SanskritLearning

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संस्कृत साधना : पाठ १९ (तिङन्त-प्रकरण ५ :: विशेष नियम)

Sanskrut_19

नमः संस्कृताय !
पिछले पाठ में आपने लुङ् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। लुङ् लकार सामान्य भूतकाल के लिए प्रयुक्त होता है। आशा करता हूँ कि आपने इस लकार से सम्बन्धित नियमों को बुद्धि में स्थिर कर लिया है। आज लङ् लकार की चर्चा करते हैं। यह भी भूतकाल के लिए प्रयुक्त होता है, किन्तु निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

१) लङ् लकार अनद्यतन भूतकाल के लिए प्रयुक्त किया जाता है। ‘अनद्यतन भूतकाल’ अर्थात् ऐसा भूतकाल जो आज से पहले का हो।

जैसे –
वह कल हुआ था = सः ह्यः अभवत्।
वे दोनों परसों हुए थे = तौ परह्यः अभवताम्।
वे सब गतवर्ष हुए थे = ते गतवर्षे अभवन्।

जहाँ आज के भूतकाल की बात कही जाए वहाँ लङ् लकार का प्रयोग नहीं करना।

२) यदि लङ् लकार के रूप के साथ “मा स्म” का प्रयोग कर दिया जाय तो यह निषेध अर्थ वाला हो जाता है। जैसे – दुःखी मत होओ = खिन्नः मा स्म भवः।
ध्यान रहे जब “मा स्म” का प्रयोग करेंगे तो लङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा।

प्राचीन ग्रन्थों में “मा स्म” के साथ लुङ् लकार का भी प्रयोग देखा जाता है, जैसे – “क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ” (श्रीमद्भगवद्गीता २.३)

भू धातु लङ् लकार

अभवत् अभवताम् अभवन्
अभवः अभवतम् अभवत
अभवम् अभवाव अभवाम

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शब्दकोश :
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पैर के लिए संस्कृत शब्द –

१) पादः ( पुँल्लिंग )
२) पद् ( पुँल्लिंग )
३) अङ्घ्रिः ( पुँल्लिंग )
४) चरणः/चरणम् (पुँल्लिंग/नपुंसकलिंग)

‘टखने’ (जो एड़ी के ठीक ऊपर होते हैं) के नाम –

१) घुटिका (स्त्रीलिंग)
२) गुल्फः/गुल्फम् (पुँल्लिंग/नपुंसकलिंग)
ये सदैव द्विवचन में प्रयुक्त होते हैं क्योंकि ये दो दो होते हैं।

एड़ी = पार्ष्णिः (पुँल्लिंग)

घुटना-
१) जानुः/जानु (पुँल्लिंग/नपुंसकलिंग )
२) ऊरुपर्वन् (पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग )
३) अष्ठीवत् (पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग )

ह्यः = बीता हुआ कल
परह्यः = बीता हुआ परसों
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वाक्य अभ्यास :
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कल मेरे पैर बहुत थक गए थे।
= ह्यः मम चरणौ भूरि श्रान्तौ अभवताम्।

परसों मेरे टखनों में बहुत पीड़ा हुई।
= परह्यः मम गुल्फयोः महती पीडा अभवत्।

इस कारण तुम भी दुःखी हुए।
= अनेन कारणेन त्वम् अपि दुःखी अभवः।

अब दुःखी मत होओ।
= सम्प्रति दुःखी मा स्म भवः।

तुम दोनों बीते वर्ष प्रथमश्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे।
= युवां व्यतीते वर्षे प्रथमश्रेण्याम् उत्तीर्णौ अभवतम्।

मैं तो अनुत्तीर्ण हो गया था भाई !!
= अहं तु अनुत्तीर्णः अभवं भ्रातः !!

तुम सब प्रसन्न हुए थे,
= यूयं प्रसन्नाः अभवत,

हम सब दुःखी हुए थे।
= वयं खिन्नाः अभवाम।

मेरे दोनों घुटनों में बहुत दर्द हुआ।
= मम जान्वोः महती पीडा अभवत्।

परसों मेरे गायन से सब लोग प्रसन्न हुए थे।
= परह्यः मम गायनेन सर्वे जनाः प्रसन्नाः अभवन्।

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श्लोक :
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अभूत् सीतापती रामः
अभूतां तौ सुदम्पती।
भूयोऽभूवन् महामोदाः
मा भूः खिन्नः प्रसीद च॥ (स्वस्य)

राम सीता के पति हुए, वे दोनों सुन्दर दम्पती हुए। बहुत महान् आमोद प्रमोद हुए। तुम दुःखी मत होओ प्रसन्न होओ।

इस श्लोक में भू धातु के प्रथम पुरुष के सारे रूप और मध्यम पुरुष एकवचन का रूप है। बहुधा इन्हीं रूपों का प्रयोग होता है, स्मरण कर लीजिए।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ५ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक)

Sanskrut_५5

सुधी मित्रों ! नमः संस्कृताय !!
कल के पाठ में आपने वाक्य में कारकों को पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना सीखा। आशा करता हूँ कि आपने इसका अभ्यास भी अवश्य किया होगा। देखिए बिना अभ्यास के कोई भी विद्या कदापि नहीं आ सकती। सभी राजकुमारों को पढ़ाते तो आचार्य द्रोण ही थे, किन्तु अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ क्यों हुए ? क्योंकि उन्होंने अभ्यास की पराकाष्ठा कर दी थी। इसलिए ध्यान रहे- “अनभ्यासे विषं विद्या।”

आज क्रिया के विषय में समझाते हैं। ध्यान दीजिए, जब ‘क्रिया’ कहेंगे तब आप “धातु” न समझ बैठियेगा। कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व (सत्ता) को ‘क्रिया’ कहते हैं और इन क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द धातु कहे जाते हैं। इनका उपदेश इन्द्र, वायु, काशकृत्स्न, भरद्वाज, पाणिनि, शाकटायन आदि महान् देवताओं और ऋषियों ने किया था। संस्कृतभाषा और संसार की लगभग सभी भाषाओं का मूल यही धातुएँ हैं। किन्तु अभी तो हम “क्रिया” पर चर्चा करेंगे।

१] क्रिया दो प्रकार की होती है- अकर्मक और सकर्मक।

क) अकर्मक क्रिया : जिस क्रिया का कर्म नहीं होता अथवा जिस क्रिया का फल कर्त्ता पर ही पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे – ‘अरविन्द सोता है’ यहाँ शयन की क्रिया हो रही है। उसका फल ‘अरविन्द’ पर ही आश्रित है। यह नहीं कह सकते कि क्या सोता है ? या किसे सोता है ? या किसको सोता है ? इस क्रिया का कर्म नहीं है अतः यह क्रिया अकर्मक है।

ख) सकर्मक क्रिया : जहाँ कर्त्ता की क्रिया का फल किसी अन्य पर पड़े उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस क्रिया का कोई न कोई कर्म हो, वह सकर्मक क्रिया है। जैसे – ‘तारासिंह अशरफ़ अली को पीटता है।’ यहाँ कर्त्ता तारासिंह की क्रिया का असर अशरफ़ अली पर पड़ रहा है, इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।

२] अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं को पहचानने की सरल विधि यह है कि जहाँ वाक्य के उच्चारण करने पर ‘क्या’ ‘किसको’ का प्रश्न शेष न रहे वह अकर्मक क्रिया और जहाँ ये प्रश्न शेष रह जाएँ, वह सकर्मक क्रिया है। ‘मोहन जागता है’ ‘मोहन सोता है’ इस प्रकार के वाक्यों में ‘क्या’ जागता है या ‘किसको’ जागता है इत्यादि प्रश्न शेष नहीं रहते, अतः ‘सोना’ ‘जागना’ आदि क्रियाएँ अकर्मक हैं ।

कौन कौन सी क्रियाएँ अकर्मक होती हैं, यह कल बताएँगे।
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वाक्य अभ्यास
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वृक्षों पर पक्षी बैठते हैं।
वृक्ष अधिकरण, पक्षी कर्त्ता, ‘बैठते हैं’ क्रिया।
= वृक्षेषु खगाः उपविशन्ति।

तुम रमेश के उद्यान से फल लाते हो।
तुम कर्त्ता, रमेश सम्बन्ध, उद्यान अपादान, फल कर्म, ‘लाते हो’ क्रिया।
= त्वं रमेशस्य उद्यानात् फलानि आनयसि।

तुम दोनों पिताजी के रुपये भिखारी को देते हो।
‘तुम दोनों’ कर्ता, पिताजी सम्बन्ध, रुपये कर्म भिखारी सम्प्रदान, ‘देते हो’ क्रिया ।
= युवां पितुः रूप्यकाणि भिक्षुकाय यच्छथः।

मैं साइकिल से विश्वविद्यालय जाता हूँ।
मैं कर्त्ता, साइकिल करण, विश्वविद्यालय कर्म, ‘जाता हूँ’ क्रिया ।
= अहं द्विचक्रिकया विश्वविद्यालयं गच्छामि।

संग से काम उत्पन्न होता है।
संग अपादान, काम कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया ।
= सङ्गात् सञ्जायते कामः।

काम से क्रोध उत्पन्न होता है।
काम अपादान, क्रोध कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया।
= कामात् क्रोधः अभिजायते।

क्रोध से मोह होता है ।
= क्रोधात् भवति सम्मोहः।

मोह से स्मृतिविभ्रम होता है।
= मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।

स्मृतिनाश से बुद्धिनाश होता है।
= स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।

बुद्धिनाश से साधक नष्ट होता है ।
= बुद्धिनाशात् साधकः नश्यति।

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श्लोक :

वेशेन वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च।
वकारैः पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः॥

वेश (पहनावा), शरीर, वाणी, विद्या और विनय – इन पाँच वकारों से युक्त पुरुष पूजित (सम्मानित) होता है।

**उपर्युक्त श्लोक में विभिन्न शब्दों के तृतीया एकवचन के रूप हैं।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १७ (साहित्य विशेष)

Gavya17

 


शब्द सिन्धु


अनहङ्कारः (anaha.nkaaraH) = being without false egoism
अनात्मनः (anaatmanaH) = of one who has failed to control the mind
अनादर (anaadara) = lack of respect
अनादि (anaadi) = without beginning
अनादिं (anaadiM) = without beginning
अनादित्व (anaaditva) = non-beginning
अनादित्वात् (anaaditvaat.h) = due to eternity
अनानसफलम् (anaanasaphalam.h) = (n) pineapple
अनामयं (anaamayaM) = without miseries
अनारम्भात् (anaarambhaat.h) = by nonperformance
अनार्य (anaarya) = persons who do not know the value of life
अनावृत्तिं (anaavRittiM) = no return
अनाशिनः (anaashinaH) = never to be destroyed
अनाश्रितः (anaashritaH) = without taking shelter
अनाहत (anaahata) = unbeaten
अनिकेतः (aniketaH) = having no residence
अनिच्छन् (anichchhan.h) = without desiring
अनित्य (anitya) = uncertain/temporary/ephemeral/transient
अनित्यं (anityaM) = temporary
अनित्यः (anityaH) = nonpermanent
अनियमित (aniyamita) = irregular
अनिर्देश्यं (anirdeshyaM) = indefinite
अनिर्विण्णचेतस (anirviNNachetasa) = without deviation
अनिलः (anilaH) = wind or air
अनिलचुल्लि (anilachulli) = (f) gas (LPG)
अनिवार्य (anivaarya) = (adj) compulsary
अनिश्चयत् (anishchayat.h) = due to non-determination (having not decided)
अनिष्ट (anishhTa) = and undesirable
अनिष्टं (anishhTaM) = leading to hell
अनीश्वरं (aniishvaraM) = with no controller
अनु (anu) = following
अनुकम्पार्थं (anukampaarthaM) = to show special mercy
अनुकारि (anukaari) = like
अनुचारय (anuchaaraya) = (causative of anu+car) follow
अनुचिन्तयन् (anuchintayan.h) = constantly thinking of
अनुतिष्ठन्ति (anutishhThanti) = regularly perform
अनुत्तमं (anuttamaM) = the finest
अनुत्तमां (anuttamaaM) = the highest
अनुदर्शनं (anudarshanaM) = observing
अनुदानं (anudaanaM) = (n) donation, grant
अनुदिनं (anudinaM) = daily
अनुद्दिश्य (anuddishya) = having targetted or aimed at
अनुद्योगिता (anudyogitaa) = unemployment
अनुद्योगी (anudyogii) = unemployed
अनुद्विग्नमनाः (anudvignamanaaH) = without being agitated in mind
अनुद्वेगकरं (anudvegakaraM) = not agitating
अनुपकारिणे (anupakaariNe) = irrespective of return
अनुपश्यति (anupashyati) = one tries to see through authority
अनुपश्यन्ति (anupashyanti) = can see
अनुपश्यामि (anupashyaami) = do I foresee
अनुप्रपन्नाः (anuprapannaaH) = following
अनुबन्ध (anubandha) = (m) result, effect
अनुबन्धं (anubandhaM) = of future bondage
अनुबन्धः (anubandhaH) = (m) annexure


पाठ


1 2

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • शठे शाठ्यं समाचरेत्।
  • शत्रवो यान्ति मित्रत्वं विशुद्धे सति चेतसा ।
  • शत्रोरपि गुणा वाच्याः दोषा वाच्या गुरोरपि ।
  • शरीरं पातयामि कार्यं वा साधयामि।
  • शास्त्रं हि निश्चितधियां क्व न सिद्धमेति।
  • शिरो वा तद्यज्ञस्य यदातिथ्यम् ।
  • शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ।
  • शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ।

सुभाषित


प्रीणाति य सुचरितैः पितरं स पुत्रो
यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् ।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यत्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥

पिता को अपने सद्वर्तन से खुश करनेवाला पुत्र, केवल पति का हित चाहनेवाली पत्नी, और जो सुख-दुःख में समान आचरण रखता हो ऐसा मित्र – ये तीन जगत में पुण्यवान को हि प्राप्त होते हैं ।


पठन/स्मरण/मनन


चम्पू श्रव्य काव्य का एक भेद है, अर्थात गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। गद्य तथा पद्य मिश्रित काव्य को “चंपू” कहते हैं।

गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते – (साहित्य दर्पण ६ / ३३६)
काव्य की इस विधा का उल्लेख साहित्यशास्त्र के प्राचीन आचार्यों- भामह, दण्डी, वामन आदि ने नहीं किया है। यों गद्य पद्यमय शैली का प्रयोग वैदिक साहित्य, बौद्ध जातक, जातकमाला आदि अति प्राचीन साहित्य में भी मिलता है। चम्पूकाव्य परंपरा का प्रारम्भ हमें अथर्व वेद से प्राप्त होता है। चम्पू नाम के प्रकृत काव्य की रचना दसवीं शती के पहले नहीं हुई। त्रिविक्रम भट्ट द्वारा रचित ‘नलचम्पू’, जो दसवीं सदी के प्रारम्भ की रचना है, चम्पू का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अतिरिक्त सोमदेव सुरि द्वारा रचित यशःतिलक, भोजराज कृत चम्पू रामायण, कवि कर्णपूरि कृत आनन्दवृन्दावन, गोपाल चम्पू (जीव गोस्वामी), नीलकण्ठ चम्पू (नीलकण्ठ दीक्षित) और चम्पू भारत (अनन्त कवि) दसवीं से सत्रहवीं शती तक के उदाहरण हैं। यह काव्य रूप अधिक लोकप्रिय न हो सका और न ही काव्यशास्त्र में उसकी विशेष मान्यता हुई। हिन्दी में यशोधरा (मैथिलीशरण गुप्त) को चम्पू-काव्य कहा जाता है, क्योंकि उसमें गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है।

गद्य और पद्य के इस मिश्रण का उचित विभाजन यह प्रतीत होता है कि भावात्मक विषयों का वर्णन पद्य के द्वारा तथा वर्णनात्मक विषयों का विवरण गद्य के द्वारा प्रस्तुत किया जाय। परन्तु चंपूरचयिताओं ने इस मनोवैज्ञानिक वैशिष्ट्य पर विशेष ध्यान न देकर दोनों के संमिश्रण में अपनी स्वतंत्र इच्छा तथा वैयक्तिक अभिरुचि को ही महत्व दिया है।

Let us read and imbibe this version of Sanskrit by पठन/स्मरण/मनन of भोज रचित चंपू रामायण – बाल काण्ड

Read the book here: https://www.scribd.com/doc/100068695/Bhoja-Champu-Champu-Ramayana

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संस्कृत साधना : पाठ १० (सर्वनाम विशेषण-२)

Sanskrut_10

नमः संस्कृताय !!
कल आपने ‘सर्वनाम विशेषण’ के विषय में जाना और तद् , एतद्, यद् और किम् के रूप भी जान लिये। मुझे आभास हो रहा है कि सर्वनाम वाला प्रसंग आपको थोड़ा सा कठिन लग रहा है। किन्तु घबराइये बिल्कुल नहीं। धैर्य रखिए। धैर्य बहुत महान् गुण है। धैर्य, ध्यान और अभ्यास ये तीन आपके मित्र हैं। इन सर्वनाम शब्दों के रूप आपको याद नहीं हुए हैं तो कोई बात नहीं। वाक्यों द्वारा जब आपको अभ्यास करायेंगे तो ये सारे शब्द आपकी जिह्वा पर स्थिर हो जाएँगे। इन्हें याद करने का सबसे सरल उपाय है इनका बारम्बार अभ्यास। अथवा आप इन्हें दिन भर में किन्हीं पाँच व्यक्तियों को सुना दें। इससे आपका अभ्यास भी हो जाएगा और संस्कृत का प्रचार भी।

१) आज आपको इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप बताते हैं।
इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

२) अब आपको एक श्लोक बता देते हैं जिससे आपको यह बात पक्की हो जाएगी कि इदम् , एतद् , अदस् और तद् का प्रयोग कब और कहाँ करना चाहिए।

“इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥”

(इदम् अस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति च एतदः रूपम्।
अदसः तु विप्रकृष्टे तद् इति परोक्षे विजानीयात् ॥)

अर्थात् –
१] इदम् = समीपस्थ वस्तु के लिए
२] एतद् = अत्यन्त समीपस्थ वस्तु के लिए
३] अदस् = दूरस्थ वस्तु के लिए
४] तद् = परोक्ष अर्थात् जो आपको दिखाई न दे ऐसी वस्तु के लिए।

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु

* ध्यानपूर्वक देखिए , आप पाएँगे कि स्त्रीलिंग के द्विवचन के सभी रूप पुँल्लिंग की भाँति ही हैं। एकवचन और बहुवचन में भी थोड़ा सा ही अन्तर है।

अब कल आपको युष्मद् ( तुम ) और अस्मद्( मैं ) के रूप बताकर कुछ दिनों तक केवल अभ्यास करवायेंगे अन्यथा यह सब सिर के ऊपर से चला जाएगा। बुद्धि में कुछ भी न टिकेगा। उपर्युक्त सर्वनामों के कुछ वैकल्पिक रूप भी होते हैं। इन वैकल्पिक रूपों को अभ्यास कराते समय बताएँगे।
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श्लोक : अयम् = यह (इदम् का पुँल्लिंग एकवचन)

अच्छेद्यः अयम् अदाह्यः अयम्
अक्लेद्यः अशोष्यः एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुः
अचलः अयं सनातनः ॥
अव्यक्तः अयम् अचिन्त्यः अयम्
अविकार्यः अयम् उच्यते।
तस्मात् एवं विदित्वा एनम्*
न अनुशोचितुम् अर्हसि॥

*एनम् = इसको (इमम् का वैकल्पिक रूप)
(श्रीमद्भगवद्गीता २।२४-२५॥)

इस प्रकार के और भी श्लोक आप ढूँढकर लिख सकते हैं जिनमें उपर्युक्त सर्वनामों का प्रयोग किया गया हो।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ५० : कृष्ण जन्म विशेष : ब्रह्म संहिता

ब्रह्म संहिता

Gavya45

The Brahma Saṁhitā is a Sanskrit Pañcarātra text, composed of verses of prayer spoken by Brahma glorifying the supreme Lord Kṛṣṇa or Govinda at the beginning of creation. It is revered within Gauḍiya Vaiṣṇavism, whose founder, Caitanya Mahāprabhu (1486–1534),, re-discovered a part of the work, the 62 verses of Chapter 5, at the Adikeshav Temple in Thiruvattar, Tamil Nadu, South India in the 16th Century which had previously been lost for a few centuries.

(१)

ईश्वरः परमः कृष्णःसच्चिदानन्दविग्रहः

अनादिरादिर्गोविन्दःसर्वकारणकारणम्

 

(२)

त्रय्या प्रबुद्धोऽथ विधिर्

वीज्ञाततत्त्वसागरः

तुष्टाव वेदसारेण

स्तोत्रेणानेन केशवम्

 

(३)

चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष

लक्षावृतेषु सुरभिरभिपालयन्तम्

लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(४)

वेणुं क्वणन्तम् अरविन्ददलायताक्षम्

बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम्

कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभं

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(५)

आलोलचन्द्रकलसद्वनमाल्यवंशी

रत्नाङ्गदं प्रणयकेलिकलाविलासम्

श्यामं त्रिभङ्गललितं नियतप्रकाशं

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(६)

अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति

पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति

आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्य

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(७)

अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्तरूपम्

आद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च

वेदेषु दुर्लभमदुर्लभम् आत्मभक्तौ

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(८)

पन्थास् तु कोटिशतवत्सरसम्प्रगम्यो

वायोरथापि मनसो मुनिपुङ्गवानाम्

सोऽप्यस्ति यत्प्रपदसीम्न्यविचिन्त्यतत्त्वे

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(९)

एकोऽप्यसौ रचयितुं जगदण्डकोटिं

यच्छक्तिरस्ति जगदण्डचया यदन्तः

अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थम्

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१०)

यद्भावभावितधियो मनुजास् तथैव

सम्प्राप्य रूपमहिमासनयानभूषाः

सूक्तैर्यमेव निगमप्रथितैः स्तुवन्ति

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(११)

आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभिस्

ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः

गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१२)

प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन

सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति

यं श्यामसुन्दरम् अचिन्त्यगुणस्वरूपं

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१३)

रामादिमूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्

नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु

कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१४)

यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि

कोटिष्वशेषवसुधादि विभूतिभिन्नम्

तद् ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१५)

माया हि यस्य जगदण्डशतानि सूते

त्रैगुण्यतद्विषयवेदवितायमाना

सत्त्वावलम्बिपरसत्त्वं विशुद्धसत्त्वम्

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१६)

आनन्दचिन्मयरसात्मतया मनःसु

यः प्राणिनां प्रतिफलन् स्मरताम् उपेत्य

लीलायितेन भुवनानि जयत्यजस्रम्

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१७)

गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले च तस्य

देवि महेशहरिधामसु तेषु तेषु

ते ते प्रभावनिचया विहिताश् च येन

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१८)

सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका

छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा

इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(१९)

क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात्

सञ्जायते न हि ततः पृथग् अस्ति हेतोः

यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद्

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२०)

दीपार्चिरेव हि दशान्तरम् अभ्युपेत्य

दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा

यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२१)

यः कारणार्णवजले भजति स्म योग

निद्रामनन्तजगदण्डसरोमकूपः

आधारशक्तिम् अवलम्ब्य परां स्वमूर्तिं

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२२)

यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य

जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः

विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२३)

भास्वान् यथाश्मशकलेषु निजेषु तेजः

स्वीयम् कियत् प्रकटयत्यपि तद्वदत्र

ब्रह्मा य एष जगदण्डविधानकर्ता

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२४)

यत्पादपल्लवयुगं विनिधाय कुम्भ

द्वन्द्वे प्रणामसमये स गणाधिराजः

विघ्नान् विहन्तुम् अलमस्य जगत्त्रयस्य

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२५)

अग्निर् महि गगनमम्बु मरुद्दिशश्च

कालस् तथात्ममनसीति जगत्त्रयाणि

यस्माद्भवन्ति विभवन्ति विशन्ति यं च

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२६)

यच्चक्षुरेष सविता सकलग्रहाणां

राजा समस्तसुरमूर्तिरशेषतेजाः

यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृतकालचक्रो

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२७)

धर्मोऽथ पापनिचयः श्रुतयस्तपांसि

ब्रह्मादिकीटपतगावधयश्च जीवाः

यद्दत्तमात्रविभवप्रकटप्रभावा

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२८)

यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म

बन्धानुरूपफलभाजनम् आतनोति

कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजां

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(२९)

यं क्रोधकामसहजप्रणयादिभीति

वात्सल्यमोहगुरुगौरवसेव्यभावैः

सञ्चिन्त्य तस्य सदृशीं तनुमापुरेते

गोविन्दमादिपुरुषंतम् अहं भजामि

 

(३०)

श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो

द्रुमा भूमिश्चिन्तामणिगणमयि तोयममृतम्

कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखि

चिदानन्दं ज्योतिः परम् अपि तद् आस्वाद्यम् अपि च

 

स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान्

निमेषार्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः

भजे श्वेतद्वीपं तम् अहम् इह गोलोकमिति यं

विदन्तस् ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये

 

(३१)

अथोवाच महाविष्णुर्

भगवन्तं प्रजापतिम्

ब्रह्मन् महत्त्वविज्ञाने

प्रजासर्गे च चेन् मतिः

पञ्चश्लोकीमिमां विद्यां

वत्स दत्तां निबोध मे

 

(३२)

प्रबुद्धे ज्ञानभक्तिभ्याम्

आत्मन्यानन्दचिन्मयी

उदेत्यनुत्तमा भक्तिर्

भगवत्प्रेमलक्षणा

 

(३३)

प्रमाणैस्तत्सदाचारैस्

तदभ्यासैर्निरन्तरम्

बोधयन् आत्मनात्मानं

भक्तिमप्युत्तमां लभेत्

 

(३४)

यस्याः श्रेयस्करं नास्ति

यया निर्वृतिमाप्नुयात्

या साधयति माम् एव

भक्तिं तामेव साधयेत्

 

(३५)

धर्मान् अन्यान् परित्यज्य

माम् एकं भज विश्वसन्

यादृशी यादृशी श्रद्धा

सिद्धिर्भवति तादृशी

 

कुर्वन्निरन्तरं कर्म

लोकोऽयमनुवर्तते

तेनैव कर्मणा ध्यायन्

मां परां भक्तिमिच्छति

 

(३६)

अहं हि विश्वस्य चराचरस्य

बीजं प्रधानं प्रकृतिः पुमांश् च

मयाहितं तेज इदं बिभर्षि

विधे विधेहि त्वमथो जगन्ति

 

 

 

संस्कृत साधना : पाठ १४ (अभ्यास)

Sanskrut_14

अभ्यास :
~~~~~~~

इदम् और अदस् सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए ।

इदम् ( यह, इस, इन आदि)
अदस् (वह, उस, उन आदि)

इदम् पुँल्लिंग :

अयम् इमौ इमे
इमम् इमौ इमान्
अनेन आभ्याम् एभिः
अस्मै आभ्याम् एभ्यः
अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
अस्य अनयोः एषाम्
अस्मिन् अनयोः एषु

इदम् नपुसंकलिंग :

इदम् इमे इमानि
इदम् इमे इमानि (शेष पुँल्लिंगवत्)

इदम् स्त्रीलिंग :

इयम् इमे इमाः
इमाम् इमे इमाः
अनया आभ्याम् आभिः
अस्यै आभ्याम् आभ्यः
अस्याः आभ्याम् आभ्यः
अस्याः अनयोः आसाम्
अस्याम् अनयोः आसु

अदस् पुँल्लिंग :

असौ अमू अमी
अमुम् अमू अमून्
अमुना अमूभ्याम् अमीभिः
अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु

अदस् नपुसंकलिंग :

अदः अमू अमूनि
अदः अमू अमूनि (शेष पुँल्लिंगवत्)

अदस् स्त्रीलिंग :

असौ अमू अमूः
अमुम् अमू अमूः
अमुया अमूभ्याम् अमूभिः
अमुष्यै अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः
अमुष्याः अमुयोः अमूषाम्
अमुष्याम् अमुयोः अमूषु
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शब्दकोश :
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‘पक्षी’ के पर्यायवाची शब्द –

1] खगः 2] विहङ्गः 3] विहगः
4] विहङ्गमः 5] विहायस् 6] शकुन्तिः
7] पक्षिन् 8] शकुनिः 9] शकुन्तः
10] शकुनः 11] द्विजः 12] पतत्रिन्
13] पत्रिन् 14] पतङ्गः 15] पतत्
16] पत्ररथः 17] अण्डजः 18] नगौकस्
19] वाजिन् 20] विकिरः 21] विः
22] विष्किरः 23] पतत्रिः 24] नीडोद्भवः
25] गरुत्मत् 26] पित्सित् 27] नभसङ्गमः

* ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

वे पक्षी तीव्र वेग से उड़ते हैं।
= अमी खगाः तीव्रवेगेन उड्डयन्ति।

ये पक्षी खेत में बैठे हैं।
= इमे विहङ्गाः क्षेत्रे आसीनाः सन्ति।

इन पक्षियों को दाना देता हूँ।
= एभ्यः विहगेभ्यः अन्नकणान् ददामि।

इस खेत से पक्षी चले गए हैं।
= अस्मात् क्षेत्रात् पत्ररथाः गताः सन्ति।

इस वाटिका में पक्षी कूजते हैं।
= अस्यां वाटिकायां शकुन्ताः कूजन्ति।

इस वृक्ष पर बहुत पक्षी रहते हैं।
= अस्मिन् वृक्षे बहवः अण्डजाः वसन्ति।

उस बरगद पर बहुत से पक्षी रहते हैं।
= अमुष्मिन् न्यग्रोधे बहवः विष्किराः वसन्ति।

ये पक्षी उन पीपल के वृक्षों पर रहते हैं।
= इमे अण्डजाः अमीषु अश्वत्थेषु वसन्ति।

ये व्याध उन पक्षियों को मारते हैं।
= इमे व्याधाः अमून् अण्डजान् घ्नन्ति।

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श्लोक :
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उदेति सविता ताम्रः
ताम्रम् एवास्तम् एति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च
महताम् एकरूपता ॥

सूर्य रक्तवर्ण ही उदित होता है और रक्तवर्ण ही अस्त होता है। सम्पत्ति और विपत्ति में सज्जन एक समान रहते हैं।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ५५ (गणेश साधना विशेष) :: ऋणहरगणेशस्तोत्रम्

Gavya51

॥ ऋणहरगणेशस्तोत्रम् ॥

सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं
लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम् ।
ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं
सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम् ॥ १॥

सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजितः फलसिद्धये ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ २॥

त्रिपुरस्यवधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ३॥

हिरण्यकशिप्वादीनां वधार्ते विष्णुनार्चितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ४॥

महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ५॥

तारकस्य वधात् पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ६॥

भास्करेण गणेशो हि पूजितश्च स्वसिद्धये।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ७॥

शशिना कान्तिवृद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ८॥

पालनाय च तपसां विश्वामित्रेण पूजितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ९॥

इदं त्वृणहरं स्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनम् ।
एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः ।
दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेरसमतां व्रजेत् ॥ १०॥

॥ इति ऋणहर गणेश स्तोत्रम् ॥

(Dhyanam)

Sindhoora varnam , dwibhujam Ganesam,
Lambodharam Padma dale nivishtam,
Brahamadhi devai pari sevyamanam,
Sidhairaryutham tham Pranamami devam

I salute that God Ganesa, who is of red colour ,
Who has two hands , who has a big paunch,
Who sits on a petal of lotus flower.
Who is served by Lord Brahma and other devas,
And who is saluted by the most eminent sages.

Stotram

1.Srushtyadhou brahmana samyak poojitha phala sidhaye ,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , by worshipping whom,
Lord Brahma got the power of creation, destroy all my debts.

2.Tripurasya vadhaath poorvam Shambunaa samyak architha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Lord Shiva,
Before destruction of Tripuras, destroy all my debts.

3.Hiranya kasypaadheenaam vadharthe Vishunaarchitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Lord Vishnu,
For the sake of killing Hiranya Kasipu , destroy all my debts.

4.Mahishasya vadhe devyaa Gana Nadha Prapoojitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , who was worshipped as Lord of Ganas,
By the goddess for killing Mahishasura , destroy all my debts.

5.Tharakasya vadhaath poorvam , kumarena prapoojitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Lord Subramanya,
Before killing of Tharakasura, destroy all my debts.

6.Bhaskarena Ganeso hi poojitha schavi sidhaye,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi worshipped as Ganesa,
By sun god to get his luster, destroy all my debts.

7.Sasinaa kanthi vrudhyartham poojitho Gana Nayaka,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi, worshipped as Lord of Ganas,
By the moon god for increasing his light , destroy all my debts.

8.Palanaya cha thapasaam Viswamithra poojitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Viswamithra,
For protecting his penance , destroy all my debts.

9.Idham thw runa haram stotram , theevra daridrya nasanam,
Yeka varam paden nithyam varshamekam samahitha,
Daridryam darunam thyakthwa, Kubhera samatham vrajeth.

If this prayer for destruction of debts ,
Which destroys extreme poverty,
Is daily read for one week,
Before the completion of one year,
He would get out of the pitiable poverty and become like Khubera.

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४७ : कृष्ण जन्म विशेष : रामानुजाचार्य रचित श्रीरङ्गगद्यम्

Gavya45

रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक थे। वह ऐसे वैष्णव सन्त थे जिनका भक्ति परम्परा पर बहुत गहरा प्रभाव रहा।

वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर और सूरदास थे। रामानुज ने वेदान्त दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट अद्वैत वेदान्त लिखा था।

रामानुजाचार्य ने वेदान्त के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी आलवार सन्तों के भक्ति-दर्शन तथा दक्षिण के पंचरात्र परम्परा को अपने विचारों का आधार बनाया।

Sriranga Gadyam is a Sanskrit prayer written by the Srivaishnavism philosopher Swami Ramanuja towards the end of the 11th century. It is one of the first bhakti prayers in this school of thought and is the basis for many prayers, like Raghuveera gadyam of this style. It is recited in the 108 divya desam temples including Srirangam.

॥ श्रीरङ्गगद्यम् ॥

चिदचित्परतत्त्वानां तत्त्वयाथार्थ्यवेदिने ।
रामानुजाय मुनये नमो मम गरीयसे ॥

स्वाधीन त्रिविध चेतनाचेतन स्वरूपस्थितिप्रवृत्तिभेदं,
क्लेशकर्माद्यशेषदोषासंस्पृष्टं, स्वाभाविकानवधिकातिशय
ज्ञानबलैश्वर्य वीर्य शक्तितेजस्सौशील्य वात्सल्य मार्दवार्जव सौहार्द
साम्य कारुण्य माधुर्य गाम्भीर्य औदार्य चातुर्य स्थैर्य धैर्य शौर्य
पराक्रम सत्यकाम सत्यसङ्कल्प कृतित्व कृतज्ञताद्यसङ्ख्येय कल्याण
गुणगणौघमहार्णवं, परब्रह्मभूतं, पुरुषोत्तमं, श्रीरङ्गशायिनं,
अस्मत्स्वामिनं, प्रबुद्धनित्यनियाम्य नित्यदास्यैकरसात्मस्वभावोऽहं,
तदेकानुभवः तदेकप्रियः, परिपूर्णं भगवन्तं, विशदतमानुभवेन
निरन्तरमनुभूय, तदनुभवजनितानवधिकातिशय
प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकिङ्करो भवानि ॥

स्वात्म नित्यनियाम्य नित्यदास्यैकरसात्म स्वभावानुसन्धानपूर्वक
भगवदनवधिकातिशय स्वाम्याद्यखिलगुणगणानुभवजनित अनवधिकातिशय
प्रीतिकारिताशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरतिरूप नित्यकैङ्कर्य
प्राप्त्युपायभूतभक्ति तदुपाय सम्यग्ज्ञान तदुपाय समीचीनक्रिया
तदनुगुण सात्विकतास्तिक्यादि समस्तात्मगुणविहीनः, दुरुत्तरानन्त तद्विपर्यय
ज्ञानक्रियानुगुणानादि पापवासना महार्णवान्तर्निमग्नः, तिलतैलवत्
दारुवह्निवत् दुर्विवेच त्रिगुण क्षणक्षरणस्वभाव
अचेतनप्रकृतिव्याप्तिरूप दुरत्यय भगवन्मायातिरोहित स्वप्रकाशः, 
अनाद्यविद्यासञ्चितानन्ताशक्य विस्रंसन कर्मपाशप्रग्रथितः,
अनागतानन्तकाल समीक्षयाऽपि अदृष्टसन्तारोपायः, निखिलजन्तुजात
शरण्य, श्रीमन्नारायण, तव चरणारविन्दयुगलं शरणमहं प्रपद्ये ॥

एवमवस्थितस्यापि अर्थित्वमात्रेण परमकारुणिको भगवान्, स्वानुभवप्रीत्य
उपनीतैकान्तिकात्यन्तिक नित्यकैङ्कर्यैकरतिरूप नित्यदास्यं दास्यतीति
विश्वासपूर्वकं भगवन्तं नित्यकिङ्करतां प्रार्थये ॥

तवानुभूतिसम्भूत प्रीतिकारितदासताम् ।
देहि मे कृपया नाथ न जाने गतिमन्यथा ॥

सर्वावस्थोचिताशेषशेषतैकरतिस्तव ।
भवेयं पुण्डरीकाक्ष त्वमेवैवं कुरुष्व माम् ॥

एवम्भृततत्त्वयाथात्म्यावबोधितदिच्छारहितस्यापि,
एतदुच्चारणमात्रावलम्बनेन, उच्यमानार्थ परमार्थनिष्ठं मे मनः
त्वमेवाद्यैव कारय ॥

अपारकरुणाम्बुधे, अनालोचितविशेषाशेषलोकशरण्य, प्रणतार्तिहर,
आश्रितवात्सल्यैक महोदधे, अनवरतविदित निखिलभूतजात याथात्म्य,
अशेषचराचरभूत, निखिलनियमनिरत, अशेषचिदचिद्वस्तुशेषीभूत, 
निखिलजगदाधार, अखिलजगत्स्वामिन्, अस्मत्स्वामिन्, 
सत्यकाम, सत्यसङ्कल्प, सकलेतरविलक्षण, अर्थिकल्पक, 
आपत्सख, काकुत्स्थ, श्रीमन्नारायण, पुरुषोत्तम, 
श्रीरङ्गनाथ, मम नाथ, नमोऽस्तुते ॥

॥ इति श्रीभगवद्रामानुजविरचितं श्रीरङ्गगद्यं सम्पूर्णम् ॥

“May I be accepted in the eternal and devoted service of that faultless One, who is complete in all respects — that Lord who holds sway over the nature, existence and activity of the three gradations of the conscious (cetana) and the non-conscious (acetana), Who is untouched by the five types of miseries and pious and sinful karmic reactions: Who is an ocean of sublime, unlimited auspicious qualities: who is the Supreme Brahman and Supreme Person; who reclines on the serpent bed in Sri Rangam; my Master who is complete. I, who have clearly understood myself to be eternally subject to Your command; I who have tasted the sweetness of always engaging in Your service; I, who realizes that You are the subject of all my knowledge and devotion; I, who have experienced You constantly without interruption; eager and anxious to be of immense and commendable service at all times and under all circumstances to You; with this eagerness generated by the pleasure of my experience of Yourself, let me, the very personification of desire be of service, be accepted eternally for such service.

I, whose essential nature is built to be ever commanded by Him, understanding this nature and ever thinking of it, meditating always on His great Lordship and all his auspicious qualities, with a devotion which is a means to the service in the form of an intense desire to be of service in all forms under all conditions, possessed of ripe knowledge which would lead to devoted service, engaged in action in the form of service to Him, lacking as I am in personal qualities like virtue (sattva) and firm faith, possessed as I am of qualities and conduct directly opposite to that enumerated and hence steeped in an ageless ocean of sin incapable of being crosses, with naturally endowed knowledge and lustre covered by inevitable association with prakriti which by nature is susceptible to continuous change and is a mixture of the threefold qualities (satva, rajas & tamas), the inevitable association being ordinarily inseparable like oil in the gingelly seed and fire in firewood; bound inextricably by the rope or karma in the form of virtue and sin collected over ages out of ignorance; I who cannot find the means of overcoming this bond to samsAra however long I may try; I take refuge in your lotus feet as the only means of emancipation O, Narayana! ever associated with Sri! The refuge of all created beings! I seek your protection.

Though I am in this state, full of various defects, I beg of the Lord my acceptance in eternal service to him in the firm faith that the all merciful Lord, heeding to my earnest request, will grant me the favor of steadfastness in everlasting service to Him urged by devotion resulting from the experience of the Lord.

My Lord! you should be pleased, out of Your unbounded mercy, to grant the service to You resulting from the joy of experiencing you. Apart from begging you, I do not know of any other means.

O lotus eyed one! I should be eager to render all forms of service under all conditions. You should grant me this state of mind.

Even if I do not have the wish sincerely for the knowledge or that I am not fit for your grace to reach the goal, Please make the words I gave expression to as an excuse to fill in the defeciencies and render me fit.

Oh! Limitless ocean of mercy!! One who does not think of the differences when his subjects are in distress, You who destroys the distress of those who seek You! Great ocean of love to His devotees, You who know the truth about all Your creations at all times! You with wishes always fulfilled ! You who can do all that You desire! Friend in my distress! You who grieves at the pains of all men, May You ever be associated with Sri! Greatest of personalities! Lord of Sri Rangam! My Lord! I prostrate before you.

Ref: http://www.angelfire.com/ok5/livermore/pdf/Sri_Ranga_Gadyam.pdf

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २० (साहित्य विशेष)

Gavya0

स्थित्यतिक्रान्तिभीरूणि स्वच्छान्याकुलितान्यपि ।
तोयानि तोयराशीनां मनांसि च मनस्विनां ।।

Minds of great people are like water in the sea. Even under tumultuous conditions it does not breach its limits and does not get muddy when shaken.


शब्द सिन्धु


अपि (api) = also
अपीतेषु (apiiteshhu) = (Masc.Loc.Pl.) having not drunk(taken water)
अपुण्य (apuNya) = vice
अपुनरावृत्तिं (apunaraavRittiM) = to liberation
अपुष्प (apushhpa) = one without flowers
अपृथिव्योः (apRithivyoH) = to the earth
अपेक्ष् (apekSh.h) = to expect
अपेक्षा (apekShaa) = (f) expectation, hope
अपैशुनं (apaishunaM) = aversion to fault-finding
अपोहनं (apohanaM) = forgetfulness
अप्ययौ (apyayau) = disappearance
अप्रकाशः (aprakaashaH) = darkness
अप्रतिमप्रभाव (apratimaprabhaava) = O immeasurable power
अप्रतिष्ठं (apratishhThaM) = without foundation
अप्रतिष्ठः (apratishhThaH) = without any position
अप्रतीकारं (apratiikaaraM) = without being resistant
अप्रदाय (apradaaya) = without offering
अप्रमेय (aprameya) = the ununderstandable
अप्रमेयं (aprameyaM) = immeasurable
अप्रमेयस्य (aprameyasya) = immeasurable
अप्रवृत्तिः (apravRittiH) = inactivity
अप्राप्तत् (apraaptat.h) = uttained, obtained
अप्राप्य (apraapya) = failing to attain
अप्रामामाण्य (apraamaamaaNya) = Unjustified
अप्रियं (apriyaM) = the unpleasant
अप्रियः (apriyaH) = and the undesirable
अप्सु (apsu) = in water
अफल (aphala) = one without fruit
अफलप्रेप्सुना (aphalaprepsunaa) = by one without desire for fruitive result
अफलाकाङ्क्षिभिः (aphalaakaa.nkShibhiH) = by those devoid of desire for result
अबन्धु (abandhu) = one who does not have any brothers / kinmen
अबल (abala) = helpless (woman)
अबला (abalaa) = (helpless) Woman
अबुद्धयः (abuddhayaH) = less intelligent persons
अबोध (abodha) = Ignorance
अब्द (abda) = Season of plenty
अब्धि (abdhi) = sea
अब्धी (abdhii) = (m) ocean, sea
अब्रवीत् (abraviit.h) = spoke
अब्रह्मण्य (abrahmaNya) = Not kosher
अभक्ताय (abhaktaaya) = to one who is not a devotee
अभय (abhaya) = freedom from fear
अभयं (abhayaM) = fearlessness
अभये (abhaye) = and fearlessness
अभवत् (abhavat.h) = became
अभविष्यत् (abhavishhyat.h) = will become
अभावः (abhaavaH) = changing quality
अभावयतः (abhaavayataH) = of one who is not fixed
अभाषत (abhaashhata) = began to speak


पाठ


1 2 3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सन्तोषं जनयेत् प्राज्ञः तदेवेश्वरपूजनम् ।
  • सन्दीप्ते भवने न कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ?
  • सम्भावितस्य चाकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते ।
  • संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति ।
  • बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा।
  • बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।
  • बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्।
  • बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।
  • बृहत्सहायः कार्यान्तं क्षोदीयान् अपि गच्छति ।
  • ब्राह्मणस्य तु देहोयं नोपभोगाय विद्यते ।

सुभाषित


परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते |
स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम् ||

नितीशतक 32

In this ever-rotating wheel of birth and death, who that is dead, is not indeed born again? But he alone is (considered as) born by whose birth (his) family attains eminence.


पठन/स्मरण/मनन


बृहत्त्रयी के अंतर्गत तीन महाकाव्य आते हैं – “किरातार्जुनीय” “शिशुपालवध” और “नैषधीयचरित”।

Today, we will spend some time with महाकवि भारवि’s work.

किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य में महाकाव्यों की ‘वृहत्त्रयी’ में स्थान प्राप्त है। महाभारत में वर्णित किरातवेशी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघु कथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है। यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत है किन्तु यह मुख्यतः वीर रस प्रधान रचना है।

इतिहासकथुब्भूतं, सन्तसन्‍निस्सयम्पि वा।

काव्यादर्श अलंकारशास्त्राचार्य दंडी (६ठी – ७वीं शती ई.) द्वारा रचित संस्कृतकाव्यशास्त्र संबंधी प्रसिद्ध ग्रंथ है।

Not all Kavya(s) are called Mahakavya. It is not the length but many other criteria that decides the status of Kavya as Mahakavya. For example: It has to be इतिवृत. Story of Mahakavya should be based on Itihas or well-known popular benevolent person. It is story based on Mahabharata, referenced from Vana parva.

विभावभावानुभाव सञ्चार्यौचित्यचारूणः । विधिः कथाशरीरस्य वृर्त्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा।

ध्वन्यालोकः/उद्द्योतः ३ – १०

Not only that, कवि’s job is to instill and maintain रस in portion of इतिहास where it is missing as per Kavi.

 

Let us read this first Sarg. Tomorrow, we will explore notable quotes from this KAvya.

 

किरातार्जुनीयम्/प्रथमः सर्गः

श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् ।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ।। १.१ ।।

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ।। १.२ ।।

द्विषां विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः ।
स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं विनिश्चितार्थामिति वाचमाददे ।। १.३ ।।

क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।
अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।। १.४ ।।

स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपं हितान्न यः संशृणुते स किंप्रभुः ।
सदानुकूलेषु हि कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसम्पदः ।। १.५ ।।

निसर्गदुर्बोधमबोधविक्लवाः क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ।। १.६ ।।

विशङ्कमानो भवतः पराभवं नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः ।
दुरोदरच्छद्मजितां समीहते नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः ।। १.७ ।।

तथापि जिह्मः स भवज्जिगीषया तनोति शुभ्रं गुणसम्पदा यशः ।
समुन्नयन्भूतिमनार्यसंगमाद्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः ।। १.८ ।।

कृतारिषड्वर्गजयेन मानवीमगम्यरूपां पदवीं प्रपित्सुना ।
विभज्य नक्तंदिवमस्ततन्द्रिणा वितन्यते तेन नयेन पौरुषम् ।। १.९ ।।

सखीनिव प्रीतियुजोऽनुजीविनः समानमानान्सुहृदश्च बन्धुभिः ।
स सन्ततं दर्शयते गतस्मयः कृताधिपत्यामिव साधु बन्धुताम् ।। १.१० ।।

असक्तमाराधयतो यथायथं विभज्य भक्त्या समपक्षपातया ।
गुणानुरागादिव सख्यमीयिवान्न बाधतेऽस्य त्रिगणः परस्परम् ।। १.११ ।।

निरत्ययं साम न दानवर्जितं न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियां ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ।। १.१२ ।।

वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवं ।। १.१३ ।।

विधाय रक्षान्परितः परेतरानशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ।। १.१४ ।।

अनारतं तेन पदेषु लम्भिता विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायतीरुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ।। १.१५ ।।

अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलं तदीयमास्थाननिकेतनाजिरं ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ।। १.१६ ।।

सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलैरकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृकाश्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ।। १.१७ ।।

महौजसो मानधना धनार्चिता धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः ।
न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ।। १.१८ ।।

उदारकीर्तेरुदयं दयावतः प्रशान्तबाधं दिशतोऽभिरक्षया ।
स्वयं प्रदुग्धेऽस्य गुणैरुपस्नुता वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी ।। १.१९ ।।

महीभुजां सच्चरितैश्चरैः क्रियाः स वेद निःशेषमशेषितक्रियः ।
महोदयैस्तस्य हितानुबन्धिभिः प्रतीयते धातुरिवेहितं फलैः ।। १.२० ।।

न तेन सज्यं क्वचिदुद्यतं धनुर्न वा कृतं कोपविजिह्ममाननम् ।
गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम् ।। १.२१ ।।

स यौवराज्ये नवयौवनोद्धतं निधाय दुःशासनमिद्धशासनः ।
मखेष्वखिन्नोऽनुमतः पुरोधसा धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम् ।। १.२२ ।।

प्रलीनभूपालमपि स्थिरायति प्रशासदावारिधि मण्डलं भुवः ।
स चिन्तयत्येव भियस्त्वदेष्यतीरहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता ।। १.२३ ।।

कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः ।
तवाभिधानाद्व्यथते नताननः स दुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः ।। १.२४ ।।

तदाशु कर्तुं त्वयि जिह्ममुद्यते विधीयतां तत्र विधेयमुत्तरम् ।
परप्रणीतानि वचांसि चिन्वतां प्रवृत्तिसाराः खलु मादृशां धियः ।। १.२५ ।।

इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ।। १.२६ ।।

निशम्य सिद्धिं द्विषतामपाकृतीस्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनीरुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ।। १.२७ ।।

भवादृशेषु प्रमदाजनोदितं भवत्यधिक्षेप इवानुशासनम् ।
तथापि वक्तुं व्यवसाययन्ति मां निरस्तनारीसमया दुराधयः ।। १.२८ ।।

अखण्डमाखण्डलतुल्यधामभिश्चिरं धृता भूपतिभिः स्ववंशजैः ।
त्वया स्वहस्तेन मही मदच्युता मतङ्गजेन स्रगिवापवर्जिता ।। १.२९ ।।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिता इवेषवः ।। १.३० ।।

गुणानुरक्तां अनुरक्तसाधनः कुलाभिमानी कुलजां नराधिपः ।
परैस्त्वदन्यः क इवापहारयेन्मनोरमां आत्मवधूं इव श्रियं ।। १.३१ ।।

भवन्तं एतर्हि मनस्विगर्हिते विवर्तमानं नरदेव वर्त्मनि ।
कथं न मन्युर्ज्वलयत्युदीरितः शमीतरुं शुष्कं इवाग्निरुच्छिखः ।। १.३२ ।।

अवन्ध्यकोपस्य निहन्तुरापदां भवन्ति वश्याः स्वयं एव देहिनः ।
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः ।। १.३३ ।।

परिभ्रमंल्लोहितचन्दनोचितः पदातिरन्तर्गिरि रेणुरूषितः ।
महारथः सत्यधनस्य मानसं दुनोति ते कच्चिदयं वृकोदरः ।। १.३४ ।।

विजित्य यः प्राज्यं अयच्छदुत्तरान्कुरूनकुप्यं वसु वासवोपमः ।
स वल्कवासांसि तवाधुनाहरन्करोति मन्युं न कथं धनंजयः ।। १.३५ ।।

वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वं एतौ धृतिसंयमौ यमौ विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुं ।। १.३६ ।।

इमां अहं वेद न तावकीं धियं विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ।। १.३७ ।।

पुराधिरूढः शयनं महाधनं विबोध्यसे यः स्तुतिगीतिमङ्गलैः ।
अदभ्रदर्भां अधिशय्य स स्थलीं जहासि निद्रां अशिवैः शिवारुतैः ।। १.३८ ।।

पुरोपनीतं नृप रामणीयकं द्विजातिशेषेण यदेतदन्धसा ।
तदद्य ते वन्यफलाशिनः परं परैति कार्श्यं यशसा समं वपुः ।। १.३९ ।।

अनारतं यौ मणिपीठशायिनावरञ्जयद्राजशिरःस्रजां रजः ।
निषीदतस्तौ चरणौ वनेषु ते मृगद्विजालूनशिखेषु बर्हिषां ।। १.४० ।।

द्विषन्निमित्ता यदियं दशा ततः समूलं उन्मूलयतीव मे मनः ।
परैरपर्यासितवीर्यसम्पदां पराभवोऽप्युत्सव एव मानिनां ।। १.४१ ।।

विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषां ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ।। १.४२ ।।

पुरःसरा धामवतां यशोधनाः सुदुःसहं प्राप्य निकारं ईदृशं ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परान्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ।। १.४३ ।।

अथ क्षमां एव निरस्तसाधनश्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनं ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकं ।। १.४४ ।।

न समयपरिरक्षणं क्षमं ते निकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः ।
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा विदधति सोपधि संधिदूषणानि ।। १.४५ ।।

विधिसमयनियोगाद्दीप्तिसंहारजिह्मं शिथिलबलं अगाधे मग्नं आपत्पयोधौ ।
रिपुतिमिरं उदस्योदीयमानं दिनादौ दिनकृतं इव लक्ष्मीस्त्वां समभ्येतु भूयः ।। १.४६ ।।

इति भारविकृतौ महाकाव्ये किरातार्जुनीये प्रथमः सर्गः ।

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २९ (शंकराचार्य विशेष)

Gavya29

 


शब्द सिन्धु


यज्ञ (yaGYa) = a sacrifice
यज्ञं (yaGYaM) = sacrifice
यज्ञः (yaGYaH) = performance of yajna
यज्ञभाविताः (yaGYabhaavitaaH) = being satisfied by the performance of sacrifices
यज्ञविदः (yaGYavidaH) = conversant with the purpose of performing sacrifices
यज्ञशिष्ट (yaGYashishhTa) = of the result of such performances of yajna
यज्ञशिष्टा (yaGYashishhTaa) = of food taken after performance of yajna
यज्ञक्षपित (yaGYakShapita) = being cleansed as the result of such performances
यज्ञाः (yaGYaaH) = sacrifices
यज्ञात् (yaGYaat.h) = from the performance of sacrifice
यज्ञानां (yaGYaanaaM) = sacrifices
यज्ञाय (yaGYaaya) = for the sake of Yajna (KRishhNa)
यज्ञार्थात् (yaGYaarthaat.h) = done only for the sake of Yajna, or Visnu
यज्ञे (yaGYe) = in sacrifice
यज्ञेन (yaGYena) = by sacrifice
यज्ञेशः (yaGYeshaH) = lord of all sacrifices, worshipping rites
यज्ञेषु (yaGYeshhu) = in the performances of yajna, sacrifice
यज्ञैः (yaGYaiH) = with sacrifices
या (yaa) = to go
याचक (yaachaka) = begger
याचते (yaachate) = (1 ap) to beg, to plead
याजि (yaaji) = worshiper
यातयामं (yaatayaamaM) = food cooked three hours before being eaten
याता (yaataa) = (f) husband’s brother’s wife
याति (yaati) = goes
यात्रा (yaatraa) = maintenance
याथार्थ्यमेव (yaathaarthyameva) = the original nature of things or the natural states + alone
यादसां (yaadasaaM) = of all aquatics
यादृक् (yaadRik.h) = as it is
यान् (yaan.h) = those who
यान्ति (yaanti) = undergo
याभिः (yaabhiH) = by which
याम (yaama) = one-eighth part of day, three yaamaas constitute one night
यामिनि (yaamini) = night
यामिमां (yaamimaaM) = all these
यामुन (yaamuna) = of the yamunaa river
यावच्च||न्द्रश्च (yaavachcha||ndrashcha) = yAvat.h + chandraH + cha:till the moon and (sun last)
यावत् (yaavat.h) = by the time when
यावन्तः (yaavantaH) = as many as
यावान् (yaavaan.h) = all that
यास्यसि (yaasyasi) = you will go
युक्त (yukta) = used
युक्तः (yuktaH) = dovetailed
युक्तचेतसः (yuktachetasaH) = their minds engaged in Me
युक्ततमः (yuktatamaH) = the greatest yogi
युक्ततमाः (yuktatamaaH) = most perfect in yoga
युक्तस्य (yuktasya) = engaged
युक्ता (yuktaa) = with
युक्ताः (yuktaaH) = engaged
युक्तात्म (yuktaatma) = having the mind firmly set on
युक्तात्मा (yuktaatmaa) = self-connected
युक्ति (yukti) = utility ; proportion
युक्ते (yukte) = being yoked
युक्तेन (yuktena) = being engaged in meditation
युक्तैः (yuktaiH) = engaged
युक्त्वा (yuktvaa) = being absorbed
युग (yuga) = World Ages
युगपत् (yugapat.h) = simultaneously
युगले (yugale) = dual
युगे (yuge) = millennium
युज् (yuj.h) = to yoke, join, concentrate on
युज्यते (yujyate) = is engaged
युज्यस्व (yujyasva) = engage (fight)
युञ्जतः (yuJNjataH) = constantly engaged
युञ्जन् (yuJNjan.h) = practicing
युञ्जीत (yuJNjiita) = must concentrate in KRishhNa consciousness
युञ्ज्यात् (yuJNjyaat.h) = should execute
युत (yuta) = equipped with
युतक (yutaka) = (n) shirt
युद्ध (yuddha) = Planetary War
युद्धं (yuddhaM) = war
युद्धविशारदाः (yuddhavishaaradaaH) = experienced in military science
युद्धात् (yuddhaat.h) = than fighting
युद्धाय (yuddhaaya) = for the sake of fighting
युद्धे (yuddhe) = in the fight
युधामन्युः (yudhaamanyuH) = Yudhamanyu
युधि (yudhi) = in the fight
युधिष्ठिरः (yudhishhThiraH) = Yudhisthira
युध्य (yudhya) = fight
युध्यते (yudhyate) = (4 ap) to fight
युध्यस्व (yudhyasva) = fight
युयुत्सवः (yuyutsavaH) = desiring to fight
युयुत्सुं (yuyutsuM) = all in a fighting spirit
युयुधानः (yuyudhaanaH) = Yuyudhana
युवन् (yuvan.h) = young
युवा (yuvaa) = the two youths
युष्मासु (yushhmaasu) = (Masc.Loc.Pl.) among yourselves
यूथ (yuutha) = (neut) collection, troop
ये (ye) = those who
येथेच्चया (yethechchayaa) = (adverb) at will
येन (yena) = by whom
येनकेनचित् (yenakenachit.h) = with anything
येषां (yeshhaaM) = whose


पाठ


Please read below lesson and understand it based on previous lessons.

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सूक्तयः

  • इदमेव सुबुद्धित्वम् आयादल्पतरो व्ययः ।
  • इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ।
  • ईर्ष्या कलहमूलं स्यात् ।
  • उत्तमस्य विशेषेणे कलङ्कोत्पादको जनः ।
  • उत्तिष्ठत, जागृत, प्राप्य वरान् निबोधत ।
  • उत्पद्यन्ते विलीयन्ते दरिद्राणां मनोरथाः ।
  • उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।
  • उदिते हि सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः।
  • उद्धरेत् दीनमात्मानं, समर्थो धर्ममाचरेत् ।
  • उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
  • उपदेशो हि न मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।
  • उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञः अपायं च विचिन्तयेत्।
  • उष्णो दहति चाङ्गारः, शीतः कृष्णायते करम्।

सुभाषित


सुवर्णाज्जायमानस्य सुवर्णत्वं च शाश्वतम् ।
ब्रह्मणो जायमानस्य ब्रह्मत्वं च तथा भवेत् ॥

Just as things made up of Gold will has nature of Gold, so a being born of Brahman has always the nature of Brahman.


पठन -> मनन -> स्मरण


॥ स्वात्मप्रकाशिका ॥

॥श्रीः॥

॥स्वात्मप्रकाशिका॥

जगत्कारणमज्ञानमेकमेव चिदन्वितम्।
एक एव मनः साक्षी जानात्येवं जगत्त्रयम्॥१॥

विवेकयुक्तबुद्ध्याहं जानाम्यात्मानमद्वयम्।
तथापि बन्धमोक्षादिव्यवहारः प्रतीयते॥२॥

विवर्तोऽपि प्रपञ्चो मे सत्यवद्भाति सर्वदा।
इति संशयपाशेन बद्धोऽहं छिन्द्धि संशयम्॥३॥

एवं शिष्यवचः श्रुत्वा गुरुराहोत्तरं स्फुटम्।
नाज्ञानं न च बुद्धिश्च न जगन्न च साक्षिता॥४॥

गन्धमोक्षादयः सर्वे कृताः सत्ये'द्वये त्वयि।
भातीत्युक्ते जगत्सर्वं सद्रूपं ब्रह्म तद्भवेत्॥५॥

सर्पादौ रज्जुसत्तेव ब्रह्मसत्तैव केवलम्।
प्रपञ्चाधाररूपेण वर्तते तज्जगन्न हि॥६॥

यथेक्षुमभिसंव्याप्य शर्करा वर्तते तथा।
आश्चर्यब्रह्मरूपेण त्वं व्याप्तोऽसि जगत्त्रयम्॥७॥

मरुभूमौ जलं सर्वं मरुभूमात्रमेव तत्।
जगत्त्रयमिदं सर्वं चिन्मात्रं सुविचारतः॥८॥

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनस्त्वयि कल्पिताः।
बुद्बुदादितरङ्गान्ता विकाराः सागरे यथा॥९॥

तरङ्गत्वं ध्रुवं सिन्धुर्न वाञ्छति यथा तथा।
विषयानन्दवाञ्छा ते महदानन्दरूपतः॥१०॥

पिष्टं व्याप्य गुडं यद्वन्माधुर्यं न हि वाञ्छति।
पूर्णानन्दो जगद्व्याप्य तदानन्दं न वाञ्छति॥११॥

दारिद्र्याशा यथा नास्ति संपन्नस्य तथा तव।
ब्रह्मानन्दनिमग्नस्य विषयाशा न संभवेत्॥१२॥

विषं दृष्ट्वामृतं दृष्ट्वा विषं त्यजति बुद्धिमान्।
आत्मानमपि दृष्ट्वा त्वं त्यजानात्मानमादरात्॥१३॥

घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति।
देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति॥१४॥

निराकारं जगत्सर्वं निर्मलं सच्चिदात्मकम्।
द्वैताभावात्कथं कस्माद्भयं पूर्णस्य मे वद॥१५॥

ब्रह्मादिकं जगत्सर्वं त्वय्यानन्दे प्रकल्पितम्।
त्वय्येव लीनं जगत्त्वं कथं लीयसे वद॥१६॥

न हि प्रपञ्चो न हि भूतजातं
न चेन्द्रियं प्राणगणो न देहः।
न बुद्धिचित्तं न मनो न कर्ता
ब्रह्मैव सत्यं परमात्मरूपम्॥१७॥

सर्वं सुखं विद्धि सुदुःखनाशा-
त्सर्वं च सद्रूपमसत्यनाशात्।
चिद्रूपमेव प्रतिभानयुक्तं
तस्मादखण्डं परमात्मरूपम्॥१८॥

चिदेव देहस्तु चिदेव लोका-
श्चिदेव भूतानि चिदिन्द्रियाणि।
कर्ता चिदन्तःकरणं चिदेव
चिदेव सत्यं परमार्थरूपम्॥१९॥

न मे बन्धो न मे मुक्तिर्न मे शास्त्रं न मे गुरुः।
मायामात्रविलासो हि मायातीतोऽहमद्वयः॥२०॥

राज्यं करोतु विज्ञानी भिक्षामटतु निर्भयः।
दोषैर्न लिप्यते शुद्धः पद्मपत्रमिवाम्भसा॥२१॥

पुण्यानि पापकर्माणि स्वप्नगानि न जाग्रति।
एवं जाग्रत्पुण्यपापकर्माणि न हि मे प्रभोः॥२२॥

कायः करोतु कर्माणि वृथा वागुच्यतामिह।
राज्यं ध्यायतु वा बुद्धिः पूर्णस्य मम का क्षतिः॥२३॥

प्राणाश्चरन्तु तद्धर्मैः कामैर्वा हन्यतां मनः।
आनन्दामृतपूर्णस्य मम दुःखं कथं भवेत्॥२४॥

आनन्दाम्बुधिमग्नोऽसौ देही तत्र न दृश्यते।
लवणं जलमध्यस्थं यथा तत्र लयं गतम्॥२५॥

इन्द्रियाणि मनः प्राणा अहंकारः परस्परम्।
जाड्यसंगतिमुत्सृज्य मग्ना मयि चिदर्णवे॥२६॥

आत्मानमञ्जसा वेद्मि त्वज्ञानं प्रपलायितम्।
कर्तृत्वमद्य मे नष्टं कर्तव्यं वापि न क्वचित्॥२७॥

चिदमृतसुखराशौ चित्तफेनं विलीनं
क्षयमधिगत एव वृत्तिचञ्चत्तरङ्गः।
स्तिमितसुखसमुद्रो निर्विचेष्टः सुपूर्णः
कथमिह मम दुखं सर्वदैकोऽहमस्मि॥२८॥

आनन्दरूपोऽहमखण्डबोधः
परात्परोऽहं घनचित्प्रकाशः।
मेघा यथा व्योम न च स्पृशन्ति
संसारदुःखानि न मां स्पृशन्ति॥२९॥

अस्थिमांसपुरीषान्त्रचर्मलोमसमन्वितः।
अन्नादः स्थूलदेहः स्यादतोऽहं शुद्धचिद्घनः॥३०॥

स्थूलदेहाश्रिता एते स्थूलाद्भिन्नस्य मे न हि।
लिङ्गं जडात्मकं नाहं चित्स्वरूपोऽहमद्वयः॥३१॥

क्षुत्पिपासान्ध्यबाधिर्यकामक्रोधादयोऽखिलाः।
लिङ्गदेहाश्रिता ह्येते नैवालिङ्गस्य मे विभोः॥३२॥

अनाद्यज्ञानमेवात्र कारणं देहमुच्यते।
नाहं कारणदेहोऽपि स्वप्रकाशो निरञ्जनः॥३३॥

जडत्वप्रियमोदत्वधर्माः कारणदेहगाः।
न सन्ति मम नित्यस्य निर्विकारस्वरूपिणः॥३४॥

जीवाद्भिन्नः परेशोऽस्ति परेशत्वं कुतस्तव।
इत्यज्ञजनसंवादो विचारः क्रियतेऽधुना॥३५॥

अधिष्ठानं चिदाभासो बुद्धिरेतत्त्रयं यदा।
अज्ञानादेकवद्भाति जीव इत्युच्यते तदा॥३६॥

अधिष्ठानं न जीवः स्यात्प्रत्येकं निर्विकारतः।
अवस्तुत्वाच्चिदाभासो नास्ति तस्य च जीवता॥३७॥

प्रत्येकं जीवता नास्ति बुद्धेरपि जडत्वतः।
जीव आभासकूटस्थबुद्धित्रयमतो भवेत्॥३८॥

मायाभासो विशुद्धात्मा त्रयमेतन्महेश्वरः।
मायाभासोऽप्यवस्तुत्वात्प्रत्येकं नेश्वरो भवेत्॥३९॥

पूर्णत्वान्निर्विकारत्वाद्विशुद्धत्वान्महेश्वरः।
जडत्वहेतोर्मायायामीश्वरत्वं नु दुर्घटम्॥४०॥

तस्मादेतत्त्रयं मिथ्या तदर्थो नेश्वरो भवेत्।
इति जीवेश्वरौ भातः स्वाज्ञानान्न हि वस्तुतः॥४१॥

घटाकाशमठाकाशौ महाकाशे प्रकल्पितौ।
एवं मयि चिदाकाशे जीवेशौ परिकल्पितौ॥४२॥

मायातत्कार्यविलये नेश्वरत्वं च जीवता।
ततः शुद्धचिदेवाहं चिद्व्योमनिरुपाधितः॥४३॥

सत्यचिद्धनमनन्तमद्वयं
सर्वदृश्यरहितं निरामयम्।
यत्पदं विमलमद्वयं शिवं
तत्सदाहमिति मौनमाश्रये॥४४॥

पूर्णमद्वयमखण्डचेतनं
विश्वभेदकलनादिवर्जितम्।
अद्वितीयपरसंविदंशकं
तत्सदाहमिति मौनमाश्रये॥४५॥

जन्ममृत्युसुखदुःखवर्जितं
जातिनीतिकुलगोत्रदूरगम्।
चिद्विवर्तजगतोऽस्य कारणं
तत्सदाहमिति मौनमाश्रये॥४६॥

उलूकस्य यथा भानावन्धकारः प्रतीयते।
स्वप्रकाशे परानन्दे तमो मूढस्य भासते॥४७॥

यथा दृष्टिनिरोधार्तो सूर्यो नास्तीति मन्यते।
तथाज्ञानावृतो देही ब्रह्म नास्तीति मन्यते॥४८॥

यथामृतं विषाद्भिन्नं विषदोषैर्न लिप्यते।
न स्पृशामि जडाद्भिन्नो जडदोषान्प्रकाशयन्॥४९॥

स्वल्पापि दीपकणिका बहुलं नाशयेत्तमः।
स्वल्पोऽपि बोधो महतीमविद्यां शमयेत्तथा॥५०॥

चिद्रूपत्वान्न मे जाड्यं सत्यत्वान्नानृतं मम।
आनन्दत्वान्न मे दुःखमज्ञानाद्भाति तत्त्रयम्॥५१॥

कालत्रये यथा सर्पो रज्जौ नास्ति तथा मयि।
अहंकारादि देहान्तं जगन्नास्त्यहमद्वयः॥५२॥

भानौ तमःप्रकाशत्वान्नाङ्गीकुर्वन्ति सज्जनाः।
तमस्तत्कार्यसाक्षीति भ्रान्तबुद्धिरहो मयि॥५३॥

यथा शीतं जलं वह्निसंबन्धादुष्णवद्भवेत्।
बुद्धितादात्म्यसंबन्धात्कर्तृत्वं वस्तुतो न हि॥५४॥

जलबिन्दुभिराकाशं न सिक्तं न च शुध्यति।
तथा गङ्गाजलेनायं न शुद्धो नित्यशुद्धतः॥५५॥

वृक्षोत्पन्नफलैर्वृक्षो यथा तृप्तिं न गच्छति।
मय्यध्यस्तान्नपानाद्यैस्तथा तृप्तिर्न विद्यते॥५६॥

स्थाणौ प्रकल्पितश्चोरः स स्थाणुत्वं न बाधते।
स्वस्मिन्कल्पितजीवश्च स्वं बाधितुमशक्यते॥५७॥

अज्ञाने बुद्धिविलये निद्रा सा भण्यते बुधैः।
विलीनाज्ञानतत्कार्ये मयि निद्रा कथं भवेत्॥५८॥

बुद्धेः पूर्णविकासोऽयं जागरः परिकीर्त्यते।
विकारादिविहीनत्वाज्जागरो मे न विद्यते॥५९॥

सूक्ष्मनाडीषु संचारो बुद्धेः स्वप्नः प्रजायते।
संचारधर्मरहिते स्वप्नो नास्ति तथा मयि॥६०॥

परिपूर्णस्य नित्यस्य शुद्धस्य ज्योतिषो मम।
आगन्तुकमलाभावात्किं स्नानेन प्रयोजनम्॥६१॥

देशाभावात्क्व गन्तव्यं स्थानाभावात्क्व वा स्थितिः।
पूर्णे मयि स्थानदेशौ कल्पितावहमद्वयः॥६२॥

प्राणसंचारसंशोषात्पिपासा जायते खलु।
शोषणानर्हचिद्रूपे मय्येषा जायते कथम्॥६३॥

नाडीषु पीड्यमानासु वाय्वग्निभ्यां भवेत्क्षुधा।
तयोः पीडनहेतुत्वात्संविद्रूपे कथं मयि॥६४॥

शरीरस्थितिशैथिल्यं श्वेतलोमसमन्वितम्।
जरा भवति सा नास्ति निरंशे मयि सर्वगे॥६५॥

योषित्क्रीडा सुखस्यान्तर्गर्वाढ्यं यौवनं किल।
आत्मानन्दे परे पूर्णे मयि नास्ति हि यौवनम्॥६६॥

मूढबुद्धिपरिव्याप्तं दुःखानामालयं सदा।
बाल्यं कोपनशीलान्तं न मे सुखजलाम्बुधेः॥६७॥

एवं तत्त्वविचाराब्धौ निमग्नानां सदा नृणाम्।
परमाद्वेतविज्ञानमपरोक्षं न संशयः॥६८॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ
स्वात्मप्रकाशिका संपूर्णा॥

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