SanskritLearning

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संस्कृत गोवीथि : : गव्य १२ (हनुमान विशेष)

प्राणका प्रेरक कौन?

केन उपनिषद् में प्राण प्रेरककी बात है| सम्पूर्ण जगत प्राण आधीन है, पर प्राण किसके आधीन है?

राजाकी प्रेरणासे दीवान काम कर शकता है, उसी प्रकार, प्राणका प्राण कौन?

स उ प्राणस्य प्राण|

आत्मा|

राम – हनुमान
आत्मा – प्राण

Gavya12


शब्दसिन्धु


अटति (aTati) = (1 pp) to roam
अणीयांसं (aNiiyaa.nsaM) = smaller
अणु (aNu) = atom
अणोः (aNoH) = than the atom
अण्वस्त्रं (aNvastraM) = (n) nuclear weapon
अतः (ataH) = hence
अतत्त्वार्थवत् (atattvaarthavat.h) = without knowledge of reality
अतन्द्रितः (atandritaH) = with great care
अतपस्काय (atapaskaaya) = to one who is not austere
अति (ati) = extremely
अतिपरिचय (atiparichaya) = excessive familiarity
अतिवीर्यं (ativiiryaM) = super power
अतिचार (atichaara) = Accelerated planetary motion
अतितरन्ति (atitaranti) = transcend
अतितरलं (atitaralaM) = ati+tarala, very+unstable
अतिथि (atithi) = (m) guest
अतिथिः (atithiH) = (masc.Nom.sing.)guest (literally undated)
अतिदारूणमन् (atidaaruuNaman.h) = adj. very dreadful
अतिदुर्वृत्त (atidurvRitta) = of exceedingly bad conduct


पाठ


१ २ ३

भोजनप्रकरणम्

नित्यः स्वाध्यायो जातो भोजनसमय आगतो गन्तव्यम् । नित्य का पढ़ना हो गया, भोजन समय आया, चलना चाहिये ।
तव पाकशालायां प्रत्यहं भोजनाय किं किं पच्यते ? तुम्हारी पाकशाला में प्रतिदिन भोजन के लिये क्या-क्या पकाया जाता है ?
शाकसूपौदश्वित्कौदनरोटिकादयः । शाक, दाल, कढ़ी, भात, रोटी आदि ।
किं वः पायसादिमधुरेषु रुचिर्नास्ति ? क्या आप लोगों की खीर आदि मीठे भोजन में रुचि नहीं है ?
अस्ति खलु परन्त्वेतानि कदाचित् कदाचित् भवन्ति । है सही परन्तु ये भोजन कभी-कभी होते हैं ।
कदाचिच्छष्कुली-श्रीखण्डादयोऽपि भवन्ति न वा ? कभी पूरी कचौड़ी शिखरन आदि भी होते हैं वा नहीं ?
भवन्ति परन्तु यथर्त्तुयोगम् । होते हैं परन्तु जैसा ऋतु का योग होता है वैसा ही भोजन बनाते हैं ।
सत्यमस्माकमपि भोजनादिकमेवमेव निष्पद्यते । ठीक है हमारे भी भोजन आदि ऐसे ही बनते हैं ।
त्वं भोजनं करिष्यसि न वा ? तू भोजन करेगा वा नहीं ?
अद्य न करोम्यजीर्णतास्ति । आज नहीं करता अजीर्णता है ।
अधिकभोजनस्येदमेव फलम् । अधिक भोजन का यही फल है ।
बुद्धिमत्ता तु यावज्जीर्यते तावदेव भुज्यते । बुद्धिमान पुरुष तो जितना पचता है उतना ही खाता है ।
अतिस्वल्पे भुक्ते शरीरबलम् ह्रस्त्यधिके चातः सर्वदा मिताहारी भवेत् । बहुत कम और अत्यधिक भोजन करने से शरीर का बल घटता है, इससे सब दिन मिताहारी होवे ।
योऽन्यथाऽऽहारव्यवहारौ करोति स कथं न दुःखी जायेत ? जो उलट-पलट आहार और व्यवहार करता है वह क्यों न दुःखी होवे ?
येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स शरीरसुखं नाप्नोति । जो शरीर से परिश्रम नहीं करता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता ।
येनात्मना पुरुषार्थो न विधीयते तस्यात्मनो बलमपि न जायते । जो आत्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसको आत्मा का बल भी नहीं बढ़ता ।
तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैर्यथाशक्ति सत्क्रिया नित्यं साधनीयाः । इससे सब मनुष्यों को उचित है यथाशक्ति उत्तम कर्मों की साधना नित्य करनी चाहिये ।
भो देवदत्त ! त्वामहं निमन्त्रये । हे देवदत्त ! मैं तुमको भोजन के लिए निमन्त्रित करता हूं ।
मन्येऽहं कदा खल्वागच्छेयम् ? मैं मानता हूँ परन्तु किस समय आऊँ ?
श्वो द्वितीयप्रहरमध्ये आगन्तासि । कल डेढ पहर दिन चढ़े आना ।
आगच्छ भो, आसनमध्यास्व, भवता ममोपरि महती कृपा कृता । आप आइये, आसन पर बैठिये, आपने मुझ पर बड़ी कृपा की ।

 

अकारादिः सूक्तयः

  • अग्ने: खरतरादेव लोहं दृढतरं भवेत्।
  • अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः ।
  • अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।
  • अजो नित्यं शाश्वतोऽयं पुराणः ।
  • अज्ञः सुखमाराध्यः ।
  • अति सर्वत्र वर्जयेत् ।

सुभाषित


गोष्पदी-कृत-वारीशं मशकी-कृत-राक्षसम् ।
रामायण-महामाला-रत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥

I make obeisance to the son of Vayu (the Wind God),
who tamed the vast ocean into a hoof-print (in
the mud), turned the demons into mosquitoes, and is
the gem in the great garland that the Ramayana is.


पठन/मनन/स्मरण


॥ श्रीहनूमत्स्तुती ॥

हनुमानञ्जनासूनुर्वायुपुत्रो महाबलः ।
रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः ॥ १॥
Hanuman, Anjana’s son, the son of wind-god,
one endowed with great strength,
the favourite of Sri Rama, Arjuna’s friend,
one having reddish brown eyes and unlimited valour

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ २॥
The one who leapt across the ocean,
who dispelled the deep anguish of Sita,
the saviour of Laxmana and who destroyed the pride of Ravana

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत् ॥ ३॥
If one recites these twelve names of the noble Hanuman –
the best among the monkeys before retiring to bed,
on rising up in the morning or during journeys

तस्य सर्व भयं नास्ति रणे च विजयी भवेत् ।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन ॥ ४॥
He will not face fear from any quarter. He will be successful in
battles. He need not have fear
either while entering the royal door, or a deep cavern.
(From Ananda Ramayana, Manohara Kanda.13-8-11).
॥ ॐ तत्सत् ॥
Encoded, proofread, and comments by
N. Balasubramanian bbalu at satyam.net.in

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४३ (पुराण विशेष) : सूर्य्यार्च्चनम्

Gavya43

Sun worship is integral and de-facto part of Sanatani living.

सूर्य्यार्च्चनम्

अग्निपुराणम्/अध्यायः ३०१

घोषासृक्प्राणधात्वर्दी दण्डी मार्त्तण्डभैरवः ।
धर्म्मार्थकाममोक्षाणां कर्त्ता विम्बपुटावृतः ।। ३०१.८ ।।

मार्त्तण्डभैरवः affects the skin, blood, breath and the Prana, and who is the cause of virtue, material prosperity, desires and emancipation covered by the rob.

ध्यानञ्च मारणस्तम्भे पीतमाप्यायने सितम् ।
रिपुघातविधौ कृष्णं मोहयेच्छक्रचापवत् ।। ३०१.१६ ।।

योऽभिषेकजपध्यानपूजाहोमपरः सदा ।
तेजस्वी ह्यजयः श्रीमान् समुद्रादौ जयं लभेत् ।। ३०१.१७ ।।

The Sun-God should be contemplated as yellow-colored in incantations practices for death as well as for stupefying the sense, as white for the sake of satisfaction, as black for achieving the destruction of enemies and as the color of rainbow for stupefaction.

One who is always bent on doing abulation, repetition of the mantras, contemplation, worship and oblation would become resplendent, invincible, prosperous and gain victory in the ocean.

मार्त्तण्डभैरवः – In Sanskrit texts, Khandoba is known as Martanda Bhairava or Surya, a combination of the solar deity Martanda and Shiva’s fierce form Bhairava.

Khandoba, (Marathi: खंडोबा Kannada: ಖಂಡೋಬಾ, Khaṇḍobā) also known as Martanda Bhairava and Malhari, is a Hindu god, worshipped as a form of Shiva, mainly in the Deccan plateau of India, especially in the states of Maharashtra and Karnataka. He is the most popular family deity in Maharashtra. He is also the patron deity of warrior, farming, herding as well as some Brahmin (priest) castes, the hunters and gatherers of the hills and forests. The cult of Khandoba has linkages with Vaishnava and Jain traditions, and also assimilates all communities irrespective of caste, including Muslims. Khandoba is sometimes identified with Mallanna of Andhra Pradesh and Mailara of Karnataka.
The worship of Khandoba developed during the 9th and 10th centuries
from a folk deity into a composite god possessing the attributes of Shiva, Bhairava, Surya and Karttikeya (Skanda). He is depicted either in the form of a Lingam, or as an image riding on a bull or a horse. The foremost centre of Khandoba worship is Jejuri in Maharashtra. The legends of Khandoba, found in the text Malhari Mahatmya and also narrated in folk songs, revolve around his victory over demons Mani-malla and his marriages.

https://en.wikipedia.org/wiki/Khandoba#Iconography

 


शब्द सिन्धु


स्थूलमात्रा (sthuulamaatraa) = macro
स्थूलशरीर (sthuulashariira) = (bahuvriihi) big-bodied
स्थूलस्फटिकी (sthuulasphaTikii) = macrocrystaline
स्थैर्यं (sthairyaM) = steadfastness
स्नातकोत्तर (snaatakottara) = post graduate
स्नाति (snaati) = to bathe
स्नान (snaana) = bath, ablution
स्नानशील (snaanashiila) = (metaphorically) pure
स्नानगृहम् (snaanagRiham.h) = (n) bathroom
स्नायु (snaayu) = sinew
स्नायुवितननं (snaayuvitananaM) = sprain
स्निग्ध (snigdha) = affectionate; also oily,greasy
स्निग्धाः (snigdhaaH) = fatty
स्नुषा (snushhaa) = (f) daughter-in-law
स्नेह (sneha) = love
स्नेहः (snehaH) = friendship (oil)
स्नेहात् (snehaat.h) = (Masc.absol.sing.) from affection
स्नेहेन (snehena) = (Masc.instr.sing.) through affection
स्पन्दते (spandate) = (1 ap) to throb
स्पर्शनं (sparshanaM) = touch
स्पर्शान् (sparshaan.h) = sense objects, such as sound
स्पष्ट (spashhTa) = Longitude of planet or house (bhaava)
स्पृश् (spRish) = to touch
स्पृशति (spRishati) = (6 pp) to touch
स्पृशन् (spRishan.h) = touching
स्पृष्टं (spRishhTaM) = (past participle) touched
स्पृहा (spRihaa) = aspiration
स्प्रिहणियरूपं (sprihaNiyaruupaM) = desirable form (personal appearance)
स्फीत (sphiita) = (adj) prosperous
स्फुटित (sphuTita) = overt
स्फुरति (sphurati) = (6 pp) to throb
स्फुरित (sphurita) = shining
स्फोतकः (sphotakaH) = (m) bomb, explosive
स्म (sma) = an indeclinable that changes the sentence to past tense from present tense
स्मयते (smayate) = (1 ap) to smile
स्मरति (smarati) = (1 pp) to remember, recollect
स्मरन् (smaran.h) = thinking of
स्मरामि (smaraami) = remember
स्मरेत् (smaret.h) = remembers, recalls
स्माशन (smaashana) = graveyard
स्मृत (smRita) = remembered
स्मृतं (smRitaM) = is considered
स्मृतः (smRitaH) = is considered
स्मृता (smRitaa) = when remembered
स्मृति (smRiti) = of memory
स्मृतिः (smRitiH) = memory
स्मृतिभ्रंशात् (smRitibhra.nshaat.h) = after bewilderment of memory
स्मृती (smRitii) = memory
स्यन्दने (syandane) = chariot
स्यन्दिन् (syandin.h) = oozing
स्यां (syaaM) = would be
स्यात् (syaat.h) = may be
स्याम (syaama) = will we become
स्युः (syuH) = form from “as.h” meaning “those who may be”
स्युतम् (syutam.h) = (n) a bag
स्रोतसां (srotasaaM) = of flowing rivers
स्व (sva) = Self
स्वं (svaM) = own
स्वः (svaH) = the nether world(?)
स्वकं (svakaM) = His own
स्वकर्म (svakarma) = in his own duty
स्वकर्मणा (svakarmaNaa) = by his own duties
स्वकीय (svakiiya) = (asj) private
स्वचक्षुषा (svachakShushhaa) = your own eyes
स्वच्छ (svachchha) = pure
स्वच्छंदी (svachchha.ndii) = adj. self-absorbed
स्वजनं (svajanaM) = kinsmen
स्वतंत्र (svata.ntra) = Free
स्वतेजसा (svatejasaa) = by Your radiance
स्वदेश (svadesha) = one’s own country
स्वधर्मं (svadharmaM) = your religious duty
स्वधर्मः (svadharmaH) = one’s prescribed duties
स्वधर्मे (svadharme) = in one’s prescribed duties
स्वधा (svadhaa) = oblation
स्वन (svana) = sound
स्वनुष्ठितात् (svanushhThitaat.h) = perfectly done
स्वपति (svapati) = (2pp) to sleep
स्वपन् (svapan.h) = dreaming
स्वप्न (svapna) = dream
स्वप्नं (svapnaM) = dreaming
स्वप्नः (svapnaH) = dreaming
स्वप्नशीलस्य (svapnashiilasya) = of one who sleeps
स्वप्नावबोधस्य (svapnaavabodhasya) = sleep and wakefulness
स्वप्नावस्था (svapnaavasthaa) = the state of the mind in a dream
स्वप्ने (svapne) = in dream
स्वभाव (svabhaava) = nature, personal mental attributes
स्वभावः (svabhaavaH) = characteristics
स्वभावजं (svabhaavajaM) = born of his own nature
स्वभावजा (svabhaavajaa) = according to his mode of material nature
स्वभावजेन (svabhaavajena) = born of your own nature
स्वभावनियतं (svabhaavaniyataM) = prescribed according to one’s nature
स्वमतिपरिणामावधि (svamatipariNaamaavadhi) = according to one’s intellectual capacity
स्वयं (svayaM) = herself


पाठ


1 2 3


सुभाषित


कुलस्यार्थे त्यजेदेकं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||

One should sacrifice one’s self-interest for the sake of one’s family, one’s family for the sake of one’s town members, one’s town members for for the sake of one’s nation, and sacrifice the whole earth for the sake of one’s soul’s enlightenment.


पठन -> स्मरण -> मनन >आत्मसात


सूर्य्यार्च्चनम्

अग्निपुराणम्/अध्यायः ३०१

धन्वन्तरिरुवाच
शय्या तु दण्डिसाजेशपावकश्चतुराननः ।
सर्व्वार्थसाधकमिदं वीजं पिण्डार्थमुच्यते ।। ३०१.१ ।।

स्वयं दीर्घस्वराकग्यञ्च वीजेष्वङ्गानि सर्वशः ।
खातं साधु विषञ्चैव सनिन्दुं सकलं तथा ।। ३०१.२ ।।

गणस्य पञ्च वीजानि पृथग्दृष्टफलं महत् ।
गणं जयाय नमः एकदंष्ट्राय अचलकर्णिने गजवक्ताय महोदरहस्ताय ।।
पञ्चाङ्गं सर्व्वसामान्यं सिद्धिः स्याल्लक्षजाप्यतः ।। ३०१.३ ।।

गणाधिपतये गणेश्वराय गणनायकाय गणक्रीडाय ।
दिग्दले पूजयेन्नमूर्त्तीः पुरावच्चाङ्गपञ्चकम् ।। ३०१.४ ।।

वक्रतुण्डाय एकदंष्ट्राय महोदराय गजवक्त्राय ।
विकटाय विघ्नराजाय धूम्रवर्णाय ।
दिग्विदिक्षु यजेदेतांल्लोकांशांश्चैव मुद्रया ।। ३०१.४ ।।

मध्यामातर्ज्जनीमध्यागताङ्गुष्ठौ समुष्टिकौ ।
चुर्भुजो मोदकाढ्यो दण्डपाशाङ्कुशान्वितः ।। ३०१.५ ।।

दन्तभक्षधरं रक्तं साब्जं पाशाङ्कुशैर्वृतम् ।
पूजयेत्तं चतुर्थ्याञ्च विशेषेनाथ नित्यशः ।। ३०१.६ ।।

श्वेतार्कमूलेन कृतं सर्व्वाप्तिः स्यात्तिलैर्घृतैः ।
तण्डुलैर्दधिमध्वाज्यैः सौभाग्यं वश्यता भवेत् ।। ३०१.७ ।।

घोषासृक्प्राणधात्वर्दी दण्डी मार्त्तण्डभैरवः ।
धर्म्मार्थकाममोक्षाणां कर्त्ता विम्बपुटावृतः ।। ३०१.८ ।।

ह्रस्वाः स्युर्मूर्त्तयः पञ्च दीर्घा अङ्गानि तस्य च ।
सिन्दूरारुणमीशाने वामार्द्धदयितं रविं ।। ३०१.९ ।।

आग्नेयादिषु कोणेषु कुजमन्दाहिकेतवः ।
स्नात्वा विधिवदादित्यमाराध्यार्घ्यपुरःसरं ।। ३०१.१० ।।

कृतान्तमैशे निर्म्माल्यं तेजश्चण्डाय दीपितं ।
रोचना कुङ्कुमं वारि रक्तागन्धाक्षताङ्कुराः ।। ३०१.११ ।।

वेणुवीजयवाः शालिश्यामाकतिलराजिकाः ।
जवापुष्पान्वितां दत्वा पात्रैः शिरसि धार्य्य तत् ।। ३०१.१२ ।।

जानुभ्यामवनीङ्गत्वा सूर्य्यायार्घ्यं निवेदयेत् ।
स्वविद्यामन्त्रितैः कुम्भैर्नवभिः प्रार्च्य वै महान् ।। ३०१.१३ ।।

ग्र्हादिशान्तये स्नानं जप्त्वार्क्क सर्वमाप्नुयात् ।
संग्रामविजयं साग्निं वीजदोषं सविन्दुकं ।। ३०१.१४ ।।

न्यस्य मूर्द्धादिपादान्तं मूलं पूज्य तु मुद्रया ।
स्वाङ्गानि च यथान्यासमात्मानं भावयेद्रविं ।। ३०१.१५ ।।

ध्यानञ्च मारणस्तम्भे पीतमाप्यायने सितम् ।
रिपुघातविधौ कृष्णं मोहयेच्छक्रचापवत् ।। ३०१.१६ ।।

योऽभिषेकजपध्यानपूजाहोमपरः सदा ।
तेजस्वी ह्यजयः श्रीमान् समुद्रादौ जयं लभेत् ।। ३०१.१७ ।।

ताम्बूलादाविदं न्यस्य जप्त्वा दद्यादुशीरकं ।
न्यस्तवीजेन हस्तेन स्पर्शनं तद्वशे स्मृतम्।। ३०१.१८ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये सूर्यार्च्चनं नामैकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३९ (पुराण विशेष) :: धारणा क्या है?

Gavya39

यस्मिन् यस्मिन् भवेदङ्गे योगिनां व्याधिसम्भवः ।
तत्तदङ्गं धिया व्याप्य दारयेत्तत्त्वधारणं ।।

When a particular part of the body is affected by illness, one should fix up the mind on that particular part as though pervaded by the mind.

धारणा is an ultimate cure.

अग्निपुराणम्/अध्यायः ३७५


शब्द सिन्धु


क्षन्तिः (kShantiH) = tolerance
क्षमता (kShamataa) = ability
क्षमा (kShamaa) = forgivance
क्षमी (kShamii) = forgiving
क्षय (kShaya) = loss, weakening, scaricity
क्षयं (kShayaM) = destruction
क्षयकृत् (kShayakRit.h) = the destroyer
क्षयति (kShayati) = (1 pp) to decay
क्षयात् (kShayaat.h) = (from) consunption/destruction
क्षयाय (kShayaaya) = for destruction
क्षर (kShara) = prone to end, destructible
क्षरं (kSharaM) = to the fallible
क्षरः (kSharaH) = constantly changing
क्षात्रं (kShaatraM) = of a ksatriya
क्षान्तिः (kShaantiH) = tolerance
क्षामये (kShaamaye) = ask forgiveness
क्षार (kShaara) = salty
क्षालयति (kShaalayati) = (10 pp) to wash
क्षितिपाल (kShitipaala) = (m) protector of the earth, king
क्षिप् (kShip) = (root) to throw
क्षिपति (kShipati) = (6 pp) to throw
क्षिपामि (kShipaami) = I put
क्षिप्त (kShipta) = neglected or distracted
क्षिप्रं (kShipraM) = soon
क्षी (kShii) = to dimnish
क्षीणकल्मषाः (kShiiNakalmashhaaH) = who are devoid of all sins
क्षीणे (kShiiNe) = spent-up/weakened state of
क्षीर (kShiira) = milk
क्षुद्र (kShudra) = insignificant, small
क्षुद्रं (kShudraM) = petty
क्षुध् (kShudh) = hunger
क्षुधा (kShudhaa) = hunger
क्षुधार्त (kShudhaarta) = hungry
क्षुध्यति (kShudhyati) = (4 pp) to be hungry
क्षुभ्यति (kShubhyati) = (4 pp) to tremble
क्षुर (kShura) = (masc) knife
क्षुरक्रिया (kShurakriyaa) = (fem) shaving, cutting with a knife
क्षुरपत्रम् (kShurapatram.h) = (n) blade
क्षूद्र (kShuudra) = weak (here)
क्षेत्र (kShetra) = field
क्षेत्रं (kShetraM) = the field
क्षेत्रज्ञ (kShetraGYa) = and the knower of the body
क्षेत्रज्ञं (kShetraGYaM) = the knower of the field
क्षेत्रज्ञः (kShetraGYaH) = the knower of the field
क्षेत्रज्ञयोः (kShetraGYayoH) = and the knower of the field
क्षेत्री (kShetrii) = the soul
क्षेत्रेषु (kShetreshhu) = in bodily fields
क्षेपणास्त्रः (kShepaNaastraH) = (m) missile
क्षेपणी (kShepaNii) = (f) rocket
क्षेमं (kShemaM) = protection
क्षेमतरं (kShemataraM) = better
क्षोउति (kShouti) = to sneeze
क्षोभं (kShobhaM) = disturbance
ज्ञ (GYa) = one who knows (suffix)
ज्ञनकारक (GYanakaaraka) = Significator of knowledge which is Jupiter
ज्ञा (GYaa) = to know
ज्ञातचर (GYaatachara) = (adj) known
ज्ञातव्यं (GYaatavyaM) = knowable
ज्ञाति (GYaati) = community (people of the same caste etc.)
ज्ञातुं (GYaatuM) = to know
ज्ञाते (GYaate) = in the realised state
ज्ञातेन (GYaatena) = by knowing
ज्ञात्वा (GYaatvaa) = knowing well
ज्ञान (GYaana) = knowledge
ज्ञानं (GYaanaM) = knowledge
ज्ञानः (GYaanaH) = whose knowledge


पाठ


1 2


सुभाषित


अपि स्वर्णमयी लंका न मे रोचति लक्ष्मण |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ||

Lakshman, This Golden Lanka does not allure me. Mother and Motherland is dearer to me even than heaven.


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


अग्निपुराणम्/अध्यायः ३७५

धारणा

अग्निरुवाच
वारणा मनसो ध्येये संस्थितिर्ध्यानवद् द्विधा ।
मूर्त्तामूर्तहरिध्यानमनोधारणतो हरिः ।। ३७५.१ ।।

यद्वाह्यावस्थितं लक्षअयं तस्मान्न चलते मनः ।
तावत् कालं प्रदेशेषु धारणा मनसि स्थितिः ।। ३७५.२ ।।

कालावधि परिच्छिन्नं देहे संस्थापितं मनः ।
न प्रच्यवति यल्लक्ष्याद्धारणा साऽभिधीयते ।। ३७५.३ ।।

धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादशधारणाः ।
ध्यानं द्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ।। ३७५.४ ।।

धारणाभ्यासयुक्तात्मा यदि प्राणैर्विमुच्यते ।
कुलैकविंशमुत्तार्य्य स्वर्य्याति परमं पदं ।। ३७५.५ ।।

यस्मिन् यस्मिन् भवेदङ्गे योगिनां व्याधिसम्भवः ।
तत्तदङ्गं धिया व्याप्य दारयेत्तत्त्वधारणं ।। ३७५.६ ।।

आग्नेयी वारुणी चैव ऐशानी चामृतात्मिका ।
साग्निः शिखा फडन्ता च विष्णोः कार्य्या द्विजोत्तम ।। ३७५.७ ।।

नाड़ीभिर्विकटं दिव्यं शूलाग्रं वेधयेच्छुभम् ।
पादाङ्गुष्ठात् कपालान्तं रश्मिमण्डलमावृतं ।। ३७५.८ ।।

तिर्य्यक्‌चाधोद्‌र्ध्वभागेभ्यः प्रयान्त्योऽतीव तेजसा ।
चिन्तयेत् साध्केन्द्रस्तं यावत्सर्वं महामुने ।। ३७५.९ ।।

भस्मीभूतं शरीरं स्वन्ततश्चैवोपसंहरेत् ।
शीतश्लेष्मादयः पापं विनश्यन्ति द्विजातयः ।। ३७५.१० ।।

शिरो धीरञ्च कारञ्च कण्ठं चाधोमुखे स्मरेत् ।
ध्यायेदच्छिन्नचित्तात्मा भूयो भूतेन चात्मना ।। ३७५.११ ।।

स्फुरच्छीकरसंस्पर्शप्रभूते हिमगामिभिः ।
धाराभिरखिलं विश्वमापूर्य्य भुवि चिन्तयेत् ।। ३७५.१२ ।।

ब्रह्मरन्ध्राच्च संक्षोभाद्यावदाधारमण्डलम् ।
सुषुम्नान्तर्गतो बूत्वा संपूर्णेन्दुकृतालयं ।। ३७५.१३ ।।

संप्लाव्य हिमसंस्पर्श तोयेनामृतमूर्त्तिना ।
क्षुत् पिपासाक्रमप्रायसन्तापपरिपीड़ितः ।। ३७५.१४ ।।

धारयेद्वारुणीं मन्त्री तुष्ट्यर्थं चाप्यतन्त्रितः ।
वारुणी धारणा प्रोक्ता ऐशानीधारणां श्रृषु ।। ३७५.१५ ।।

व्योग्नि ब्रह्ममये पद्मे प्राणापणे क्षयङ्गते ।
प्रसादं चिन्तयेद् विष्णोर्यावच्चिन्ता क्षयं गता ।। ३७५.१६ ।।

महाभावञ्चपेत् सर्व्वं ततो व्यापक ईश्वरः ।
अर्द्धेन्दुं परमं शान्तं निराभासन्निरञ्जनं ।। ३७५.१७ ।।

असत्यं सत्यमाभाति तावत्सर्वं चराचरं ।
यावत् स्वस्यन्दरूपन्तु न दृष्टं गुरुवक्त्रतः ।। ३७५.१८ ।।

दृष्टे तस्मिन् परे तत्त्वे आब्रह्म सचराचरं ।
प्रमातृमानमेयञ्च ध्यानहृत्पद्मकल्पनं ।। ३७५.१९ ।।

मातृमोदकवत्सर्वं जपहोमार्चनादिकं ।
विष्णुमन्त्रेण वा कुर्य्यादमृतां धारणां वदे ।। ३७५.२० ।।

संपूर्णेन्दुनिभं ध्यायेत् कमलं तन्त्रिमुष्टिगं ।
शिरःस्थं चिन्तयेत् यत्नाच्छशाङ्गायुतवर्चसं ।। ३७५.२१ ।।

सम्पूर्णमण्डलं व्योम्नि शिवकल्लोलपूर्णितं ।
तथा हृत्‌कमले ध्यायेत्तन्मध्ये स्वतनुं स्मरेत् ।।

साधको विगतक्लेशो जायते दारणादिभिः ।। ३७५.२२ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये धारणा नाम पञ्चसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४७ : कृष्ण जन्म विशेष : रामानुजाचार्य रचित श्रीरङ्गगद्यम्

Gavya45

रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक थे। वह ऐसे वैष्णव सन्त थे जिनका भक्ति परम्परा पर बहुत गहरा प्रभाव रहा।

वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर और सूरदास थे। रामानुज ने वेदान्त दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट अद्वैत वेदान्त लिखा था।

रामानुजाचार्य ने वेदान्त के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी आलवार सन्तों के भक्ति-दर्शन तथा दक्षिण के पंचरात्र परम्परा को अपने विचारों का आधार बनाया।

Sriranga Gadyam is a Sanskrit prayer written by the Srivaishnavism philosopher Swami Ramanuja towards the end of the 11th century. It is one of the first bhakti prayers in this school of thought and is the basis for many prayers, like Raghuveera gadyam of this style. It is recited in the 108 divya desam temples including Srirangam.

॥ श्रीरङ्गगद्यम् ॥

चिदचित्परतत्त्वानां तत्त्वयाथार्थ्यवेदिने ।
रामानुजाय मुनये नमो मम गरीयसे ॥

स्वाधीन त्रिविध चेतनाचेतन स्वरूपस्थितिप्रवृत्तिभेदं,
क्लेशकर्माद्यशेषदोषासंस्पृष्टं, स्वाभाविकानवधिकातिशय
ज्ञानबलैश्वर्य वीर्य शक्तितेजस्सौशील्य वात्सल्य मार्दवार्जव सौहार्द
साम्य कारुण्य माधुर्य गाम्भीर्य औदार्य चातुर्य स्थैर्य धैर्य शौर्य
पराक्रम सत्यकाम सत्यसङ्कल्प कृतित्व कृतज्ञताद्यसङ्ख्येय कल्याण
गुणगणौघमहार्णवं, परब्रह्मभूतं, पुरुषोत्तमं, श्रीरङ्गशायिनं,
अस्मत्स्वामिनं, प्रबुद्धनित्यनियाम्य नित्यदास्यैकरसात्मस्वभावोऽहं,
तदेकानुभवः तदेकप्रियः, परिपूर्णं भगवन्तं, विशदतमानुभवेन
निरन्तरमनुभूय, तदनुभवजनितानवधिकातिशय
प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकिङ्करो भवानि ॥

स्वात्म नित्यनियाम्य नित्यदास्यैकरसात्म स्वभावानुसन्धानपूर्वक
भगवदनवधिकातिशय स्वाम्याद्यखिलगुणगणानुभवजनित अनवधिकातिशय
प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकैङ्कर्य
प्राप्त्युपायभूतभक्ति तदुपाय सम्यग्ज्ञान तदुपाय समीचीनक्रिया
तदनुगुण सात्विकतास्तिक्यादि समस्तात्मगुणविहीनः, दुरुत्तरानन्त तद्विपर्यय
ज्ञानक्रियानुगुणानादि पापवासना महार्णवान्तर्निमग्नः, तिलतैलवत्
दारुवह्निवत् दुर्विवेच त्रिगुण क्षणक्षरणस्वभाव
अचेतनप्रकृतिव्याप्तिरूप दुरत्यय भगवन्मायातिरोहित स्वप्रकाशः, 
अनाद्यविद्यासञ्चितानन्ताशक्य विस्रंसन कर्मपाशप्रग्रथितः,
अनागतानन्तकाल समीक्षयाऽपि अदृष्टसन्तारोपायः, निखिलजन्तुजात
शरण्य, श्रीमन्नारायण, तव चरणारविन्दयुगलं शरणमहं प्रपद्ये ॥

एवमवस्थितस्यापि अर्थित्वमात्रेण परमकारुणिको भगवान्, स्वानुभवप्रीत्य
उपनीतैकान्तिकात्यन्तिक नित्यकैङ्कर्यैकरतिरूप नित्यदास्यं दास्यतीति
विश्वासपूर्वकं भगवन्तं नित्यकिङ्करतां प्रार्थये ॥

तवानुभूतिसम्भूत प्रीतिकारितदासताम् ।
देहि मे कृपया नाथ न जाने गतिमन्यथा ॥

सर्वावस्थोचिताशेषशेषतैकरतिस्तव ।
भवेयं पुण्डरीकाक्ष त्वमेवैवं कुरुष्व माम् ॥

एवम्भृततत्त्वयाथात्म्यावबोधितदिच्छारहितस्यापि,
एतदुच्चारणमात्रावलम्बनेन, उच्यमानार्थ परमार्थनिष्ठं मे मनः
त्वमेवाद्यैव कारय ॥

अपारकरुणाम्बुधे, अनालोचितविशेषाशेषलोकशरण्य, प्रणतार्तिहर,
आश्रितवात्सल्यैक महोदधे, अनवरतविदित निखिलभूतजात याथात्म्य,
अशेषचराचरभूत, निखिलनियमनिरत, अशेषचिदचिद्वस्तुशेषीभूत, 
निखिलजगदाधार, अखिलजगत्स्वामिन्, अस्मत्स्वामिन्, 
सत्यकाम, सत्यसङ्कल्प, सकलेतरविलक्षण, अर्थिकल्पक, 
आपत्सख, काकुत्स्थ, श्रीमन्नारायण, पुरुषोत्तम, 
श्रीरङ्गनाथ, मम नाथ, नमोऽस्तुते ॥

॥ इति श्रीभगवद्रामानुजविरचितं श्रीरङ्गगद्यं सम्पूर्णम् ॥

“May I be accepted in the eternal and devoted service of that faultless One, who is complete in all respects — that Lord who holds sway over the nature, existence and activity of the three gradations of the conscious (cetana) and the non-conscious (acetana), Who is untouched by the five types of miseries and pious and sinful karmic reactions: Who is an ocean of sublime, unlimited auspicious qualities: who is the Supreme Brahman and Supreme Person; who reclines on the serpent bed in Sri Rangam; my Master who is complete. I, who have clearly understood myself to be eternally subject to Your command; I who have tasted the sweetness of always engaging in Your service; I, who realizes that You are the subject of all my knowledge and devotion; I, who have experienced You constantly without interruption; eager and anxious to be of immense and commendable service at all times and under all circumstances to You; with this eagerness generated by the pleasure of my experience of Yourself, let me, the very personification of desire be of service, be accepted eternally for such service.

I, whose essential nature is built to be ever commanded by Him, understanding this nature and ever thinking of it, meditating always on His great Lordship and all his auspicious qualities, with a devotion which is a means to the service in the form of an intense desire to be of service in all forms under all conditions, possessed of ripe knowledge which would lead to devoted service, engaged in action in the form of service to Him, lacking as I am in personal qualities like virtue (sattva) and firm faith, possessed as I am of qualities and conduct directly opposite to that enumerated and hence steeped in an ageless ocean of sin incapable of being crosses, with naturally endowed knowledge and lustre covered by inevitable association with prakriti which by nature is susceptible to continuous change and is a mixture of the threefold qualities (satva, rajas & tamas), the inevitable association being ordinarily inseparable like oil in the gingelly seed and fire in firewood; bound inextricably by the rope or karma in the form of virtue and sin collected over ages out of ignorance; I who cannot find the means of overcoming this bond to samsAra however long I may try; I take refuge in your lotus feet as the only means of emancipation O, Narayana! ever associated with Sri! The refuge of all created beings! I seek your protection.

Though I am in this state, full of various defects, I beg of the Lord my acceptance in eternal service to him in the firm faith that the all merciful Lord, heeding to my earnest request, will grant me the favor of steadfastness in everlasting service to Him urged by devotion resulting from the experience of the Lord.

My Lord! you should be pleased, out of Your unbounded mercy, to grant the service to You resulting from the joy of experiencing you. Apart from begging you, I do not know of any other means.

O lotus eyed one! I should be eager to render all forms of service under all conditions. You should grant me this state of mind.

Even if I do not have the wish sincerely for the knowledge or that I am not fit for your grace to reach the goal, Please make the words I gave expression to as an excuse to fill in the defeciencies and render me fit.

Oh! Limitless ocean of mercy!! One who does not think of the differences when his subjects are in distress, You who destroys the distress of those who seek You! Great ocean of love to His devotees, You who know the truth about all Your creations at all times! You with wishes always fulfilled ! You who can do all that You desire! Friend in my distress! You who grieves at the pains of all men, May You ever be associated with Sri! Greatest of personalities! Lord of Sri Rangam! My Lord! I prostrate before you.

Ref: http://www.angelfire.com/ok5/livermore/pdf/Sri_Ranga_Gadyam.pdf

संस्कृत गोवीथी : गव्य 1

Gavya_1


शब्द सागर


  • गोवीथी – cow-path, that portion of the moon’s path which contains the asterisms Bhadra-padā, Revatī, andᅠ Aṡvinī (orᅠ according to others, Hasta, Citrā, andᅠ Svātī)
  • गव्य – That which belongs to cow, that is which suits to cows, that which is received from cow

पाठ १.१


शब्द

  • सः
  • त्वम्
  • अहम्
  • गच्छति
  • गच्छसि
  • गच्छामि

वाक्य

  • अहं गच्छामि |
  • त्वं गच्छसि |
  • स: गच्छति |

सुभाषित

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पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः ।
न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः ॥

 


गीता पाठ

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मूल श्लोकः

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।

English Commentary By Swami Sivananda


1.1 धर्मक्षेत्रे on the holy plain? कुरुक्षेत्रे in Kurukshetra? समवेताः assembled together? युयुत्सवः desirous to fight? मामकाः my people? पाण्डवाः the sons of Pandu? च and? एव also? किम् what? अकुर्वत did do? सञ्जय O Sanjaya.

Commentary Dharmakshetra — that place which protects Dharma is Dharmakshetra. Because it was in the land of the Kurus? it was called Kurukshetra.

Sanjaya is one who has conered likes and dislikes and who is impartial.

Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta


।।1.1।।धर्मक्षेत्र इति। अत्र केचित् व्याख्याविकल्पमाहुः कुरूणां करणानां यत् क्षेत्रमनुग्राहकं अतएव सांसारिकधर्माणां (S सांसारिकत्वधर्माणां) सर्वेषां क्षेत्रम् उत्पत्तिनिमित्तत्वात्। अयं स परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् (या. स्मृ. I 8) इत्यस्य च धर्मस्य क्षेत्रम् समस्तधर्माणां क्षयात् अपवर्गप्राप्त्या त्राणभूतं तदधिकारिशरीरम्। सर्वक्षत्राणां क्षदेः हिंसार्थत्वात् परस्परं वध्यघातकभावेन (S परस्परवध्य ) वर्तमानानां रागवैराग्यक्रोधक्षमाप्रभृतीनां समागमो यत्र तस्मिन् स्थिता ये मामका अविद्यापुरुषोचिता अविद्यामयाः संकल्पाः पाण्डवाः शुद्धविद्यापुरुषोचिता विद्यात्मानः ते किमकुर्वत कैः खलु के जिताः इति। मामकः अविद्यापुरुषः पाण्डुः शुद्धः।

Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas

1।।व्याख्या धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे कुरुक्षेत्रमें देवताओंने यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है।

यहाँ धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे पदोंमें क्षेत्र शब्द देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है प्रत्युत तीर्थभूमि भी है जिसमें प्राणी जीतेजी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये यह भूमि चुनी गयी है।

संसारमें प्रायः तीन बातोंको लेकर लड़ाई होती है भूमि धन और स्त्री। इस तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ कुरुक्षेत्रे पद देनेका तात्पर्य भी जमीनको लेकर ल़ड़नेमें है। कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात् राजा कुरुकी जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवों द्वारा पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके लिये लड़ाई करने आये हुए हैं।

यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये कुरुक्षेत्रे पद देना युक्तिसंगत न्यायसंगत है तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही होता है। युद्धजैसा कार्य भी धर्मभूमि तीर्थभूमिमें ही करते हैं जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ धर्मक्षेत्रे पद आया है।

यहाँ आरम्भ में धर्म पदसे एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भके धर्म पदमेंसे धर् लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके मम पदोंसे लिया जाय तो धर्म शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है अर्थात् धर्मका पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेसे धर्मका अनुष्ठान हो जाता है।

इन धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे पदोंसे सभी मनुष्योंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये केवल अपने सुखआरामकी दृष्टिसे नहीं और कर्तव्यअकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता 16। 24)।

समवेता युयुत्सवः राजाओंके द्वारा बारबार सन्धिका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्धके मैं तीखी सूईकी नोकजितनी जमीन भी पाण्डवोंको नहीं दूँगा। (टिप्पणी प0 2.1) तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं।

दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्यप्राप्तिका ही था। वह राज्यप्राप्ति धर्मसे हो चाहे अधर्मसे न्यायसे हो चाहे अन्यायसे विहित रीतिसे हो चाहे निषिद्ध रीतिसे किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना चाहिये ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात् युद्धकी इच्छावाला था।

पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवननिर्वाह कर लेंगे पर अपने धर्ममें बाधा नहीं आने देंगे धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु जिस माँकी आज्ञासे युधिष्ठिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे विवाह किया था उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी (टिप्पणी प0 2.2) अर्थात् केवल माँके आज्ञापालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुये हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही युयुत्सु थे पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे।

मामकाः पाण्डवाश्चैव पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचितअनुचितका विचार न करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ मामकाः पदके अन्तर्गत कौरव (टिप्पणी प0 3.1) और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी पाण्डवाः पद अलग देनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमें समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे पर पाण्डवोंको अपना नहीं मानते थे। (टिप्पणी प0 3.2) इस कारण उन्होंने अपने पुत्रोंके लिये मामकाः और पाण्डुपुत्रोंके लिये पाण्डवा पदका प्रयोग किया है क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह अपने घरोंमें मुहल्लोंमें गाँवोंमें प्रान्तोंमें देशोंमें सम्प्रदायोंमें द्वैधीभाव अर्थात् ये अपने हैं ये दूसरे हैं ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है।

यहाँ पाण्डवाः पदके साथ एव पद देनेका तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया

मामकाः और पाण्डवाः (टिप्पणी प0 3.3) इनमेंसे पहले मामकाः पदका उत्तर सञ्जय आगेके (दूसरे) श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेना को देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्यमुख्य सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी सेनाके मुख्यमुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रणकौशल आदिकी प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर कौरवसेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक पाण्डवाः पदका उत्तर देंगे कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय श्रीकृष्णने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन भीम युधिष्ठिर नकुल सहदेव आदिने अपनेअपने शंख बजाये जिससे दुर्योधनकी सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी सञ्जय पाण्डवोंकी बात कहतेकहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका प्रसङ्ग आरम्भ कर देंगे।

किमकुर्वत किम् शब्दके तीन अर्थ होते हैं विकल्प निन्दा (आक्षेप) और प्रश्न।

युद्ध हुआ कि नहीं इस तरहका विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता क्योंकि दस दिनतक युद्ध हो चुका है और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद सञ्जय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना रहे हैं।

मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने यह क्या किया जो कि युद्ध कर बैठे उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता क्योंकि युद्ध तो चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था।

यहाँ किम् शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता है। धृतराष्ट्र सञ्जयसे भिन्नभिन्न प्रकारकी छोटीबड़ी सब

घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीकठीक जाननेके लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।

सम्बन्ध धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर सञ्जय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३३ (शंकराचार्य विशेष)

Gavya33

कुशला ब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः सुरागिणः
तेऽप्यज्ञानतया नूनं पुनरायान्ति यान्ति च॥

Also those persons who are only clever in discussing about Reality but have no realisation, and are very much attached to worldly pleasures, are born and die again and again in consequence of their ignorance.

अपरोक्षानुभूति


शब्द सिन्धु


नदीनां (nadiinaaM) = of the rivers
ननन्दा (nanandaa) = (f) husband’s or wife’s sister
ननु (nanu) = really
नन्दः (nandaH) = nanda
नन्दति (nandati) = revels
नन्दत्येव (nandatyeva) = nandati+eva, revels alone/revels indeed
नन्दन (nandana) = child
नपुंसकं (napu.nsakaM) = neuter
नभः (nabhaH) = the sky
नभःस्पृशं (nabhaHspRishaM) = touching the sky
नभस्तल (nabhastala) = sky
नम् (nam.h) = to salute
नमः (namaH) = a salute
नमति (namati) = to bow
नमस्कार (namaskaara) = Salutation
नमस्कारनीचमनी (namaskaaraniichamanii) = Salutation to evil minded
नमस्कुरु (namaskuru) = offer obeisances
नमस्कृत्वा (namaskRitvaa) = offering obeisances
नमस्ते (namaste) = offering my respects unto You
नमस्यन्तः (namasyantaH) = offering obeisances
नमस्यन्ति (namasyanti) = are offering respects
नमामि (namaami) = I bow
नमाम्यहम् (namaamyaham.h) = namAmi+ahaM, bow+I
नमेरन् (nameran.h) = they should offer proper obeisances
नमो (namo) = salutation
नम्य (namya) = (adj) bendable
नयन (nayana) = eye
नयनं (nayanaM) = eyes
नयेत् (nayet.h) = must bring under
नर (nara) = Man
नरः (naraH) = a man


पाठ


1 2

लोकोक्ति

बहुत अधिक प्रचलित और लोगों के मुँहचढ़े वाक्य लोकोक्ति के तौर पर जाने जाते हैं। इन वाक्यों में जनता के अनुभव का निचोड़ या सार होता है। इनकी उत्पत्ति एवं रचनाकार ज्ञात नहीं होते।

नास्ति गतिश्रमो यानवताम्।

नास्ति बुद्धिमतां शत्रु:।

निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते।

निर्वाणदीपे किमु तैलदानम्?


सुभाषित


रूपयौवनसंपन्ना: विशालकुलसंभवा: |
विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: किंशुका: इव ||

Those who are born in a great family and are handsome and young, but do not possess any knowledge, are like a beautiful flower without fregnance.


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


For next few days, we will focus on शंकर भाष्य

मूल श्लोकः

श्री भगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya

।।15.1।। — ऊर्ध्वमूलं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वात् नित्यत्वात् महत्त्वाच्च ऊर्ध्वम् उच्यते ब्रह्म अव्यक्तं मायाशक्तिमत्? तत् मूलं अस्येति सोऽयं संसारवृक्षः ऊर्ध्वमूलः। श्रुतेश्च — ऊर्ध्वमूलोऽर्वाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः (क0 उ0 2।6।1) इति। पुराणे च — अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोच्छ्रितः। बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः।।महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा। धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः।।आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः। एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्माचरति नित्यशः।।एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना। ततश्चात्मरतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः।। इत्यादि। तम् ऊर्ध्वमूलं संसारं मायामयं वृक्षम् अधःशाखं महदहंकारतन्मात्रादयः शाखा इव अस्य अधः भवन्तीति सोऽयं अधःशाखः? तम् अधःशाखम्। न श्वोऽपि स्थाता इति अश्वत्थः तं क्षणप्रध्वंसिनम् अश्वत्थं प्राहुः कथयन्ति अव्ययं संसारमायायाः अनादिकालप्रवृत्तत्वात् सोऽयं संसारवृक्षः अव्ययः? अनाद्यन्तदेहादिसंतानाश्रयः हि सुप्रसिद्धः? तम् अव्ययम्। तस्यैव संसारवृक्षस्य इदम् अन्यत् विशेषणम् — छन्दांसि यस्य पर्णानि? छन्दांसि च्छादनात् ऋग्यजुःसामलक्षणानि यस्य संसारवृक्षस्य पर्णानीव पर्णानि। यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि पर्णानि? तथा वेदाः संसारवृक्षपरिरक्षणार्थाः? धर्माधर्मतद्धेतुफलप्रदर्शनार्थत्वात्। यथाव्याख्यातं संसारवृक्षं समूलं यः तं वेद सः वेदवित्? वेदार्थवित् इत्यर्थः। न हि समूलात् संसारवृक्षात् अस्मात् ज्ञेयः अन्यः अणुमात्रोऽपि अवशिष्टः अस्ति इत्यतः सर्वज्ञः सर्ववेदार्थविदिति समूलसंसारवृक्षज्ञानं स्तौति।।तस्य एतस्य संसारवृक्षस्य अपरा अवयवकल्पना उच्यते –,

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३२ (शंकराचार्य विशेष)

Gavya32

भावितं तीव्रवेगेन यद्वस्तु निश्चयात्मना
पुमांस्तद्धि भवेच्छीघ्रं ज्ञेयं भ्रमरकीटवत्॥

A person who meditates upon a thing with great assiduity and firm conviction, becomes that very thing. This may be understood from the illustration of the wasp and the worm. [According to folk wisdom, when a wasp catches an insect and takes it back to its hole, the insect becomes so terrorised that it constantly thinks about its predator to the point where it actually transforms itself into a wasp. The same analogy applies to a person who meditates on Reality with all his mind and eventually ends up becoming Reality.]

अपरोक्षानुभूति


शब्द सिन्धु


इन्धन (indhana) = fuel
इमं (imaM) = (from idaM) this
इमाः (imaaH) = all these
इमान् (imaan.h) = these
इमे (ime) = these
इमौ (imau) = these
इयं (iyaM) = this
इव (iva) = just like or as if
इशत् (ishat.h) = a little
इषुभिः (ishhubhiH) = with arrows
इष्ट (ishhTa) = of all desirable things
इष्टं (ishhTaM) = leading to heaven
इष्टाः (ishhTaaH) = palatable
इष्टान् (ishhTaan.h) = desired
इष्टिका (ishhTikaa) = (f) brick
इष्ट्वा (ishhTvaa) = worshiping
इह (iha) = here
इहैव (ihaiva) = in the present body
इक्षुः (ikShuH) = sugarcane
इक्ष्वाकवे (ikShvaakave) = unto King Iksvaku
ईदृशं (iidRishaM) = of this nature
ईदृषं (iidRishhaM) = like this
ईर्ष्या (iirshhyaa) = (f) jealousy
ईश (iisha) = God
ईशं (iishaM) = Lord Siva
ईशावास्यं (iishaavaasyaM) = inhabited or manifested by the Master
ईश्वर (iishvara) = lord, the capable (here)
ईश्वरं (iishvaraM) = the Supersoul
ईश्वरः (iishvaraH) = the Supreme Lord
ईश्वरप्राणिधान (iishvarapraaNidhaana) = attentiveness to god
ईह् (iih.h) = to wish
ईहते (iihate) = he aspires
ईहन्ते (iihante) = they desire
ईहा (iihaa) = wish
ईक्ष् (iikSh.h) = to see
ईक्षण (iikShaNa) = seeing


पाठ


1 2

लोकोक्ति

बहुत अधिक प्रचलित और लोगों के मुँहचढ़े वाक्य लोकोक्ति के तौर पर जाने जाते हैं। इन वाक्यों में जनता के अनुभव का निचोड़ या सार होता है। इनकी उत्पत्ति एवं रचनाकार ज्ञात नहीं होते।

Learn and use them

न पुष्पार्थी सिञ्चति शुष्कतरुम्।

न मूर्खजनसम्पर्क: सुरेन्द्रभवनेष्वपि।

न व्यापारशतेनापि शुकवत्पाठ्यते बक:।

नक्र: स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कर्षति।

नास्ति अर्थिनो गौरवम्


सुभाषित


जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवनं खलु देहिनाम् |
तथाविधिमिति त्वाशाश्वत्कल्याणमाचरेत् ||

Life of a man is like a shaky reflection of moon in the water (is very short, and unstable). Knowing this, humans should always keep on doing a long lasting work that benefits the society.


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


कौपीन पंचकम्
Five Stanzas on the wearer of loin-cloth

वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो
भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः ।
विशोकमन्तःकरणे चरन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ १॥
Roaming ever in the grove of Vedanta,
Ever pleased with his beggar’s morsel,
Wandering onward, his heart free from sorrow,
Blest indeed is the wearer of the loin-cloth . (1)

मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः
पाणिद्वयं भोक्तुममन्त्रयन्तः ।
कन्थामिव श्रीमपि कुत्सयन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ २॥
Sitting at the foot of a tree for shelter,
Eating from his hands his meagre portion,
Spurning wealth like a patched-up garment,
Blest indeed is the wearer of the loin-cloth . (2)

स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः
सुशान्तसर्वेन्द्रियवृत्तिमन्तः ।
अहर्निशं ब्रह्मसुखे रमन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ ३॥
Satisfied fully by the Bliss within him,
Curbing wholly the cravings of his senses,
Delighting day and night in the bliss of Brahman,
Blest indeed is the wearer of the loin-cloth . (3)

देहादिभावं परिवर्तयन्तः
स्वात्मानमात्मन्यवलोकयन्तः ।
नान्तं न मध्यं न बहिः स्मरन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ ४॥
Witnessing the changes of mind and body,
Naught but the Self within him beholding,
Heedless of outer, of inner, of middle,
Blest indeed is the wearer of the loin-cloth . (4)

ब्रह्माक्षरं पावनमुच्चरन्तो
ब्रह्माहमस्मीति विभावयन्तः ।
भिक्षाशिनो दिक्षु परिभ्रमन्तः
कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥ ५॥
Chanting Brahman, the word of redemption,
Meditating only on `I am Brahman’,
Living on alms and wandering freely,
Blest indeed is the wearer of the loin-cloth . (5)

॥ इति श्रीमद् शङ्कराचार्यकृत कौपीन पञ्चकं सम्पूर्णम् ॥
source: `Self-Knowledge’ of Adi
Sankaracharya, by Swami Nikhilananda,
Ramakrishna Math, Madras (1967)
(From appendix on miscellaneous stotras).
Encoded and proofread by P . P . Narayanaswami at swami at math.mun.ca

 

 

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 8

 

Gavya8


शब्द सिन्धु


अंकुश (a.nkusha) = a goad (metal stick used to control elephants)
अंकुशधारिणम् (a.nkushadhaariNam.h) = bearing the weapon `ankusha’ with which the elephant
अंग (a.nga) = body, organ
अंगण (a.ngaNa) = field
अंगसंगिनौ (a.ngasa.nginau) = with
अंगैः (a.ngaiH) = limbs, body parts
अंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः (a.ngaistushhTuvaa.nsastanuubhiH) = having satisfied with strong limbs?
अंजन (a.njana) = anointment
अंतरंग (a.ntara.nga) = inner body or inner nature, feelings, inside
अंतर्गत (a.ntargata) = internal
अंबा (aMbaa) = mother
अंश (a.nsha) = part, angle


पाठ


विभक्ति

1

2 3

4

Here is the interesting verse explaining Vibhakti. It is from रामरक्षास्तोत्र.

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ॥
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥
राम: राजमणि: सदा विजयते|
रामं रमेशम् भजे |
रामेण अभिहिता निशाचरचम्|
रामाय तस्मै नम:|
रामात् नास्ति परायणम् परतरम्|
रामस्य दास: अस्मि अहम्|
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे|
भोः राम माम् उद्धर |
As seen by above verse, the vibhakti to be used based on the role noun plays in the sentence.
RAma, the jewel among kings is always victorious I do devotion to RAma, (hence) to Ramesha (i.e. to ViShNu)
by singing a song of devotion
Army of nocturnal beings was destroyed by RAma I bow unto that RAma
There is no better recourse than RAma I am servent of RAma
Resting of my mind may always be at RAma Oh RAma, please uplift me !
——————
सुभाषित
—————————–
आत्मवान् को जित क्रोधो द्युतिमान् कः अनसूयकः |
कस्य बिभ्यति देवाः च जात रोषस्य संयुगे || १-१-४
“Who is that courageous one, who controlled his ire, who is brilliant, non-jealous and even whom do the gods fear, when provoked to war… [1-1-4]
——————————-
पठन
—————–
॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥
 
श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।
श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
 
॥ अथ ध्यानम्‌ ॥
 
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥
 
॥ इति ध्यानम्‌ ॥ 
 
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥ 
 
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥ 
 
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥
 
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
 
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
 
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
 
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
 
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥
 
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥
 
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥
 
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
 
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
 
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥
 
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥
 
आदिष्टवान्‌ यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
 
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥
 
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
 
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
 
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥
 
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥
 
संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥
 
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥
 
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
 
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
 
रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥
 
रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ 
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥
 
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥ 
 
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
 
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
 
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
 
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥
 
लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
 
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
 
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥
 
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥
 
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥
 
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
 
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
 
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥
 
॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ५३ : उच्छिष्ट-गणपति

Gavya51

Note: I am not into tantra. This study is part of my personal swadhyay.

उच्छिष्ट-गणपति

Uchchhishta Ganapati (Sanskritउच्छिष्ट-गणपतिUcchiṣṭa Gaṇapati) is an Tantric aspect of the Hindu god Ganesha(Ganapati). He is the primary deity of the Uchchhishta Ganapatya sect, one of six major schools of the Ganapatyas.

The gaNas of which he is the pati represent the limitless vidyA-vrttis which aid the upAsaka in overcoming various vighnas that hinder Atma-vichAra. The same is stated in the yAmaLa:

utkR^iShTAshchApi shiShTAshcha praLaye nAshavarjitAH |
gaNA ucChiShTasaMjnADhyAsteShAM cha patirIshvaraH |
ucChiShTagaNapashcheti guNeshasambhavaH smR^itaH ||

A similar explanation can be seen in the rahasya-hR^idaya of this special form:

utkR^iShTAH j~nAninaH siddhAH kAraNabrahmalokagAH |
praLaye nAsharahitAH shiShTAste yogapAragAH |
ucChiShTAshcheti kathitAH teShAM cha pataye namaH ||

He is said to have chosen as his shakti sarasvatI, the daughter of brahmA and shAradA and puShTi-lakShmIH, the daughter of mahAviShNu and ramA:

sarasvatIM brahmaputrIM puShTilakShmIM hareH sutAm |
jagrAha vidhipUrvaM tu devocChiShTagaNAdhipaH ||

॥ श्रीउच्छिष्टगणपतिसहस्रनामस्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशाय नमः ।

श्रीभैरव उवाच ।
शृणु देवि रहस्यं मे यत्पुरा सूचितं मया ।
तव भक्त्या गणेशस्य वक्ष्ये नामसहस्रकम् ॥ १॥

श्रीदेव्युवाच ।
ॐ भगवन्गणनाथस्य उच्छिष्टस्य महात्मनः ।
श्रोतुं नाम सहस्रं मे हृदयं प्रोत्सुकायते ॥ २॥

श्रीभैरव उवाच ।
प्राङ्मुखे त्रिपुरानाथे जाता विघ्नकुलाः शिवे ।
मोहने मुच्यते चेतस्तैः सर्वैर्बलदर्पितैः ॥ ३॥

तदा प्रभुं गणाध्यक्षं स्तुत्वा नामसहस्रकैः ।
विघ्ना दूरात्पलायन्ते कालरुद्रादिव प्रजाः ॥ ४॥

तस्यानुग्रहतो देवि जातोऽहं त्रिपुरान्तकः ।
तमद्यापि गणेशानं स्तौमि नामसहस्रकैः ॥ ५॥

तदद्य तव भक्त्याहं साधकानां हिताय च ।
महागणपतेर्वक्ष्ये दिव्यं नामसहस्रकम् ॥ ६॥

ॐ अस्य श्रीउच्छिष्टगणेशसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीभैरव ऋषिः ।
गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपतिर्देवता ।
गं बीजम् । ह्रीं शक्तिः । कुरुकुरु कीलकम् ।
मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गणाध्यक्षो ग्लौं गँ गणपतिर्गुणी ।
गुणाढ्यो निर्गुणो गोप्ता गजवक्त्रो विभावसुः ॥ ७॥

विश्वेश्वरो विभादीप्तो दीपनो धीवरो धनी ।
सदा शान्तो जगत्त्राता विश्वावर्तो विभाकरः ॥ ८॥

विश्रम्भी विजयो वैद्यो वारान्निधिरनुत्तमः ।
अणिमाविभवः श्रेष्ठो ज्येष्ठो गाथाप्रियो गुरुः ॥ ९॥

सृष्टिकर्ता जगद्धर्ता विश्वभर्ता जगन्निधिः ।
पतिः पीतविभूषाङ्को रक्ताक्षो लोहिताम्बरः ॥ १०॥

विरूपाक्षो विमानस्थो विनीतः सदस्यः सुखी । सात्वतः
सुरूपः सात्त्विकः सत्यः शुद्धः शङ्करनन्दनः ॥ ११॥

नन्दीश्वरो जयानन्दी वन्द्यः स्तुत्यो विचक्षणः ।
दैत्यमर्द्दी सदाक्षीबो मदिरारुणलोचनः ॥ १२॥

सारात्मा विश्वसारश्च विश्वसारो(२) विलेपनः ।
परं ब्रह्म परं ज्योतिः साक्षी त्र्यक्षो विकत्थनः ॥ १३॥

विश्वेश्वरो वीरहर्ता सौभाग्यो भाग्यवर्द्धनः ।
भृङ्गिरिटी भृङ्गमाली भृङ्गकूजितनादितः ॥ १४॥

विनर्तको विनीतोऽपि विनतानन्दनार्चितः ।
वैनतेयो विनम्राङ्गो विश्वनायकनायकः ॥ १५॥

विराटको विराटश्च विदग्धो विधुरात्मभूः ।
पुष्पदन्तः पुष्पहारी पुष्पमालाविभूषणः ॥ १६॥

पुष्पेषुमथनः पुष्टो विवर्तः कर्तरीकरः ।
अन्त्योऽन्तकश्चित्तगणाश्चित्तचिन्तापहारकः ॥ १७॥

अचिन्त्योऽचिन्त्यरूपश्च चन्दनाकुलमुण्डकः ।
लोहितो लिपितो लुप्तो लोहिताक्षो विलोभकः ॥ १८॥

लब्धाशयो लोभरतो लोभदोऽलङ्घ्यगर्धकः ।
सुन्दरः सुन्दरीपुत्रः समस्तासुरघातकः ॥ १९॥

नूपुराढ्यो विभवेन्द्रो नरनारायणो रविः ।
विचारो वान्तदो वाग्मी वितर्की विजयीश्वरः ॥ २०॥

सुजो बुद्धः सदारूपः सुखदः सुखसेवितः ।
विकर्तनो विपच्चारी विनटो नटनर्तकः ॥ २१॥

नटो नाट्यप्रियो नादोऽनन्तोऽनन्तगुणात्मकः ।
गङ्गाजलपानप्रियो गङ्गातीरविहारकृत् ॥ २२।
गङ्गाप्रियो गङ्गजश्च वाहनादिपुरःसरः ।
गन्धमादनसंवासो गन्धमादनकेलिकृत् ॥ २३॥

गन्धानुलिप्तपूर्वाङ्गः सर्वदेवस्मरः सदा ।
गणगन्धर्वराजेशो गणगन्धर्वसेवितः ॥ २४॥

गन्धर्वपूजितो नित्यं सर्वरोगविनाशकः ।
गन्धर्वगणसंसेव्यो गन्धर्ववरदायकः ॥ २५॥

गन्धर्वो गन्धमातङ्गो गन्धर्वकुलदैवतः ।
गन्धर्वगर्वसंवेगो गन्धर्ववरदायकः ॥ २६॥

गन्धर्वप्रबलार्तिघ्नो गन्धर्वगणसंयुतः ।
गन्धर्वादिगुणानन्दो नन्दोऽनन्तगुणात्मकः ॥ २७॥

विश्वमूर्तिर्विश्वधाता विनतास्यो विनर्तकः ।
करालः कामदः कान्तः कमनीयः कलानिधिः ॥ २८॥

कारुण्यरूपः कुटिलः कुलाचारी कुलेश्वरः ।
विकरालो रणश्रेष्ठः संहारो हारभूषणः ॥ २९॥

उरुरभ्यमुखो रक्तो देवतादयितौरसः ।
महाकालो महादंष्ट्रो महोरगभयानकः ॥ ३०॥

उन्मत्तरूपः कालाग्निरग्निसूर्येन्दुलोचनः ।
सितास्यः सितमाल्यश्च सितदन्तः सितांशुमान् ॥ ३१॥

असितात्मा भैरवेशो भाग्यवान्भगवान्भवः ।
गर्भात्मजो भगावासो भगदो भगवर्द्धनः ॥ ३२॥

शुभङ्करः शुचिः शान्तः श्रेष्ठः श्रव्यः शचीपतिः ।
वेदाद्यो वेदकर्ता च वेदवेद्यः सनातनः ॥ ३३॥

विद्याप्रदो वेदरसो वैदिको वेदपारगः ।
वेदध्वनिरतो वीरो वेदविद्यागमोऽर्थवित् ॥ ३४॥

तत्त्वज्ञः सर्वगः साधुः सदयः सदसन्मयः ।
शिवशङ्करः शिवसुतः शिवानन्दविवर्द्धनः ॥ ३५॥

शैत्यः श्वेतः शतमुखो मुग्धो मोदकभूषणः ।
देवो दिनकरो धीरो घृतिमान्द्युतिमान्धवः ॥ ३६॥

शुद्धात्मा शुद्धमतिमाञ्छुद्धदीप्तिः शुचिव्रतः ।
शरण्यः शौनकः शूरः शरदम्भोजधारकः ॥ ३७॥ न्
दारकः शिखिवाहेष्टः सितः शङ्करवल्लभः ।
शङ्करो निर्भयो नित्यो लयकृल्लास्यतत्परः ॥ ३८॥

लूतो लीलारसोल्लासी विलासी विभ्रमो भ्रमः ।
भ्रमणः शशिभृत्सुर्यः शनिर्धरणिनन्दनः ॥ ३९॥

बुधो विबुधसेव्यश्च बुधराजो बलंधरः ।
जीवो जीवप्रदो जेता स्तुत्यो नित्यो रतिप्रियः ॥ ४०॥

जनको जनमार्गज्ञो जनरक्षणतत्परः ।
जनानन्दप्रदाता च जनकाह्लादकारकः ॥ ४१।
विबुधो बुधमान्यश्च जैनमार्गनिवर्तकः ।
गच्छो गणपतिर्गच्छनायको गच्छगर्वहा ॥ ४२॥

गच्छराजोथ गच्छेथो गच्छराजनमस्कृतः ।
गच्छप्रियो गच्छगुरुर्गच्छत्राकृद्यमातुरः ॥ ४३॥

गच्छप्रभुर्गच्छचरो गच्छप्रियकृताद्यमः ।
गच्छगीतगुणोगर्तो मर्यादाप्रतिपालकः ॥ ४४॥

गीर्वाणागमसारस्य गर्भो गीर्वाणदेवता ।
गौरीसुतो गुरुवरो गौराङ्गो गणपूजितः ॥ ४५॥

परम्पदं परन्धाम परमात्मा कविः कुजः ।
राहुर्दैत्यशिरश्छेदी केतुः कनककुण्डलः ॥ ४६॥

ग्रहेन्द्रो ग्रहितो ग्राह्योऽग्रणीर्घुर्घुरनादितः ।
पर्जन्यः पीवरः पत्री पीनवक्षाः पराक्रमी ॥ ४७॥

वनेचरो वनस्पतिर्वनवासी स्मरोपमः ।
पुण्यः पूतः पवित्रश्च परात्मा पूर्णाविग्रहः ॥ ४८॥

पूर्णेन्दुसुकलाकारो मन्त्रपूर्णमनोरथः ।
युगात्मा युगकृद्यज्वा याज्ञिको यज्ञवत्सलः ॥ ४९॥

यशस्यो यजमानेष्टो वज्रभृद्वज्रपञ्जरः ।
मणिभद्रो मणिमयो मान्यो मीनध्वजाश्रितः ॥ ५०॥

मीनध्वजो मनोहारी योगिनां योगवर्धनः ।
द्रष्टा स्रष्टा तपस्वी च विग्रही तापसप्रियः ॥ ५१॥

तपोमयस्तपोमूर्तिस्तपनश्च तपोधनः ।
सम्पत्तिसदनाकारः सम्पत्तिसुखदायकः ॥ ५२॥

सम्पत्तिसुखकर्ता च सम्पत्तिसुभगाननः ।
सम्पत्तिशुभदो नित्यसम्पत्तिश्च यशोधनः ॥ ५३॥

रुचको मेचकस्तुष्टः प्रभुस्तोमरघातकः ।
दण्डी चण्डांशुरव्यक्तः कमण्डलुधरोऽनघः ॥ ५४॥

कामी कर्मरतः कालः कोलः क्रन्दितदिक्तटः ।
भ्रामको जातिपूज्यश्च जाड्यहा जडसूदनः ॥ ५५॥

जालन्धरो जगद्वासी हास्यकृद्गहनो गुहः ।
हविष्मान्हव्यवाहाक्षो हाटको हाटकाङ्गदः ॥ ५६॥

सुमेरुर्हिमवान्होता हरपुत्रो हलङ्कषः ।
हालाप्रियो हृदा शान्तः कान्ताहृदयपोषणः ॥ ५७॥

शोषणः क्लेशहा क्रूरः कठोरः कठिनाकृतिः ।
कुबेरो धीमयो ध्याता ध्येयो धीमान्दयानिधिः ॥ ५८॥

दविष्ठो दमनो हृष्टो दाता त्राता पितासमः ।
निर्गतो नैगमोऽगम्यो निर्जयो जटिलोऽजरः ॥ ५९॥

जनजीवो जितारातिर्जगद्व्यापी जगन्मयः ।
चामीकरनिभो नाभ्यो नलिनायतलोचनः ॥ ६०॥

रोचनो मोचको मन्त्री मन्त्रकोटिसमाश्रितः ।
पञ्चभूतात्मकः पञ्चसायकः पञ्चवक्त्रकः ॥ ६१॥

पञ्चमः पश्चिमः पूर्वः पूर्णः कीर्णालकः कुणिः ।
कठोरहृदयो ग्रीवालङ्कृतो ललिताशयः ॥ ६२॥

लोलचित्तो बृहन्नासो मासपक्षर्तुरूपवान् ।
ध्रुवो द्रुतगतिर्बन्धो धर्मी नाकिप्रियोऽनलः ॥ ६३॥

अङ्गुल्यग्रस्थभुवनो भुवनैकमलापहः ।
सागरः स्वर्गतिः स्वक्षः सानन्दः साधुपूजितः ॥ ६४॥

सतीपतिः समरसः सनकः सरलः सरः ।
सुरप्रियो वसुमतिर्वासवो वसुपूजितः ॥ ६५॥

वित्तदो वित्तनाथश्च धनिनां धनदायकः ।
राजीवनयनः स्मार्तः स्मृतिदः कृत्तिकाम्बरः ॥ ६६॥

अश्विनोऽश्वमुखः शुभ्रो हरिणो हरिणीप्रियः ।
कृत्तिकासनकः कोलो रोहिणीरमणोपमः ॥ ६७॥

रौहिणेयप्रेमकरो रोहिणीमोहनो मृगः ।
मृगराजो मृगशिरा माधवो मधुरध्वनिः ॥ ६८॥

आर्द्राननो महाबुद्धिर्महोरगविभूषणः ।
भ्रूक्षेपदत्तविभवो भ्रूकरालः पुनर्मयः ॥ ६९॥

पुनर्देव: पुनर्जेता पुनर्जीवः पुनर्वसुः ।
तिमिरास्तिमिकेतुश्च तिमिषासुरघातनः ॥ ७०॥

तिष्यस्तुलाधरो जृम्भो विश्लेषाश्लेषदानराट् ।
मानदो माधवो माधो वाचालो मघवोपमः ॥ ७१॥

मध्यो मघाप्रियो मेघो महाशुण्डो महाभुजः ।
पूर्वफाल्गुनिकः स्फीत फल्गुरुत्तरफाल्गुनः ॥ ७२॥

फेनिलो ब्रह्मदो ब्रह्मा सप्ततन्तुसमाश्रयः ।
घोणाहस्तश्चतुर्हस्तो हस्तिवन्ध्यो हलायुधः ॥ ७३॥

चित्राम्बरार्चितपदः स्वस्तिदः स्वस्तिनिग्रहः ।
विशाखः शिखिसेव्यश्च शिखिध्वजसहोदरः ॥ ७४॥

अणुरेणूत्करः स्फारो रुरुरेणुसुतो नरः ।
अनुराधाप्रियो राधः श्रीमाञ्छुक्लः शुचिस्मितः ॥ ७५॥

ज्येष्ठः श्रेष्ठार्चितपदो मूलं च त्रिजगद्गुरुः ।
शुचिश्चैव पूर्वाषाढश्चोत्तराषाढ ईश्वरः ॥ ७६॥

श्रव्योऽभिजिदनन्तात्मा श्रवो वेपितदानवः ।
श्रावणः श्रवणः श्रोता धनी धन्यो धनिष्ठकः ॥ ७७॥

शातातपः शातकुम्भः शरज्ज्योतिः शताभिषक् ।
पूर्वाभाद्रपदो भद्रश्चोत्तराभाद्रपादितः ॥ ७८॥

रेणुकातनयो रामो रेवतीरमणो रमी ।
आश्वयुक्कार्तिकेयेष्टो मार्गशीर्षो मृगोत्तमः ॥ । ७९॥

पोषेश्वरः फाल्गुनात्मा वसन्तश्चैत्रको मधुः ।
राज्यदोऽभिजिदात्मेयस्तारेशस्तारकद्युतिः ॥ ८०॥

प्रतीतः प्रोर्जितः प्रीतः परमः परमो हितः ।
परहा पञ्चभूः पञ्चवायुपूज्यपरिग्रहः ॥ ८१॥

पुराणागमविद्योगी महिषो रासभोऽग्रजः ।
ग्रहो मेषो मृषो मन्दो मन्मथो मिथुनाकृतिः ॥ ८२॥

कल्पभृत्कटको दीपो मर्कटः कर्कटो धृणिः ।
कुक्कुटो वनजो हंसः परमहंसः सृगालकः ॥ ८३॥

सिंहा सिंहासनाभूष्यो मद्गुर्मूषकवाहनः ।
पुत्रदो नरकत्राता कन्याप्रीतः कुलोद्वहः ॥ ८४॥

अतुल्यरूपो बलदस्तुल्यभृत्तुल्यसाक्षिकः ।
अलिश्चापधरो धन्वी कच्छपो मकरो मणिः ॥ ८५॥

कुम्भभृत्कलशः कुब्जो मीनमांससुतर्पितः ।
राशिताराग्रहमयस्तिथिरूपो जगद्विभुः ॥ ८६॥

प्रतापी प्रतिपत्प्रेयोऽद्वितीयोऽद्वैतनिश्चितः ।
त्रिरूपश्च तृतीयाग्निस्त्रयीरूपस्त्रयीतनुः ॥ ८७॥

चतुर्थीवल्लभो देवो परागः पञ्चमीश्वरः ।
षड्रसास्वादविज्ञानः षष्ठीषष्टिकवत्सलः ॥ ८८॥

सप्तार्णवगतिः सारः सप्तमीश्वररोहितः ।
अष्टमीनन्दनोत्तंसो नवमीभक्तिभावितः ॥ ८९॥

दशदिक्पतिपूज्यश्च दशमी द्रुहिणो द्रुतः ।
एकादशात्मगणयो द्वादशीयुगचर्चितः ॥ ९०॥

त्रयोदशमणिस्तुत्यश्चतुर्दशस्वरप्रियः ।
चतुर्दशेन्द्रसंस्तुत्यः पूर्णिमानन्दविग्रहः ॥ ९१॥

दर्शदर्शो दर्शनश्च वानप्रस्थो महेश्वरः ।
मौर्वी मधुरवाङ्मूलमूर्तिमान्मेघवाहनः ॥ ९२॥

महागजो जितक्रोधो जितशत्रुर्जयाश्रयः ।
रौद्रो रुद्रप्रियो रुद्रो रुद्रपुत्रोऽघनाशनः ॥ ९३॥

भवप्रियो भवानीष्टो भारभृद्भूतभावनः ।
गान्धर्वकुशलोऽकुण्ठो वैकुण्ठो विष्टरश्रवाः ॥ ९४॥

वृत्रहा विघ्नहा सीरः समस्तदुःखतापहा ।
मञ्जुलो मार्जरो मत्तो दुर्गापुत्रो दुरालसः ॥ ९५॥

अनन्तचित्सुधाधोरो वीरो वीर्यैकसाधकः ।
भास्वन्मुकुटमाणिक्यः कूजत्किङ्किंणिजालकः ॥ ९६॥

शुण्डाधारी तुण्डचलः कुण्डली मुण्डमालकः ।
पद्माक्षः पद्महस्तश्च पद्मनाभसमर्चितः ॥ ९७॥

उद्घृताधरदन्ताढ्यो मालाभूषणभूषितः ।
मारदो वारणो लोलश्रवणः शूर्पकर्णकः ॥ ९८॥

बृहदुल्लासनासाढ्यो व्याप्तत्रैलोक्यमण्डलः ।
रत्नमण्डलमध्यस्थः कृशानुरूपशीलकः ॥ ९९॥

बृहत्कर्णाञ्चलोद्भूतवायुवीजितदिक्तटः ।
बृहदास्यरवाक्रान्तभीतब्रह्माण्डभाण्डकः ॥ १००॥

बृहत्पादसमाक्रान्तसप्तपातालदीपितः ।
बृहद्दन्तकृतात्युग्ररणानन्दरसालसः ॥ १०१॥

बृहद्धस्तधृताशेषायुधनिर्जितदानवः ।
स्फूरत्सिन्दूरवदनः स्फूरत्तेजोऽग्निलोचनः ॥ १०२॥

उद्दीपितमणिः स्फूर्जन्नूपुरध्वनिनादितः ।
चलत्तोयप्रवाहाढ्यो नदीजलकणाकरः ॥ १०३॥

भ्रमत्कुञ्जरसङ्घातवन्दिताङ्घ्रिसरोरुहः ।
ब्रह्माच्युतमहारुद्रपुरस्सरसुरार्चितः ॥ १०४॥

अशेषशेषप्रभृतिव्यालजालोपसेवितः ।
गर्जत्पञ्चाननारावव्याप्ताकाशधरातलः ॥ १०५॥

हाहाहूहूगतात्युग्रस्वरविभ्रान्तमानसः ।
पञ्चाशद्वर्णबीजाख्यमन्त्रमन्त्रितविग्रहः ॥ १०६॥

वेदान्तशास्त्रपीयूषधाराऽऽप्लावितभूतलः ।
शङ्खध्वनिसमाक्रान्तपातालादिनभस्तलः ॥ १०७॥

चिन्तामणिर्महामल्लो बल्लहस्तो बलिः कविः ।
कृतत्रेतायुगोल्लासभासमानजगत्त्रयः ॥ १०८॥

द्वापरः परलोकैकः कर्मध्वान्तसुधाकरः ।
सुधाऽऽसिक्तवपुर्व्यासो ब्रह्माण्डादिकबाहुकः ॥ १०९॥

अकारादिक्षकारान्तवर्णपङ्क्तिसमुज्ज्वलः ।
अकाराकारप्रोद्गीतताननादनिनादितः ॥ ११०॥

इकारेकारमत्राढ्यमालाभ्रमणलालसः ।
उकारोकारप्रोद्गारिघोरनागोपवीतकः ॥ १११॥

ऋवर्णाङ्कितॠकारिपद्मद्वयसमुज्ज्वलः ।
लृकारयुतलॄकारशङ्खपूर्णदिगन्तरः ॥ ११२॥

एकारैककारगिरिजास्तनपानविचक्षणः ।
ओकारौकारविश्वादिकृतसृष्टिक्रमालसः ॥ ११३॥

अंअःवर्णावलीव्याप्तपादादिशीर्षमण्डलः ।
कर्णतालकृतात्युच्चैर्वायुवीजितनिर्झरः ॥ ११४॥

खगेशध्वजरत्नाङ्ककिरीटारुणपादकः ।
गर्विताशेषगन्धर्वगीततत्परश्रोत्रकः ॥ ११५॥

घनवाहनवागीशपुरस्सरसुरार्चितः ।
ङवर्णामृतधाराढ्यशोभमानैकदन्तकः ॥ ११६॥

चन्द्रकुङ्कुमजम्बाललिप्तसिन्दूरविग्रहः ।
छत्रचामररत्नाढ्यभ्रुकुटालङ्कृताननः ॥ ११७॥

जटाबद्धमहानर्घमणिपङ्क्तिविराजितः ।
झङ्कारिमधुपव्रातगाननादविनादितः ॥ ११८॥

ञवर्णकृतसंहारदैत्यासृक्पर्णमुद्गरः ।
टकाराख्याफलास्वादवेपिताशेषमूर्धजः ॥ ११९॥

ठकाराद्यडकाराङ्कढकारानन्दतोषितः ।
णवर्णामृतपीयूषधाराधारसुधाकरः ॥ १२०॥

ताम्रसिन्दूरपूजाढ्यललाटफलकच्छविः ।
थकारघनपङ्क्त्यातिसन्तोषिताद्विजव्रजः ॥ १२१॥

दयामृतहृदम्भोजधृतत्रैलोक्यमण्डलः ।
धनदादिमहायक्षसंसेवितपदाम्बुजः ॥ १२२॥

नमिताशेषदेवौघकिरीटमणिरञ्जितः ।
परवर्गापवर्गादिभोगेच्छेदनदक्षकः ॥ १२३॥

फणिचक्रसमाक्रान्तगलमण्डलमण्डितः ।
बद्धभ्रूयुगभीमोग्रसन्तर्जितसुरसुरः ॥ १२४॥

भवानीहृदयानन्दवर्द्धनैकनिशाकरः ।
मदिराकलशस्फीतकरालैककराम्बुजः ॥ १२५॥

यज्ञान्तरायसङ्घातसज्जीकृतवरायुधः ।
रत्नाकरसुताकान्तिक्रान्तिकीर्तिविवर्धनः ॥ १२६॥

लम्बोदरमहाभीमवपुर्दीप्तकृतासुरः ।
वरुणादिदिगीशानस्वर्चितार्चनचर्चितः ॥ १२७॥

शङ्करैकप्रियप्रेमनयनान्दवर्द्धनः ।
षोडशस्वरितालापगीतगानविचक्षणः ॥ १२८॥

समस्तदुर्गतिसरिन्नाथोत्तारणकोडुपः ।
हरादिब्रह्मवैकुण्ठब्रह्मगीतादिपाठकः ॥ १२९॥

क्षमापूरितहृत्पद्मसंरक्षितचराचरः ।
ताराङ्कमन्त्रवर्णैकाविग्रहोज्ज्वलविग्रहः ॥ १३०॥

अकारादिक्षकारान्तविद्याभूषितविग्रहः ।
ॐ श्रीविनायको ॐ ह्रीं विघ्नाध्यक्षो गणाधिपः ॥ १३१॥

हेरम्बो मोदकाहारो वक्रतुण्डो विधिः स्मृतः ।
वेदान्तगीतो विद्यार्थिसिद्धमन्त्रः षडक्षरः ॥ १३२॥

गणेशो वरदो देवो द्वादशाक्षरमन्त्रितः ।
सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रिताशेषविग्रहः ॥ १३३॥

गाङ्गेयो गणसेव्यश्च ॐ श्रीद्वैमातुरः शिवः ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ग्लौं गँ देवो महागणपतिः प्रभुः ॥ १३४॥

इदं नामसहस्रं तु महागणपतेः स्मृतम् ।
गुह्यं गोप्यतमं सिद्धं सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ॥ १३५॥

सर्वमन्त्रमयं दिव्यं सर्वविघ्नविनाशनम् ।
ग्रहतारामयं राशिवर्णपङ्क्तिसमन्वितम् ॥ १३६॥

सर्वाविद्यामयं ब्रह्मसाधनं साधकप्रियम् ।
गणेशस्य च सर्वस्वं रहस्यं त्रिदिवौकसाम् ॥ १३७॥

यथेष्टफलदं लोके मनोरथप्रपूरणम् ।
अष्टसिद्धिमयं श्रेष्ठं साधकानां जयप्रदम् ॥ १३८॥

विनार्चनं विना होमं विनान्यासं विना जपम् ।
अणिमाद्यष्टसिद्धीनां साधनं स्मृतिमात्रतः ॥ १३९॥

चतुर्थ्यामर्धरात्रे तु पठेन्मन्त्री चतुष्पथे ।
लिखेद्भूर्जे महादेवि ! पुण्यं नामसहस्रकम् ॥ १४०॥

धारयेत्तं चतुर्दश्यां मध्याह्ने मूर्ध्नि वा भुजे ।
योषिद्वामकरे चैव पुरुषो दक्षिणे भुजे ॥ १४१॥

स्तम्भयेदपि ब्रह्याणं मोहयेदपि शङ्करम् ।
वशयेदपि त्रैलोक्यं मारयेदखिलान् रिपून् ॥ १४२॥

उच्चाटयेच्च गीर्वाणं शमयेच्च धनञ्जयम् ।
वन्ध्या पुत्रं लभेच्छीघ्रं निर्धनो धनमाप्नुयात् ॥ १४३॥

त्रिवारं यः पठेद्रात्रौ गणेशस्य पुरः शिवे ।
नग्नः शक्तियुतो देवि भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ॥ १४४॥

प्रत्यक्षवरदं पश्येद्गणेशं साधकोत्तमः ।
य इदं पठते नाम्नां सहस्रं भक्तिपूर्वकम् ॥ १४५॥

तस्य वित्तादिविभवोदारायुः सम्पदः सदा ।
रणे राजमये द्यूते पठेन्नामसहस्रकम् ॥ १४६॥

सर्वत्र जयमाप्नोति गणेशस्य प्रसादतः ॥ १४७॥

इतीदं पुण्यसर्वस्वं मन्त्रनामसहस्रकम् ।
महागणपतेः पुण्यं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ १४७॥

॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे
श्रीमदुच्छिष्टगणेशसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १५ (हनुमान विशेष)

Gavya15


शब्द सिन्धु


अधिक (adhika) = additional
अधिकं (adhikaM) = more
अधिकः (adhikaH) = greater
अधिकतरः (adhikataraH) = very much
अधिकार (adhikaara) = title
अधिकारः (adhikaaraH) = right
अधिकारितन्त्रं (adhikaaritantraM) = (n) bureaucracy
अधिक्षिपति (adhikShipati) = to censure
अधिक्षेपः (adhikShepaH) = (m) accusation
अधिगच्छति (adhigachchhati) = attains
अधिगम्य (adhigamya) = having gone to
अधिदैव (adhidaiva) = the principle of subjective existence
अधिदैवं (adhidaivaM) = governing all the demigods
अधिदैवतं (adhidaivataM) = called adhidaiva
अधिनियमः (adhiniyamaH) = (m) act
अधिप (adhipa) = protector
अधिपति (adhipati) = lord
अधिभुत (adhibhuta) = the principle of objective existence
अधिभूतं (adhibhuutaM) = the material manifestation
अधिमात्र (adhimaatra) = superior
अधिमात्रातम (adhimaatraatama) = the highest, the supreme one
अधियज्ञ (adhiyaGYa) = the principle of sacrifice, incarnation
अधियज्ञः (adhiyaGYaH) = the Supersoul
अधिवास (adhivaasa) = dwelling
अधिवेशनं (adhiveshanaM) = (n) conference
अधिष्ठान (adhishhThaana) = seat, abode
अधिष्ठानं (adhishhThaanaM) = sitting place
अधिष्ठाय (adhishhThaaya) = being so situated
अधिसरि (adhisari) = competent candidate
अधीत (adhiita) = studied
अधीता (adhiitaa) = studied
अधीयानः (adhiiyaanaH) = studied
अधुना (adhunaa) = recently
अधोमुख (adhomukha) = face downwards
अधोमुखश्वानासन (adhomukhashvaanaasana) = the dog stretch posture
अध्ययन (adhyayana) = study
अध्ययनैः (adhyayanaiH) = or Vedic study
अध्यक्षेण (adhyakSheNa) = by superintendence
अध्यात्म (adhyaatma) = the principle of self
अध्यात्मं (adhyaatmaM) = transcendental


पाठ


Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
  • यत्र विद्वज्जनो नास्ति प्राज्ञस्तत्राल्पधीरपि ।
  • यदध्यासितमर्हद्भिस्तद्धि तीर्थं प्रचक्षते ।
  • यद्धात्रा निजभावपट्टलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः।
  • यद्यपि शुद्धं लोकविरुद्धं नाकरणीयं नाचरणीयम्।
  • यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् ।
  • यस्यागमः केवलजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति ।
  • याज्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा ।
  • यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ।
  • योग्यत्वाद् यः समुत्कर्षो निरपायः सः सर्वथा ।
  • यो यद्वपति बीजं हि लभते सोऽपि तत्फलम् ।
  • योऽर्थे शुचिस्सः हि शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ।

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सुभाषित


हनूमते नमः । अञ्जनासूनवे । वायुपुत्राय ।
महाबलाय । रामेष्टाय । फल्गुनसखाय ।
पिङ्गाक्षाय । अमितविक्रमाय । उदधिक्रमणाय ।
सीताशोकविनाशकाय । लक्ष्मणप्राणदात्रे ।
दशग्रीवस्यदर्पघ्ने नमः ।


पठन/स्मरण/मनन


॥ श्रीहनुमद्व्रतम् ॥

तत्रादौ हनुमद्व्रतं कर्तुमारभमाण आचारानुसारेण
विशिष्टाचारपरम्पराप्राप्तां यथाशक्तिद्रव्यैः पम्पापूजां करिष्ये ।
इति सङ्कल्प्य, मार्गशीर्षमासे शुक्लत्रयोदश्यां व्रतं
करिष्यमाणः द्वादश्यामेव नियतो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः
सम्यग्रात्रिं यापयित्वा ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय
कर्तव्यं सर्वमालोकयति ॥

शौनक उवाच
हनुमद्व्रतसङ्कल्पं कर्तुकामोऽब्रवीज्जनः ।
कस्मिन्देशे व्रतं सम्यक्कर्तव्यं वद सूतज ॥ १॥

किं च व्रतं पूर्वतरैः कुत्राचरितमद्भुतम् ।
सन्ति स्थलानि बहुधा गोष्ठवृन्दावनादयः ॥ २॥

वापीकूपतडागाद्याः कुल्याः कृत्रिमविस्तृताः ।
नद्यो नदाः सागराद्याः पर्वताः सरितो द्रुमाः ।
विचार्य बहुधा तच्च वद नो वदतां वर ॥ ३॥

सूत उवाच
साधु पृष्टं महाभागाः सम्यगेवोच्यते मया ।
बहवः सन्ति देशाश्च पुण्याः पुण्यविवर्धनाः ॥

तथापि वक्ष्ये यद्गुह्यं तच्छृण्वन्तु मुनीश्वराः ॥ ४॥

पूर्वं हनुमतः पूजा कृता पम्पासरित्तटे ।
तस्मात् पम्पासरित्तीरे हनुमद्व्रतमुत्तमम् ॥ ५॥

नानादेशेषु कर्तव्या पम्पापूजा प्रयत्नतः ।
ब्राह्मे मुहुर्ते चोत्थाय शौचादिभिरतन्द्रितः ॥ ६॥

नित्यकर्म समाप्याशु योगक्षेमं समाविशेत् ।
ततश्च पञ्चभिर्वाद्यैरुपेतो बन्धुभिवृर्तः ॥ ७॥

तत्रत्यां च नदीं काञ्चिद्गत्वा स्नात्वा च वाग्यतः ।
अघमर्षणमन्त्रैश्च शुचिः प्रयतमानसः ॥ ८॥

सन्ध्यावन्दनपूर्वं च नित्यकर्म समाप्य च ।
पितॄन् सन्तर्प्य यत्नेन ललाटे तिलकोज्ज्वलः ॥ ९॥

षोडशाप्युपचारांश्च पम्पायाः सर्वतो व्रती ॥ १०॥

पम्पा पूजा ॥

हेमकूटगिरिप्रान्तजनानां गिरिसानुगाम् ।
पम्पामावाहयाम्यस्यां नद्यां हृद्यां प्रयत्नतः ॥ आवाहनम्
तरङ्गशतकल्लोलैः रिङ्गत्तामरसोज्ज्वले ।
पम्पानदि नमस्तुभ्यं गृहाणासनमुत्तमम् ॥ आसनम्
हृद्यं सुगन्धसम्पन्नं शुद्धं शुद्धाम्बुसत्कृतम् ।
पाद्यं गृहाण पम्पाख्ये महानदि नमोऽस्तु ते ॥ पाद्यम्
भागीरथि नमस्तुभ्यं सलिलेन सुशोभने ।
अनर्घ्यमर्घ्यमनघे गृह्यतामिदमुत्तमम् ॥ अर्घ्यम्
पम्पानदि नमस्तुभ्यं महापुण्ये सुशोभने ।
गोदावरीजलेनाद्य गृहाणाचमनीयकम् ॥ आचमनीयम्
दुग्धाज्येक्षुरसैः पुण्यैर्दध्नश्च मधुना तथा ।
पञ्चामृतैः स्नापयिष्ये पम्पानदि नमोऽस्तु ते । पञ्चामृतस्नानम्
शुद्धक्षीरैः शुद्धजलैर्नारिकेलाम्बुभिस्तथा ।
पुण्यैः कृष्णानदीतोयैः सिञ्चामि त्वां सरिद्वरे ॥ स्नानम्
महामूल्यं च कार्पासं दिव्यवस्त्रमनुत्तमम् ।
पम्पानदि महापुण्ये पम्पाशोभातिशोभने ॥ वस्त्रम्
श्रौतस्मार्तादिसत्कर्मफलदं पावनं शुभम् ।
यज्ञोपवीतमधुना कल्पये सरिदुत्तमे ॥ यज्ञोपवीतम्
कर्पूरगुटिकामिश्रं कस्तूर्या च विमर्दितम् ।
यत्नेन कल्पितं गन्धं लेपयेऽङ्गं सरिद्वरे ॥ गन्धम्
लक्षणोक्तान्हरिद्राक्तानक्षतांश्चोत्तमाञ्छुभान् ।
पम्पानदि गृहाणेमाञ्छुभशोभातिवृद्धये ॥ अक्षतान्
अतसीकुसुमोपेतं पङ्केरुहदलोज्ज्वलम् ।
कुङ्कुमं शङ्करजटासम्भूते सरिदर्पये ॥ कुङ्कुमम्
कज्जलं त्रिजगद्वन्द्ये महापुण्ये तरङ्गिणि ।
नेत्रयोः पादमनघं गृह्यतां सरितां वरे ॥ नेत्राञ्जनम्
शतपत्रैश्च कह्लारैः कुमुदैर्वकुलैरपि ।
मल्लिकाजातिपुन्नागैः केवलैश्चापि चम्पकैः ॥

तुलसीदामभिश्चापि तथा बिल्वदलैरपि ।
पूजयामि महापुण्ये पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ पुष्पाणि

अथ अङ्गपूजा ॥

गोदावर्यै नमः पादौ पूजयामि । कृष्णायै नमः गुल्फौ पूजयामि ।
पापहारिण्यै नमः जङ्घे पूजयामि । सुभ्रुवे नमः जानुनी पूजयामि ।
उरुतरङ्गिण्यै नमः ऊरू पजयामि । तडिदुज्ज्वलजवायै नमः कटिं पूजयामि ।
अम्बुशोभिन्यै नमः नितम्बं पूजयामि । अणुमध्यायै नमः मध्यं पूजयामि ।
सुस्तनायै नमः स्तनौ पूजयामि । कम्बुकण्ठ्यै नमः कण्ठं पूजयामि ।
ललिताबाहुरङ्गायै नमः बाहू पूजयामि ।
दीर्घवेण्यै नमः वेणीं पूजयामि । सुवक्त्रायै नमः वक्त्रं पूजयामि ।
दुर्वारवारिपूरायै नमः शिरः पूजयामि । सहस्रमुखायै नमः सर्वाङ्गं
पूजयामि ॥

सदशाङ्गं शुभं दिव्यं सगुग्गुलमनुत्तमम् ।
साज्यं परिमलोद्भूतं धूपं स्वीकुरु पावने ॥ धूपम्
साज्यमग्निप्रकाशोद्यत्कोटिसूर्यसमद्युति ।
पश्य दीपं प्रसन्नाङ्गे पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ दीपम्
शाल्यन्नं स्वर्णपात्रस्थं शाकापूपसमन्वितम् ।
साज्यं दधिपायसं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ नैवेद्यम्
पूगैः सुशोभनैश्चापि नागवल्लीदलैर्युतम् ।
ताम्बूलं गृह्यतां देवि पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ ताम्बूलम्
व्रतपूर्तिमहाकीर्तिदिव्यस्फूर्तिप्रकीर्तिदम् ।
कर्तुकामो व्रतमिदं सौवर्णं पुष्पमर्पये ॥ सुवर्णपुष्पम्
प्रदक्षिणत्रयं देवि प्रयत्नेन प्रकल्पितम् ।
पश्याद्य पावने देवि पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ प्रदक्षिणं
नमस्ते नमस्ते विशालोज्ज्वलाङ्गे
नमस्ते नमस्ते लसत्सत्तरङ्गे ।
नमस्ते नमस्ते गिरिप्रान्तरङ्गे
नमस्ते नमस्ते कलद्बर्हिरङ्गे ॥ नमस्कारं
अपराधशतं देवि मत्कृतं च दिने दिने ।
क्षम्यतां पावने देवि पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ क्षमापणम्
पम्पानदि महापुण्ये तरङ्गिणि ! नमोऽस्तु ते ।
त्वत्तीरे हनुमत्पूजा कृता रामेण धीमता ॥

मनोरथफलावाप्तिस्तस्याभीष्टं न संशयः ।
सुग्रीवेण च तीरेऽस्मिन्कपिवर्येण ते कृतम् ॥

संस्कृतं च मनोवाञ्छा सहस्तस्य बभूव सा ।
अतस्त्वन्नीरपुलिने कृते हनुमतो व्रते ॥

श्रेयांसि मम सर्वाणि न विघ्नानि भवन्त्विह ।
इति सम्प्रार्थ्य पम्पाख्यां नदीं शुभतरङ्गिणीम् ॥

कलशोदकपाणिश्च गच्छेत् स्वगृहमादरात् ॥

इति पम्पापूजा ॥

देशकालौ स्मृत्वा, मयाऽऽचरितस्य व्रतस्य सम्पूर्णफलावाप्त्यर्थं
भार्यया सह हनुमत्पूजां करिष्ये । इति सङ्कल्प्य
(पीठस्य अधोभागे)-अतलाय नमः । वितलाय नमः । सुतलाय नमः ।
रसातलाय नमः । तलातलाय नमः । महातलाय नमः । पातालाय नमः ।
तत्र अगाधसर्वतःशब्दात्मने नमः । तत्र कमले कमठाय नमः ।
तदुपरि सहस्रमणिफणाप्रकाशमानशेषाय नमः ।
अष्टदिग्गजेभ्यो नमः ।
तदुपरि भूमण्डलाय नमः । तपोलोकाय । महर्लोकाय नमः ।
सत्यलोकाय । अष्टदिक्पालकेभ्यो नमः । तन्मध्ये मेरवे नमः ।
मेरोर्दक्षिणदिग्भागे द्रोणशैलाय नमः । तन्मध्ये सुरतरवे नमः ।
तन्मूले सुवर्णवेदिकायै नमः । वेद्यां वृक्षस्य पूर्वभागे
नवरत्नखचितचारुरत्नपीठाय नमः ।
(हनुमत् पीठे अलङ्कृतं कलशं निधाय)
ॐ नमो भगवते वायुनन्दनाय नमः । इति कलशस्थापनम् ।
ततः देशकालौ सङ्कीर्त्य सीतासमेतश्रीरामचन्द्रध्यानादि मानसं
कृत्वा श्रीहनुमन्तमावाहयेत् । प्राणप्रतिष्ठां च विधिवत्कुर्यात् ॥

द्वादशग्रन्थिपूजा –
अञ्जनीसूनवे नमः प्रथमग्रन्थिं पूजयामि ।
हनुमते नमः द्वितीयग्रन्थिं पूजयामि ।
वायुपुत्राय नमः तृतीयग्रन्थिं पूजयामि ।
महाबलाय नमः चतुर्थग्रन्थिं पूजयामि ।
रामेष्टाय नमः पञ्चमग्रन्थिं पूजयामि ।
फाल्गुनसखाय नमः षष्ठग्रन्थिं पूजयामि ।
पिङ्गाक्षाय नमः सप्तमग्रन्थिं पूजयामि ।
अमितविक्रमाय नमः अष्टमग्रन्थिं पूजयामि ।
कपीश्वराय नमः नवमग्रन्थिं पूजयामिः ।
सीताशोकविनाशनाय नमः दशमग्रन्थिं पूजयामि ।
लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः एकादशग्रन्थिं पूजयामि ।
दशग्रीवदर्पघ्नाय नमः द्वादशग्रन्थिं पूजयामि ।
भविष्यद्ब्रह्मणेनमः त्रयोदशग्रन्थिं पूजयामि ।

(अङ्ग पूजा)
हनुमते नमः पादौ पूजयामि ।
सुग्रीवसखाय नमः गुल्फौ पूजयामि ।
अङ्गदमित्राय नमः जङ्घे पूजयामि ।
रामदासाय नमः ऊरू पूजयामि ।
अक्षघ्नाय नमः कटिं पूजयामि ।
लङ्कादहनाय नमः वालं पूजयामि ।
रामदासाय नमः नाभिं पूजयामि ।
सागरोल्लङ्घनाय नमः मध्यं पूजयामि ।
लङ्कामर्दनाय नमः केशावलिं पूजयामि ।
सञ्जीवनीहर्त्रे नमः स्तनौ पूजयामि ।
सौमित्रिप्राणदाय नमः वक्षः पूजयामि ।
कुण्ठितदशकण्ठाय नमः कण्ठं पूजयामि ।
रामाभिषेककारिणे नमः हस्तौ पूजयामि ।
मन्त्ररचितरामायणाय नमः वक्त्रं पूजयामि ।
प्रसन्नदवदनाय नमः वदनं पूजयामि ।
पिङ्गनेत्राय नमः नेत्रं पूजयामि ।
श्रुतिपारगाय नमः श्रुतिं पूजयामि ।
ऊर्ध्वपुण्ड्रधारिणे नमः कपोलं पूजयामि ।
मणिकण्ठमालिने नमः शिरः पूजयामि ।
सर्वाभीष्टप्रदाय नमः सर्वाङ्गं पूजयामि ।

दोरग्रहणम्
अञ्जनीगर्भसम्भूत रामकार्यार्थसम्भव ।
वरदातः कृता पूजा रक्ष मां प्रतिवत्सरम् ।
व्रतोद्यापनं – यजमानो महानद्यां माध्याह्निकस्नानं कृत्वा,
नित्यकर्म विधायाऽऽचार्य-ब्रह्मऋत्विग्भिः सहोपविश्य,
प्राणानायम्य,
अद्य शुभतिथौ धर्मपत्नीसमेतस्य मम
हनुमद्-व्रतकल्पोक्त-सम्पूर्णफलावाप्तये
धर्मार्थ-काम-मोक्ष-चतुर्विध-पुरुषार्थसिद्ध्यर्थं
श्रीमदाञ्जनेयप्रीत्यर्थं च हनुमद्व्रतोद्यापनाख्यं कर्म करिष्ये ।
अस्मिन् कर्मणि आचार्यत्वं भवन्तः कुर्वन्त्विति वेदवेत्तारं कुटुम्बिनं
वित्तहीनं शान्तमाचारवन्तं ब्राह्मणमाचार्यत्वे नियोज्य, एवं
लक्षणसहयुक्तमपरं ब्राह्मणं नियोज्य, ततः त्रयोदशकलशावाहनार्थं
त्रयोदशब्राह्मणानृत्विग्विधौ नियोज्य एवमावरणं कृत्वा, ततो
निष्कमात्रसुवर्णेन, तदर्धेन यथाशक्ति वा हनुमत्प्रतिमां कृत्वा
प्राणानायम्य, हनुमद्-व्रतोद्यापनाङ्गत्वेन पम्पापूजां कृत्वा,
पुनः प्राणानायम्य, शुभतिथौ धर्मपत्नीसमेतस्य मम
मनोवाञ्छाफलसिद्ध्यर्थं
श्रीमदाञ्जनेयप्रीत्यर्थमाञ्जनेयप्रतिमापूजां करिष्ये ।
इति सङ्कल्प्य,
तत्प्रतिमाशुद्ध्यर्थं पञ्चामृतस्नपनं कृत्वा, मूलमन्त्रेण
शुद्धोदकस्नपनं कृत्वा, पञ्चप्रस्थपरिमितश्वेततण्डुलोपरि
अलङ्कृतपूर्णकलशं संस्थाप्य तदुपरि प्रतिमामाधाय
प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा।ततस्त्रयोदशकलशान्
प्रतिमावेष्टितांस्तण्डुलेषु निधाय, कलशपूजां कृत्वा,
तेषु कलशेषु वस्त्राण्यावेष्ट्य, तेषु नानाविधफलानि दत्वा,
कलशपूजां कृत्वा, ततः पीठार्चनं कुर्यात् ॥

पीठस्याधस्तले – अतलाय नमः । वितलाय नमः ।
सुतलाय नमः । रसातलाय नमः । तलातलाय नमः ।
महातलाय नमः । पातालाय नमः ।
तथागाधसर्वतोमुख-सुधाधिभ्यां नमः । तत्र कमठाय नमः ।
तदुपरि – सहस्रफणिफणामण्डित-मणिप्रकाशिताशेषलोकशेषाय नमः ।
अष्टदिग्गजेभ्यो नमः । तदुपरि भूमण्डलाय नमः ।
दिक्पालेभ्यो नमः । तन्मध्ये मेरवे नमः ।
मेरोर्दक्षिणदिग्भागे रत्नसानवे नमः । तन्मध्ये सुरतरवे नमः ।
तन्मूले सुवर्णवेदिकायै नमः । वेद्यां वृक्षस्य पूर्वभागे
नवरत्नखचितनूतनपीठाय नमः । (एवं भावयित्वा)
स्वामिन् ! सर्वजगन्नाथ ! यावत् पूजावसानकम् ।
तावत् त्वं प्रीतिभावेन प्रतिमायां स्थिरो भव ॥

ततस्त्रयोदशग्रन्थियुक्तदोरकं प्रतिष्ठाप्य,
ध्यानम् –
वन्दे विद्युद्वलयलसितं ब्रह्मसूत्रं दधानं,
कर्णद्वन्द्वे कनकवलये कुण्डले धारयन्तम् ।
सत्कौपीनं कटिपरिहृतं कामरूपं कपीन्द्रं
नित्यं ध्यायाम्यनिलतनयं वज्रदेहं वरिष्ठम् ॥

प्रतप्त-जाम्बूनद-दिव्यमंसं देदीप्यमानाग्निविभासुराक्षम् ।
प्रफुल्ल-पङ्केरुह-शोभनास्यं ध्याये हृदिस्थं पवमानसूनुम् ॥

अथ कल्पोक्तप्रकारेण आवाहनादि -षोडशोपचारान् कृत्वा
नमःसर्वहितार्थाय जगदाराध्यकर्मणे ।
अमेयायाञ्जनेयाय पुनरर्घ्यं पुरोऽर्पये ।
इति प्रसन्नार्घ्यं समर्पयामि नमः ।
भक्त्या प्रकल्पितैरेतैरुपचारैश्च षोडशैः ।
भगवन् हनुमन्नीश ! प्रीयतां मे प्रियोक्तिभिः ॥

उपचारसमर्पणं यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥

एवं रात्रौ प्रथमयामपूजां कृत्वा,
तस्यां रात्र्यां प्रतियामपूजां कुर्वन्,
गीतवादित्रादिभिर्मङ्गलध्वनिभिर्भागवतपठनादिपुराण-
श्रवणादिभिर्जागरणं कृत्वा, परेद्युः प्रभाते महानद्यां ब्राह्मणैः सह
स्नानं कृत्वा, नित्यकर्म विधाय गन्धादिभिरलङ्कृत्य, गृहमागत्य,
पूर्ववत्पूजां कृत्वा, हनुमद्व्रतोद्यापनाङ्गहोमं कुर्यात् ।
क्षीरान्नेनाज्येन पिप्पलसमिद्भिः कल्पोक्तद्रव्येण
मूलमन्त्रेणाष्टोत्तरसहस्रमष्टोत्तरशतं वा होमं कुर्यात् ।
पूर्णाहुतिं दत्वा, ब्रह्मणे दक्षिणां दत्वा, तत आचार्यं पूजयित्वा,
प्रतिमां सवस्त्रां सालङ्कारां सतण्डुलां च दत्वा, तद्दानसाद्गुण्यार्थं
दक्षिणां दत्वा, आचार्याय सवत्सां सालङ्कारां पयस्विनीं गां दद्यात् ।
तत ऋत्विग्भ्यः सवस्त्रान् कलशान् दत्वा दक्षिणां च दत्वा,
विशिष्टपङ्गुदीनान्धकृपणजनान् ब्राह्मणान् सन्तर्प्य, ऋत्विगादि-
ब्राह्मणान् शतं पञ्चाशत्, पञ्चविंशतिं त्रयोदश वा ब्राह्मणान्
मिष्टान्नभोजनेन सन्तर्प्य, भूरिदानं विभवानुसारेण कुर्यात् ।
एवं कुर्वन् यजमानः कृतार्थो भवति ।
हनुमान् सुप्रीतो वरदो भूत्वा पुत्रपौत्रादि सर्वकामान्
प्रयच्छति । इति शौनकादिकान् प्रति सूतः प्रोवाच । इति ॥

From Hanumatstutimanjari, Mahaperiaval Publication
Proofread by PSA Easwaran psaeaswaran at gmail

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