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संस्कृत साधना : पाठ २८ (तिङन्त-प्रकरण १३ :: लुट् लकार )

Sanskrut_28

नमो नमः मित्राणि !
लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् लिट् लिङ् और लोट् लकार के विषय में समझा। अब “लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥” अर्थात् लुट् लृट् और लृङ् लकारों के विषय जानना शेष रह गया है। ये तीनों लकार भविष्यत् काल के लिए प्रयुक्त होते हैं। किन्तु इनमें थोड़ी थोड़ी विशेषता है। अतः पृथक् पृथक् समझाते हैं। सर्वप्रथम लुट् लकार के विषय में चर्चा करते हैं।

१) यह लकार अनद्यतन भविष्यत् काल के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा भविष्यत् जो आज न हो। कल, परसों या उसके भी आगे। आज वाले कार्यों के लिए इसका प्रयोग प्रायः नहीं होता। जैसे – ” वे कल विद्यालय में होंगे” = ते श्वः विद्यालये भवितारः।

भू धातु , लुट् लकार

भविता भवितारौ भवितारः
भवितासि भवितास्थः भवितास्थ
भवितास्मि भवितास्वः भवितास्मः
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शब्दकोश :
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‘वेदपाठी’ के नाम –
१] श्रोत्रियः (पुँल्लिङ्ग)
२] छान्दसः (पुँल्लिङ्ग)

आजीविका के लिए वेद पढ़ाने वाले के नाम –
१] उपाध्यायः (पुँल्लिङ्ग )
२] अध्यापकः (पुँल्लिङ्ग )

मुनियों की झोपड़ी के नाम –
१] पर्णशाला (स्त्रीलिङ्ग)
२] उटजः/उटजम् (पुँल्लिङ्ग/नपुंसकलिङ्ग)

* उटः = घास-फूस , और जो उससे बनाया जाए वह है ‘उटज’।

यज्ञशाला के नाम –
१] चैत्यम् (नपुंसकलिङ्ग)
२] आयतनम् (नपुंसकलिङ्ग)

आने वाला कल = श्वः
आने वाला परसों = परश्वः

* ये दोनों अव्यय हैं। अव्यय ज्यों के त्यों प्रयोग में लाये जाते हैं। विभक्ति द्वारा इनका रूप नहीं बदलता और न ही किसी लिङ्ग में रूप बदलता है, न ही वचन में।
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वाक्य अभ्यास :

यह मुनि कल उस झोपड़ी में होगा।
= अयं मुनिः श्वः तस्यां पर्णशालायां भविता।

वे दोनों वेदपाठी परसों उस यज्ञभवन में होंगे।
= अमू छान्दसौ परश्वः अमुष्मिन् चैत्ये भवितारौ।

वे वेदपाठी कल इन यज्ञशालाओं में होंगे।
= अमी श्रोत्रियाः श्वः एषु आयतनेषु भवितारः।

तुम परसों अध्यापक के साथ पर्णशाला में होगे।
= त्वं परश्वः उपाध्यायेन सह उटजे भवितासि।

तुम दोनों कल यज्ञशाला में होगे।
= युवां श्वः चैत्ये भवितास्थः।

वहाँ वेदपाठियों का सामगान होगा।
= तत्र छान्दसानां सामगानं भविता।

तुम सब परसों कुटिया में होगे।
= यूयं परश्वः उटजे भवितास्थ।

वहाँ अगदतन्त्र का व्याख्यान होगा।
= तत्र अगदतन्त्रस्य व्याख्यानं भविता।

मैं कल उस कुटी में होऊँगा।
= अहं श्वः तस्मिन् उटजे भवितास्मि।

उसी में दो उपाध्याय होंगे।
= तस्मिन् एव द्वौ उपाध्यायौ भवितारौ।

हम दोनों परसों उस चैत्य में नहीं होंगे।
= आवां परश्वः तस्मिन् चैत्ये न भवितास्वः।

हम सब कल वेदपाठियों की कुटी में होंगे।
= वयं श्वः छान्दसानाम् उटजेषु भवितास्मः ।

वहीं ऋग्वेद का जटापाठ होगा।
= तत्र एव ऋग्वेदस्य जटापाठः भविता।

उपाध्याय लोग भी वहीं होंगे।
= अध्यापकाः अपि तत्र एव भवितारः।

हम लोग भी वहीं होंगे।
= वयम् अपि तत्र एव भवितास्मः।

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श्लोक :
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न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
( श्रीमद्भगवद्गीता २।२०॥ )

उपर्युक्त श्लोक में ‘भविता’ पद भू धातु के लुट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है।
पुस्तक में देखकर एक एक शब्द का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १४ (अभ्यास)

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अभ्यास :
~~~~~~~

इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए ।

इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु
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शब्दकोश :
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‘पक्षी’ के पर्यायवाची शब्द –

1] खगः 2] विहङ्गः 3] विहगः
4] विहङ्गमः 5] विहायस् 6] शकुन्तिः
7] पक्षिन् 8] शकुनिः 9] शकुन्तः
10] शकुनः 11] द्विजः 12] पतत्रिन्
13] पत्रिन् 14] पतङ्गः 15] पतत्
16] पत्ररथः 17] अण्डजः 18] नगौकस्
19] वाजिन् 20] विकिरः 21] विः
22] विष्किरः 23] पतत्रिः 24] नीडोद्भवः
25] गरुत्मत् 26] पित्सित् 27] नभसङ्गमः

* ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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वे पक्षी तीव्र वेग से उड़ते हैं।
= अमी खगाः तीव्रवेगेन उड्डयन्ति।

ये पक्षी खेत में बैठे हैं।
= इमे विहङ्गाः क्षेत्रे आसीनाः सन्ति।

इन पक्षियों को दाना देता हूँ।
= एभ्यः विहगेभ्यः अन्नकणान् ददामि।

इस खेत से पक्षी चले गए हैं।
= अस्मात् क्षेत्रात् पत्ररथाः गताः सन्ति।

इस वाटिका में पक्षी कूजते हैं।
= अस्यां वाटिकायां शकुन्ताः कूजन्ति।

इस वृक्ष पर बहुत पक्षी रहते हैं।
= अस्मिन् वृक्षे बहवः अण्डजाः वसन्ति।

उस बरगद पर बहुत से पक्षी रहते हैं।
= अमुष्मिन् न्यग्रोधे बहवः विष्किराः वसन्ति।

ये पक्षी उन पीपल के वृक्षों पर रहते हैं।
= इमे अण्डजाः अमीषु अश्वत्थेषु वसन्ति।

ये व्याध उन पक्षियों को मारते हैं।
= इमे व्याधाः अमून् अण्डजान् घ्नन्ति।

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श्लोक :
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उदेति सविता ताम्रः
ताम्रम् एवास्तम् एति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च
महताम् एकरूपता ॥

सूर्य रक्तवर्ण ही उदित होता है और रक्तवर्ण ही अस्त होता है। सम्पत्ति और विपत्ति में सज्जन एक समान रहते हैं।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ३४ (आत्मनेपदी धातुएँ)

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#संस्कृतशिक्षण – 34 [आत्मनेपदी धातुएँ]

प्रियसंस्कृतमित्राणि नमो नमः!
गीर्वाणवाणी की उपासना में आपने अभी तक कारक विभक्तियों, विशेष्य विशेषण, सर्वनाम विशेषण, अकर्मक सकर्मक क्रियाओं, दसों लकारों इत्यादि के विषय में जाना है और अभ्यास भी किया है। यदि आपने निष्ठापूर्वक अभ्यास किया होगा तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत की वाक्यरचना से आपका पूर्ण परिचय हो गया होगा। छात्र भी धनुर्वेद सीखने वाले योद्धा की भाँति होता है, जैसे ‘वशिष्ठधनुर्वेद’ नामक ग्रन्थ में उसके लिए परिश्रम की ही प्रशंसा की गई है, वैसे ही आपको भी अभ्यास में परिश्रम करना चाहिए-

श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः।
तस्माद् गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता॥

श्रम से ही अद्भुत योद्धा बना जा सकता है, श्रम से ही विजय प्राप्त होती है, इसलिए सिद्धान्तों को जानते हुए, गुरु के समक्ष ही अभ्यास करना चाहिए।( सौवाँ श्लोक)

1) आपको स्मरण होगा कि प्रारम्भिक पाठों में हमने बताया था कि जब ‘भू’ आदि धातुओं से भवति भवतः भवन्ति आदि क्रियापद बनाते हैं तो उनमें ‘तिङ्’ प्रत्यय जोड़कर ही ये रूप बनते हैं।

2) उन तिङ् प्रत्ययों में से पहले नौ प्रत्यय ‘परस्मैपदी’ कहे जाते हैं और अन्तिम नौ प्रत्यय ‘आत्मनेपदी’। यह परस्मैपद और आत्मनेपद महर्षि पाणिनि जी के द्वारा बनाये गये पारिभाषिक शब्द हैं। जैसे पाण्डु के सभी पुत्रों को ‘पाण्डव’ कहकर काम चला लिया जाता है वैसे ही परस्मैपद और आत्मनेपद कहकर नौ नौ प्रत्ययों का नाम ले लिया जाता है, अलग अलग अट्ठारहों प्रत्यय नहीं गिनाना पड़ता।

3) परस्मैपद प्रत्ययों के जुड़ने पर जिस प्रकार के रूप बनते हैं वह आपने भू धातु के अभ्यास से जान लिया। भू धातु परस्मैपदी होती है, अतः उसमें परस्मैपद प्रत्यय तिप् तस् झि आदि जुड़े। अब एक धातु आत्मनेपदी बतायेंगे। उसके रूप किस प्रकार से चलते हैं यह आप देख लीजिएगा। ऊपर जो वशिष्ठधनुर्वेद से श्लोक उद्धृत किया है, उसमें ‘प्राप्यते’ क्रियापद आत्मनेपदी है। आत्मनेपद प्रत्यय देख लीजिए –

त आताम् झ
थास् आथाम् ध्वम्
इट् वहि महिङ्

जब किसी धातु में इन्हें जोड़ते हैं तो इनमें कुछ परिवर्तन हो जाता है, देखिए ये इस प्रकार हो जाते हैं-

अते एते अन्ते
असे एथे अध्वे
ए आवहे आमहे

मुद् हर्षे (प्रसन्न होना) धातु, आत्मनेपदी

लट् लकार

मोदते मोदेते मोदन्ते
मोदसे मोदेथे मोदध्वे
मोदे मोदावहे मोदामहे

लुङ् लकार

अमोदिष्ट अमोदिषाताम् अमोदिषत
अमोदिष्ठाः अमोदिषाथाम् अमोदिध्वम्
अमोदिषि अमोदिष्वहि अमोदिष्महि

लङ् लकार

अमोदत अमोदेताम् अमोदन्त
अमोदथाः अमोदेथाम् अमोदध्वम्
अमोदे अमोदावहि अमोदामहि

लिट् लकार (केवल प्रथम पुरुष)

मुमुदे मुमुदाते मुमुदिरे

आपको लगता होगा कि हे भगवान् इतने सारे क्लिष्ट उच्चारण वाले रूप कैसे और कितने सारे याद करने पड़ेंगे ? तो डरिये मत ! मा भैषीः ! आपको किसी एक प्रतिनिधि धातु के रूप किसी प्रकार याद कर डालने हैं बाकी सभी आत्मनेपदी धातुओं के रूप इसी प्रकार चलेंगे। यदि आप प्रत्येक रूप पर आधारित कम से कम एक दो वाक्य बनाकर अभ्यास कर डालें तो ये शीघ्र याद हो जाएँगे। फिर तो आपको आनन्द ही आनन्द आयेगा।

4) आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह कैसे पता चलेगा कि कौन सी धातु परस्मैपदी है और कौन सी आत्मनेपदी अथवा उभयपदी ? तो यह पता चलता है धातुपाठ को पढ़ने से। उभयपदी धातुएँ वे होती हैं जिनके रूप दोनों प्रकार से चलते हैं। अगले पाठों में धातुओं के विषय में यह सब निर्देश कर दिया करेंगे।

5) आगे के पाठों में हम केवल रूपों का संकेत मात्र कर दिया करेंगे, उसी प्रकार से बहुत सी धातुओं के रूप चलेंगे।
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वाक्य अभ्यास :
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बच्चे लड्डुओं से प्रसन्न होते हैं।
= बालकाः मोदकैः मोदन्ते।

मैं सेवइयों से प्रसन्न होता हूँ।
= अहं सूत्रिकाभिः मोदे।

तुम किससे प्रसन्न होते हो ?
= त्वं केन मोदसे ?

मुझे देखकर तुम प्रसन्न हुए थे।
= मां दृष्ट्वा त्वम् अमोदिष्ठाः।

मैं भी प्रसन्न हुआ था।
= अहम् अपि अमोदिषि।

वे भी मेरे आगमन से प्रसन्न हुए थे।
= ते अपि मम आगमनेन अमोदिषत।

कल बच्चों का खेल देखकर तुम क्यों प्रसन्न नहीं हुए ?
= ह्यः खेलां दृष्ट्वा त्वं कथं न अमोदथाः ?

मैं तो कल बहुत प्रसन्न हुआ था।
= अहं तु ह्यः बहु अमोदे।

वे बच्चे भी कल बहुत प्रसन्न हुए थे।
= ते बालकाः अपि ह्यः बहु अमोदन्त।

हनुमान् को देखकर सीता प्रसन्न हुईं।
= हनूमन्तं दृष्ट्वा सीता मुमुदे।

राम और लक्ष्मण को देखकर ऋषि प्रसन्न हुए।
= रामं लक्ष्मणं दृष्ट्वा ऋषयः मुमुदिरे।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ : ३ (कारक और सम्बन्ध)

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नमः संस्कृताय मित्राणि ! अद्यत्वे शैत्यं निरन्तरं वर्द्धते, न वा ?
तो कल के पाठ में आपने यह जाना कि किसी भी वाक्य में क्रिया का होना अनिवार्य है और उस क्रिया के सम्पादन में जितने भी कारण होते हैं वे “कारक” कहे जाते हैं। एक श्लोक के माध्यम से छहों कारकों का नाम भी बताया था। आपको वह श्लोक अवश्य याद हो गया होगा। चलिए एक बार फिर याद दिला देते हैं-
“कर्त्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट् ॥”

अब इन छह “कारकों” और “सम्बन्ध” के विषय में समझाते हैं। यह भी बताएँगे कि किस कारक के लिए किस विभक्ति का प्रयोग होता है। सम्बोधन को छोड़कर सात विभक्तियाँ होती हैं- यह तो आप जानते ही हैं।

1] कर्त्ता = जो क्रिया को करने में स्वतन्त्र होता है उसे कर्त्ता कहते हैं अर्थात् यह सीधा सीधा क्रिया को सम्पादित करता है। “जो करता है वही कर्त्ता।” जैसे- कृष्णः खेलति – इसमें “खेलना” क्रिया को कृष्ण कर रहा है, इसलिए “कृष्ण” “कर्त्ता कारक” हुआ। कल वाले उदाहरण में- “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ना” क्रिया कौन कर रहा है ? उत्तर है- डोनाल्ड ट्रम्प, यही इस वाक्य में कर्त्ता है।

2] कर्म = जिस पदार्थ के लिए कोई क्रिया की जाती है वह पदार्थ ही उस क्रिया का कर्म होता है। जैसे – “डोनाल्ड ट्रम्प फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “फल” के लिए की जा रही है इसलिए फल “तोड़ना” क्रिया का “कर्म” हुआ।

3] करण = क्रिया की सिद्धि में जो चीज कर्त्ता की सबसे अधिक सहायक होती है वही “करण” है। “डोनाल्ड ट्रम्प डण्डे से फल तोड़ता है।” डोनाल्ड ट्रम्प कर्त्ता है और उसकी सबसे सहायक चीज है डण्डा, इसलिए “डण्डा” करण हुआ।

4] सम्प्रदान = जिसके लिए क्रिया की जाती है तथा जिसको कोई वस्तु दी जाती है उसे “सम्प्रदान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया नरेन्द्र मोदी के लिए की जा रही है इसलिए नरेन्द्र मोदी “सम्प्रदान कारक” हुआ।

5] अपादान = किसी वस्तु के दूसरी वस्तु से अलग होने की क्रिया में जो वस्तु स्थिर रहती है उसे ही “अपादान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प पेड़ से फल तोड़ता है” – पेड़ से फल अलग हो रहा है किन्तु पेड़ स्थिर है, इसलिए स्थिर वस्तु “पेड़” “अपादान” हुआ।

6) *सम्बन्ध = इसे कारकों में नहीं गिना जाता क्योंकि क्रिया के सम्पादन में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। कल इसके विषय में बताया था, आपको याद होगा।

7] अधिकरण = क्रिया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है उस स्थान को “अधिकरण” कारक कहा जाता है। “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “बाग में” हो रही है इसलिए “बाग” “अधिकरण” कारक हआ।

सम्बन्ध को मिलाकर ये कुल सात चीजें हो गईं। विभक्तियाँ भी सात ही होती हैं। इन सातों के लिए अलग-अलग एक-एक विभक्ति निर्धारित कर दी गई है। देखिए-

1] कर्त्ता = प्रथमा विभक्ति
2] कर्म = द्वितीया ”
3] करण = तृतीया ”
4] सम्प्रदान = चतुर्थी ”
5] अपादान = पञ्चमी ”
6] सम्बन्ध = षष्ठी ”
7] अधिकरण = सप्तमी ”

*सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति ही होती है किन्तु शब्द के रूप में प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। जैसे – रामः = हे राम ! (विसर्ग लुप्त हो गये)।
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कल हमने आपको एक बहुत सुंदर श्लोक बताया था-

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय ॥

इसमें “राम” शब्द के एकवचन में सभी विभक्तियों का प्रयोग किया गया है । देखिए –

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
2] रामं रमेशं भजे।
3] रामेण अभिहता निशाचरचमू।
4] रामाय तस्मै नमः ।
5] रामात् नास्ति परायणं परतरम्।
6] रामस्य दासः अस्मि अहम्।
7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे ।
8] हे राम ! मां पालय ।

कल हम आपको वाक्य में कारक पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना बताएँगे। इससे आपको अभ्यास हो जाएगा। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ भी बताएँगे। आप लोगों को कहीं कोई समस्या हो तो टिप्पणी करके निःसंकोच पूछिएगा। तब तक के लिए नमो नमः !!

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ १० (सर्वनाम विशेषण-२)

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नमः संस्कृताय !!
कल आपने ‘सर्वनाम विशेषण’ के विषय में जाना और तद् , एतद्, यद् और किम् के रूप भी जान लिये। मुझे आभास हो रहा है कि सर्वनाम वाला प्रसंग आपको थोड़ा सा कठिन लग रहा है। किन्तु घबराइये बिल्कुल नहीं। धैर्य रखिए। धैर्य बहुत महान् गुण है। धैर्य, ध्यान और अभ्यास ये तीन आपके मित्र हैं। इन सर्वनाम शब्दों के रूप आपको याद नहीं हुए हैं तो कोई बात नहीं। वाक्यों द्वारा जब आपको अभ्यास करायेंगे तो ये सारे शब्द आपकी जिह्वा पर स्थिर हो जाएँगे। इन्हें याद करने का सबसे सरल उपाय है इनका बारम्बार अभ्यास। अथवा आप इन्हें दिन भर में किन्हीं पाँच व्यक्तियों को सुना दें। इससे आपका अभ्यास भी हो जाएगा और संस्कृत का प्रचार भी।

१) आज आपको इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप बताते हैं।
इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

२) अब आपको एक श्लोक बता देते हैं जिससे आपको यह बात पक्की हो जाएगी कि इदम् , एतद् , अदस् और तद् का प्रयोग कब और कहाँ करना चाहिए।

“इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥”

(इदम् अस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति च एतदः रूपम्।
अदसः तु विप्रकृष्टे तद् इति परोक्षे विजानीयात् ॥)

अर्थात् –
१] इदम् = समीपस्थ वस्तु के लिए
२] एतद् = अत्यन्त समीपस्थ वस्तु के लिए
३] अदस् = दूरस्थ वस्तु के लिए
४] तद् = परोक्ष अर्थात् जो आपको दिखाई न दे ऐसी वस्तु के लिए।

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

* ध्यानपूर्वक देखिए , आप पाएँगे कि स्त्रीलिंग के द्विवचन के सभी रूप पुँल्लिंग की भाँति ही हैं। एकवचन और बहुवचन में भी थोड़ा सा ही अन्तर है।

अब कल आपको युष्मद् ( तुम ) और अस्मद्( मैं ) के रूप बताकर कुछ दिनों तक केवल अभ्यास करवायेंगे अन्यथा यह सब सिर के ऊपर से चला जाएगा। बुद्धि में कुछ भी न टिकेगा। उपर्युक्त सर्वनामों के कुछ वैकल्पिक रूप भी होते हैं। इन वैकल्पिक रूपों को अभ्यास कराते समय बताएँगे।
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श्लोक : अयम् = यह (इदम् का पुँल्लिंग एकवचन)

अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम्
अक्लेद्यः अशोष्यः एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुः
अचलः अयं सनातनः ॥
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम्
अविकार्यः अयम् उच्यते।
तस्मात् एवं विदित्वा एनम्*
न अनुशोचितुम् अर्हसि॥

*एनम् = इसको (इमम् का वैकल्पिक रूप)
(श्रीमद्भगवद्गीता २।२४-२५॥)

इस प्रकार के और भी श्लोक आप ढूँढकर लिख सकते हैं जिनमें उपर्युक्त सर्वनामों का प्रयोग किया गया हो।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ४ (कारकों की पहचान)

 

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सभी सुधी मित्रों को प्यार भरा नमस्कार !
कल हमने आपको कारकों के विषय में समझाया था। आशा करता हूँ कि कर्त्ता, कर्म आदि कारकों के विषय में आप समझ गये होंगे। यह भी पक्का हो गया होगा कि किस कारक में कौन-सी विभक्ति लगती है। एक बात निवेदन करना चाहता हूँ कि ये लेख प्रारम्भिक स्तर के हैं, इसलिए इनमें सूक्ष्म विषयों पर चर्चा नहीं की जा रही है। दूसरी बात यह कि जब तक हम लकारों के विषय में नहीं समझा देते तब तक “वर्तमानकाल” की क्रियाओं का ही उपयोग करेंगे क्योंकि आप “ति” “तः” “न्ति” लगाकर उनका प्रयोग करना जानते हैं। आज आपको वाक्य में कारकों को पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाने का अभ्यास करायेंगे।

1] कर्त्ता आदि कारकों को पहचानने के लिए आप इस चिर-परिचित विधि को भी उपयोग में ला सकते हैं-

कर्त्ता = ने
कर्म = को
करण = से, के द्वारा
सम्प्रदान = के लिए
अपादान = से (अलग होने में)
सम्बन्ध = का, की, के
अधिकरण = में, पर
सम्बोधन = हे, अरे, भो

2] किन्तु कभी-कभी ये चिह्न कारकों के साथ नहीं भी दिखाई पड़ते। जैसे कहीं-कहीं बोला जाता है- “मैं भोजन किया” इसमें “मैं” के साथ “ने” चिह्न नहीं दिखाई पड़ रहा। ऐसे में यही देखना चाहिए कि क्रिया को कौन कर रहा है ? जो कर रहा होगा वही “कर्त्ता” होगा।

3] इसी प्रकार सम्प्रदान कारक को पहचानने में कठिनाई आ सकती है। उपर्युक्त विधि में हमने पढ़ा कि “के लिए” सम्प्रदान का चिह्न है, किन्तु सम्प्रदान के लिए कभी कभी “को” चिह्न भी आ जाता है, जैसे- “कृष्ण ‘अर्जुन को’ दिव्यदृष्टि देता है।” ऐसे में आपको चाहिए कि “क्रिया” जिसके लिए (जिसको उद्देश्य मानकर) की जा रही हो वह “सम्प्रदान” होगा। प्रस्तुत वाक्य में “देना” क्रिया अर्जुन के लिए है, “देना” क्रिया का फल अर्जुन को मिल रहा है। इसलिए “अर्जुन” सम्प्रदान कारक हुआ।

ये सब बातें अभ्यास करने पर आप स्वयं समझ जाएँगे। तो चलिए अभ्यास शुरू करते हैं। साथ ही विभक्ति लगाकर संस्कृत भी बनाते चलेंगे।

1) कृष्ण अर्जुन को दिव्यदृष्टि देता है ।
– कृष्ण कर्त्ता, अर्जुन सम्प्रदान, दिव्यदृष्टि कर्म, ‘देता है’ क्रिया है।
= कृष्णः अर्जुनाय दिव्यदृष्टिं ददाति।

2) साकेत अभय को हाथ से लड्डू देता है।
– साकेत कर्त्ता, अभय सम्प्रदान, ‘हाथ से’ करण, लड्डू कर्म, ‘देता है’ क्रिया।
= साकेतः अभयाय हस्तेन मोदकं ददाति।

3) मुदित कार से जयपुर से जोधपुर जाता है।
– मुदित कर्त्ता, कार करण, जयपुर अपादान, जोधपुर कर्म, ‘जाता है’ क्रिया।
= मुदितः कारयानेन जयपुरात् जोधपुरं गच्छति।

4) श्यामकिशोर की पुस्तकें हैं।
– श्यामकिशोर सम्बन्ध, पुस्तकें कर्ता, ‘हैं’ क्रिया।
= श्यामकिशोरस्य पुस्तकानि सन्ति।

5) पाकिस्तान में आतंकवादी रहते हैं।
– पाकिस्तान अधिकरण, आतंकवादी कर्त्ता, ‘रहते हैं’ क्रिया।
= पाकिस्ताने आतङ्कवादिनः वसन्ति।

इसप्रकार आप भी स्वयं वाक्य बनाकर उनमें कारक ढूँढकर विभक्तियाँ लगाइये। आप देखेंगे कि कितनी आसानी से आप संस्कृत लिखने लगे।

_______________________________________

कल वाले श्लोक का अर्थ:

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
राजमणि* राम सदा जीतते हैं।
*जो राजाओं में मणि के समान है।

2] रामं रमेशं भजे।
रमापति राम को भजता हूँ।

3] रामेण अभिहता निशाचरचमू ।
राम के द्वारा राक्षसों की सेना मारी गई।

4] रामाय तस्मै नमः।
उस राम के लिए नमस्कार है।

5] रामात् नास्ति परायणं परतरम् ।
राम से अतिरिक्त दूसरा आश्रय नहीं है।

6] रामस्य दासः अस्मि अहम् ।
मैं राम का दास हूँ।

7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे।
राम में सदा मेरा चित्त लगा रहे।

8] हे राम! मां पालय ॥
हे राम ! मेरी रक्षा करो ।

संस्कृत साधना : पाठ २० (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार विशेष नियम)

Sanskrut_20

 

नमः संस्कृताय मित्राणि !

अभी तक आपने वर्तमानकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में, केवल वेद में दिखाई देने वाले लेट् लकार के विषय में , सामान्य भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लुङ् लकार के विषय में और अपरोक्ष भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लङ् लकार के विषय में जाना। आपने भू (होना) धातु के उन रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया जो कि उपर्युक्त लकारों में बनते हैं।

आज आपको भूतकाल के लिए ही प्रयुक्त होने वाले लिट् लकार के विषय में बतायेंगे। यह लकार बहुत रोचक भी है और सरल भी। आपने कभी न कभी “व्यास उवाच” या गीता के “श्रीभगवान् उवाच” या “अर्जुन उवाच” या “सञ्जय उवाच” आदि वाक्यों को तो सुना ही होगा ? इन वाक्यों में जो ‘उवाच’ शब्द है वह ‘ ब्रू ‘ ( ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि ) धातु के लिट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। लिट् लकार के रूप पुराणों और इतिहासग्रन्थों में बहुलता से मिलते हैं।

भू धातु के रूप इस लकार में निम्नलिखित हैं –

बभूव (वह हुआ) बभूवतुः (वे दो हुए) बभूवुः (वे सब हुए)
बभूविथ (तू हुआ ) बभूवथुः (तुम दोनों हुए) बभूव (तुम सब हुए )
बभूव (मैं हुआ ) बभूविव (हम दो हुए ) बभूविम(हम सब हुए )

लिट् लकार के विषय में कुछ स्मरणीय बातें-

१) लिट् लकार का प्रयोग परोक्ष भूतकाल के लिए होता है। ऐसा भूतकाल जो वक्ता की आँखों के सामने का न हो। प्रायः बहुत पुरानी घटना को बताने के लिए इसका प्रयोग होता है। जैसे – रामः दशरथस्य पुत्रः बभूव। = राम दशरथ के पुत्र हुए। यह घटना कहने वाले ने देखी नहीं अपितु परम्परा से सुनी है अतः लिट् लकार का प्रयोग हुआ।

२) लिट् लकार के प्रथम पुरुष के रूपों का ही प्रयोग बहुधा होता है। आप ढूँढते रह जाएँगे मध्यमपुरुष और उत्तमपुरुष के रूप नहीं मिलेंगे। अतः आपको प्रथमपुरुष के रूप ही याद करना है।

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शब्दकोश :
=======

युवावस्था के नाम –

१] तारुण्यम् ( नपुंसकलिंग )
२] यौवनम् ( नपुंसकलिंग )

बुढ़ापे के नाम –

१] स्थाविरम् ( नपुंसकलिंग )
२] वृद्धत्वम् ( नपुंसकलिंग )
३] वार्द्धकम् ( नपुंसकलिंग ) इसका प्रसिद्ध प्रयोग – “वार्द्धके मुनिवृत्तीनाम्” (रघुवंशम्)।
४] वार्द्धक्यम् ( नपुंसकलिंग )

*वार्द्धकम् का अर्थ ‘वृद्धों का समूह’ भी होता है।

बड़े भाई के नाम-

१] पूर्वजः ( पुँल्लिंग )
२] अग्रियः ( पुँल्लिंग )
३] अग्रजः ( पुँल्लिंग )

छोटे भाई के नाम –

१] जघन्यजः
२] कनिष्ठः
३] यवीयः
४] अवरजः
५] अनुजः
(सभी पुँल्लिंग में)
________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

अज के पुत्र दशरथ हुए।
= अजस्य पुत्रः दशरथः बभूव।

वृद्धावस्था में दशरथ के चार पुत्र हुए।
= स्थाविरे दशरथस्य चत्वारः सुताः बभूवुः।

राम सब भाइयों के अग्रज हुए।
= रामः सर्वेषां भ्रातॄणाम् अग्रियः बभूव।

लक्ष्मण और शत्रुघ्न जुड़वा हुए।
= लक्ष्मणः च शत्रुघ्नः च यमलौ बभूवतुः।

युवावस्था में राम और लक्ष्मण अद्भुत धनुर्धर हुए।
= यौवने रामः च लक्ष्मणः च अद्भुतौ धनुर्धरौ बभूवतुः।

भारतवर्ष में आश्वलायन नामक ऋषि हुए थे।
= भारतवर्षे आश्वलायनः नामकः ऋषिः बभूव।

वे शारदामन्त्र के उपदेशक हुए।
= सः शारदामन्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

अभिमन्यु तरुणाई में ही महारथी हो गया था।
= अभिमन्युः तारुण्ये एव महारथः बभूव।

एक दुर्वासा नाम वाले ऋषि हुए।
= एकः दुर्वासा नामकः ऋषिः बभूव।

जो अथर्ववेदीय मन्त्रों के उपदेशक हुए।
= यः अथर्ववेदीयानां मन्त्राणाम् उपदेशकः बभूव।

भारत में शंख और लिखित ऋषि हुए।
= भारते शंखः च लिखितः च ऋषी बभूवतुः।

भारत में ही रेखागणितज्ञ बौधायन हुए।
= भारते एव रेखागणितज्ञः बौधायनः बभूव।

भारत में ही शस्त्र और शास्त्र के वेत्ता परशुराम हुए।
= भारते एव शस्त्रस्य च शास्त्रस्य च वेत्ता परशुरामः बभूव।

भारत में ही वैयाकरण पाणिनि और कात्यायन हुए।
= भारते एव वैयाकरणौ पाणिनिः च कात्यायनः च बभूवतुः।

पाणिनि के छोटे भाई पिङ्गल छन्दःशास्त्र के उपदेशक हुए।
= पाणिनेः अनुजः पिङ्गलः छन्दःशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

धौम्य के बड़े भाई उपमन्यु हुए।
= धौम्यस्य अग्रियः उपमन्युः बभूव।

उपमन्यु शैवागम के उपदेशक हुए।
= उपमन्युः शैवागमस्य उपदेशकः बभूव।

वे कृष्ण के भी गुरु थे।
= सः कृष्णस्य अपि गुरुः बभूव।

भारत में ही शिल्पशास्त्र के अट्ठारह उपदेशक हुए।
= भारते एव शिल्पशास्त्रस्य अष्टादश उपदेशकाः बभूवुः।
________________________________________

श्लोक :
====

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

एक एक शब्द का अर्थ अपनी कापी में लिखें और अपने बड़ों से पूछकर ‘हृषीकेश’ ‘गुडाकेश’ ‘परन्तप’ और ‘गोविन्द’ शब्दों का रहस्य पूछें और उसे डायरी में लिख लें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

Sanskrut_9

नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
_______________________________________

उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २१ (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार अभ्यास)

Sanskrut_21

॥ लिट् लकार अभ्यास ॥

कुछ स्मरणीय बातें –

१) संस्कृत लिखते समय स्वरों, ह्रस्व दीर्घ मात्राओं , अनुस्वार, विसर्ग और हलन्त पर विशेष ध्यान दें। इनका उचित प्रयोग करें। कुछ लोग ‘मम’ के स्थान पर ‘मम्’ लिख देते हैं और ‘प्रणाम’ के स्थान पर ‘प्रणाम्’ – यहाँ अनावश्यक हलन्त लगा दिया गया। उसी प्रकार कुछ लोग ‘आम्’ (हाँ) के स्थान पर ‘आम’ और ‘किम्’ के स्थान पर ‘किम’ लिख देते हैं- यहाँ हलन्त लगाना भूल जाते हैं। इसी प्रकार विसर्ग और मात्रा आदि के विषय में जानना चाहिए।

२) संस्कृत में ‘ ड़ ‘ और ‘ ढ़ ‘ अक्षर नहीं होते अतः इनका प्रयोग न करें। ‘ ड़ ‘ और ‘ ङ ‘ तथा ‘ ढ़ ‘ और ‘ ढ ‘ के अन्तर को तो आप जानते ही होंगे।
‘पीड़ा’ को संस्कृत में ‘पीडा’ लिखा जाता है।
‘गूढ़’ को संस्कृत में ‘गूढ’ लिखा जाता है। इसी प्रकार ‘ड’ और ‘ङ’ , ‘व’ और ‘ब’ तथा श ष स का भी ध्यान रखें।

३) संस्कृत लिखने के लिए आपको पुरुष, वचन, लिंग, विशेष्य, विशेषण, सर्वनाम, कर्त्ता, कर्म, क्रिया, कारक-विभक्ति, धातुरूप (लकार) और शब्दरूप – इतनी बातें जानना अति आवश्यक है। इनमें से अधिकांश बातें मैं समझा चुका हूँ। अब केवल धातुरूप, शब्दरूप और कारकविभक्ति विस्तार से समझाना रह गया है। इसके बाद की बातें सन्धि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग, वाच्यपरिवर्तन आदि प्रौढ संस्कृत लिखने के लिए हैं, इन्हें सीख लेने पर भाषा में प्रौढता आ जाती है।

४) संस्कृत में किस क्रिया के लिए कौन सी धातु है- यह स्मरण रखेंगे तो अनुवाद करना बहुत सहज हो जाएगा। आगामी पाठों में यह बताते चलेंगे।

भू धातु-
बभूव (वह हुआ)/ बभूवतुः (वे दो हुए)/बभूवुः (वे सब हुए)

शब्दकोश :
~~~~~~~

‘विद्वान्’ के पर्यायवाची शब्द –

१] विद्वान्
२] विपश्चित्
३] दोषज्ञः
४] सत्
५] सुधीः
६] कोविदः
७] बुधः
८] धीरः
९] मनीषी
१०] ज्ञः
१२] प्राज्ञः
१३] सङ्ख्यावान्
१४] पण्डितः
१५] कविः
१६] धीमान्
१७] सूरिः
१८] कृती
१८] कृष्टिः
१९] लब्धवर्णः
२०] विचक्षणः
२१] दूरदर्शी
२२] दीर्घदर्शी

ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
_________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

भारत में अनेक विद्वान् हुए।
= भारते अनेके कोविदाः बभूवुः।

उन विद्वानों में कुछ वैयाकरण हुए।
= तेषु बुधेषु केचित् वैयाकरणाः बभूवुः।

कुछ न्यायदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् न्यायदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

कुछ साङ्ख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

आचार्य व्याघ्रभूति वैयाकरण हुए।
आचार्यः व्याघ्रभूतिः वैयाकरणः बभूव।

आचार्य अक्षपाद नैयायिक हुए।
= आचार्यः अक्षपादः नैयायिकः बभूव।

आचार्य पञ्चशिख सांख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= आचार्यः पञ्चशिखः साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डितः बभूव।

वाचक्नवी गार्गी मन्त्रों की विदुषी हुई थी।
= वाचक्नवी गार्गी मन्त्राणां विचक्षणा बभूव।

पाण्डु के पाँच पुत्र हुए।
= पाण्डोः पञ्च सुताः बभूवुः।

वे सभी विद्वान् हुए।
= ते सर्वे प्राज्ञाः बभूवुः।

युधिष्ठिर धर्मशास्त्र और द्यूतविद्या के जानकार हुए।
= युधिष्ठिरः धर्मशास्त्रस्य द्यूतविद्यायाः च कोविदः बभूव।

भीम मल्लविद्या और पाकशास्त्र के वेत्ता हुए।
= भीमसेनः मल्लविद्यायाः पाकशास्त्रस्य च सूरिः बभूव।

सुकेशा ऋषि पाकशास्त्र के उपदेशक हुए थे।
= सुकेशा ऋषिः पाकशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

श्रीकृष्ण भीमसेन का रसाला खाकर बहुत प्रसन्न हुए थे।
= श्रीकृष्णः भीमसेनस्य रसालं भुक्त्वा भूरि प्रसन्नः बभूव।

अर्जुन धनुर्वेद और गन्धर्ववेद के जानकार हुए।
= फाल्गुनः धनुर्वेदस्य गन्धर्ववेदस्य च विपश्चित् बभूव।

नकुल अश्वविद्या के ज्ञानी हुए।
= नकुलः अश्वविद्यायाः कोविदः बभूव।

आचार्य शालिहोत्र अश्वविद्या के प्रसिद्ध जानकार थे।
= आचार्यः शालिहोत्रः अश्वविद्यायाः प्रथितः पण्डितः बभूव।

सहदेव पशुचिकित्सा और शकुनशास्त्र के विद्वान् थे।
= सहदेवः पशुचिकित्सायाः शकुनशास्त्रस्य च ज्ञः बभूव।

कुन्ती अथर्ववेदीय मन्त्रों की विदुषी हुई।
= पृथा अथर्ववेदीयानां मन्त्राणां पण्डिता बभूव।

लल्लाचार्य और उत्पलाचार्य प्रसिद्ध गणितज्ञ हुए।
= लल्लाचार्यः उत्पलाचार्यः च प्रसिद्धौ गणितज्ञौ बभूवतुः।

मण्डनमिश्र की पत्नी भारती बड़ी विदुषी हुई।
= मण्डनमिश्रस्य पत्नी भारती महती पण्डिता बभूव।

भरद्वाज और शाकटायन वैमानिकरहस्य के ज्ञाता हुए।
= भरद्वाजः शाकटायनः च वैमानिकरहस्यस्य विचक्षणौ बभूवतुः।

शाकपूणि निरुक्त के प्रसिद्ध जानकार हुए थे।
= शाकपूणिः निरुक्तस्य प्रथितः कृष्टिः बभूव।

ऋतुध्वज की महारानी मदालसा तत्त्वज्ञ थी।
= ऋतुध्वजस्य पट्टराज्ञी मदालसा तत्त्वज्ञा बभूव।

भारत में एक नहीं, दो नहीं वरन् सहस्रों विद्वान् हुए हैं।
= भारते एकः न, द्वौ न अपितु सहस्रशाः कोविदाः बभूवुः।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ : २ (कारक और विभक्ति)

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नमस्कार मित्रों ! कल हमने आपको संस्कृतभाषा की कुछ विशेषताओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। मुझे पूरा विश्वास है कि आपने पिछली बातें पक्की कर ली हैं। फिर भी आपको याद दिलाना उचित समझता हूँ । आप जान गये हैं कि संस्कृत में तीन वचन, तीन पुरुष और शब्दों के तीन लिंग होते हैं। प्रत्येक शब्द के रूप चलते हैं जिन्हें “विभक्ति” कहते हैं। पुरुष को पहचानने का तरीका भी आप जान गये हैं। क्रिया सदैव पुरुष और वचन के अनुसार होती है- यह भी आपने पक्का कर लिया। तो अब हम अगले सोपान पर पैर रखेंगे। आज हम आपको “कारक और विभक्ति” के विषय में थोड़ा सा बतायेंगे। यह विषय बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसे आपने ठीक से समझ लिया तो वाक्यरचना कभी गलत नहीं होगी। ध्यानपूर्वक पढ़िये।

1) किसी भी वाक्य में कोई न कोई क्रिया अवश्य रहती है। बिना क्रिया के कोई वाक्य नहीं होता। इसीलिए वैयाकरण लोग कहते हैं – “एकतिङ् वाक्यम्” अर्थात् “जिसमें एक क्रिया हो उसे वाक्य कहते हैं।”

2) उस क्रिया को सम्पन्न करने में कई कारण होते हैं, जिनके कारण ही क्रिया का होना सम्भव हो पाता है। क्रिया के उन कारणों को ही “कारक” कहा जाता है।

3) “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ता है”- यह क्रियापद है। अब इस “तोड़ना” क्रिया के छः कारण हैं, देखिए कौन कौन से-

1] डोनाल्ड ट्रम्प “कर्ता” कारक है ।
2] बाग “अधिकरण” कारक है ।
3] पेड़ “अपादान” कारक है ।
4] डण्डा “करण” कारक है ।
5] नरेंद्र मोदी “सम्प्रदान” कारक है ।
6] फल “कर्म” कारक है।

4) संस्कृत भाषा में यही छः कारक होते हैं। इन छहों को याद रखने के लिए एक श्लोक बता देता हूँ जिसे याद कर लेने पर आप इनका नाम कभी नहीं भूलेंगे-

“कर्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट्॥”

5) इन छः कारकों के अतिरिक्त एक और चीज होती है जिसे “सम्बन्ध” कहा जाता है। ऊपर के वाक्य में यदि कहा जाए-
“डोनाल्ड ट्रम्प ‘ओबामा के’ बाग में डण्डे से………”
तो इससे बाग का सम्बन्ध ओबामा के साथ दिखाया जा रहा है। किन्तु ओबामा “तोड़ना” क्रिया में सहायक नहीं है इसलिए वह कारक नहीं है।

इन पाँच बातों को भली प्रकार समझ लीजिए और मस्तिष्क में बिठा लीजिए। कल आपको छह कारकों और सम्बन्ध के विषय में थोड़ा विस्तार से बताया जाएगा। साथ ही यह भी बताएँगे कि इन सातों के लिए किन विभक्तियों का प्रयोग होता है।
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श्लोक :

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय॥

यह श्लोक आगे काम आयेगा अतः याद कर लें।

॥शं तनोतु शङ्करः॥

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