SanskritLearning

SanskritLearning

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १९ (साहित्य विशेष)

Gavya19


शब्द सिन्धु


अन्न (anna) = food
अन्नं (annaM) = foodstuff
अन्नात् (annaat.h) = from grains
अन्य (anya) = other person
अन्यं (anyaM) = other
अन्यः (anyaH) = another
अन्यत् (anyat.h) = other
अन्यत्र (anyatra) = somewhere else
अन्यथा (anyathaa) = other
अन्यया (anyayaa) = by the other
अन्यां (anyaaM) = another
अन्यान् (anyaan.h) = others
अन्यानि (anyaani) = different
अन्यायेन (anyaayena) = illegally
अन्ये (anye) = others
अन्येन (anyena) = by another
अन्येभ्यः (anyebhyaH) = from others
अन्यैः (anyaiH) = by others
अन्योन्य (anyonya) = mutual
अन्वय (anvaya) = Family
अन्वशोचः (anvashochaH) = you are lamenting
अन्विच्छ (anvichchha) = try for
अन्वित (anvita) = (p.p) Followed or attended by, in company with, joined by; having ossessed of; overpowerd by, connected grammatically;
अन्विताः (anvitaaH) = absorbed
अन्वेषणम् (anveshhaNam.h) = (n) search, exploration
अपकृ (apakRi) = to harm
अपकेन्द्रण (apakendraNa) = centrifugation
अपङ्ग (apa.nga) = handicapped
अपची (apachii) = to decrease
अपठम् (apaTham.h) = read
अपण्डित (apaNDita) = someone who is not a scholar
अपत्य (apatya) = Progeny
अपनुद्यात् (apanudyaat.h) = can drive away
अपमा (apamaa) = comparison
अपमानयोः (apamaanayoH) = and dishonour
अपर (apara) = other
अपरं (aparaM) = junior
अपररात्र (apararaatra) = (m) dawn
अपरस्पर (aparaspara) = without cause
अपरा (aparaa) = lower
अपराजितः (aparaajitaH) = who had never been vanquished
अपराजीत (aparaajiita) = Unconquered
अपराणि (aparaaNi) = others
अपरान् (aparaan.h) = others
अपरिग्रह (aparigraha) = abstention from greed, non-possessiveness
अपरिग्रहः (aparigrahaH) = free from the feeling of possessiveness
अपरिमेयं (aparimeyaM) = immeasurable
अपरिहार्ये (aparihaarye) = of that which is unavoidable
अपरे (apare) = others
अपर्याप्तं (aparyaaptaM) = immeasurable
अपलायनं (apalaayanaM) = not fleeing
अपवर्ग (apavarga) = heaven, liberation
अपवहनं (apavahanaM) = seducetion
अपवाद (apavaada) = exceptional
अपविघ्नः (apavighnaH) = without obstacles
अपश्यत् (apashyat.h) = he could see
अपस्मार (apasmaara) = forgetful
अपस्मारः (apasmaaraH) = (m) epilepsy
अपहरण (apaharaNa) = stealing
अपहरणं (apaharaNaM) = abduction, kipnapping
अपहर्तारं (apahartaaraM) = the remover]destroyer
अपहृत (apahRita) = stolen
अपहृतचेतसां (apahRitachetasaaM) = bewildered in mind
अपात्रेभ्यः (apaatrebhyaH) = to unworthy persons
अपान (apaana) = one of the vital airs, controls the elimination of bodily wastes
अपानं (apaanaM) = the air going downward
अपाने (apaane) = in the air which acts downward
अपापो (apaapo) = without sins
अपायिनः (apaayinaH) = disappearing
अपारा (apaaraa) = one who has no limits
अपावृतं (apaavRitaM) = wide open


पाठ


1 2

3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सहते विपत्सहस्रं मानी नैवापमानलेशमपि ।
  • सहसा विदधीत न क्रियाम् अविवेकः परमापदां पदम् ।
  • सिद्ध्यन्ति कुत्र सुकृतानि विना श्रमेण ?
  • सुतप्तमपि पानीयं शमत्येव पावकम्।
  • सुदुर्लभाः सर्वमनोरमा गिरः ।
  • सुलभा रम्यता लोके दुर्लभं हि गुणार्जनम् ।
  • सुलभो हि द्विषां भङ्गः दुर्लभा सत्स्ववाच्यता ।
  • सोत्साहानां नास्त्यसाध्यं नराणाम् ।
  • स्मृत्वा स्मृत्वा याति दुःखं नवत्वम् ।
  • स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।
  • स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
  • सङ्घे शक्तिः कलौ युगे ।

सुभाषित


तत्त्वं किमपि काव्यानां जानाति विरलो भुवि ।

मार्मिकः को मरन्दानामन्तरेण मधुव्रतम् ॥ ११७ ॥

अन्वयः : भुवि काव्यानां किम् अपि तत्त्वं विरलः जानाति । मधुव्रतम् अन्तरेण मरन्दानां मार्मिकः कः?

It is only a rare person who understands anything of the essence of a literary work. Who has a deep insight into the honey of flowers other than the honey-bee?


पठन


चित्र काव्य

Wiki: https://hi.wikipedia.org/wiki/चित्रकाव्य

 

चित्रकाव्य वह आलंकारिक काव्य है जिसके चरणों की रचना ऐसी युक्ति से की गई हो कि वे चरण किसी विशिष्ट क्रम से लिखे जाने पर कमल, खड़ग, घोड़े, रथ, हाथी आदि के चित्रों के समान बन जाते हों। इसकी गणना अधम प्रकार के काव्यों में होती है।

Why is it called अधम or lowly work?

काव्यस्यात्मा ध्वनि|

 

जिस प्रकार अतिशय अलंकृत नारी लावण्य के अभाव में हृदयावर्जक नहीं हो सकती, उसी प्रकार ध्वनि तत्व के अभाव में अलंकृत काव्य भी हृदयावर्जक नहीं हो सकता। इसलिए अपने काव्य के प्रारम्भ में ही उन्होंने ‘काव्यस्यात्मा ध्वनि’ कहा। ध्वनि ही उनके अनुसार काव्य का आत्मभूत तत्व है।

काव्यका आत्मा ध्वनि है| जब तक काव्य सुसंगत ध्वनि प्रदान नहीं कर पाता, वह अधम कहा जाता है|

चित्र शब्दका साधारण अर्थ प्राण-शून्य आकृति| चित्रकाव्यभी जब तक ध्वनि-शून्य है, तब तक वह शब्दार्थी सूप रचना मात्र है |

प्राणहीन = तत्वहीन

कविको काव्य प्राणवान बनानेका प्रयत्न करना चाहिए | चित्रकाव्य तक अटकना नहीं है|

This is one view.

Here is the another view from the book:

Read the चित्रकाव्य मीमांसा as a part of SAnskrit leanring and then go through the book for further knowledge.

Download book from: https://archive.org/details/PathakRamRupChritaKavyaKautukam

1_1 1_2 1_3

Example

1_4 1_5

संस्कृत साधना : पाठ : २ (कारक और विभक्ति)

Sanskrut_2

नमस्कार मित्रों ! कल हमने आपको संस्कृतभाषा की कुछ विशेषताओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। मुझे पूरा विश्वास है कि आपने पिछली बातें पक्की कर ली हैं। फिर भी आपको याद दिलाना उचित समझता हूँ । आप जान गये हैं कि संस्कृत में तीन वचन, तीन पुरुष और शब्दों के तीन लिंग होते हैं। प्रत्येक शब्द के रूप चलते हैं जिन्हें “विभक्ति” कहते हैं। पुरुष को पहचानने का तरीका भी आप जान गये हैं। क्रिया सदैव पुरुष और वचन के अनुसार होती है- यह भी आपने पक्का कर लिया। तो अब हम अगले सोपान पर पैर रखेंगे। आज हम आपको “कारक और विभक्ति” के विषय में थोड़ा सा बतायेंगे। यह विषय बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसे आपने ठीक से समझ लिया तो वाक्यरचना कभी गलत नहीं होगी। ध्यानपूर्वक पढ़िये।

1) किसी भी वाक्य में कोई न कोई क्रिया अवश्य रहती है। बिना क्रिया के कोई वाक्य नहीं होता। इसीलिए वैयाकरण लोग कहते हैं – “एकतिङ् वाक्यम्” अर्थात् “जिसमें एक क्रिया हो उसे वाक्य कहते हैं।”

2) उस क्रिया को सम्पन्न करने में कई कारण होते हैं, जिनके कारण ही क्रिया का होना सम्भव हो पाता है। क्रिया के उन कारणों को ही “कारक” कहा जाता है।

3) “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ता है”- यह क्रियापद है। अब इस “तोड़ना” क्रिया के छः कारण हैं, देखिए कौन कौन से-

1] डोनाल्ड ट्रम्प “कर्ता” कारक है ।
2] बाग “अधिकरण” कारक है ।
3] पेड़ “अपादान” कारक है ।
4] डण्डा “करण” कारक है ।
5] नरेंद्र मोदी “सम्प्रदान” कारक है ।
6] फल “कर्म” कारक है।

4) संस्कृत भाषा में यही छः कारक होते हैं। इन छहों को याद रखने के लिए एक श्लोक बता देता हूँ जिसे याद कर लेने पर आप इनका नाम कभी नहीं भूलेंगे-

“कर्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट्॥”

5) इन छः कारकों के अतिरिक्त एक और चीज होती है जिसे “सम्बन्ध” कहा जाता है। ऊपर के वाक्य में यदि कहा जाए-
“डोनाल्ड ट्रम्प ‘ओबामा के’ बाग में डण्डे से………”
तो इससे बाग का सम्बन्ध ओबामा के साथ दिखाया जा रहा है। किन्तु ओबामा “तोड़ना” क्रिया में सहायक नहीं है इसलिए वह कारक नहीं है।

इन पाँच बातों को भली प्रकार समझ लीजिए और मस्तिष्क में बिठा लीजिए। कल आपको छह कारकों और सम्बन्ध के विषय में थोड़ा विस्तार से बताया जाएगा। साथ ही यह भी बताएँगे कि इन सातों के लिए किन विभक्तियों का प्रयोग होता है।
_______________________________________

श्लोक :

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय॥

यह श्लोक आगे काम आयेगा अतः याद कर लें।

॥शं तनोतु शङ्करः॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३० (शंकराचार्य विशेष)

Gavya30

स्वप्नो जागरणेऽलीकः स्वप्नेऽपि जागरो न हि ।
द्वयमेव लये नास्ति लयोऽपि ह्युभयोर्न च ॥

The dream is unreal in waking, whereas the waking experience is absent in the dream. Both, however, are non-existent in deep sleep which, again, is not experienced in either.

 


शब्द सिन्धु


प्रयुंजानो (prayu.njaano) = combined
प्रयुक्तः (prayuktaH) = impelled
प्रयुक्तव्यं (prayuktavyaM) = should be used
प्रयुज्यते (prayujyate) = is used
प्रयुज्येत् (prayujyet.h) = is used
प्रयोग (prayoga) = practice
प्रयोगः (prayogaH) = (m) experiment
प्रयोगशाला (prayogashaalaa) = (f) laboratory
प्रयोजन (prayojana) = (n) reason
प्रयोजनीयं (prayojaniiyaM) = should use
प्रलपन् (pralapan.h) = talking
प्रलयं (pralayaM) = dissolution
प्रलयः (pralayaH) = annihilation
प्रलयान्तां (pralayaantaaM) = unto the point of death
प्रलये (pralaye) = in the annihilation
प्रलीनः (praliinaH) = being dissolved
प्रलीयते (praliiyate) = is annihilated
प्रलीयन्ते (praliiyante) = are annihilated
प्रलोभनं (pralobhanaM) = allure
प्रवचनेन (pravachanena) = (instr.sing.)thro’ discourse or lecture
प्रवदतां (pravadataaM) = of arguments
प्रवदन्ति (pravadanti) = say
प्रवर्तक (pravartaka) = (adj m) a promoter
प्रवर्तते (pravartate) = act
प्रवर्तन्ते (pravartante) = they flourish
प्रवर्तितं (pravartitaM) = established by the Vedas
प्रवक्ष्यामि (pravakShyaami) = I shall explain
प्रवक्ष्ये (pravakShye) = I shall explain
प्रवालाः (pravaalaaH) = twigs
प्रवासः (pravaasaH) = (m) journey, travel, trip
प्रवाह (pravaaha) = current
प्रवाहः (pravaahaH) = (m) current, flow
प्रविभक्तं (pravibhaktaM) = divided
प्रविभक्तानि (pravibhaktaani) = are divided


पाठ


We are in revision mode. Keep reading based on learning so far.

1 2

Use this sentences in daily life.

  • एकः प्रजायते जन्तुः एकः एव प्रलीयते।
  • एकयोनीप्रसूतानां तेषां गन्धं पृथक् पृथक् ।
  • एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ।
  • कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा।
  • कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ।
  • कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् ।
  • कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाश्चेतनेषु।
  • कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ।
  • कार्यं निदानाद्धि गुणानधीते ।
  • किञ्चित्कालोपभोग्यानि यौवनानि धनानि च।
  • कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।
  • कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः ।
  • कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः ।
  • कृते च प्रतिकर्तव्यम् एष धर्मः सनातनः ।
  • क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।
  • क्षणमुज्ज्वलितं श्रेयः न तु धूमायितं चिरम् ।
  • क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा रुष्टा तुष्टा क्षणे क्षणे।
  • क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ।

सुभाषित


कर्मोक्तिनर्मनिर्माणै: प्रात: प्रात: प्रधावताम्।
धनं धनं प्रलपतां निधनं विस्मृतं नृणाम्॥

By creating the pastime of various actions and running (to and fro) from morning to morning, talking of nothing but money, men forget that (such a thing as) death exists.


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


Today we will focus on स्वरूपानुसन्धानाष्टकम्

तपोयज्ञदानादिभिः शुद्धबुद्धि-
र्विरक्तो नृपादेः पदे तुच्छबुद्ध्या .
परित्यज्य सर्वं यदाप्नोति तत्त्वं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. १..
दयालुं गुरुं ब्रह्मनिष्ठं प्रशान्तं
समाराध्य मत्या विचार्य स्वरूपम् .
यदाप्नोति तत्त्वं निदिध्यास विद्वान्-
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. २..
यदानन्दरूपं प्रकाशस्वरूपं
निरस्तप्रपञ्चं परिच्छेदहीनम् .
अहंब्रह्मवृत्त्यैकगम्यं तुरीयं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ३..
यदज्ञानतो भाति विश्वं समस्तं
विनष्टं च सद्यो यदात्मप्रबोधे .
मनोवागतीतं विशुद्धं विमुक्तं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ४..
निषेधे कृते नेति नेतीति वाक्यैः
समाधिस्थितानां यदाभाति पूर्णम् .
अवस्थात्रयातीतमद्वैतमेकं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ५..
यदानन्दलेशैः समानन्दि विश्वं
यदाभाति सत्त्वे तदाभाति सर्वम् .
यदालोकने रूपमन्यत्समस्तं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ६..
अनन्तं विभुं निर्विकल्पं निरीहं
शिवं सङ्गहीनं यदोङ्कारगम्यम् .
निराकारमत्युज्ज्वलं मृत्युहीनं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ७..
यदानन्द सिन्धौ निमग्नः पुमान्स्या-
दविद्याविलासः समस्तप्रपञ्चः .
तदा नः स्फुरत्यद्भुतं यन्निमित्तं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ८..
स्वरूपानुसन्धानरूपां स्तुतिं यः
पठेदादराद्भक्तिभावो मनुष्यः .
श्रुणोतीह वा नित्यमुद्युक्तचित्तो
भवेद्विष्णुरत्रैव वेदप्रमाणात् .. ९..
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
स्वरूपानुसन्धानाष्टकम् संपूर्णम् ..

 

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 3

Gavya_3


शब्द सिन्धु

Work


  • कार्यप्रवाह – workflow
  • कार्यभार – workload
  • कार्यक्रमस्वचालन – workflow automation
  • कर्मसारथि – co-worker
  • कर्मकरगण – workforce
  • परिबृंहण – additional work

पाठ १.३


Work Theme

  • अहं आगामिवर्षे करिष्यामि | – Next year, I will work.
  • मम अन्यत् कार्यम् अस्ति| – I have some other work.
  • गृहकार्यं सर्वं समाप्तं वा? – Finished your household work?
  • ममापि बहुनि कार्याणि सन्ति – I have a lot of work to do myself.
अहं पठामि में पढ़ता हूँ
त्वं पठसि तू पढ़ता है
स: पठति वह पढ़ता है
अहं खादामि में खाता हूँ
त्वं खादसि तू खाता है
स: खादति वह खाता है
अहं पश्यामि में देखता हूँ
त्वं पश्यसि तू देखता है
स: पश्यति वह देखता है
  • अहं वाणिज्यशास्त्रं पठामि|
  • नवमकक्श्यायां पठामि|
  • संस्कृतं पठामि|
  • त्वं प्रातः किं खादसि?
  • त्वं फलानि अपि खादसि?
  • पुनः कदाचित् पश्यामि (Meet you again)
  • मासे कति चित्राणि पश्यति? – How often do you go to films in a month?

 

Bookish..

Untitled

Untitled2

Untitled3

 


सुभाषित


विवेक-चूड़ामणि

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटीभि:।।11।।

Work leads to purification of the mind, not to perception of the Reality. The realisation of Truth is brought about by discrimination and not in the least by ten million of acts.

कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तुपलब्धि (तत्वदृष्टि) – के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता।


पठन/मनन


Following excerpt is from Kathak griha sutra. It is commenraty by Devapala on first Sun sighting Sanskar for newborn. Try to interpret it by self.

KathakGrihasutra_0

KathakGrihasutra

 

 

 

संस्कृत गोवीथी : गव्य 2

Gavya_2


शब्द सिन्धु

Morning


  • गतप्रभाते – last morning
  • अद्य प्रभाते – this morning
  • उषसी – Sandhya Time
  • बालादित्य – Morning Sun

पाठ १.२


Morning Theme

  • अद्य प्रातः आगतवान् वा? – Did you come this morning?
  • त्वं प्रातः किं खादसि? – What do you eat in the morning?
  • अद्य प्रातः आरभ्य बहु कार्याणि – I have had a lot work since morning
  • प्रतिप्रभातं विद्यालयं न गच्छामि इति रोदिति – He cries every morning saying he would not go to school

पाठ

Word Word2 Sentence Pattern 1 Sentence Pattern 2
अहं (में) वदामि अहं वदामि| वदामि अहं|
त्वं (तू) वदसि त्वं  वदसि| वदसि त्वं |
स: (वह) वदति स: वदति| वदति स:|

 

वदामि – To say

Usages:

(Focus on वदामि)

  • यथार्थं वदामि – I am telling the truth.
  • अस्मिन् विषये अनन्तरं वदामि – I’ll tell you about it later.
  • अहं किमर्थं असत्यं वदामि? – Why should I tell a lie?
  • त्वां धन्यं वदामि – Thank you!
  • तत्र अहं किमपि न वदामि – I do not want to say anything in this regard
  • अहम् तां किमपि न वदामि । प्रयोजनम् किम् ? – I don’t say anything to her. What is the point?

(Focus on वदसि?)

  • किं भोः, एवं वदसि? – Hey, why do you say so?
  • त्वम् संस्कृतं वदसि ? – Do you speak Sanskrit?

(Focus on वदति)

  • तत्र गमनं मास्तु भोः, सः बहुमूल्यं वदति । He is very expensive, let us not go to him.
  • संस्कृतं जानामि इति वदति भवान् तदनन्तरं संस्कृतेन सम्भाषणं कर्तुं किमर्थं सङ्कोचः ? You say you know Sanskrit but why then this hesitation to talk in Sanskrit?

Patha

सुभाषित


 

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

एक एक क्षण गवाये बिना विद्या पानी चाहिए; और एक एक कण बचा करके धन ईकट्ठा करना चाहिए । क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समजनेवाले को धन कहाँ ?

 


स्वाध्याय – पठन, मनन


Listen this video

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ९(हनुमान विशेष)

Gavya9

 


शब्द सिन्धु


अंशभूतं (a.nshabhuutaM) = has been a part of her
अंशः (a.nshaH) = fragmental particle
अंशुमान् (a.nshumaan.h) = radiant
अंशेन (a.nshena) = part
अकर्तारं (akartaaraM) = as the nondoer
अकर्म (akarma) = inaction
अकर्मकृत् (akarmakRit.h) = without doing something
अकर्मणः (akarmaNaH) = than no work
अकर्मणि (akarmaNi) = in not doing prescribed duties
अकल्मषं (akalmashhaM) = freed from all past sinful reactions
अकस्मात् (akasmaat.h) = by chance
अकारः (akaaraH) = the first letter
अकारो (akaaro) = the letter `a’
अकार्य (akaarya) = and forbidden activities
अकार्यं (akaaryaM) = what ought not to be done
अकार्ये (akaarye) = and what ought not to be done
अकीर्ति (akiirti) = infamy
अकीर्तिं (akiirtiM) = infamy
अकीर्तिः (akiirtiH) = ill fame
अकुर्वत् (akurvat.h) = did
अकुर्वत (akurvata) = did they do
अकुशलं (akushalaM) = inauspicious


पाठ


Untitled

2

3


सुभाषित


कृतम् हनुमता कार्यम् सुमहद्भुवि दुर्लभम् |
मनसापि यदन्येन न शक्यम् धरणीतले || ६-१-२

“A very outstanding work, the most arduous in the world has been done by Hanuman, which could not be carried out even in thought by any other on the surface of this earth.”


पठन/मनन/स्मरण


आञ्जनेय गायत्रि
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि ।
तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ॥
Meaning: I wish to know the son of a~njani.
I meditate on vAyu putra.
May that hanumAn propel us.

आञ्जनेय त्रिकाल वंदनं
प्रातः स्मरामि हनुमन् अनन्तवीर्यं
श्री रामचन्द्र चरणाम्बुज चंचरीकम् ।
लंकापुरीदहन नन्दितदेववृन्दं
सर्वार्थसिद्धिसदनं प्रथितप्रभावम् ॥

Meaning: I remember that hanuman during
the early hours as one whose valor is
immeasurable. I remember that bee who
stays always at shrI ramachandra’s
feet. I remember HIM who burnt la.nka
and made gods happy. I remember him
who is the store house of all siddhis
and who is capable of anything.
माध्यम् नमामि वृजिनार्णव तारणैकाधारं
शरण्य मुदितानुपम प्रभावम् ।
सीताधि सिंधु परिशोषण कर्म दक्षं
वंदारु कल्पतरुं अव्ययं आञ्ज्नेयम् ॥

Meaning: I bow that Anjaneya svAmi during
the mid day as the one capable Person
to crossing the ocean, who blesses the
person with enormous happiness when
he/she takes refuge in HIM. He is
entrusted with the responsibility of
annihilating sIta’s sorrows. He is like
a wish-fulfilling tree for one who bows to HIM.
सायं भजामि शरणोप स्मृताखिलार्ति
पुञ्ज प्रणाशन विधौ प्रथित प्रतापम् ।
अक्षांतकं सकल राक्षस वंश
धूम केतुं प्रमोदित विदेह सुतं दयालुम् ॥

Meaning: I worship that A~njaneya svAmi
during the evening as the one who saves
everyone who takes HIS name. He the most
valorous one, who killed akShA and was
the dhUmaketu for all the demons.
He also made sIta devi (daughter of
videha country) happy.

——-
Ravisankar S. Mayavaram

संस्कृत साधना : पाठ १८ (तिङन्त-प्रकरण ४ :: विशेष नियम)

Sanskrut_18

नमस्कार मित्रों !
पिछले पाठ में आपने लट् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। ‘भू’ धातु के लट् लकार में बनने वाले रूपों को जाना और उनका वाक्यों में अभ्यास भी किया। स्मरण करा दूँ कि “अनभ्यासे विषं विद्या” अभ्यास न करने पर विद्या विष का काम करती है। आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों ? मान लीजिये कि आप किसी सभा या गोष्ठी में बैठे हैं और सम्बन्धित विद्या का प्रसंग चल गया और आप अनभ्यास के कारण उसमें भ्रमित हो गये, तो बिना अपमानित हुए न बचेंगे। और “सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।” अकीर्ति या अपमान मरण से भी बढ़कर है। अतः अनभ्यास में विद्या हो गयी न विष के समान ! अतः अभ्यास बहुत आवश्यक है। मैंने एक श्लोक आपको बताया था-
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥

इस श्लोक को आप ठीक से स्मरण रखिए। वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में बता दिया गया। लेट् लकार केवल और केवल वेद में ही पाया जाता है अतः उसके विषय में नहीं बतायेंगे। जब कभी वैदिक व्याकरण सिखायेंगे तब उसके विषय में विस्तार से समझायेंगे। अब भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लकारों के विषय में समझाते हैं। भूतकाल के लिए तीन लकार प्रयुक्त होते हैं- “भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा” सबसे पहला है लुङ् लकार, इसी के विषय में आज चर्चा करते हैं। सामान्य रूप से आप भूतकाल के लिए इन तीनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष नियम जान लीजिए जिससे भाषा में उत्कृष्टता आ जाएगी। संस्कृत में हलन्त, अनुस्वार और विसर्ग पर विशेष ध्यान देना है।

भू (होना), लुङ् लकार

अभूत् (वह हुआ)/ अभूताम् (वे दो हुए) /अभूवन् (वे सब हुए)
अभूः (तू हुआ)/ अभूतम् ( तुम दो हुए)/ अभूत (तुम सब हुए)
अभूवम् (मैं हुआ)/ अभूव (हम दो हुए)/ अभूम (हम सब हुए)

लुङ् लकार के विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए –

१) सबसे पहली बात तो यह स्मरण रखिए कि लुङ् लकार का प्रयोग ‘सामान्य भूतकाल’ के लिए होता है। ‘सामान्य भूतकाल’ का अर्थ है कि जब भूतकाल के साथ ‘कल’ ‘परसों’ आदि विशेषण न लगे हों। बोलने वाला व्यक्ति चाहे अपना अनुभव बता रहा हो अथवा किसी अन्य व्यक्ति का, अभी बीते हुए का वर्णन हो या पहले बीते हुए का, सभी जगह लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है। भले ही घटना साल भर पहले की हो किन्तु यदि कोई विशेषण नहीं लगा है तो लुङ् लकार का ही प्रयोग होगा।

२) ‘आज गया’ , ‘आज पढ़ा’ , ‘आज हुआ’ आदि अद्यतन (आज वाले) भूतकाल के लिए भी लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है, लङ् या लिट् का नहीं।

३) लुङ् लकार के रूप के साथ यदि ‘माङ्’ अव्यय ( मा शब्द ) लगा दें तो उसका अर्थ निषेधात्मक हो जाता है और तब इसका प्रयोग भूतकाल के लिए नहीं अपितु ‘आज्ञा’ या ‘विधि’ अर्थ हो जाता है, जैसे – ” दुःखी मत होओ” = “खिन्नः मा भूः” । एक बात ध्यान रखनी है कि जब माङ् का प्रयोग करेंगे तो लुङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा। अभूत् – मा भूत्, अभूः – मा भूः ।
______________________________________

शब्दकोश :
=======

‘सन्तान’ के पर्यायवाची शब्द –

१) सन्तानः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग में)
२) अपत्यम् ( नपुंसकलिंग )
३) तोकम् ( नपुंसकलिंग )

‘देह’ (शरीर) के पर्यायवाची शब्द –

१) कलेवरम् ( नपुंसकलिंग )
२) गात्रम् ( नपुंसकलिंग )
३) वपुष् ( नपुंसकलिंग )
४) संहननम् ( नपुंसकलिंग )
५) शरीरम् ( नपुंसकलिंग )
६) वर्ष्मन् ( नपुंसकलिंग )
७) विग्रहः ( पुँल्लिंग )
८) कायः ( पुँल्लिंग )
९) देहः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग (देहम्) )
१०) मूर्तिः ( स्त्रीलिंग )
११) तनुः ( स्त्रीलिंग )
१२) तनूः ( स्त्रीलिंग )

_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

तुम्हारे घर सन्तान हुई।
= तव गृहे सन्तानः अभूत्।

महान् उत्सव हुआ।
= महान् उत्सवः अभूत्।

तुम्हारे माता और पिता आनन्दित हुए।
= तव माता च पिता च आनन्दितौ अभूताम्।

सभी आनन्दमग्न हो गए।
= सर्वे आनन्दमग्नाः अभूवन्।

तुम भी प्रसन्न हुए।
= त्वम् अपि प्रसन्नः अभूः।

तुम दोनों बहुत आनन्दित हुए।
= युवां भूरि आनन्दितौ अभूतम्।

तुम सब थकित हो गये थे।
= यूयं श्रान्ताः अभूत ।

मैं भी थकित हो गया था।
= अहम् अपि श्रान्तः अभूवम्।

हम दोनों उत्सव से हर्षित हुए।
= आवाम् उत्सवेन हर्षितौ अभूव।

हम सब आनन्दित हुए।
= वयम् आनन्दिताः अभूम।
_______________________________________

श्लोक :
====

गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥

चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, न चलता हुआ गरुड भी एक पग नहीं जाता । इसलिए चलते रहो।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २२ (तिङन्त-प्रकरण ७ :: लिङ् लकार (विधिलिङ्))

Sanskrut_22

नमः संस्कृताय !

लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् और लिट् लकार के विषय में जाना। लकारों से सम्बन्धित जो श्लोक मैंने बताया था उसका आधा भाग आपने जान लिया- “लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।” साथ ही आपने भू धातु के रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया। अब श्लोक का तृतीय चरण देखिए- “विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ” अर्थात् ‘विधि’ और ‘आशीर्वाद’ अर्थ में लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग होता है। तो आज आपको लिङ् लकार के विषय में बताते हैं। आगामी पाठों में लोट् और अन्य लकारों के विषय में क्रमशः बताएँगे। स्मृतिग्रन्थों में तथा अन्य विधिनिषेध का विधान करने वाले शास्त्रों में विधिलिङ् लकार के प्रचुर प्रयोग मिलते हैं।

१) सर्वप्रथम तो आप यह जान लीजिए कि इस लकार के दो भेद हैं- १. विधिलिङ् २. आशीर्लिङ् । आज केवल विधिलिङ् लकार की चर्चा करते हैं।

२) जिसके द्वारा किसी बात का विधान किया जाता है उसे विधि कहते हैं। जैसे – ‘स्वर्गकामः यजेत्’ स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे। यहाँ यज्ञ करने का विधान किया गया है अतः यज् (यजन करना) धातु में विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार यदि किसी चीज का निषेध करना हो तो वाक्य में निषेधार्थक शब्द का प्रयोग करके विधिलिङ् लकार का प्रयोग करना चाहिए, जैसे -” मांसं न भक्षेत् ” मांस नहीं खाना चाहिए/ न खाये।

मोटे तौर पर आप यह ध्यान में रखिए कि जहाँ “चाहिए” ऐसा बोला जा रहा हो , वहाँ इस लकार का प्रयोग होगा। हिन्दी में ‘करे’ और ‘करना चाहिए’ दोनों लगभग समान अर्थ वाले हैं।

३) जहाँ किसी बात की सम्भावना की जाए वहाँ भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है, जैसे – ” अद्य वर्षः भवेत् ” सम्भव है आज वर्षा हो।

४) योग्यता बतलाने के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है। जैसे – “भवान् पारितोषिकं लभेत् ” – आप पुरस्कार पाने योग्य हैं।

५) आमन्त्रित, निमन्त्रित करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे -” भवान् अद्य मम गृहम् आगच्छेत्” आज आप मेरे घर आयें।

६) इच्छा, कामना करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे – “भवान् शीघ्रं स्वस्थः भवेत्” आप शीघ्र स्वस्थ हों।

७) आज्ञा के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया जाता है।

८) अच्छी प्रकार स्मरण रखिए कि “आशीर्वाद” के अर्थ में इस लकार का प्रयोग नहीं होता। आशीर्वाद के लिए आशीर्लिङ् और कभी कभी लोट् लकार का प्रयोग होता है।

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत्
भवेयम् भवेव भवेम
________________________________________

शब्दकोश :
========

जासूस, भेदिया, गुप्तचर के लिए संस्कृत शब्द –

१] यथार्हवर्णः
२] प्रणिधिः
३] अपसर्पः
४] चरः
५] स्पशः
६] चारः
७] गूढपुरुषः

*ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

वह जासूस होवे। ( इच्छा )
= सः गूढपुरुषः भवेत् ।

वे दोनों जासूस सफल हों। (इच्छा)
= तौ यथार्हवर्णौ सफलौ भवेताम् ।

उन सारे गुप्तचरों को राष्ट्रभक्त होना चाहिए। (विधि)
= ते सर्वे स्पशाः राष्ट्रभक्ताः भवेयुः।

तुम्हें गुप्तचर के घर में होना चाहिए। (विधि)
= त्वं गूढपुरुषस्य गृहे भवेः।

तुम दोनों को भेदिया होना चाहिए। (सम्भावना)
= युवां स्पशौ भवेतम् ।

तुम सबको भेदियों से दूर रहना चाहिए।(विधि, आज्ञा)
= यूयं चारेभ्यः दूरं भवेत।

सोचता हूँ, मैं जासूस होऊँ। (इच्छा, सम्भावना)
= मन्ये अहं प्रणिधिः भवेयम्।

हम दोनों भेदियों के भी भेदिये होवें। (इच्छा)
= आवां चाराणाम् अपि चारौ भवेव ।

हम सब गुप्तचरों के प्रशंसक हों।(इच्छा, विधि)
= वयम् अपसर्पाणां प्रशंसकाः भवेम ।
_________________________________________

श्लोक :
====

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेत् युगपद् उत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासः तस्य महात्मनः॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।१२ )

पुस्तक से देखकर सभी शब्दों का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

WhySanskrit

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३५ (शंकराचार्य विशेष)

Gavya35

एकान्ते सुखमास्यतां परतरे चेतः समाधीयतां
पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्वाधितं दृश्यताम्।
प्राक्कर्म प्रविलाप्यतां चितिबलान्नाप्युत्तरैः श्लिश्यतां
प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थीयताम्॥५॥

एकांत के सुख का सेवन करें, परब्रह्म में चित्त को लगायें, परब्रह्म की खोज करें, इस विश्व को उससे व्याप्त देखें, पूर्व कर्मों का नाश करें, मानसिक बल से भविष्य में आने वाले कर्मों का आलिंगन करें, प्रारब्ध का यहाँ ही भोग करके परब्रह्म में स्थित हो जाएँ ॥५॥

Enjoy in solitude, meditate on the Lord, search for the Lord, see this world as pervaded by Him. Destroy the effects of the previous deeds, welcome the future with all your mental strength. Exhaust the remaining effects of past actions here and get established in the Lord ॥5॥

-साधन पंचकम्


शब्द सिन्धु


विषाण (vishhaaNa) = horns
विषादं (vishhaadaM) = moroseness
विषादि (vishhaadi) = morose
विषीदन् (vishhiidan.h) = while lamenting
विषीदन्तं (vishhiidantaM) = lamenting
विषुस्पृश (vishhuspRisha) = touched, tinged with poison (poison-tipped arrow?)
विषेशाधिकारः (vishheshaadhikaaraH) = (m) privilege
विषेषता (vishheshhataa) = difference
विषोपमेयं (vishhopameyaM) = poison-like
विष्टभ्य (vishhTabhya) = pervading
विष्ठितं (vishhThitaM) = situated
विष्णु (vishhNu) = the preserver of life
विष्णुः (vishhNuH) = the Lord MahaavishhNu
विष्णुत्वं (vishhNutvaM) = the quality/state of Brahman/god-realisation
विष्णो (vishhNo) = O Lord Visnu
विष्लेषण (vishhleshhaNa) = analysis
विसंमोहन (visaMmohana) = infatuation
विसर्गः (visargaH) = creation
विसृजन् (visRijan.h) = giving up
विसृजामि (visRijaami) = I create
विसृज्य (visRijya) = putting aside
विस्तरः (vistaraH) = the expanse
विस्तरशः (vistarashaH) = in detail
विस्तरस्य (vistarasya) = to the extent
विस्तरेण (vistareNa) = in detail
विस्तारं (vistaaraM) = the expansion
विस्तारः (vistaaraH) = (m) amplitude
विस्तारित (vistaarita) = expanded
विस्फुरणै (visphuraNai) = by emanation
विस्मयः (vismayaH) = wonder
विस्मयपदं (vismayapadaM) = object of wonder
विस्मयाविष्टः (vismayaavishhTaH) = being overwhelmed with wonder
विस्मिताः (vismitaaH) = in wonder
विहग (vihaga) = bird
विहगः (vihagaH) = Bird, cloud, arrow, sun, moon, a planet in general, some thing that moves in the sky
विहाय (vihaaya) = giving up
विहार (vihaara) = in relaxation
विहारस्य (vihaarasya) = recreation
विहारिणि (vihaariNi) = one who strolls
विहिआ (vihiaa) = vihitA?, understood
विहित (vihita) = prescribed
विहितं (vihitaM) = directed
विहिताः (vihitaaH) = used
विहितान् (vihitaan.h) = arranged
विहीन (vihiina) = without
विहीना (vihiinaa) = bereft
विहृ (vihRi) = to roam
विक्षिप्त (vikShipta) = mental aggitation
विक्षेप (vikShepa) = confusion
विज्ञातं (viGYaataM) = has been known
विज्ञातुं (viGYaatuM) = to know
विज्ञान (viGYaana) = comprehension, Science
विज्ञानं (viGYaanaM) = numinous knowledge
विज्ञानमय (viGYaanamaya) = full of greater(scientific in a way) knowledge
विज्ञानी (viGYaanii) = scientist
विज्ञाय (viGYaaya) = after understanding


पाठ


1 2

लोकोक्ति

बहुत अधिक प्रचलित और लोगों के मुँहचढ़े वाक्य लोकोक्ति के तौर पर जाने जाते हैं। इन वाक्यों में जनता के अनुभव का निचोड़ या सार होता है। इनकी उत्पत्ति एवं रचनाकार ज्ञात नहीं होते।

पाषाणादिष्टिका वरा।

पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना|

पिण्डेन ब्रह्माण्डपरीक्षणं स्यात्।

पुरुषकारम् अनुवर्तते दैवम्।

पुरुषार्थहीना: भुवि भारभूता:|


सुभाषित


अग्निशेषमृणशेषं शत्रुशेषं तथैव च |
पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्माच्शेषं न कारयेत् ||

If a fire, a loan, or an enemy continues to exist even to a small extent, it will grow again and again; so do not let any one of it continue to exist even to a small extent. यदि कोई आग, एक ऋण, या एक शत्रु अस्तित्व ही रहेगी को भी एक छोटी-सी सीमा तक, इससे बार-बार बढ़ने; अत: ऐसा न होने दीजिए यह किसी एक के अस्तित्व को जारी करने के लिए भी एक छोटी-सी हद तक ।


For next few days, we will focus on शंकर भाष्य

मूल श्लोकः

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।14.3।।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।14.3।। –,मम स्वभूता मदीया माया त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः योनिः सर्वभूतानां कारणम्। सर्वकार्येभ्यो महत्त्वात् भरणाच्च स्वविकाराणां महत् ब्रह्म इति योनिरेव विशिष्यते। तस्मिन् महति ब्रह्मणि योनौ गर्भं हिरण्यगर्भस्य जन्मनः बीजं सर्वभूतजन्मकारणं बीजं दधामि निक्षिपामि क्षेत्रक्षेत्रज्ञप्रकृतिद्वयशक्तिमान् ईश्वरः अहम्? अविद्याकामकर्मोपाधिस्वरूपानुविधायिनं क्षेत्रज्ञं क्षेत्रेण संयोजयामि इत्यर्थः। संभवः उत्पत्तिः सर्वभूतानां हिरण्यगर्भोत्पत्तिद्वारेण ततः तस्मात् गर्भाधानात् भवति हे भारत।।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४३ (पुराण विशेष) : सूर्य्यार्च्चनम्

Gavya43

Sun worship is integral and de-facto part of Sanatani living.

सूर्य्यार्च्चनम्

अग्निपुराणम्/अध्यायः ३०१

घोषासृक्प्राणधात्वर्दी दण्डी मार्त्तण्डभैरवः ।
धर्म्मार्थकाममोक्षाणां कर्त्ता विम्बपुटावृतः ।। ३०१.८ ।।

मार्त्तण्डभैरवः affects the skin, blood, breath and the Prana, and who is the cause of virtue, material prosperity, desires and emancipation covered by the rob.

ध्यानञ्च मारणस्तम्भे पीतमाप्यायने सितम् ।
रिपुघातविधौ कृष्णं मोहयेच्छक्रचापवत् ।। ३०१.१६ ।।

योऽभिषेकजपध्यानपूजाहोमपरः सदा ।
तेजस्वी ह्यजयः श्रीमान् समुद्रादौ जयं लभेत् ।। ३०१.१७ ।।

The Sun-God should be contemplated as yellow-colored in incantations practices for death as well as for stupefying the sense, as white for the sake of satisfaction, as black for achieving the destruction of enemies and as the color of rainbow for stupefaction.

One who is always bent on doing abulation, repetition of the mantras, contemplation, worship and oblation would become resplendent, invincible, prosperous and gain victory in the ocean.

मार्त्तण्डभैरवः – In Sanskrit texts, Khandoba is known as Martanda Bhairava or Surya, a combination of the solar deity Martanda and Shiva’s fierce form Bhairava.

Khandoba, (Marathi: खंडोबा Kannada: ಖಂಡೋಬಾ, Khaṇḍobā) also known as Martanda Bhairava and Malhari, is a Hindu god, worshipped as a form of Shiva, mainly in the Deccan plateau of India, especially in the states of Maharashtra and Karnataka. He is the most popular family deity in Maharashtra. He is also the patron deity of warrior, farming, herding as well as some Brahmin (priest) castes, the hunters and gatherers of the hills and forests. The cult of Khandoba has linkages with Vaishnava and Jain traditions, and also assimilates all communities irrespective of caste, including Muslims. Khandoba is sometimes identified with Mallanna of Andhra Pradesh and Mailara of Karnataka.
The worship of Khandoba developed during the 9th and 10th centuries
from a folk deity into a composite god possessing the attributes of Shiva, Bhairava, Surya and Karttikeya (Skanda). He is depicted either in the form of a Lingam, or as an image riding on a bull or a horse. The foremost centre of Khandoba worship is Jejuri in Maharashtra. The legends of Khandoba, found in the text Malhari Mahatmya and also narrated in folk songs, revolve around his victory over demons Mani-malla and his marriages.

https://en.wikipedia.org/wiki/Khandoba#Iconography

 


शब्द सिन्धु


स्थूलमात्रा (sthuulamaatraa) = macro
स्थूलशरीर (sthuulashariira) = (bahuvriihi) big-bodied
स्थूलस्फटिकी (sthuulasphaTikii) = macrocrystaline
स्थैर्यं (sthairyaM) = steadfastness
स्नातकोत्तर (snaatakottara) = post graduate
स्नाति (snaati) = to bathe
स्नान (snaana) = bath, ablution
स्नानशील (snaanashiila) = (metaphorically) pure
स्नानगृहम् (snaanagRiham.h) = (n) bathroom
स्नायु (snaayu) = sinew
स्नायुवितननं (snaayuvitananaM) = sprain
स्निग्ध (snigdha) = affectionate; also oily,greasy
स्निग्धाः (snigdhaaH) = fatty
स्नुषा (snushhaa) = (f) daughter-in-law
स्नेह (sneha) = love
स्नेहः (snehaH) = friendship (oil)
स्नेहात् (snehaat.h) = (Masc.absol.sing.) from affection
स्नेहेन (snehena) = (Masc.instr.sing.) through affection
स्पन्दते (spandate) = (1 ap) to throb
स्पर्शनं (sparshanaM) = touch
स्पर्शान् (sparshaan.h) = sense objects, such as sound
स्पष्ट (spashhTa) = Longitude of planet or house (bhaava)
स्पृश् (spRish) = to touch
स्पृशति (spRishati) = (6 pp) to touch
स्पृशन् (spRishan.h) = touching
स्पृष्टं (spRishhTaM) = (past participle) touched
स्पृहा (spRihaa) = aspiration
स्प्रिहणियरूपं (sprihaNiyaruupaM) = desirable form (personal appearance)
स्फीत (sphiita) = (adj) prosperous
स्फुटित (sphuTita) = overt
स्फुरति (sphurati) = (6 pp) to throb
स्फुरित (sphurita) = shining
स्फोतकः (sphotakaH) = (m) bomb, explosive
स्म (sma) = an indeclinable that changes the sentence to past tense from present tense
स्मयते (smayate) = (1 ap) to smile
स्मरति (smarati) = (1 pp) to remember, recollect
स्मरन् (smaran.h) = thinking of
स्मरामि (smaraami) = remember
स्मरेत् (smaret.h) = remembers, recalls
स्माशन (smaashana) = graveyard
स्मृत (smRita) = remembered
स्मृतं (smRitaM) = is considered
स्मृतः (smRitaH) = is considered
स्मृता (smRitaa) = when remembered
स्मृति (smRiti) = of memory
स्मृतिः (smRitiH) = memory
स्मृतिभ्रंशात् (smRitibhra.nshaat.h) = after bewilderment of memory
स्मृती (smRitii) = memory
स्यन्दने (syandane) = chariot
स्यन्दिन् (syandin.h) = oozing
स्यां (syaaM) = would be
स्यात् (syaat.h) = may be
स्याम (syaama) = will we become
स्युः (syuH) = form from “as.h” meaning “those who may be”
स्युतम् (syutam.h) = (n) a bag
स्रोतसां (srotasaaM) = of flowing rivers
स्व (sva) = Self
स्वं (svaM) = own
स्वः (svaH) = the nether world(?)
स्वकं (svakaM) = His own
स्वकर्म (svakarma) = in his own duty
स्वकर्मणा (svakarmaNaa) = by his own duties
स्वकीय (svakiiya) = (asj) private
स्वचक्षुषा (svachakShushhaa) = your own eyes
स्वच्छ (svachchha) = pure
स्वच्छंदी (svachchha.ndii) = adj. self-absorbed
स्वजनं (svajanaM) = kinsmen
स्वतंत्र (svata.ntra) = Free
स्वतेजसा (svatejasaa) = by Your radiance
स्वदेश (svadesha) = one’s own country
स्वधर्मं (svadharmaM) = your religious duty
स्वधर्मः (svadharmaH) = one’s prescribed duties
स्वधर्मे (svadharme) = in one’s prescribed duties
स्वधा (svadhaa) = oblation
स्वन (svana) = sound
स्वनुष्ठितात् (svanushhThitaat.h) = perfectly done
स्वपति (svapati) = (2pp) to sleep
स्वपन् (svapan.h) = dreaming
स्वप्न (svapna) = dream
स्वप्नं (svapnaM) = dreaming
स्वप्नः (svapnaH) = dreaming
स्वप्नशीलस्य (svapnashiilasya) = of one who sleeps
स्वप्नावबोधस्य (svapnaavabodhasya) = sleep and wakefulness
स्वप्नावस्था (svapnaavasthaa) = the state of the mind in a dream
स्वप्ने (svapne) = in dream
स्वभाव (svabhaava) = nature, personal mental attributes
स्वभावः (svabhaavaH) = characteristics
स्वभावजं (svabhaavajaM) = born of his own nature
स्वभावजा (svabhaavajaa) = according to his mode of material nature
स्वभावजेन (svabhaavajena) = born of your own nature
स्वभावनियतं (svabhaavaniyataM) = prescribed according to one’s nature
स्वमतिपरिणामावधि (svamatipariNaamaavadhi) = according to one’s intellectual capacity
स्वयं (svayaM) = herself


पाठ


1 2 3


सुभाषित


कुलस्यार्थे त्यजेदेकं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||

One should sacrifice one’s self-interest for the sake of one’s family, one’s family for the sake of one’s town members, one’s town members for for the sake of one’s nation, and sacrifice the whole earth for the sake of one’s soul’s enlightenment.


पठन -> स्मरण -> मनन >आत्मसात


सूर्य्यार्च्चनम्

अग्निपुराणम्/अध्यायः ३०१

धन्वन्तरिरुवाच
शय्या तु दण्डिसाजेशपावकश्चतुराननः ।
सर्व्वार्थसाधकमिदं वीजं पिण्डार्थमुच्यते ।। ३०१.१ ।।

स्वयं दीर्घस्वराकग्यञ्च वीजेष्वङ्गानि सर्वशः ।
खातं साधु विषञ्चैव सनिन्दुं सकलं तथा ।। ३०१.२ ।।

गणस्य पञ्च वीजानि पृथग्दृष्टफलं महत् ।
गणं जयाय नमः एकदंष्ट्राय अचलकर्णिने गजवक्ताय महोदरहस्ताय ।।
पञ्चाङ्गं सर्व्वसामान्यं सिद्धिः स्याल्लक्षजाप्यतः ।। ३०१.३ ।।

गणाधिपतये गणेश्वराय गणनायकाय गणक्रीडाय ।
दिग्दले पूजयेन्नमूर्त्तीः पुरावच्चाङ्गपञ्चकम् ।। ३०१.४ ।।

वक्रतुण्डाय एकदंष्ट्राय महोदराय गजवक्त्राय ।
विकटाय विघ्नराजाय धूम्रवर्णाय ।
दिग्विदिक्षु यजेदेतांल्लोकांशांश्चैव मुद्रया ।। ३०१.४ ।।

मध्यामातर्ज्जनीमध्यागताङ्गुष्ठौ समुष्टिकौ ।
चुर्भुजो मोदकाढ्यो दण्डपाशाङ्कुशान्वितः ।। ३०१.५ ।।

दन्तभक्षधरं रक्तं साब्जं पाशाङ्कुशैर्वृतम् ।
पूजयेत्तं चतुर्थ्याञ्च विशेषेनाथ नित्यशः ।। ३०१.६ ।।

श्वेतार्कमूलेन कृतं सर्व्वाप्तिः स्यात्तिलैर्घृतैः ।
तण्डुलैर्दधिमध्वाज्यैः सौभाग्यं वश्यता भवेत् ।। ३०१.७ ।।

घोषासृक्प्राणधात्वर्दी दण्डी मार्त्तण्डभैरवः ।
धर्म्मार्थकाममोक्षाणां कर्त्ता विम्बपुटावृतः ।। ३०१.८ ।।

ह्रस्वाः स्युर्मूर्त्तयः पञ्च दीर्घा अङ्गानि तस्य च ।
सिन्दूरारुणमीशाने वामार्द्धदयितं रविं ।। ३०१.९ ।।

आग्नेयादिषु कोणेषु कुजमन्दाहिकेतवः ।
स्नात्वा विधिवदादित्यमाराध्यार्घ्यपुरःसरं ।। ३०१.१० ।।

कृतान्तमैशे निर्म्माल्यं तेजश्चण्डाय दीपितं ।
रोचना कुङ्कुमं वारि रक्तागन्धाक्षताङ्कुराः ।। ३०१.११ ।।

वेणुवीजयवाः शालिश्यामाकतिलराजिकाः ।
जवापुष्पान्वितां दत्वा पात्रैः शिरसि धार्य्य तत् ।। ३०१.१२ ।।

जानुभ्यामवनीङ्गत्वा सूर्य्यायार्घ्यं निवेदयेत् ।
स्वविद्यामन्त्रितैः कुम्भैर्नवभिः प्रार्च्य वै महान् ।। ३०१.१३ ।।

ग्र्हादिशान्तये स्नानं जप्त्वार्क्क सर्वमाप्नुयात् ।
संग्रामविजयं साग्निं वीजदोषं सविन्दुकं ।। ३०१.१४ ।।

न्यस्य मूर्द्धादिपादान्तं मूलं पूज्य तु मुद्रया ।
स्वाङ्गानि च यथान्यासमात्मानं भावयेद्रविं ।। ३०१.१५ ।।

ध्यानञ्च मारणस्तम्भे पीतमाप्यायने सितम् ।
रिपुघातविधौ कृष्णं मोहयेच्छक्रचापवत् ।। ३०१.१६ ।।

योऽभिषेकजपध्यानपूजाहोमपरः सदा ।
तेजस्वी ह्यजयः श्रीमान् समुद्रादौ जयं लभेत् ।। ३०१.१७ ।।

ताम्बूलादाविदं न्यस्य जप्त्वा दद्यादुशीरकं ।
न्यस्तवीजेन हस्तेन स्पर्शनं तद्वशे स्मृतम्।। ३०१.१८ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये सूर्यार्च्चनं नामैकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।।

Popular Posts

My Favorites

Pranayama and Path of Self-realization

स य एवं विदुष उपद्रष्टा भवति प्राणं रुणद्धि ॥५४॥ न च प्राणं रुणद्धि सर्वज्यानिं जीयते ॥५५॥ न च सर्वज्यानिं जीयते पुरैनं जरसः प्राणो जहाति...