SanskritLearning

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संस्कृत साधना : पाठ २९ (तिङन्त-प्रकरण १४ :: लुट् लकार अभ्यास )

Sanskrut_29

भू धातु, लुट् लकार

भविता भवितारौ भवितारः 
भवितासि भवितास्थः भवितास्थ
भवितास्मि भवितास्वः भवितास्मः

शब्दकोश :
=======

रात्रि के पर्यायवाची शब्द –
१) शर्वरी
२) निशा
३) निशीथिनी
४) रात्रिः
५) त्रियामा
६) क्षणदा
७) क्षपा
८) विभावरी
९) तमस्विनी
१०) रजनी
११) यामिनी
१२) तमी
* सभी शब्द स्त्रीलिंग में।

‘नक्तम्’ का अर्थ भी ‘रात्रि’ होता है और यह शब्द अव्यय होता है। वाक्य में इसका प्रयोग यथावत् कर सकते हैं। यदि आपको उपर्युक्त रात्रिवाची शब्दों के रूप न पता हों तो सर्वत्र ‘नक्तम्’ का प्रयोग कीजिए।
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वाक्य अभ्यास :
===========

तेरा यह कार्य परसों रात में होगा।
= तव इदं कार्यं परश्वः निशायां भविता।

आप दोनों कल रात प्रयाग में नहीं होंगे क्या ?
= भवन्तौ श्वः रात्रौ प्रयागे न भवितारौ किम् ?

वे सब तो परसों रात प्रयाग में ही होंगे।
= ते तु परश्वः क्षपायां प्रयागे एव भवितारः।

हम भी वहीं होंगे।
= वयम् अपि तत्र एव भवितास्मः।

यह योगी कल रात कहाँ होगा ?
= एषः योगी श्वः क्षणदायां कुत्र भविता ?

तुम परसों रात विमान में होगे।
= त्वं परश्वः नक्तं विमाने भवितासि।

तुम दोनों तो रेलगाड़ी में होगे।
= युवां तु रेलगन्त्र्यां भवितास्थः।

परसों रात ही उत्सव होगा।
= परश्वः नक्तम् एव उत्सवः भविता।

हम दोनों उस उत्सव में नहीं होंगे।
= आवां तस्मिन् उत्सवे न भवितास्वः।

बाकी सब तो होंगे ही।
= अन्याः सर्वे तु भवितारः एव।

तुम दोनों उस उत्सव में क्यों नहीं होगे ?
= युवां तस्मिन् उत्सवे कथं न भवितास्थः ?

हम दोनों मथुरा में होंगे, इसलिए।
= आवां मथुरायां भवितास्वः, अत एव।

उसके बाद हम सब तुम्हारे घर होंगे।
= तत्पश्चात् वयं तव भवने भवितास्मः।

हमारा स्वागत होगा कि नहीं ??
= अस्माकं स्वागतं भविता वा न वा ??

अवश्य होगा।
= अवश्यं भविता।

हम आप सबको देखकर बहुत प्रसन्न होंगे।
= वयं भवतः दृष्ट्वा भूरि प्रसन्नाः भवितास्मः।
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श्लोक :
====

न च तस्मात् मनुष्येषु
कश्चित् मे प्रियकृत्तमः।
‘भविता’ न च मे तस्मात्
अन्यः प्रियतरो भुवि॥

( श्रीमद्भगवद्गीता १८.६९ )

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २८ (तिङन्त-प्रकरण १३ :: लुट् लकार )

Sanskrut_28

नमो नमः मित्राणि !
लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् लिट् लिङ् और लोट् लकार के विषय में समझा। अब “लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥” अर्थात् लुट् लृट् और लृङ् लकारों के विषय जानना शेष रह गया है। ये तीनों लकार भविष्यत् काल के लिए प्रयुक्त होते हैं। किन्तु इनमें थोड़ी थोड़ी विशेषता है। अतः पृथक् पृथक् समझाते हैं। सर्वप्रथम लुट् लकार के विषय में चर्चा करते हैं।

१) यह लकार अनद्यतन भविष्यत् काल के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा भविष्यत् जो आज न हो। कल, परसों या उसके भी आगे। आज वाले कार्यों के लिए इसका प्रयोग प्रायः नहीं होता। जैसे – ” वे कल विद्यालय में होंगे” = ते श्वः विद्यालये भवितारः।

भू धातु , लुट् लकार

भविता भवितारौ भवितारः
भवितासि भवितास्थः भवितास्थ
भवितास्मि भवितास्वः भवितास्मः
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शब्दकोश :
=======

‘वेदपाठी’ के नाम –
१] श्रोत्रियः (पुँल्लिङ्ग)
२] छान्दसः (पुँल्लिङ्ग)

आजीविका के लिए वेद पढ़ाने वाले के नाम –
१] उपाध्यायः (पुँल्लिङ्ग )
२] अध्यापकः (पुँल्लिङ्ग )

मुनियों की झोपड़ी के नाम –
१] पर्णशाला (स्त्रीलिङ्ग)
२] उटजः/उटजम् (पुँल्लिङ्ग/नपुंसकलिङ्ग)

* उटः = घास-फूस , और जो उससे बनाया जाए वह है ‘उटज’।

यज्ञशाला के नाम –
१] चैत्यम् (नपुंसकलिङ्ग)
२] आयतनम् (नपुंसकलिङ्ग)

आने वाला कल = श्वः
आने वाला परसों = परश्वः

* ये दोनों अव्यय हैं। अव्यय ज्यों के त्यों प्रयोग में लाये जाते हैं। विभक्ति द्वारा इनका रूप नहीं बदलता और न ही किसी लिङ्ग में रूप बदलता है, न ही वचन में।
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वाक्य अभ्यास :

यह मुनि कल उस झोपड़ी में होगा।
= अयं मुनिः श्वः तस्यां पर्णशालायां भविता।

वे दोनों वेदपाठी परसों उस यज्ञभवन में होंगे।
= अमू छान्दसौ परश्वः अमुष्मिन् चैत्ये भवितारौ।

वे वेदपाठी कल इन यज्ञशालाओं में होंगे।
= अमी श्रोत्रियाः श्वः एषु आयतनेषु भवितारः।

तुम परसों अध्यापक के साथ पर्णशाला में होगे।
= त्वं परश्वः उपाध्यायेन सह उटजे भवितासि।

तुम दोनों कल यज्ञशाला में होगे।
= युवां श्वः चैत्ये भवितास्थः।

वहाँ वेदपाठियों का सामगान होगा।
= तत्र छान्दसानां सामगानं भविता।

तुम सब परसों कुटिया में होगे।
= यूयं परश्वः उटजे भवितास्थ।

वहाँ अगदतन्त्र का व्याख्यान होगा।
= तत्र अगदतन्त्रस्य व्याख्यानं भविता।

मैं कल उस कुटी में होऊँगा।
= अहं श्वः तस्मिन् उटजे भवितास्मि।

उसी में दो उपाध्याय होंगे।
= तस्मिन् एव द्वौ उपाध्यायौ भवितारौ।

हम दोनों परसों उस चैत्य में नहीं होंगे।
= आवां परश्वः तस्मिन् चैत्ये न भवितास्वः।

हम सब कल वेदपाठियों की कुटी में होंगे।
= वयं श्वः छान्दसानाम् उटजेषु भवितास्मः ।

वहीं ऋग्वेद का जटापाठ होगा।
= तत्र एव ऋग्वेदस्य जटापाठः भविता।

उपाध्याय लोग भी वहीं होंगे।
= अध्यापकाः अपि तत्र एव भवितारः।

हम लोग भी वहीं होंगे।
= वयम् अपि तत्र एव भवितास्मः।

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श्लोक :
====

न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
( श्रीमद्भगवद्गीता २।२०॥ )

उपर्युक्त श्लोक में ‘भविता’ पद भू धातु के लुट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है।
पुस्तक में देखकर एक एक शब्द का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २७ (तिङन्त-प्रकरण १२ :: लोट् लकार अभ्यास)

Sanskrut_27

भू धातु, लोट् लकार

भवतु* भवताम् भवन्तु
भव* भवतम् भवत
भवानि भवाव भवाम

*भवतात् (विकल्प से)

शब्दकोश :
~ ~ ~ ~ ~

‘लोभी’ के पर्यायवाची शब्द –
१) गृध्नुः
२) गर्धनः
३) लुब्धः
४) अभिलाषुकः
५) तृष्णक्

‘अत्यन्त लोभी’ –
१) लोलुपः
२) लोलुभः

उच्छृङ्खल व्यक्ति के दो नाम-
१) अविनीतः
२) समुद्धतः

मतवाले व्यक्ति के चार नाम –
१) मत्तः
२) शौण्डः
३) उत्कटः
४) क्षीबः

सभी शब्द पुँल्लिंग।
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वाक्य अभ्यास :
===========

वह लोभी वैद्य मेरे पास नहीं होना चाहिए।
= सः गृध्नुः भिषक् मम समीपे मा भवतु।

वे दोनों लोभी पुरुष कार्यालय में न हों।
= तौ गर्धनौ पुरुषौ कार्यालये न भवताम्।

जब मैं यहाँ होऊँ तब वे लोभी यहाँ न हों।
= यदा अहम् अत्र भवानि तदा ते लुब्धाः अत्र न भवन्तु।

तुम लोभी मत बनो।
= त्वम् अभिलाषुकः मा भव।

धन से मतवाले मत होओ।
= धनेन मत्तः मा भव।

तुम दोनों महालोभियों को तो महालोभियों के बीच ही होना चाहिए।
= युवां लोलुपौ तु लोलुभानां मध्ये एव भवतम्।

तुम सब प्रसन्नता से मतवाले मत होओ।
= यूयं प्रसन्नतया उत्कटाः मा भवत।

हे भगवान् ! मैं आपकी कथा का लोभी होऊँ।
= हे भगवन्! अहं भवतः कथायाः लोलुपः भवानि।

मैं आपके सौन्दर्य का लोलुप होऊँ।
= अहं भवतः सौन्दर्यस्य लोलुभः भवानि।

हम दोनों धन के लोभी न हों।
= आवां धनस्य अभिलाषुकौ न भवाव।

धन पाकर हम सब मतवाले न हों।
= धनं लब्ध्वा वयं शौण्डाः न भवाम।

ज्ञान से उच्छृङ्खल न हों।
= ज्ञानेन उद्धताः न भवाम।

वे मतवाले हमारे पास कभी न हों।
= ते क्षीबाः अस्माकं समीपे कदापि न भवन्तु ।
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श्लोक :
= = = =

त्यज* दुर्जन-संसर्गं
भज* साधु-समागमम्।
कुरु* पुण्यम् अहोरात्रं
स्मर* नित्यम् अनित्यताम्॥

दुष्ट व्यक्तियों का संसर्ग त्यागो, सज्जनों का संग करो। रात-दिन पुण्यकार्य करो (और) निरन्तर (संसार की) अनित्यता का स्मरण करो।

इस श्लोक के * चिह्न वाले क्रियापद लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन के हैं।

॥ शिवोऽवतु ॥

 

संस्कृत साधना : पाठ २६ (तिङन्त-प्रकरण ११ :: लोट् लकार)

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नमः संस्कृताय !
पिछले पाठों में आपने लिङ् लकार के विषय में जाना। उसके दो भेदों- विधिलिङ् और आशीर्लिङ् के विषय में पृथक् पृथक् समझा। प्रयोग सम्बन्धी नियम भी जाने। आशा है कि आपने अच्छी प्रकार अभ्यास करके उन नियमों को बुद्धि में स्थिर कर लिया है। आज लोट् लकार के विषय में समझाते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। आपने वृद्धों और सन्त महात्माओं अथवा किसी आदरणीय व्यक्ति को यह आशीर्वाद देते बहुत बार सुना होगा – “आयुष्मान् भव”। तो इसमें जो ‘भव’ शब्द है न, वह भू धातु के लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन का ही रूप है। पूरे रूप देखिए –

भवतु* भवताम् भवन्तु
भव* भवतम् भवत
भवानि भवाव भवाम

*प्रथमपुरुष एकवचन और मध्यमपुरुष एकवचन में विकल्प से ‘भवतात्’ भी बनता है। किन्तु ‘भवतात्’ प्रयोग हमें तभी करना है जब आशीर्वाद देना हो। जैसे – “आयुष्मान् भव” अथवा “आयुष्मान् भवतात्”।

१) लोट् लकार उन सभी अर्थों में होता है जिनमें लिङ् लकार (दोनों भेद) का प्रयोग होता है। एक प्रकार से आप कह सकते हैं कि लोट् लकार लिङ् लकार का विकल्प है। आज्ञा देना, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना करना, निमन्त्रण देना, आशीर्वाद देना- इस सभी अर्थों में लोट् लकार का प्रयोग होता है।
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शब्दकोश :
=======

‘मित्र’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) मित्र ( नपुंसकलिंग )
२ ) सखिन् ( पुँल्लिंग )
३ ) सुहृद् ( पुँल्लिंग )

समान आयु वाले मित्र के लिए संस्कृत शब्द –
१ ) वयस्य ( पुँल्लिंग )
२ ) स्निग्ध ( पुँल्लिंग )
३ ) सवयस् ( पुँल्लिंग )
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वाक्य अभ्यास :
==========

वह मेरा मित्र हो जाए।
= असौ मम सुहृद् भवतु।

वे दोनों मित्र सफल हों।
= तौ वयस्यौ सफलौ भवताम्।

मेरा मित्र आयुष्मान् हो।
= मम सखा आयुष्मान् भवतु (भवतात्)।

तुम्हारे बहुत से मित्र हों।
= तव बहवः मित्राणि भवन्तु।

तू सफल हो।
= त्वं सफलः भव (भवतात्)।

इस समय तुम दोनों को यहाँ होना चाहिए।
= एतस्मिन् समये युवाम् अत्र भवतम्।

तुम सब वर्चस्वी होओ।
= यूयं वर्चस्विनः भवत।

मैं कहाँ होऊँ ?
= अहं कुत्र भवानि ?

हम दोनों उस मित्र के घर होवें ?
= आवां तस्य मित्रस्य गृहे भवाव ?

हम सब यहाँ विराजमान हों।
= वयम् अत्र विराजमानाः भवाम।

हम सभी जीवों के मित्र हों।
= वयं सर्वेषां जीवानां मित्राणि भवाम।
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श्लोक :
=====

तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वम् एव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।३३)

उत्तिष्ठ = खड़े हो जाओ।[उत् + स्था(तिष्ठ्) लोट् मध्यमपुरुष एकवचन]
लभस्व = प्राप्त करो [लभ् धातु, लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन]
भुङ्क्ष्व = भोगो [भुज् धातु, लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन]
भव = ? ( आप जानते ही हैं !)

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २५ (तिङन्त-प्रकरण १० :: आशीर्लिङ् अभ्यास)

Sanskrut_25

भू धातु, आशीर्लिङ्

भूयात् भूयास्ताम् भूयासुः
भूयाः भूयास्तम् भूयास्त
भूयासम् भूयास्व भूयास्म

शब्दकोश :
=======

‘यशस्वी’ के पर्यायवाची शब्द –
१) कीर्तिमान्
२) यशस्वी
३) समज्ञावान्

‘आयुष्मान्’ के पर्यायवाची शब्द –
१) चिरजीवी
२) दीर्घायुः
३) जैवातृकः
४) चिरञ्जीवी
५) आयुष्मान्

सभी शब्द विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं अतः तीनों लिंगों में रूप चलेंगे। स्त्रीलिंग में आयुष्मती, कीर्तिमती, दीर्घजीविनी आदि। शब्दरूप प्रकरण में रूप किस प्रकार चलते हैं यह बतायेंगे, अभी आप लकारों पर ध्यान दीजिए।
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वाक्य अभ्यास :
===========

तेरा पुत्र यशस्वी हो।
= तव पुत्रः यशस्वी भूयात्।

तुम्हारी दोनों पुत्रियाँ यशस्विनी हों।
= तव उभे सुते कीर्तिमत्यौ भूयास्ताम्।

आपके सभी पुत्र दीर्घायु हों।
= भवतः सर्वे तनयाः चिरञ्जीविनः भूयासुः।

तू आयुष्मान् हो।
= त्वं जैवातृकः भूयाः।

तुम दोनों यशस्वी होओ।
= युवां समज्ञावन्तौ भूयास्तम्।

तुम सब दीर्घायु होओ।
= यूयं जैवातृकाः भूयास्त।

मैं दीर्घायु होऊँ।
= अहं चिरजीवी भूयासम्।

हम दोनों यशस्वी होवें।
= आवां समज्ञावन्तौ भूयास्व ।

हम सब आयुष्मान् हों।
= वयम् आयुष्मन्तः भूयास्म।
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श्लोक :
=====
पठन् द्विजः वागृषभत्वम् ईयात्
स्यात् क्षत्त्रियः भूमिपतित्वम् ईयात्।
वणिग्जनः पण्यफलत्वम् ईयात्
जनः च शूद्रः अपि महत्त्वम् ईयात्॥
( रामायणम् बालकाण्डम् १।७९ )

ब्राह्मण इस काव्य को पढ़ता हुआ वाणी में निपुणता प्राप्त करे, क्षत्रिय हो तो भूमिपति होवे, वैश्य व्यापार का फल पाये और शूद्र भी महत्त्व को प्राप्त हो।

ईयात् = इण् गतौ ( जाना ) आशीर्लिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन ( ‘प्राप्त हो’ ‘जाये’ ऐसा अर्थ होगा )

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २४ (तिङन्त-प्रकरण ९ :: आशीर्लिङ्)

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नमः संस्कृताय मित्राणि !
लकारों के क्रम में लिङ् लकार के विषय में समझाते हुए हमने इसके दो भेदों का उल्लेख किया था- विधिलिङ् और आशीर्लिङ्। विधिलिङ् लकार के प्रयोग के नियम तो आपने जान लिये। अब आशीर्लिङ् के विषय में बताते हैं। आपने यह वेदमन्त्र तो कभी न कभी सुना ही होगा –

मधुमन्मे निष्क्रमणं मधुमन्मे परायणम्।
वाचा वदामि मधुमद् ‘भूयासं’ मधुसंदृशः॥

( मेरा जाना मधुर हो, मेरा आना मधुर हो। मैं मधुर वाणी बोलूँ, मैं मधु के सदृश हो जाऊँ। अथर्ववेद १।३४।३॥ )

इसमें जो ‘भूयासम्’ शब्द है, वह भू धातु के आशीर्लिङ् के उत्तमपुरुष एकवचन का रूप है। भू धातु के आशीर्लिङ् में रूप देखिए –

भूयात् भूयास्ताम् भूयासुः
भूयाः भूयास्तम् भूयास्त
भूयासम् भूयास्व भूयास्म

१) इस लकार का प्रयोग केवल आशीर्वाद अर्थ में ही होता है। महामुनि पाणिनि जी ने सूत्र लिखा है – “आशिषि लिङ्लोटौ।३।३।१७२॥” अर्थात् आशीर्वाद अर्थ में आशीर्लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग करते हैं। जैसे – सः चिरञ्जीवी भूयात् = वह चिरञ्जीवी हो।

२) इस लकार के प्रयोग बहुत कम दिखाई पड़ते हैं, और जो दिखते भी हैं वे बहुधा भू धातु के ही होते हैं। अतः आपको भू धातु के ही रूप स्मरण कर लेना है बस।
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शब्दकोश :
=======

‘गर्भवती’ के पर्यायवाची शब्द –
१) आपन्नसत्त्वा
२) गुर्विणी
३) अन्तर्वत्नी
४) गर्भिणी
५) गर्भवती

पतिव्रता स्त्री के पर्यायवाची-
१) सुचरित्रा
२) सती
३) साध्वी
४) पतिव्रता

स्वयं पति चुनने वाली स्त्री के लिए संस्कृत शब्द –
१) स्वयंवरा
२) पतिंवरा
३) वर्या

वीरप्रसविनी – वीर पुत्र को जन्म देने वाली
बुधप्रसविनी – विद्वान् को जन्म देने वाली

उपर्युक्त सभी शब्द स्त्रीलिंग में होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

यह गर्भिणी वीर पुत्र को उत्पन्न करने वाली हो।
= एषा आपन्नसत्त्वा वीरप्रसविनी भूयात्।

ये सभी स्त्रियाँ पतिव्रताएँ हों।
= एताः सर्वाः योषिताः सुचरित्राः भूयासुः।

ये दोनों पतिव्रताएँ प्रसन्न रहें।
= एते सुचरित्रे मुदिते भूयास्ताम्।

हे स्वयं पति चुनने वाली पुत्री ! तू पति की प्रिय होवे।
= हे पतिंवरे पुत्रि ! त्वं भर्तुः प्रिया भूयाः।

तुम दोनों पतिव्रताएँ होवो ।
= युवां सत्यौ भूयास्तम् ।

वशिष्ठ ने दशरथ की रानियों से कहा –
= वशिष्ठः दशरथस्य राज्ञीः उवाच –

तुम सब वीरप्रसविनी होओ।
= यूयं वीरप्रसविन्यः भूयास्त ।

मैं मधुर बोलने वाला होऊँ।
= अहं मधुरवक्ता भूयासम्।

सावित्री ने कहा –
सावित्री उवाच

मैं स्वयं पति चुनने वाली होऊँ।
= अहं वर्या भूयासम्।

माद्री और कुन्ती ने कहा –
माद्री च पृथा च ऊचतुः –

हम दोनों वीरप्रसविनी होवें।
= आवां वीरप्रसविन्यौ भूयास्व ।

हम सब राष्ट्रभक्त हों।
वयं राष्ट्रभक्ताः भूयास्म ।

हम सब चिरञ्जीवी हों।
= वयं चिरञ्जीविनः भूयास्म।
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श्लोक :
=====

एकः स्वादु न भुञ्जीत नैकः सुप्तेषु जागृयात्।
एको न गच्छेत् अध्वानं नैकः चार्थान् प्रचिन्तयेत्॥
(पञ्चतन्त्र)

स्वादिष्ट भोजन अकेले नहीं खाना चाहिए, सोते हुए लोगों में अकेले नहीं जागना चाहिए, यात्रा में अकेले नहीं जाना चाहिए और गूढ़ विषयों पर अकेले विचार नहीं करना चाहिए।

इस श्लोक में जितने भी क्रियापद हैं वे सभी विधिलिङ् लकार प्रथमपुरुष एकवचन के हैं।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २३ (तिङन्त-प्रकरण ८ :: विधिलिङ् लकार अभ्यास)

Sanskrut_23

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत
भवेयम् भवेव भवेम

शब्दकोश :
=======

‘रोगहीनता’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) अनामयम् ( नपुंसकलिंग )
२ ) आरोग्यम् ( नपुंसकलिंग )

रोग दूर करना –
१ ) चिकित्सा ( स्त्रीलिंग )
२ ) रुक्प्रतिक्रिया ( स्त्रीलिंग )

*ज्ञातव्य : आयुर्वेद के दो विभाग होते हैं। एक तो ‘निदान’ जिसमें रोगों की पहचान करने के लिए उनके लक्षणों का वर्णन होता है, जैसे ‘माधवनिदानम्’ नामक ग्रन्थ इसी प्रकार का ग्रन्थ है। दूसरा विभाग है ‘चिकित्सा’ जिसमें विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न औषधों की व्यवस्था होती है। भावप्रकाश में लिखा है “या क्रिया व्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते” अर्थात् जो क्रिया जो व्याधि का हरण करे उसे चिकित्सा कहते हैं । और भैषज्यरत्नावली नामक ग्रन्थ में तीन प्रकार की चिकित्सा बतायी गयी है-
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता।
शस्त्रैः कषायैः लोहाद्यैः क्रमेणान्त्या सुपूजिता॥

जिसमें शस्त्रों से चीर फाड़ (operation) हो – आसुरी
विभिन्न रसों के माध्यम से – मानुषी
पारे आदि धातुओं से – दैवी

दवा के लिए संस्कृत शब्द –
१ ) भेषजम् ( नपुंसकलिंग )
२ ) औषधम् ( नपुंसकलिंग )
३ ) भैषज्यम् (नपुंसकलिंग )
४ ) अगदः ( पुँल्लिंग )
५ ) जायुः ( पुँल्लिंग )

‘रोग’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) रुज् ( स्त्रीलिंग )
२ ) रुजा (स्त्रीलिंग )
३ ) उपतापः ( पुँल्लिंग )
४ ) रोगः ( पुँल्लिंग )
५ ) व्याधिः ( पुँल्लिंग )
६ ) गदः ( पुँल्लिंग )
७ ) आमयः ( पुँल्लिंग )

‘वैद्य’ के पर्यायवाची शब्द –
१ ) रोगहारी ( पुँल्लिंग )
२ ) अगदङ्कारः ( पुँल्लिंग )
३ ) भिषक् ( पुँल्लिंग )
४ ) वैद्यः ( पुँल्लिंग )
५ ) चिकित्सकः ( पुँल्लिंग )
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वाक्य अभ्यास :
===========

हमारे देश में निपुण वैद्य होवें।
= अस्माकं देशे निपुणाः वैद्याः भवेयुः।

कोई भी वैद्य धूर्त न हो ।
= कः अपि चिकित्सकः धूर्तः न भवेत्।

सभी वैद्य धार्मिक होवें।
सर्वे अपि अगदङ्काराः धार्मिकाः भवेयुः।

तू दक्ष वैद्य होवे।
= त्वं दक्षः भिषक् भवेः ।

तुम दोनों लोभी वैद्य न होओ।
= युवां लोलुपौ चिकित्सकौ न भवेतम् ।

तुम सुवर्णभस्म खाकर पुष्ट होओ।
= त्वं काञ्चनभस्मं भुक्त्वा पुष्टः भवेः।

यह दवा खाकर तो दुर्बल भी बलवान् हो जाए।
= एतत् औषधं भुक्त्वा दुर्बलः अपि बलवान् भवेत्।

यह दवा तेरे लिए पुष्टिकर होवे।
= एतत् भेषजं तुभ्यं पुष्टिकरं भवेत्।

सभी रोगहीन होवें।
= सर्वे अपि अनामयाः भवेयुः।

लगता है, इस चिकित्सालय में अच्छी चिकित्सा होगी।
= मन्ये , अस्मिन् चिकित्सालये सुष्ठु रुक्प्रतिक्रिया भवेत् ।

ये दवाएँ इस रोग के लिए पर्याप्त होनी चाहिए।
= एतानि भैषज्यानि एतस्मै उपतापाय अलं भवेयुः।

हम योगी हों।
= वयं योगिनः भवेम।

जिससे रोग न हों।
= येन रुजाः न भवेयुः।

हम दोनों सदाचारी होवें।
= आवां सदाचारिणौ भवेव।

जिससे रोग न हों।
= येन आमयाः न भवेयुः।

मैं आयुर्वेद की बात मानने वाला होऊँ।
= अहं आयुर्वेदस्य वचनकरः भवेयम्।

तुम दोनों इस रोग से शीघ्र मुक्त होओ।
= युवाम् अस्मात् गदात् शीघ्रं मुक्तौ भवेतम् ।

हे भगवान् ! मैं इस रोग से जल्दी छूट जाऊँ।
= हे भगवन् ! अहं अस्मात् आमयात् शीघ्रं मुक्तः भवेयम्।
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श्लोक :
=====

इस श्लोक में अर्जुन ‘भवेत्’ का प्रयोग किस अर्थ में कर रहे हैं, सोचकर बताइये –

यदि माम् अप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्राः रणे हन्युः तत् मे क्षेमकरं भवेत् ॥
( श्रीमद्भगवद्गीता १।४६ )

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २२ (तिङन्त-प्रकरण ७ :: लिङ् लकार (विधिलिङ्))

Sanskrut_22

नमः संस्कृताय !

लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् और लिट् लकार के विषय में जाना। लकारों से सम्बन्धित जो श्लोक मैंने बताया था उसका आधा भाग आपने जान लिया- “लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।” साथ ही आपने भू धातु के रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया। अब श्लोक का तृतीय चरण देखिए- “विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ” अर्थात् ‘विधि’ और ‘आशीर्वाद’ अर्थ में लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग होता है। तो आज आपको लिङ् लकार के विषय में बताते हैं। आगामी पाठों में लोट् और अन्य लकारों के विषय में क्रमशः बताएँगे। स्मृतिग्रन्थों में तथा अन्य विधिनिषेध का विधान करने वाले शास्त्रों में विधिलिङ् लकार के प्रचुर प्रयोग मिलते हैं।

१) सर्वप्रथम तो आप यह जान लीजिए कि इस लकार के दो भेद हैं- १. विधिलिङ् २. आशीर्लिङ् । आज केवल विधिलिङ् लकार की चर्चा करते हैं।

२) जिसके द्वारा किसी बात का विधान किया जाता है उसे विधि कहते हैं। जैसे – ‘स्वर्गकामः यजेत्’ स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे। यहाँ यज्ञ करने का विधान किया गया है अतः यज् (यजन करना) धातु में विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार यदि किसी चीज का निषेध करना हो तो वाक्य में निषेधार्थक शब्द का प्रयोग करके विधिलिङ् लकार का प्रयोग करना चाहिए, जैसे -” मांसं न भक्षेत् ” मांस नहीं खाना चाहिए/ न खाये।

मोटे तौर पर आप यह ध्यान में रखिए कि जहाँ “चाहिए” ऐसा बोला जा रहा हो , वहाँ इस लकार का प्रयोग होगा। हिन्दी में ‘करे’ और ‘करना चाहिए’ दोनों लगभग समान अर्थ वाले हैं।

३) जहाँ किसी बात की सम्भावना की जाए वहाँ भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है, जैसे – ” अद्य वर्षः भवेत् ” सम्भव है आज वर्षा हो।

४) योग्यता बतलाने के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है। जैसे – “भवान् पारितोषिकं लभेत् ” – आप पुरस्कार पाने योग्य हैं।

५) आमन्त्रित, निमन्त्रित करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे -” भवान् अद्य मम गृहम् आगच्छेत्” आज आप मेरे घर आयें।

६) इच्छा, कामना करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे – “भवान् शीघ्रं स्वस्थः भवेत्” आप शीघ्र स्वस्थ हों।

७) आज्ञा के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया जाता है।

८) अच्छी प्रकार स्मरण रखिए कि “आशीर्वाद” के अर्थ में इस लकार का प्रयोग नहीं होता। आशीर्वाद के लिए आशीर्लिङ् और कभी कभी लोट् लकार का प्रयोग होता है।

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत्
भवेयम् भवेव भवेम
________________________________________

शब्दकोश :
========

जासूस, भेदिया, गुप्तचर के लिए संस्कृत शब्द –

१] यथार्हवर्णः
२] प्रणिधिः
३] अपसर्पः
४] चरः
५] स्पशः
६] चारः
७] गूढपुरुषः

*ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

वह जासूस होवे। ( इच्छा )
= सः गूढपुरुषः भवेत् ।

वे दोनों जासूस सफल हों। (इच्छा)
= तौ यथार्हवर्णौ सफलौ भवेताम् ।

उन सारे गुप्तचरों को राष्ट्रभक्त होना चाहिए। (विधि)
= ते सर्वे स्पशाः राष्ट्रभक्ताः भवेयुः।

तुम्हें गुप्तचर के घर में होना चाहिए। (विधि)
= त्वं गूढपुरुषस्य गृहे भवेः।

तुम दोनों को भेदिया होना चाहिए। (सम्भावना)
= युवां स्पशौ भवेतम् ।

तुम सबको भेदियों से दूर रहना चाहिए।(विधि, आज्ञा)
= यूयं चारेभ्यः दूरं भवेत।

सोचता हूँ, मैं जासूस होऊँ। (इच्छा, सम्भावना)
= मन्ये अहं प्रणिधिः भवेयम्।

हम दोनों भेदियों के भी भेदिये होवें। (इच्छा)
= आवां चाराणाम् अपि चारौ भवेव ।

हम सब गुप्तचरों के प्रशंसक हों।(इच्छा, विधि)
= वयम् अपसर्पाणां प्रशंसकाः भवेम ।
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श्लोक :
====

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेत् युगपद् उत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासः तस्य महात्मनः॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।१२ )

पुस्तक से देखकर सभी शब्दों का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

WhySanskrit

संस्कृत साधना : पाठ २१ (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार अभ्यास)

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॥ लिट् लकार अभ्यास ॥

कुछ स्मरणीय बातें –

१) संस्कृत लिखते समय स्वरों, ह्रस्व दीर्घ मात्राओं , अनुस्वार, विसर्ग और हलन्त पर विशेष ध्यान दें। इनका उचित प्रयोग करें। कुछ लोग ‘मम’ के स्थान पर ‘मम्’ लिख देते हैं और ‘प्रणाम’ के स्थान पर ‘प्रणाम्’ – यहाँ अनावश्यक हलन्त लगा दिया गया। उसी प्रकार कुछ लोग ‘आम्’ (हाँ) के स्थान पर ‘आम’ और ‘किम्’ के स्थान पर ‘किम’ लिख देते हैं- यहाँ हलन्त लगाना भूल जाते हैं। इसी प्रकार विसर्ग और मात्रा आदि के विषय में जानना चाहिए।

२) संस्कृत में ‘ ड़ ‘ और ‘ ढ़ ‘ अक्षर नहीं होते अतः इनका प्रयोग न करें। ‘ ड़ ‘ और ‘ ङ ‘ तथा ‘ ढ़ ‘ और ‘ ढ ‘ के अन्तर को तो आप जानते ही होंगे।
‘पीड़ा’ को संस्कृत में ‘पीडा’ लिखा जाता है।
‘गूढ़’ को संस्कृत में ‘गूढ’ लिखा जाता है। इसी प्रकार ‘ड’ और ‘ङ’ , ‘व’ और ‘ब’ तथा श ष स का भी ध्यान रखें।

३) संस्कृत लिखने के लिए आपको पुरुष, वचन, लिंग, विशेष्य, विशेषण, सर्वनाम, कर्त्ता, कर्म, क्रिया, कारक-विभक्ति, धातुरूप (लकार) और शब्दरूप – इतनी बातें जानना अति आवश्यक है। इनमें से अधिकांश बातें मैं समझा चुका हूँ। अब केवल धातुरूप, शब्दरूप और कारकविभक्ति विस्तार से समझाना रह गया है। इसके बाद की बातें सन्धि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग, वाच्यपरिवर्तन आदि प्रौढ संस्कृत लिखने के लिए हैं, इन्हें सीख लेने पर भाषा में प्रौढता आ जाती है।

४) संस्कृत में किस क्रिया के लिए कौन सी धातु है- यह स्मरण रखेंगे तो अनुवाद करना बहुत सहज हो जाएगा। आगामी पाठों में यह बताते चलेंगे।

भू धातु-
बभूव (वह हुआ)/ बभूवतुः (वे दो हुए)/बभूवुः (वे सब हुए)

शब्दकोश :
~~~~~~~

‘विद्वान्’ के पर्यायवाची शब्द –

१] विद्वान्
२] विपश्चित्
३] दोषज्ञः
४] सत्
५] सुधीः
६] कोविदः
७] बुधः
८] धीरः
९] मनीषी
१०] ज्ञः
१२] प्राज्ञः
१३] सङ्ख्यावान्
१४] पण्डितः
१५] कविः
१६] धीमान्
१७] सूरिः
१८] कृती
१८] कृष्टिः
१९] लब्धवर्णः
२०] विचक्षणः
२१] दूरदर्शी
२२] दीर्घदर्शी

ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
_________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

भारत में अनेक विद्वान् हुए।
= भारते अनेके कोविदाः बभूवुः।

उन विद्वानों में कुछ वैयाकरण हुए।
= तेषु बुधेषु केचित् वैयाकरणाः बभूवुः।

कुछ न्यायदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् न्यायदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

कुछ साङ्ख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

आचार्य व्याघ्रभूति वैयाकरण हुए।
आचार्यः व्याघ्रभूतिः वैयाकरणः बभूव।

आचार्य अक्षपाद नैयायिक हुए।
= आचार्यः अक्षपादः नैयायिकः बभूव।

आचार्य पञ्चशिख सांख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= आचार्यः पञ्चशिखः साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डितः बभूव।

वाचक्नवी गार्गी मन्त्रों की विदुषी हुई थी।
= वाचक्नवी गार्गी मन्त्राणां विचक्षणा बभूव।

पाण्डु के पाँच पुत्र हुए।
= पाण्डोः पञ्च सुताः बभूवुः।

वे सभी विद्वान् हुए।
= ते सर्वे प्राज्ञाः बभूवुः।

युधिष्ठिर धर्मशास्त्र और द्यूतविद्या के जानकार हुए।
= युधिष्ठिरः धर्मशास्त्रस्य द्यूतविद्यायाः च कोविदः बभूव।

भीम मल्लविद्या और पाकशास्त्र के वेत्ता हुए।
= भीमसेनः मल्लविद्यायाः पाकशास्त्रस्य च सूरिः बभूव।

सुकेशा ऋषि पाकशास्त्र के उपदेशक हुए थे।
= सुकेशा ऋषिः पाकशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

श्रीकृष्ण भीमसेन का रसाला खाकर बहुत प्रसन्न हुए थे।
= श्रीकृष्णः भीमसेनस्य रसालं भुक्त्वा भूरि प्रसन्नः बभूव।

अर्जुन धनुर्वेद और गन्धर्ववेद के जानकार हुए।
= फाल्गुनः धनुर्वेदस्य गन्धर्ववेदस्य च विपश्चित् बभूव।

नकुल अश्वविद्या के ज्ञानी हुए।
= नकुलः अश्वविद्यायाः कोविदः बभूव।

आचार्य शालिहोत्र अश्वविद्या के प्रसिद्ध जानकार थे।
= आचार्यः शालिहोत्रः अश्वविद्यायाः प्रथितः पण्डितः बभूव।

सहदेव पशुचिकित्सा और शकुनशास्त्र के विद्वान् थे।
= सहदेवः पशुचिकित्सायाः शकुनशास्त्रस्य च ज्ञः बभूव।

कुन्ती अथर्ववेदीय मन्त्रों की विदुषी हुई।
= पृथा अथर्ववेदीयानां मन्त्राणां पण्डिता बभूव।

लल्लाचार्य और उत्पलाचार्य प्रसिद्ध गणितज्ञ हुए।
= लल्लाचार्यः उत्पलाचार्यः च प्रसिद्धौ गणितज्ञौ बभूवतुः।

मण्डनमिश्र की पत्नी भारती बड़ी विदुषी हुई।
= मण्डनमिश्रस्य पत्नी भारती महती पण्डिता बभूव।

भरद्वाज और शाकटायन वैमानिकरहस्य के ज्ञाता हुए।
= भरद्वाजः शाकटायनः च वैमानिकरहस्यस्य विचक्षणौ बभूवतुः।

शाकपूणि निरुक्त के प्रसिद्ध जानकार हुए थे।
= शाकपूणिः निरुक्तस्य प्रथितः कृष्टिः बभूव।

ऋतुध्वज की महारानी मदालसा तत्त्वज्ञ थी।
= ऋतुध्वजस्य पट्टराज्ञी मदालसा तत्त्वज्ञा बभूव।

भारत में एक नहीं, दो नहीं वरन् सहस्रों विद्वान् हुए हैं।
= भारते एकः न, द्वौ न अपितु सहस्रशाः कोविदाः बभूवुः।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ २० (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार विशेष नियम)

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नमः संस्कृताय मित्राणि !

अभी तक आपने वर्तमानकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में, केवल वेद में दिखाई देने वाले लेट् लकार के विषय में , सामान्य भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लुङ् लकार के विषय में और अपरोक्ष भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लङ् लकार के विषय में जाना। आपने भू (होना) धातु के उन रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया जो कि उपर्युक्त लकारों में बनते हैं।

आज आपको भूतकाल के लिए ही प्रयुक्त होने वाले लिट् लकार के विषय में बतायेंगे। यह लकार बहुत रोचक भी है और सरल भी। आपने कभी न कभी “व्यास उवाच” या गीता के “श्रीभगवान् उवाच” या “अर्जुन उवाच” या “सञ्जय उवाच” आदि वाक्यों को तो सुना ही होगा ? इन वाक्यों में जो ‘उवाच’ शब्द है वह ‘ ब्रू ‘ ( ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि ) धातु के लिट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। लिट् लकार के रूप पुराणों और इतिहासग्रन्थों में बहुलता से मिलते हैं।

भू धातु के रूप इस लकार में निम्नलिखित हैं –

बभूव (वह हुआ) बभूवतुः (वे दो हुए) बभूवुः (वे सब हुए)
बभूविथ (तू हुआ ) बभूवथुः (तुम दोनों हुए) बभूव (तुम सब हुए )
बभूव (मैं हुआ ) बभूविव (हम दो हुए ) बभूविम(हम सब हुए )

लिट् लकार के विषय में कुछ स्मरणीय बातें-

१) लिट् लकार का प्रयोग परोक्ष भूतकाल के लिए होता है। ऐसा भूतकाल जो वक्ता की आँखों के सामने का न हो। प्रायः बहुत पुरानी घटना को बताने के लिए इसका प्रयोग होता है। जैसे – रामः दशरथस्य पुत्रः बभूव। = राम दशरथ के पुत्र हुए। यह घटना कहने वाले ने देखी नहीं अपितु परम्परा से सुनी है अतः लिट् लकार का प्रयोग हुआ।

२) लिट् लकार के प्रथम पुरुष के रूपों का ही प्रयोग बहुधा होता है। आप ढूँढते रह जाएँगे मध्यमपुरुष और उत्तमपुरुष के रूप नहीं मिलेंगे। अतः आपको प्रथमपुरुष के रूप ही याद करना है।

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शब्दकोश :
=======

युवावस्था के नाम –

१] तारुण्यम् ( नपुंसकलिंग )
२] यौवनम् ( नपुंसकलिंग )

बुढ़ापे के नाम –

१] स्थाविरम् ( नपुंसकलिंग )
२] वृद्धत्वम् ( नपुंसकलिंग )
३] वार्द्धकम् ( नपुंसकलिंग ) इसका प्रसिद्ध प्रयोग – “वार्द्धके मुनिवृत्तीनाम्” (रघुवंशम्)।
४] वार्द्धक्यम् ( नपुंसकलिंग )

*वार्द्धकम् का अर्थ ‘वृद्धों का समूह’ भी होता है।

बड़े भाई के नाम-

१] पूर्वजः ( पुँल्लिंग )
२] अग्रियः ( पुँल्लिंग )
३] अग्रजः ( पुँल्लिंग )

छोटे भाई के नाम –

१] जघन्यजः
२] कनिष्ठः
३] यवीयः
४] अवरजः
५] अनुजः
(सभी पुँल्लिंग में)
________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

अज के पुत्र दशरथ हुए।
= अजस्य पुत्रः दशरथः बभूव।

वृद्धावस्था में दशरथ के चार पुत्र हुए।
= स्थाविरे दशरथस्य चत्वारः सुताः बभूवुः।

राम सब भाइयों के अग्रज हुए।
= रामः सर्वेषां भ्रातॄणाम् अग्रियः बभूव।

लक्ष्मण और शत्रुघ्न जुड़वा हुए।
= लक्ष्मणः च शत्रुघ्नः च यमलौ बभूवतुः।

युवावस्था में राम और लक्ष्मण अद्भुत धनुर्धर हुए।
= यौवने रामः च लक्ष्मणः च अद्भुतौ धनुर्धरौ बभूवतुः।

भारतवर्ष में आश्वलायन नामक ऋषि हुए थे।
= भारतवर्षे आश्वलायनः नामकः ऋषिः बभूव।

वे शारदामन्त्र के उपदेशक हुए।
= सः शारदामन्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

अभिमन्यु तरुणाई में ही महारथी हो गया था।
= अभिमन्युः तारुण्ये एव महारथः बभूव।

एक दुर्वासा नाम वाले ऋषि हुए।
= एकः दुर्वासा नामकः ऋषिः बभूव।

जो अथर्ववेदीय मन्त्रों के उपदेशक हुए।
= यः अथर्ववेदीयानां मन्त्राणाम् उपदेशकः बभूव।

भारत में शंख और लिखित ऋषि हुए।
= भारते शंखः च लिखितः च ऋषी बभूवतुः।

भारत में ही रेखागणितज्ञ बौधायन हुए।
= भारते एव रेखागणितज्ञः बौधायनः बभूव।

भारत में ही शस्त्र और शास्त्र के वेत्ता परशुराम हुए।
= भारते एव शस्त्रस्य च शास्त्रस्य च वेत्ता परशुरामः बभूव।

भारत में ही वैयाकरण पाणिनि और कात्यायन हुए।
= भारते एव वैयाकरणौ पाणिनिः च कात्यायनः च बभूवतुः।

पाणिनि के छोटे भाई पिङ्गल छन्दःशास्त्र के उपदेशक हुए।
= पाणिनेः अनुजः पिङ्गलः छन्दःशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

धौम्य के बड़े भाई उपमन्यु हुए।
= धौम्यस्य अग्रियः उपमन्युः बभूव।

उपमन्यु शैवागम के उपदेशक हुए।
= उपमन्युः शैवागमस्य उपदेशकः बभूव।

वे कृष्ण के भी गुरु थे।
= सः कृष्णस्य अपि गुरुः बभूव।

भारत में ही शिल्पशास्त्र के अट्ठारह उपदेशक हुए।
= भारते एव शिल्पशास्त्रस्य अष्टादश उपदेशकाः बभूवुः।
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श्लोक :
====

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

एक एक शब्द का अर्थ अपनी कापी में लिखें और अपने बड़ों से पूछकर ‘हृषीकेश’ ‘गुडाकेश’ ‘परन्तप’ और ‘गोविन्द’ शब्दों का रहस्य पूछें और उसे डायरी में लिख लें।

॥ शिवोऽवतु ॥

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