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संस्कृत साधना : पाठ ८ (‘विशेष्य’ और ‘विशेषण’)

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सर्वेभ्यः मित्रेभ्यः नमो नमः !!
आज आपको ‘विशेष्य’ और ‘विशेषण’ के विषय में समझाते हैं। किन्तु आप निरन्तर अभ्यास तो कर रहे हैं न ? और सीखने में कोई जल्दबाजी भी नहीं करनी चाहिए। महात्मा विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा था – “अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः” अर्थात् गुरु का अनादर, जल्दबाजी और किसी से होड़ रखना- विद्या के ये तीन शत्रु हैं। तो इन शत्रुओं से आपको बचकर रहना है।

१) जो किसी व्यक्ति या वस्तु या किसी स्थान आदि की विशेषता बताए उसे ‘विशेषण’ कहा जाता है। उदाहरण- जैसे बहुत सी गोमाताएँ किसी स्थान पर बैठी हुई हैं और आपसे कहा जाए कि “काली गाय को ले आओ” तब आप उन सभी गोमाताओं में से केवल काली गोमाता को ही लायेंगे। अब यहाँ जो “काली” शब्द है वह गोमाता की विशेषता बता रहा है। इसी प्रकार कहीं बहुत से बालक बैठे हों और कोई कहे कि “मैं बालक को रसगुल्ला दूँगा” तो सभी बालक रसगुल्ला लेने आ जाएँगे। किन्तु यदि वह कहे कि “मैं पीले कुर्ते वाले बालक को रसगुल्ला दूँगा” तब ‘पीले कुर्ते वाला’ विशेषण हो गया, इस विशेषण ने उस बालक को अन्य बालकों से अलग कर दिया।

२) अब ‘विशेष्य’ को जानिये। जिसकी विशेषता बताई जाए वह ‘विशेष्य’। जैसे- “कपिला गाय” कहा जाए तो ‘कपिला’ विशेषण है और ‘गाय’ विशेष्य है।

३) जो लिंग, विभक्ति और वचन विशेष्य के होंगे वही विशेषण के भी होंगे। यह संस्कृतभाषा की अद्भुत विशेषता है। इन विशेष्य विशेषणों को आप वाक्य में कहीं भी रख दें किन्तु वाक्य का अर्थ नहीं बदलेगा।

यह तो आपको ‘विशेष्य’ और ‘विशेषण’ के विषय में बताया। कल आपको सर्वनाम विशेषण के बारे में बताएँगे जो कि बहुत महत्त्वपूर्ण विषय है। और आपसे एक आग्रह है कि किसी पाठ से सम्बन्धित कोई संशय, जिज्ञासा आदि हो तो निःसंकोच पूछिये। अधोलिखित वाक्यों में आपको ‘विशेष्य’ ‘विशेषण’ का अभ्यास कराते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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नटखट कन्हैया कपिला गाय का दूध पीता है।
= कौतुकी कृष्णः कपिलायाः धेनोः दुग्धं पिबति।

सुन्दर बच्ची मधुर कण्ठ से मधुर गीत गाती है।
= सुन्दरी बालिका मधुरेण कण्ठेन मधुरं गीतं गायति।

चपल बन्दर विशाल वृक्षों पर पके फल खाता है।
= चपलः वानरः विशालेषु वृक्षेषु पक्वानि फलानि खादति।

दुष्ट शिकारी तीखे बाणों से हिरन को मारता है।
= दुष्टः व्याधः तीक्ष्णैः शरैः हरिणं हन्ति।

तुम दोनों निर्धन आदमी को भयंकर ठण्ड में अच्छे वस्त्र देते हो।
= युवां निर्धनाय पुरुषाय भयङ्करे शैत्ये शोभनानि वस्त्राणि यच्छथः । (यच्छ् -देना)

चतुर स्त्री सुगन्धित पुष्पों को माला में गूँथती है।
= चतुरा नारी सुगन्धितानि पुष्पाणि मालायां ग्रथ्नाति।

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श्लोक :
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पश्यामि देवान् तव देव देहे
सर्वान् तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणम् ईशं कमलासनस्थम्
ऋषीन् च सर्वान् उरगान् च दिव्यान्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ११।१५॥)

उपर्युक्त श्लोक में द्वितीया विभक्ति के कुछ शब्द हैं उन्हें ढूँढकर टिप्पणी-मंजूषा (Comment box) में लिखें।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ५ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक)

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सुधी मित्रों ! नमः संस्कृताय !!
कल के पाठ में आपने वाक्य में कारकों को पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना सीखा। आशा करता हूँ कि आपने इसका अभ्यास भी अवश्य किया होगा। देखिए बिना अभ्यास के कोई भी विद्या कदापि नहीं आ सकती। सभी राजकुमारों को पढ़ाते तो आचार्य द्रोण ही थे, किन्तु अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ क्यों हुए ? क्योंकि उन्होंने अभ्यास की पराकाष्ठा कर दी थी। इसलिए ध्यान रहे- “अनभ्यासे विषं विद्या।”

आज क्रिया के विषय में समझाते हैं। ध्यान दीजिए, जब ‘क्रिया’ कहेंगे तब आप “धातु” न समझ बैठियेगा। कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व (सत्ता) को ‘क्रिया’ कहते हैं और इन क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द धातु कहे जाते हैं। इनका उपदेश इन्द्र, वायु, काशकृत्स्न, भरद्वाज, पाणिनि, शाकटायन आदि महान् देवताओं और ऋषियों ने किया था। संस्कृतभाषा और संसार की लगभग सभी भाषाओं का मूल यही धातुएँ हैं। किन्तु अभी तो हम “क्रिया” पर चर्चा करेंगे।

१] क्रिया दो प्रकार की होती है- अकर्मक और सकर्मक।

क) अकर्मक क्रिया : जिस क्रिया का कर्म नहीं होता अथवा जिस क्रिया का फल कर्त्ता पर ही पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे – ‘अरविन्द सोता है’ यहाँ शयन की क्रिया हो रही है। उसका फल ‘अरविन्द’ पर ही आश्रित है। यह नहीं कह सकते कि क्या सोता है ? या किसे सोता है ? या किसको सोता है ? इस क्रिया का कर्म नहीं है अतः यह क्रिया अकर्मक है।

ख) सकर्मक क्रिया : जहाँ कर्त्ता की क्रिया का फल किसी अन्य पर पड़े उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस क्रिया का कोई न कोई कर्म हो, वह सकर्मक क्रिया है। जैसे – ‘तारासिंह अशरफ़ अली को पीटता है।’ यहाँ कर्त्ता तारासिंह की क्रिया का असर अशरफ़ अली पर पड़ रहा है, इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।

२] अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं को पहचानने की सरल विधि यह है कि जहाँ वाक्य के उच्चारण करने पर ‘क्या’ ‘किसको’ का प्रश्न शेष न रहे वह अकर्मक क्रिया और जहाँ ये प्रश्न शेष रह जाएँ, वह सकर्मक क्रिया है। ‘मोहन जागता है’ ‘मोहन सोता है’ इस प्रकार के वाक्यों में ‘क्या’ जागता है या ‘किसको’ जागता है इत्यादि प्रश्न शेष नहीं रहते, अतः ‘सोना’ ‘जागना’ आदि क्रियाएँ अकर्मक हैं ।

कौन कौन सी क्रियाएँ अकर्मक होती हैं, यह कल बताएँगे।
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वाक्य अभ्यास
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वृक्षों पर पक्षी बैठते हैं।
वृक्ष अधिकरण, पक्षी कर्त्ता, ‘बैठते हैं’ क्रिया।
= वृक्षेषु खगाः उपविशन्ति।

तुम रमेश के उद्यान से फल लाते हो।
तुम कर्त्ता, रमेश सम्बन्ध, उद्यान अपादान, फल कर्म, ‘लाते हो’ क्रिया।
= त्वं रमेशस्य उद्यानात् फलानि आनयसि।

तुम दोनों पिताजी के रुपये भिखारी को देते हो।
‘तुम दोनों’ कर्ता, पिताजी सम्बन्ध, रुपये कर्म भिखारी सम्प्रदान, ‘देते हो’ क्रिया ।
= युवां पितुः रूप्यकाणि भिक्षुकाय यच्छथः।

मैं साइकिल से विश्वविद्यालय जाता हूँ।
मैं कर्त्ता, साइकिल करण, विश्वविद्यालय कर्म, ‘जाता हूँ’ क्रिया ।
= अहं द्विचक्रिकया विश्वविद्यालयं गच्छामि।

संग से काम उत्पन्न होता है।
संग अपादान, काम कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया ।
= सङ्गात् सञ्जायते कामः।

काम से क्रोध उत्पन्न होता है।
काम अपादान, क्रोध कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया।
= कामात् क्रोधः अभिजायते।

क्रोध से मोह होता है ।
= क्रोधात् भवति सम्मोहः।

मोह से स्मृतिविभ्रम होता है।
= मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।

स्मृतिनाश से बुद्धिनाश होता है।
= स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।

बुद्धिनाश से साधक नष्ट होता है ।
= बुद्धिनाशात् साधकः नश्यति।

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श्लोक :

वेशेन वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च।
वकारैः पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः॥

वेश (पहनावा), शरीर, वाणी, विद्या और विनय – इन पाँच वकारों से युक्त पुरुष पूजित (सम्मानित) होता है।

**उपर्युक्त श्लोक में विभिन्न शब्दों के तृतीया एकवचन के रूप हैं।

संस्कृत साधना : पाठ : १

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सदैव याद रखना है-
1) संस्कृत में तीन वचन होते हैं- एकवचन, द्विवचन, बहुवचन।
2) संस्कृत में तीन पुरुष होते हैं- प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुष, उत्तमपुरुष
3) संस्कृत में शब्दों के तीन लिंग होते हैं- पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुसंकलिंग।
4) संस्कृत में प्रत्येक शब्द के रूप चलते हैं जिन्हें “विभक्ति” कहा जाता है। जैसे-
रामः रामौ रामाः
रामम् रामौ रामान् इत्यादि
(1) (2) (3)
प्रथमपु. पठति पठतः पठन्ति
मध्यमपु. पठसि पठथः पठथ
उत्तमप. पठामि पठावः पठामः

5) पुरुष को पहचानने के लिए एक सूत्र बताता हूँ उसको समझ लीजिए –

“हम उत्तम, तुम मध्यम, बाकी सब प्रथम॥”

अर्थात् हम(वयम्), मैं(अहम्) आदि स्वयं बोलने वाले व्यक्ति के वाचक शब्द हैं उत्तम पुरुष।

तुम(त्वम्) अर्थात् श्रोता के वाचक शब्द मध्यमपुरुष।

और जितने व्यक्तिवाचक शब्द बचते हैं जैसे- वह, वे, राम, श्याम, सीता, गीता आदि, वे प्रथमपुरुष हैं। आप= भवान् शब्द भी सदैव प्रथमपुरुष ही होता है, ध्यान रखना है।

6) सबसे महत्त्वपूर्ण बात- जिस पुरुष और वचन का *कर्ता होगा उसी पुरुष और वचन की क्रिया होगी। यह बात गाँठ बाँध लेनी है।
*कर्ता= जो क्रिया को करता है वही ‘कर्ता’ है। जैसे “रामः पठति” वाक्य में ‘राम’ ‘पठन क्रिया’ को कर रहा है।

यदि ये छह बातें आप ध्यान में रखेंगे तो बहुत आसानी से वाक्य बना लेंगे।
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मुदित पढ़ता है।
= मुदितः पठति।

अभय और साकेत नहीं पढ़ते हैं।
= अभयः साकेतः च न पठतः।

अजय, बालकृष्ण, गोविंद और राधेश्याम थोड़ा* पढ़ते हैं।
= अजयः बालकृष्णः गोविन्दः राधेश्यामः च मनाक्* पठन्ति।

क्या तुम पढ़ते हो ?
= किं त्वं पठसि ?

तुम दोनों क्या पढ़ते हो ?
= युवां किं पठथः ?

तुम सब रामायण पढ़ते हो।
=यूयं रामायणं पठथ।

मैं कुछ भी नहीं पढ़ता।
= अहं किमपि न पठामि।

हम दोनों संस्कृत पढ़ते हैं।
= आवां संस्कृतं पठावः।

हम सब पढ़ते हैं।
= वयं पठामः।

*** खेलना ( क्रीड्)
बोलना ( वद् )
चलना ( चल् ) आदि धातुओं का प्रयोग करते हुए एक एक संस्कृतवाक्य बनाइये।

 

 

संस्कृत साधना : पाठ १५ (तिङन्त-प्रकरण)

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नमः संस्कृताय !!
पिछले पाठों में आपने सर्वनाम के विषय में जाना। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सर्वनामों के रूपों का अभ्यास भी आपने किया। मुझे विश्वास है कि आप इस विषय को भलीभाँति समझ गये हैं। जिन सर्वनामों के रूप आपको बताये गये हैं उनका प्रयोग स्थान स्थान पर होता ही रहेगा। अब हम बहुत महत्त्वपूर्ण विषय में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ‘तिङन्त-प्रकरण’ की चर्चा करेंगे। संस्कृतभाषा में यदि आप तिङन्त, कारक और शब्दरूप- ये तीन बातें भली प्रकार जान गये तो समझिए कि संस्कृत के विशाल प्रासाद में प्रवेश कर गए। तब आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।

१) पिछले पाठों में हमने आपको धातुओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। आपने विस्मृत तो नहीं कर दिया ? चलिये पुनः बता देते हैं । क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द ‘धातु’ कहे जाते हैं, जैसे- भू , अस् , पठ् , पा इत्यादि। अब इन मूल शब्दों अर्थात् धातुओं से- भवति, अस्ति, पठति, पिबति इत्यादि रूप कैसे बन जाते हैं- यह बात आपके मस्तिष्क में कभी न कभी आयी ही होगी ! है कि नहीं ? तो इसका उत्तर है- ‘लकार’ । अब यह ‘लकार’ क्या है, यह बताते हैं-

२) लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में ‘ङ्’ है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

३) इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे। इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, आप एक श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे
भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ
लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥

अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।

आने वाले पाठों में हम प्रत्येक लकार के प्रयोगों के नियमों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही आपको आत्मनेपद – परस्मैपद, धातुओं के दस गणों, सेट् और अनिट् धातुओं के विषय में भी समझायेंगे। इस प्रकरण में आपको विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह तिङन्त-प्रकरण ही संस्कृत का प्राण है।
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शब्दकोश :
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‘स्त्री’ के पर्यायवाची शब्द-

१ योषित् २ अबला
३ योषा ४ नारी
५ सीमन्तिनी ६ वधूः
७ प्रतीपदर्शिनी ८ वामा
९ वनिता १० महिला
११ प्रिया १२ रामा
१३ जनिः १४ जनी
१५ योषिता १६ जोषित्
१७ जोषा १८ जोविता
१९ वनिका २० महेलिका
२१ महेला २२ शर्व्वरी
२३ सिन्दूरतिलका २४ सुभ्रूः (सुन्दर भौंह वाली)
२५ सुनयना २६ वामदृक्
२७ अङ्गना २८ ललना
२९ कान्ता ३० पुरन्ध्री
३१ वरवर्णिनी ३२ सुतनुः
३३ तन्वी ३४ तनुः
३५ कामिनी ३६ तन्वङ्गी
३७ रमणी ३८ कुरङ्गनयना
३९ भीरुः ४० भाविनी
४१ विलासिनी ४२ नितम्बिनी
४३ मत्तकासिनी ४४ सुनेत्रा
४५ प्रमदा ४६ सुन्दरी
४७ अञ्चितभ्रूः ४८ ललिता
४९ वासिता ५० भामिनी
५१ वरारोहा ५२ नताङ्गी
५३ त्रिनता ५४ वरा
५५ श्यामा ५६ चारुवदना

* सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द जैसे – भीरुः, सुभ्रूः आदि शब्द विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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यह स्त्री बुद्धिमती है।
= एषा नारी बुद्धिमती अस्ति।

वे दो नारियाँ शिक्षका हैं।
= ते वनिते शिक्षिके स्तः।

वे नारियाँ मधुर गीत गाती हैं।
= ताः प्रमदाः मधुरं गीतं गायन्ति।

उस स्त्री से यह सुन्दर भौहों वाली स्त्री पूछती है..
= तां महिलाम् एषा सुभ्रूः पृच्छति…

कि वे स्त्रियाँ किस गीत को गाती हैं ?
= यत् ताः प्रमदाः कं गीतं गायन्ति ?

ये दो स्त्रियाँ उन दो स्त्रियों को फल देती हैं।
= एते प्रमदे ताभ्यां ललनाभ्यां फलानि यच्छतः।

एक स्त्री रोटी पकाती है और एक दाल पकाती है।
= एका जोषा रोटिकाः पचति एका च सूपं पचति।

दो स्त्रियाँ इन स्त्रियों से भोजन पकवाती हैं।
= द्वे अङ्गने एताभिः वनिताभिः भोजनं पाचयतः।

सभी स्त्रियाँ परस्पर बातें करती हैं।
= सर्वाः जोषिताः परस्परं वार्तालापं कुर्वन्ति।

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श्लोक :
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यः प्रीणाति सुचरितैः पितरं स पुत्रः
यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रम् आपदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

जो अपने सुन्दर आचरणों से पिता को प्रसन्न करे वह पुत्र, जो पति के ही हित को चाहे वह पत्नी, जो सम्पत्ति और विपत्ति में समान व्यवहार करे वह मित्र, इन तीनों को संसार में बहुत पुण्य करने वाला व्यक्ति (ही) प्राप्त करता है।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १० (सर्वनाम विशेषण-२)

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नमः संस्कृताय !!
कल आपने ‘सर्वनाम विशेषण’ के विषय में जाना और तद् , एतद्, यद् और किम् के रूप भी जान लिये। मुझे आभास हो रहा है कि सर्वनाम वाला प्रसंग आपको थोड़ा सा कठिन लग रहा है। किन्तु घबराइये बिल्कुल नहीं। धैर्य रखिए। धैर्य बहुत महान् गुण है। धैर्य, ध्यान और अभ्यास ये तीन आपके मित्र हैं। इन सर्वनाम शब्दों के रूप आपको याद नहीं हुए हैं तो कोई बात नहीं। वाक्यों द्वारा जब आपको अभ्यास करायेंगे तो ये सारे शब्द आपकी जिह्वा पर स्थिर हो जाएँगे। इन्हें याद करने का सबसे सरल उपाय है इनका बारम्बार अभ्यास। अथवा आप इन्हें दिन भर में किन्हीं पाँच व्यक्तियों को सुना दें। इससे आपका अभ्यास भी हो जाएगा और संस्कृत का प्रचार भी।

१) आज आपको इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप बताते हैं।
इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

२) अब आपको एक श्लोक बता देते हैं जिससे आपको यह बात पक्की हो जाएगी कि इदम् , एतद् , अदस् और तद् का प्रयोग कब और कहाँ करना चाहिए।

“इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥”

(इदम् अस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति च एतदः रूपम्।
अदसः तु विप्रकृष्टे तद् इति परोक्षे विजानीयात् ॥)

अर्थात् –
१] इदम् = समीपस्थ वस्तु के लिए
२] एतद् = अत्यन्त समीपस्थ वस्तु के लिए
३] अदस् = दूरस्थ वस्तु के लिए
४] तद् = परोक्ष अर्थात् जो आपको दिखाई न दे ऐसी वस्तु के लिए।

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

* ध्यानपूर्वक देखिए , आप पाएँगे कि स्त्रीलिंग के द्विवचन के सभी रूप पुँल्लिंग की भाँति ही हैं। एकवचन और बहुवचन में भी थोड़ा सा ही अन्तर है।

अब कल आपको युष्मद् ( तुम ) और अस्मद्( मैं ) के रूप बताकर कुछ दिनों तक केवल अभ्यास करवायेंगे अन्यथा यह सब सिर के ऊपर से चला जाएगा। बुद्धि में कुछ भी न टिकेगा। उपर्युक्त सर्वनामों के कुछ वैकल्पिक रूप भी होते हैं। इन वैकल्पिक रूपों को अभ्यास कराते समय बताएँगे।
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श्लोक : अयम् = यह (इदम् का पुँल्लिंग एकवचन)

अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम्
अक्लेद्यः अशोष्यः एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुः
अचलः अयं सनातनः ॥
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम्
अविकार्यः अयम् उच्यते।
तस्मात् एवं विदित्वा एनम्*
न अनुशोचितुम् अर्हसि॥

*एनम् = इसको (इमम् का वैकल्पिक रूप)
(श्रीमद्भगवद्गीता २।२४-२५॥)

इस प्रकार के और भी श्लोक आप ढूँढकर लिख सकते हैं जिनमें उपर्युक्त सर्वनामों का प्रयोग किया गया हो।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

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नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
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उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ४ (कारकों की पहचान)

 

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सभी सुधी मित्रों को प्यार भरा नमस्कार !
कल हमने आपको कारकों के विषय में समझाया था। आशा करता हूँ कि कर्त्ता, कर्म आदि कारकों के विषय में आप समझ गये होंगे। यह भी पक्का हो गया होगा कि किस कारक में कौन-सी विभक्ति लगती है। एक बात निवेदन करना चाहता हूँ कि ये लेख प्रारम्भिक स्तर के हैं, इसलिए इनमें सूक्ष्म विषयों पर चर्चा नहीं की जा रही है। दूसरी बात यह कि जब तक हम लकारों के विषय में नहीं समझा देते तब तक “वर्तमानकाल” की क्रियाओं का ही उपयोग करेंगे क्योंकि आप “ति” “तः” “न्ति” लगाकर उनका प्रयोग करना जानते हैं। आज आपको वाक्य में कारकों को पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाने का अभ्यास करायेंगे।

1] कर्त्ता आदि कारकों को पहचानने के लिए आप इस चिर-परिचित विधि को भी उपयोग में ला सकते हैं-

कर्त्ता = ने
कर्म = को
करण = से, के द्वारा
सम्प्रदान = के लिए
अपादान = से (अलग होने में)
सम्बन्ध = का, की, के
अधिकरण = में, पर
सम्बोधन = हे, अरे, भो

2] किन्तु कभी-कभी ये चिह्न कारकों के साथ नहीं भी दिखाई पड़ते। जैसे कहीं-कहीं बोला जाता है- “मैं भोजन किया” इसमें “मैं” के साथ “ने” चिह्न नहीं दिखाई पड़ रहा। ऐसे में यही देखना चाहिए कि क्रिया को कौन कर रहा है ? जो कर रहा होगा वही “कर्त्ता” होगा।

3] इसी प्रकार सम्प्रदान कारक को पहचानने में कठिनाई आ सकती है। उपर्युक्त विधि में हमने पढ़ा कि “के लिए” सम्प्रदान का चिह्न है, किन्तु सम्प्रदान के लिए कभी कभी “को” चिह्न भी आ जाता है, जैसे- “कृष्ण ‘अर्जुन को’ दिव्यदृष्टि देता है।” ऐसे में आपको चाहिए कि “क्रिया” जिसके लिए (जिसको उद्देश्य मानकर) की जा रही हो वह “सम्प्रदान” होगा। प्रस्तुत वाक्य में “देना” क्रिया अर्जुन के लिए है, “देना” क्रिया का फल अर्जुन को मिल रहा है। इसलिए “अर्जुन” सम्प्रदान कारक हुआ।

ये सब बातें अभ्यास करने पर आप स्वयं समझ जाएँगे। तो चलिए अभ्यास शुरू करते हैं। साथ ही विभक्ति लगाकर संस्कृत भी बनाते चलेंगे।

1) कृष्ण अर्जुन को दिव्यदृष्टि देता है ।
– कृष्ण कर्त्ता, अर्जुन सम्प्रदान, दिव्यदृष्टि कर्म, ‘देता है’ क्रिया है।
= कृष्णः अर्जुनाय दिव्यदृष्टिं ददाति।

2) साकेत अभय को हाथ से लड्डू देता है।
– साकेत कर्त्ता, अभय सम्प्रदान, ‘हाथ से’ करण, लड्डू कर्म, ‘देता है’ क्रिया।
= साकेतः अभयाय हस्तेन मोदकं ददाति।

3) मुदित कार से जयपुर से जोधपुर जाता है।
– मुदित कर्त्ता, कार करण, जयपुर अपादान, जोधपुर कर्म, ‘जाता है’ क्रिया।
= मुदितः कारयानेन जयपुरात् जोधपुरं गच्छति।

4) श्यामकिशोर की पुस्तकें हैं।
– श्यामकिशोर सम्बन्ध, पुस्तकें कर्ता, ‘हैं’ क्रिया।
= श्यामकिशोरस्य पुस्तकानि सन्ति।

5) पाकिस्तान में आतंकवादी रहते हैं।
– पाकिस्तान अधिकरण, आतंकवादी कर्त्ता, ‘रहते हैं’ क्रिया।
= पाकिस्ताने आतङ्कवादिनः वसन्ति।

इसप्रकार आप भी स्वयं वाक्य बनाकर उनमें कारक ढूँढकर विभक्तियाँ लगाइये। आप देखेंगे कि कितनी आसानी से आप संस्कृत लिखने लगे।

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कल वाले श्लोक का अर्थ:

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
राजमणि* राम सदा जीतते हैं।
*जो राजाओं में मणि के समान है।

2] रामं रमेशं भजे।
रमापति राम को भजता हूँ।

3] रामेण अभिहता निशाचरचमू ।
राम के द्वारा राक्षसों की सेना मारी गई।

4] रामाय तस्मै नमः।
उस राम के लिए नमस्कार है।

5] रामात् नास्ति परायणं परतरम् ।
राम से अतिरिक्त दूसरा आश्रय नहीं है।

6] रामस्य दासः अस्मि अहम् ।
मैं राम का दास हूँ।

7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे।
राम में सदा मेरा चित्त लगा रहे।

8] हे राम! मां पालय ॥
हे राम ! मेरी रक्षा करो ।

संस्कृत साधना : पाठ : २ (कारक और विभक्ति)

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नमस्कार मित्रों ! कल हमने आपको संस्कृतभाषा की कुछ विशेषताओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। मुझे पूरा विश्वास है कि आपने पिछली बातें पक्की कर ली हैं। फिर भी आपको याद दिलाना उचित समझता हूँ । आप जान गये हैं कि संस्कृत में तीन वचन, तीन पुरुष और शब्दों के तीन लिंग होते हैं। प्रत्येक शब्द के रूप चलते हैं जिन्हें “विभक्ति” कहते हैं। पुरुष को पहचानने का तरीका भी आप जान गये हैं। क्रिया सदैव पुरुष और वचन के अनुसार होती है- यह भी आपने पक्का कर लिया। तो अब हम अगले सोपान पर पैर रखेंगे। आज हम आपको “कारक और विभक्ति” के विषय में थोड़ा सा बतायेंगे। यह विषय बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसे आपने ठीक से समझ लिया तो वाक्यरचना कभी गलत नहीं होगी। ध्यानपूर्वक पढ़िये।

1) किसी भी वाक्य में कोई न कोई क्रिया अवश्य रहती है। बिना क्रिया के कोई वाक्य नहीं होता। इसीलिए वैयाकरण लोग कहते हैं – “एकतिङ् वाक्यम्” अर्थात् “जिसमें एक क्रिया हो उसे वाक्य कहते हैं।”

2) उस क्रिया को सम्पन्न करने में कई कारण होते हैं, जिनके कारण ही क्रिया का होना सम्भव हो पाता है। क्रिया के उन कारणों को ही “कारक” कहा जाता है।

3) “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ता है”- यह क्रियापद है। अब इस “तोड़ना” क्रिया के छः कारण हैं, देखिए कौन कौन से-

1] डोनाल्ड ट्रम्प “कर्ता” कारक है ।
2] बाग “अधिकरण” कारक है ।
3] पेड़ “अपादान” कारक है ।
4] डण्डा “करण” कारक है ।
5] नरेंद्र मोदी “सम्प्रदान” कारक है ।
6] फल “कर्म” कारक है।

4) संस्कृत भाषा में यही छः कारक होते हैं। इन छहों को याद रखने के लिए एक श्लोक बता देता हूँ जिसे याद कर लेने पर आप इनका नाम कभी नहीं भूलेंगे-

“कर्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट्॥”

5) इन छः कारकों के अतिरिक्त एक और चीज होती है जिसे “सम्बन्ध” कहा जाता है। ऊपर के वाक्य में यदि कहा जाए-
“डोनाल्ड ट्रम्प ‘ओबामा के’ बाग में डण्डे से………”
तो इससे बाग का सम्बन्ध ओबामा के साथ दिखाया जा रहा है। किन्तु ओबामा “तोड़ना” क्रिया में सहायक नहीं है इसलिए वह कारक नहीं है।

इन पाँच बातों को भली प्रकार समझ लीजिए और मस्तिष्क में बिठा लीजिए। कल आपको छह कारकों और सम्बन्ध के विषय में थोड़ा विस्तार से बताया जाएगा। साथ ही यह भी बताएँगे कि इन सातों के लिए किन विभक्तियों का प्रयोग होता है।
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श्लोक :

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय॥

यह श्लोक आगे काम आयेगा अतः याद कर लें।

॥शं तनोतु शङ्करः॥

संस्कृत साधना : पाठ : ३ (कारक और सम्बन्ध)

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नमः संस्कृताय मित्राणि ! अद्यत्वे शैत्यं निरन्तरं वर्द्धते, न वा ?
तो कल के पाठ में आपने यह जाना कि किसी भी वाक्य में क्रिया का होना अनिवार्य है और उस क्रिया के सम्पादन में जितने भी कारण होते हैं वे “कारक” कहे जाते हैं। एक श्लोक के माध्यम से छहों कारकों का नाम भी बताया था। आपको वह श्लोक अवश्य याद हो गया होगा। चलिए एक बार फिर याद दिला देते हैं-
“कर्त्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट् ॥”

अब इन छह “कारकों” और “सम्बन्ध” के विषय में समझाते हैं। यह भी बताएँगे कि किस कारक के लिए किस विभक्ति का प्रयोग होता है। सम्बोधन को छोड़कर सात विभक्तियाँ होती हैं- यह तो आप जानते ही हैं।

1] कर्त्ता = जो क्रिया को करने में स्वतन्त्र होता है उसे कर्त्ता कहते हैं अर्थात् यह सीधा सीधा क्रिया को सम्पादित करता है। “जो करता है वही कर्त्ता।” जैसे- कृष्णः खेलति – इसमें “खेलना” क्रिया को कृष्ण कर रहा है, इसलिए “कृष्ण” “कर्त्ता कारक” हुआ। कल वाले उदाहरण में- “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ना” क्रिया कौन कर रहा है ? उत्तर है- डोनाल्ड ट्रम्प, यही इस वाक्य में कर्त्ता है।

2] कर्म = जिस पदार्थ के लिए कोई क्रिया की जाती है वह पदार्थ ही उस क्रिया का कर्म होता है। जैसे – “डोनाल्ड ट्रम्प फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “फल” के लिए की जा रही है इसलिए फल “तोड़ना” क्रिया का “कर्म” हुआ।

3] करण = क्रिया की सिद्धि में जो चीज कर्त्ता की सबसे अधिक सहायक होती है वही “करण” है। “डोनाल्ड ट्रम्प डण्डे से फल तोड़ता है।” डोनाल्ड ट्रम्प कर्त्ता है और उसकी सबसे सहायक चीज है डण्डा, इसलिए “डण्डा” करण हुआ।

4] सम्प्रदान = जिसके लिए क्रिया की जाती है तथा जिसको कोई वस्तु दी जाती है उसे “सम्प्रदान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया नरेन्द्र मोदी के लिए की जा रही है इसलिए नरेन्द्र मोदी “सम्प्रदान कारक” हुआ।

5] अपादान = किसी वस्तु के दूसरी वस्तु से अलग होने की क्रिया में जो वस्तु स्थिर रहती है उसे ही “अपादान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प पेड़ से फल तोड़ता है” – पेड़ से फल अलग हो रहा है किन्तु पेड़ स्थिर है, इसलिए स्थिर वस्तु “पेड़” “अपादान” हुआ।

6) *सम्बन्ध = इसे कारकों में नहीं गिना जाता क्योंकि क्रिया के सम्पादन में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। कल इसके विषय में बताया था, आपको याद होगा।

7] अधिकरण = क्रिया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है उस स्थान को “अधिकरण” कारक कहा जाता है। “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “बाग में” हो रही है इसलिए “बाग” “अधिकरण” कारक हआ।

सम्बन्ध को मिलाकर ये कुल सात चीजें हो गईं। विभक्तियाँ भी सात ही होती हैं। इन सातों के लिए अलग-अलग एक-एक विभक्ति निर्धारित कर दी गई है। देखिए-

1] कर्त्ता = प्रथमा विभक्ति
2] कर्म = द्वितीया ”
3] करण = तृतीया ”
4] सम्प्रदान = चतुर्थी ”
5] अपादान = पञ्चमी ”
6] सम्बन्ध = षष्ठी ”
7] अधिकरण = सप्तमी ”

*सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति ही होती है किन्तु शब्द के रूप में प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। जैसे – रामः = हे राम ! (विसर्ग लुप्त हो गये)।
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कल हमने आपको एक बहुत सुंदर श्लोक बताया था-

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय ॥

इसमें “राम” शब्द के एकवचन में सभी विभक्तियों का प्रयोग किया गया है । देखिए –

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
2] रामं रमेशं भजे।
3] रामेण अभिहता निशाचरचमू।
4] रामाय तस्मै नमः ।
5] रामात् नास्ति परायणं परतरम्।
6] रामस्य दासः अस्मि अहम्।
7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे ।
8] हे राम ! मां पालय ।

कल हम आपको वाक्य में कारक पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना बताएँगे। इससे आपको अभ्यास हो जाएगा। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ भी बताएँगे। आप लोगों को कहीं कोई समस्या हो तो टिप्पणी करके निःसंकोच पूछिएगा। तब तक के लिए नमो नमः !!

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ १४ (अभ्यास)

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अभ्यास :
~~~~~~~

इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए ।

इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु
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शब्दकोश :
~~~~~~~

‘पक्षी’ के पर्यायवाची शब्द –

1] खगः 2] विहङ्गः 3] विहगः
4] विहङ्गमः 5] विहायस् 6] शकुन्तिः
7] पक्षिन् 8] शकुनिः 9] शकुन्तः
10] शकुनः 11] द्विजः 12] पतत्रिन्
13] पत्रिन् 14] पतङ्गः 15] पतत्
16] पत्ररथः 17] अण्डजः 18] नगौकस्
19] वाजिन् 20] विकिरः 21] विः
22] विष्किरः 23] पतत्रिः 24] नीडोद्भवः
25] गरुत्मत् 26] पित्सित् 27] नभसङ्गमः

* ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

वे पक्षी तीव्र वेग से उड़ते हैं।
= अमी खगाः तीव्रवेगेन उड्डयन्ति।

ये पक्षी खेत में बैठे हैं।
= इमे विहङ्गाः क्षेत्रे आसीनाः सन्ति।

इन पक्षियों को दाना देता हूँ।
= एभ्यः विहगेभ्यः अन्नकणान् ददामि।

इस खेत से पक्षी चले गए हैं।
= अस्मात् क्षेत्रात् पत्ररथाः गताः सन्ति।

इस वाटिका में पक्षी कूजते हैं।
= अस्यां वाटिकायां शकुन्ताः कूजन्ति।

इस वृक्ष पर बहुत पक्षी रहते हैं।
= अस्मिन् वृक्षे बहवः अण्डजाः वसन्ति।

उस बरगद पर बहुत से पक्षी रहते हैं।
= अमुष्मिन् न्यग्रोधे बहवः विष्किराः वसन्ति।

ये पक्षी उन पीपल के वृक्षों पर रहते हैं।
= इमे अण्डजाः अमीषु अश्वत्थेषु वसन्ति।

ये व्याध उन पक्षियों को मारते हैं।
= इमे व्याधाः अमून् अण्डजान् घ्नन्ति।

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श्लोक :
====

उदेति सविता ताम्रः
ताम्रम् एवास्तम् एति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च
महताम् एकरूपता ॥

सूर्य रक्तवर्ण ही उदित होता है और रक्तवर्ण ही अस्त होता है। सम्पत्ति और विपत्ति में सज्जन एक समान रहते हैं।

॥शिवोऽवतु॥

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