कारक-विभक्ति के विषय में समझाया जाएगा जिससे आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि कब किस पदार्थ को कौन सा कारक माना जाएगा। अभी आप लिंग, वचन, पुरुष, विशेषण, सर्वनाम विशेषण और शब्दकोश पर ध्यान देते जाइये।

अभ्यास :
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यद् ( जो ), तद् ( वह ) और किम् ( कौन ) के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए।

शब्दकोश :
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वनम् (वन) के पर्यायवाची शब्द –
1] अटवी ( स्त्रीलिंग )
2] अरण्यम् ( नपुसंकलिंग )
3] विपिनम् (नपुसंकलिंग )
4] गहनम् (नपुसंकलिंग )
5] काननम् (नपुसंकलिंग )
6] वनम् ( नपुसंकलिंग )

भारी वन के नाम –
1] महारण्यम् (नपुसंकलिंग )
2] अरण्यानी (स्त्रीलिंग)

_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

(निम्नलिखित वाक्यों में कुछ पशु-पक्षियों के नाम हैं उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िये ।)

जो भालू बैठा है वह किस वन में रहता है ?
= यः भल्लूकः आसीनः अस्ति सः कस्मिन् कानने निवसति ?

जिस वन में सिंह रहता है उसी वन में खरगोश भी रहता है।
= यस्मिन् अरण्ये सिंहः वसति तस्मिन् एव अरण्ये शशकः अपि वसति।

जिसका नाम पिंगलक है वह सिंह किस वन से आया है ?
= यस्य नाम पिङ्गलकः अस्ति सः कस्मात् विपिनात् आगतः अस्ति ?

जिस मोरनी का नाम चारुपर्णा है वह किस वन से आयी है ?
= यस्याः मयूर्याः नाम चारुपर्णा अस्ति सा कस्मात् अरण्यात् आगता अस्ति ?

जिस वन से वह कौआ आया है उसी वन से वह गौरैया भी आयी है।
= यस्मात् विपिनात् सः वायसः आगतः अस्ति तस्मात् एव विपिनात् सा चटका अपि आगता अस्ति।

जिन पंखों से हंस उड़ता है उन्हीं पंखों से बगुला भी उड़ता है।
= याभ्यां पक्षाभ्यां हंसः उड्डयति ताभ्याम् एव पक्षाभ्यां बकः अपि उड्डयति ।

वह ऊँट किस विधि से काँटे खाता है ?
= सः क्रमेलकः केन विधिना कण्टकानि खादति ?

जिस विधि से सिंह मांस खाता है उसी विधि से ऊँट काँटे खाता है।
= येन विधिना मृगेन्द्रः मांसं खादति तेन एव विधिना उष्ट्रः कण्टकानि खादति।

जो बन्दर लाल मुँह वाला है, वह किस वृक्ष पर चढ़ता है ?
= यः वानरः रक्तमुखः अस्ति सः कं वृक्षम् आरोहति ?

वे भयंकर सुअर जिनके दाँत टेढ़े हैं, किन महावनों में रहते हैं ?
= ते भयङ्कराः कोलाः येषां दन्ताः वक्राः सन्ति, केषु महारण्येषु वसन्ति ?

वे काले हिरन किन वनों से आये हैं ?
= ते कृष्णसाराः केभ्यः गहनेभ्यः आगताः सन्ति ?

वह नेता नहीं वह तो गिरगिट है जो सच्ची बात वाला नहीं है।
= सः नेता नैव स तु सरटः अस्ति यः सत्यवाक्यः नास्ति।
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श्लोक :

यः यः यां यां तनुं भक्तः
श्रद्धयाऽर्चितुम् इच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां
ताम् एव विदधाम्यहम्॥

(श्रीमद्भगवद्गीता 7.21)

पुस्तक में एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १० (सर्वनाम विशेषण-२)

Sanskrut_10

नमः संस्कृताय !!
कल आपने ‘सर्वनाम विशेषण’ के विषय में जाना और तद् , एतद्, यद् और किम् के रूप भी जान लिये। मुझे आभास हो रहा है कि सर्वनाम वाला प्रसंग आपको थोड़ा सा कठिन लग रहा है। किन्तु घबराइये बिल्कुल नहीं। धैर्य रखिए। धैर्य बहुत महान् गुण है। धैर्य, ध्यान और अभ्यास ये तीन आपके मित्र हैं। इन सर्वनाम शब्दों के रूप आपको याद नहीं हुए हैं तो कोई बात नहीं। वाक्यों द्वारा जब आपको अभ्यास करायेंगे तो ये सारे शब्द आपकी जिह्वा पर स्थिर हो जाएँगे। इन्हें याद करने का सबसे सरल उपाय है इनका बारम्बार अभ्यास। अथवा आप इन्हें दिन भर में किन्हीं पाँच व्यक्तियों को सुना दें। इससे आपका अभ्यास भी हो जाएगा और संस्कृत का प्रचार भी।

१) आज आपको इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप बताते हैं।
इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

२) अब आपको एक श्लोक बता देते हैं जिससे आपको यह बात पक्की हो जाएगी कि इदम् , एतद् , अदस् और तद् का प्रयोग कब और कहाँ करना चाहिए।

“इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥”

(इदम् अस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति च एतदः रूपम्।
अदसः तु विप्रकृष्टे तद् इति परोक्षे विजानीयात् ॥)

अर्थात् –
१] इदम् = समीपस्थ वस्तु के लिए
२] एतद् = अत्यन्त समीपस्थ वस्तु के लिए
३] अदस् = दूरस्थ वस्तु के लिए
४] तद् = परोक्ष अर्थात् जो आपको दिखाई न दे ऐसी वस्तु के लिए।

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

* ध्यानपूर्वक देखिए , आप पाएँगे कि स्त्रीलिंग के द्विवचन के सभी रूप पुँल्लिंग की भाँति ही हैं। एकवचन और बहुवचन में भी थोड़ा सा ही अन्तर है।

अब कल आपको युष्मद् ( तुम ) और अस्मद्( मैं ) के रूप बताकर कुछ दिनों तक केवल अभ्यास करवायेंगे अन्यथा यह सब सिर के ऊपर से चला जाएगा। बुद्धि में कुछ भी न टिकेगा। उपर्युक्त सर्वनामों के कुछ वैकल्पिक रूप भी होते हैं। इन वैकल्पिक रूपों को अभ्यास कराते समय बताएँगे।
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श्लोक : अयम् = यह (इदम् का पुँल्लिंग एकवचन)

अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम्
अक्लेद्यः अशोष्यः एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुः
अचलः अयं सनातनः ॥
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम्
अविकार्यः अयम् उच्यते।
तस्मात् एवं विदित्वा एनम्*
न अनुशोचितुम् अर्हसि॥

*एनम् = इसको (इमम् का वैकल्पिक रूप)
(श्रीमद्भगवद्गीता २।२४-२५॥)

इस प्रकार के और भी श्लोक आप ढूँढकर लिख सकते हैं जिनमें उपर्युक्त सर्वनामों का प्रयोग किया गया हो।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ १६ (तिङन्त-प्रकरण २ :: विशेष नियम)

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पिछले पाठ में आपने लकारों के विषय में जाना। ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं से जुड़ते हैं। अब आपको कुछ विशेष बातें बताते हैं-

१) जब हम किसी धातु से कोई लकार जोड़ते हैं तब उस लकार का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर अट्ठारह प्रत्ययों का प्रयोग होता है। इन प्रत्ययों को संक्षेप में तिङ् कहा जाता है। जैसे हम हिन्दी आदि भाषाओं में संक्षिप्त नामों का प्रयोग करते हैं वैसे ही संस्कृतभाषा में भी संक्षिप्त नामों का प्रयोग होता था। आप कह सकते हैं कि यह प्रवृत्ति संस्कृत से ही आयी। चूँकि इन अट्ठारह प्रत्ययों में से पहला है ‘तिप्’ और अन्तिम है ‘महिङ्’ तो तिप् का ति ले लिया और महिङ् का ङ् ले लिया जिससे ‘तिङ्’ यह संक्षिप्त नाम हो गया इन प्रत्ययों का। सारा खेल इन तिङ् प्रत्ययों का ही है। कोई भी क्रियापद इन तिङ् प्रत्ययों के बिना नहीं बन सकता। धातु के अन्त में तिङ् जोड़ना ही होता है अतः इस प्रकरण को तिङन्त-प्रकरण कहा जाता है। तिङन्त अर्थात् तिङ् प्रत्यय हैं जिनके अन्त में ‘तिङ्+अन्त’।

२) इन अट्ठारह प्रत्ययों के आरम्भिक नौ प्रत्यय ‘परस्मैपद’ और अन्तिम नौ प्रत्यय ‘आत्मनेपद’ कहलाते हैं। यह भी स्मरण रखिए कि जिन धातुओं से परस्मैपद प्रत्यय होते हैं उन धातुओं को ‘परस्मैपदी’ कहा जाता है और जिन धातुओं से आत्मनेपद प्रत्यय जुड़ते हैं उन्हें ‘आत्मनेपदी’ कहा जाता है और जिन
धातुओं से दोनों प्रकार के प्रत्यय होते हैं उन धातुओं को ‘उभयपदी’ धातु कहा जाता है।

परस्मैपद प्रत्यय
(१) (२) (३४५…)
प्रथमपुरुष तिप् तस् झि
मध्यमपुरुष सिप् थस् थ
उत्तमपुरुष मिप् वस् मस्

आत्मनेपद प्रत्यय
(१) (२) (३४५…)
प्रथमपुरुष ता आताम् झ
मध्यमपुरुष थास् आथाम् ध्वम्
उत्तमपुरुष इट् वहि महिङ्

पुरुष और वचन के विषय में आपको पहले ही बताया जा चुका है। पुरुष और वचन के अनुसार ही इन प्रत्ययों को धातु से जोड़ा जाता है। यह तो आपको लकार, तिङ् प्रत्ययों और आत्मनेपद परस्मैपद के विषय में समझाया। अगामी पाठों में आपको लकारों के प्रयोग के नियमों से अवगत करायेंगे।
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शब्दकोश :
=======

‘मनुष्य’ के पर्यायवाची शब्द –

१) मनुष्यः
२) मानुषः
३) मर्त्यः
४) मनुजः
५) मानवः
६) नरः

‘पुरुष’ के पर्यायवाची शब्द –

१) पुंस्
२) पञ्चजनः
३) पुरुषः
४) पूरुषः
५) नृ

* उपर्युक्त सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं।
= मनुजाः उत्सवप्रियाः भवन्ति।

प्रतिदिन सैकड़ो मनुष्य जन्मते और मरते हैं।
= प्रतिदिनं शतानि मानुषाः जायन्ते म्रियन्ते च।

मनुष्यों में कुछ तो सज्जन होते हैं,
= मानवेषु केचित् तु सज्जनाः भवन्ति,

और कुछ मनुष्य धूर्त होते हैं।
= केचित् नराः धूर्ताः च भवन्ति।

सैकडों मनुष्य धन के लिए ही मरते हैं।
= शतानि मनुजाः धनाय एव म्रियन्ते।

किन्तु उन मनुष्यों को कोई नहीं जानता।
= किन्तु तान् मनुजान् कोऽपि न जानाति।

धूर्त मनुष्य आपसी स्नेह को फाड़ देते हैं।
= धूर्ताः मनुजाः पारस्परिकं स्नेहं भिन्दन्ति।

सत्पुरुषों के लिए तो सारी पृथ्वी कुटुम्ब है।
= सत्पुरुषेभ्यः तु समग्रा वसुधा कुटुम्बकम् एव अस्ति।

वे दो ठग पुरुष उस भले पुरुष को ठगते हैं।
= तौ वञ्चकौ पुरुषौ तं भद्रं पुरुषं वञ्चयतः।

इस भले आदमी में कोई दुर्गुण नहीं है।
= अस्मिन् भद्रे पूरुषे कोऽपि दुर्गुणः न अस्ति।

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श्लोक :
====

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥३.२३॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४.११॥

(श्रीमद्भगवद्गीता)

पुस्तक में से एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २६ (तिङन्त-प्रकरण ११ :: लोट् लकार)

Sanskrut_26

नमः संस्कृताय !
पिछले पाठों में आपने लिङ् लकार के विषय में जाना। उसके दो भेदों- विधिलिङ् और आशीर्लिङ् के विषय में पृथक् पृथक् समझा। प्रयोग सम्बन्धी नियम भी जाने। आशा है कि आपने अच्छी प्रकार अभ्यास करके उन नियमों को बुद्धि में स्थिर कर लिया है। आज लोट् लकार के विषय में समझाते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। आपने वृद्धों और सन्त महात्माओं अथवा किसी आदरणीय व्यक्ति को यह आशीर्वाद देते बहुत बार सुना होगा – “आयुष्मान् भव”। तो इसमें जो ‘भव’ शब्द है न, वह भू धातु के लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन का ही रूप है। पूरे रूप देखिए –

भवतु* भवताम् भवन्तु
भव* भवतम् भवत
भवानि भवाव भवाम

*प्रथमपुरुष एकवचन और मध्यमपुरुष एकवचन में विकल्प से ‘भवतात्’ भी बनता है। किन्तु ‘भवतात्’ प्रयोग हमें तभी करना है जब आशीर्वाद देना हो। जैसे – “आयुष्मान् भव” अथवा “आयुष्मान् भवतात्”।

१) लोट् लकार उन सभी अर्थों में होता है जिनमें लिङ् लकार (दोनों भेद) का प्रयोग होता है। एक प्रकार से आप कह सकते हैं कि लोट् लकार लिङ् लकार का विकल्प है। आज्ञा देना, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना करना, निमन्त्रण देना, आशीर्वाद देना- इस सभी अर्थों में लोट् लकार का प्रयोग होता है।
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शब्दकोश :
=======

‘मित्र’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) मित्र ( नपुंसकलिंग )
२ ) सखिन् ( पुँल्लिंग )
३ ) सुहृद् ( पुँल्लिंग )

समान आयु वाले मित्र के लिए संस्कृत शब्द –
१ ) वयस्य ( पुँल्लिंग )
२ ) स्निग्ध ( पुँल्लिंग )
३ ) सवयस् ( पुँल्लिंग )
_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
==========

वह मेरा मित्र हो जाए।
= असौ मम सुहृद् भवतु।

वे दोनों मित्र सफल हों।
= तौ वयस्यौ सफलौ भवताम्।

मेरा मित्र आयुष्मान् हो।
= मम सखा आयुष्मान् भवतु (भवतात्)।

तुम्हारे बहुत से मित्र हों।
= तव बहवः मित्राणि भवन्तु।

तू सफल हो।
= त्वं सफलः भव (भवतात्)।

इस समय तुम दोनों को यहाँ होना चाहिए।
= एतस्मिन् समये युवाम् अत्र भवतम्।

तुम सब वर्चस्वी होओ।
= यूयं वर्चस्विनः भवत।

मैं कहाँ होऊँ ?
= अहं कुत्र भवानि ?

हम दोनों उस मित्र के घर होवें ?
= आवां तस्य मित्रस्य गृहे भवाव ?

हम सब यहाँ विराजमान हों।
= वयम् अत्र विराजमानाः भवाम।

हम सभी जीवों के मित्र हों।
= वयं सर्वेषां जीवानां मित्राणि भवाम।
______________________________________

श्लोक :
=====

तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वम् एव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।३३)

उत्तिष्ठ = खड़े हो जाओ।[उत् + स्था(तिष्ठ्) लोट् मध्यमपुरुष एकवचन]
लभस्व = प्राप्त करो [लभ् धातु, लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन]
भुङ्क्ष्व = भोगो [भुज् धातु, लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन]
भव = ? ( आप जानते ही हैं !)

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २० (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार विशेष नियम)

Sanskrut_20

 

नमः संस्कृताय मित्राणि !

अभी तक आपने वर्तमानकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में, केवल वेद में दिखाई देने वाले लेट् लकार के विषय में , सामान्य भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लुङ् लकार के विषय में और अपरोक्ष भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लङ् लकार के विषय में जाना। आपने भू (होना) धातु के उन रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया जो कि उपर्युक्त लकारों में बनते हैं।

आज आपको भूतकाल के लिए ही प्रयुक्त होने वाले लिट् लकार के विषय में बतायेंगे। यह लकार बहुत रोचक भी है और सरल भी। आपने कभी न कभी “व्यास उवाच” या गीता के “श्रीभगवान् उवाच” या “अर्जुन उवाच” या “सञ्जय उवाच” आदि वाक्यों को तो सुना ही होगा ? इन वाक्यों में जो ‘उवाच’ शब्द है वह ‘ ब्रू ‘ ( ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि ) धातु के लिट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। लिट् लकार के रूप पुराणों और इतिहासग्रन्थों में बहुलता से मिलते हैं।

भू धातु के रूप इस लकार में निम्नलिखित हैं –

बभूव (वह हुआ) बभूवतुः (वे दो हुए) बभूवुः (वे सब हुए)
बभूविथ (तू हुआ ) बभूवथुः (तुम दोनों हुए) बभूव (तुम सब हुए )
बभूव (मैं हुआ ) बभूविव (हम दो हुए ) बभूविम(हम सब हुए )

लिट् लकार के विषय में कुछ स्मरणीय बातें-

१) लिट् लकार का प्रयोग परोक्ष भूतकाल के लिए होता है। ऐसा भूतकाल जो वक्ता की आँखों के सामने का न हो। प्रायः बहुत पुरानी घटना को बताने के लिए इसका प्रयोग होता है। जैसे – रामः दशरथस्य पुत्रः बभूव। = राम दशरथ के पुत्र हुए। यह घटना कहने वाले ने देखी नहीं अपितु परम्परा से सुनी है अतः लिट् लकार का प्रयोग हुआ।

२) लिट् लकार के प्रथम पुरुष के रूपों का ही प्रयोग बहुधा होता है। आप ढूँढते रह जाएँगे मध्यमपुरुष और उत्तमपुरुष के रूप नहीं मिलेंगे। अतः आपको प्रथमपुरुष के रूप ही याद करना है।

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शब्दकोश :
=======

युवावस्था के नाम –

१] तारुण्यम् ( नपुंसकलिंग )
२] यौवनम् ( नपुंसकलिंग )

बुढ़ापे के नाम –

१] स्थाविरम् ( नपुंसकलिंग )
२] वृद्धत्वम् ( नपुंसकलिंग )
३] वार्द्धकम् ( नपुंसकलिंग ) इसका प्रसिद्ध प्रयोग – “वार्द्धके मुनिवृत्तीनाम्” (रघुवंशम्)।
४] वार्द्धक्यम् ( नपुंसकलिंग )

*वार्द्धकम् का अर्थ ‘वृद्धों का समूह’ भी होता है।

बड़े भाई के नाम-

१] पूर्वजः ( पुँल्लिंग )
२] अग्रियः ( पुँल्लिंग )
३] अग्रजः ( पुँल्लिंग )

छोटे भाई के नाम –

१] जघन्यजः
२] कनिष्ठः
३] यवीयः
४] अवरजः
५] अनुजः
(सभी पुँल्लिंग में)
________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

अज के पुत्र दशरथ हुए।
= अजस्य पुत्रः दशरथः बभूव।

वृद्धावस्था में दशरथ के चार पुत्र हुए।
= स्थाविरे दशरथस्य चत्वारः सुताः बभूवुः।

राम सब भाइयों के अग्रज हुए।
= रामः सर्वेषां भ्रातॄणाम् अग्रियः बभूव।

लक्ष्मण और शत्रुघ्न जुड़वा हुए।
= लक्ष्मणः च शत्रुघ्नः च यमलौ बभूवतुः।

युवावस्था में राम और लक्ष्मण अद्भुत धनुर्धर हुए।
= यौवने रामः च लक्ष्मणः च अद्भुतौ धनुर्धरौ बभूवतुः।

भारतवर्ष में आश्वलायन नामक ऋषि हुए थे।
= भारतवर्षे आश्वलायनः नामकः ऋषिः बभूव।

वे शारदामन्त्र के उपदेशक हुए।
= सः शारदामन्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

अभिमन्यु तरुणाई में ही महारथी हो गया था।
= अभिमन्युः तारुण्ये एव महारथः बभूव।

एक दुर्वासा नाम वाले ऋषि हुए।
= एकः दुर्वासा नामकः ऋषिः बभूव।

जो अथर्ववेदीय मन्त्रों के उपदेशक हुए।
= यः अथर्ववेदीयानां मन्त्राणाम् उपदेशकः बभूव।

भारत में शंख और लिखित ऋषि हुए।
= भारते शंखः च लिखितः च ऋषी बभूवतुः।

भारत में ही रेखागणितज्ञ बौधायन हुए।
= भारते एव रेखागणितज्ञः बौधायनः बभूव।

भारत में ही शस्त्र और शास्त्र के वेत्ता परशुराम हुए।
= भारते एव शस्त्रस्य च शास्त्रस्य च वेत्ता परशुरामः बभूव।

भारत में ही वैयाकरण पाणिनि और कात्यायन हुए।
= भारते एव वैयाकरणौ पाणिनिः च कात्यायनः च बभूवतुः।

पाणिनि के छोटे भाई पिङ्गल छन्दःशास्त्र के उपदेशक हुए।
= पाणिनेः अनुजः पिङ्गलः छन्दःशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

धौम्य के बड़े भाई उपमन्यु हुए।
= धौम्यस्य अग्रियः उपमन्युः बभूव।

उपमन्यु शैवागम के उपदेशक हुए।
= उपमन्युः शैवागमस्य उपदेशकः बभूव।

वे कृष्ण के भी गुरु थे।
= सः कृष्णस्य अपि गुरुः बभूव।

भारत में ही शिल्पशास्त्र के अट्ठारह उपदेशक हुए।
= भारते एव शिल्पशास्त्रस्य अष्टादश उपदेशकाः बभूवुः।
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श्लोक :
====

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

एक एक शब्द का अर्थ अपनी कापी में लिखें और अपने बड़ों से पूछकर ‘हृषीकेश’ ‘गुडाकेश’ ‘परन्तप’ और ‘गोविन्द’ शब्दों का रहस्य पूछें और उसे डायरी में लिख लें।

॥ शिवोऽवतु ॥

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