SanskritGavya

SanskritGavya

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 3

Gavya_3


शब्द सिन्धु

Work


  • कार्यप्रवाह – workflow
  • कार्यभार – workload
  • कार्यक्रमस्वचालन – workflow automation
  • कर्मसारथि – co-worker
  • कर्मकरगण – workforce
  • परिबृंहण – additional work

पाठ १.३


Work Theme

  • अहं आगामिवर्षे करिष्यामि | – Next year, I will work.
  • मम अन्यत् कार्यम् अस्ति| – I have some other work.
  • गृहकार्यं सर्वं समाप्तं वा? – Finished your household work?
  • ममापि बहुनि कार्याणि सन्ति – I have a lot of work to do myself.
अहं पठामि में पढ़ता हूँ
त्वं पठसि तू पढ़ता है
स: पठति वह पढ़ता है
अहं खादामि में खाता हूँ
त्वं खादसि तू खाता है
स: खादति वह खाता है
अहं पश्यामि में देखता हूँ
त्वं पश्यसि तू देखता है
स: पश्यति वह देखता है
  • अहं वाणिज्यशास्त्रं पठामि|
  • नवमकक्श्यायां पठामि|
  • संस्कृतं पठामि|
  • त्वं प्रातः किं खादसि?
  • त्वं फलानि अपि खादसि?
  • पुनः कदाचित् पश्यामि (Meet you again)
  • मासे कति चित्राणि पश्यति? – How often do you go to films in a month?

 

Bookish..

Untitled

Untitled2

Untitled3

 


सुभाषित


विवेक-चूड़ामणि

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटीभि:।।11।।

Work leads to purification of the mind, not to perception of the Reality. The realisation of Truth is brought about by discrimination and not in the least by ten million of acts.

कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तुपलब्धि (तत्वदृष्टि) – के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता।


पठन/मनन


Following excerpt is from Kathak griha sutra. It is commenraty by Devapala on first Sun sighting Sanskar for newborn. Try to interpret it by self.

KathakGrihasutra_0

KathakGrihasutra

 

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १२ (हनुमान विशेष)

प्राणका प्रेरक कौन?

केन उपनिषद् में प्राण प्रेरककी बात है| सम्पूर्ण जगत प्राण आधीन है, पर प्राण किसके आधीन है?

राजाकी प्रेरणासे दीवान काम कर शकता है, उसी प्रकार, प्राणका प्राण कौन?

स उ प्राणस्य प्राण|

आत्मा|

राम – हनुमान
आत्मा – प्राण

Gavya12


शब्दसिन्धु


अटति (aTati) = (1 pp) to roam
अणीयांसं (aNiiyaa.nsaM) = smaller
अणु (aNu) = atom
अणोः (aNoH) = than the atom
अण्वस्त्रं (aNvastraM) = (n) nuclear weapon
अतः (ataH) = hence
अतत्त्वार्थवत् (atattvaarthavat.h) = without knowledge of reality
अतन्द्रितः (atandritaH) = with great care
अतपस्काय (atapaskaaya) = to one who is not austere
अति (ati) = extremely
अतिपरिचय (atiparichaya) = excessive familiarity
अतिवीर्यं (ativiiryaM) = super power
अतिचार (atichaara) = Accelerated planetary motion
अतितरन्ति (atitaranti) = transcend
अतितरलं (atitaralaM) = ati+tarala, very+unstable
अतिथि (atithi) = (m) guest
अतिथिः (atithiH) = (masc.Nom.sing.)guest (literally undated)
अतिदारूणमन् (atidaaruuNaman.h) = adj. very dreadful
अतिदुर्वृत्त (atidurvRitta) = of exceedingly bad conduct


पाठ


१ २ ३

भोजनप्रकरणम्

नित्यः स्वाध्यायो जातो भोजनसमय आगतो गन्तव्यम् । नित्य का पढ़ना हो गया, भोजन समय आया, चलना चाहिये ।
तव पाकशालायां प्रत्यहं भोजनाय किं किं पच्यते ? तुम्हारी पाकशाला में प्रतिदिन भोजन के लिये क्या-क्या पकाया जाता है ?
शाकसूपौदश्वित्कौदनरोटिकादयः । शाक, दाल, कढ़ी, भात, रोटी आदि ।
किं वः पायसादिमधुरेषु रुचिर्नास्ति ? क्या आप लोगों की खीर आदि मीठे भोजन में रुचि नहीं है ?
अस्ति खलु परन्त्वेतानि कदाचित् कदाचित् भवन्ति । है सही परन्तु ये भोजन कभी-कभी होते हैं ।
कदाचिच्छष्कुली-श्रीखण्डादयोऽपि भवन्ति न वा ? कभी पूरी कचौड़ी शिखरन आदि भी होते हैं वा नहीं ?
भवन्ति परन्तु यथर्त्तुयोगम् । होते हैं परन्तु जैसा ऋतु का योग होता है वैसा ही भोजन बनाते हैं ।
सत्यमस्माकमपि भोजनादिकमेवमेव निष्पद्यते । ठीक है हमारे भी भोजन आदि ऐसे ही बनते हैं ।
त्वं भोजनं करिष्यसि न वा ? तू भोजन करेगा वा नहीं ?
अद्य न करोम्यजीर्णतास्ति । आज नहीं करता अजीर्णता है ।
अधिकभोजनस्येदमेव फलम् । अधिक भोजन का यही फल है ।
बुद्धिमत्ता तु यावज्जीर्यते तावदेव भुज्यते । बुद्धिमान पुरुष तो जितना पचता है उतना ही खाता है ।
अतिस्वल्पे भुक्ते शरीरबलम् ह्रस्त्यधिके चातः सर्वदा मिताहारी भवेत् । बहुत कम और अत्यधिक भोजन करने से शरीर का बल घटता है, इससे सब दिन मिताहारी होवे ।
योऽन्यथाऽऽहारव्यवहारौ करोति स कथं न दुःखी जायेत ? जो उलट-पलट आहार और व्यवहार करता है वह क्यों न दुःखी होवे ?
येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स शरीरसुखं नाप्नोति । जो शरीर से परिश्रम नहीं करता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता ।
येनात्मना पुरुषार्थो न विधीयते तस्यात्मनो बलमपि न जायते । जो आत्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसको आत्मा का बल भी नहीं बढ़ता ।
तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैर्यथाशक्ति सत्क्रिया नित्यं साधनीयाः । इससे सब मनुष्यों को उचित है यथाशक्ति उत्तम कर्मों की साधना नित्य करनी चाहिये ।
भो देवदत्त ! त्वामहं निमन्त्रये । हे देवदत्त ! मैं तुमको भोजन के लिए निमन्त्रित करता हूं ।
मन्येऽहं कदा खल्वागच्छेयम् ? मैं मानता हूँ परन्तु किस समय आऊँ ?
श्वो द्वितीयप्रहरमध्ये आगन्तासि । कल डेढ पहर दिन चढ़े आना ।
आगच्छ भो, आसनमध्यास्व, भवता ममोपरि महती कृपा कृता । आप आइये, आसन पर बैठिये, आपने मुझ पर बड़ी कृपा की ।

 

अकारादिः सूक्तयः

  • अग्ने: खरतरादेव लोहं दृढतरं भवेत्।
  • अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः ।
  • अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।
  • अजो नित्यं शाश्वतोऽयं पुराणः ।
  • अज्ञः सुखमाराध्यः ।
  • अति सर्वत्र वर्जयेत् ।

सुभाषित


गोष्पदी-कृत-वारीशं मशकी-कृत-राक्षसम् ।
रामायण-महामाला-रत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥

I make obeisance to the son of Vayu (the Wind God),
who tamed the vast ocean into a hoof-print (in
the mud), turned the demons into mosquitoes, and is
the gem in the great garland that the Ramayana is.


पठन/मनन/स्मरण


॥ श्रीहनूमत्स्तुती ॥

हनुमानञ्जनासूनुर्वायुपुत्रो महाबलः ।
रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः ॥ १॥
Hanuman, Anjana’s son, the son of wind-god,
one endowed with great strength,
the favourite of Sri Rama, Arjuna’s friend,
one having reddish brown eyes and unlimited valour

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ २॥
The one who leapt across the ocean,
who dispelled the deep anguish of Sita,
the saviour of Laxmana and who destroyed the pride of Ravana

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत् ॥ ३॥
If one recites these twelve names of the noble Hanuman –
the best among the monkeys before retiring to bed,
on rising up in the morning or during journeys

तस्य सर्व भयं नास्ति रणे च विजयी भवेत् ।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन ॥ ४॥
He will not face fear from any quarter. He will be successful in
battles. He need not have fear
either while entering the royal door, or a deep cavern.
(From Ananda Ramayana, Manohara Kanda.13-8-11).
॥ ॐ तत्सत् ॥
Encoded, proofread, and comments by
N. Balasubramanian bbalu at satyam.net.in

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १७ (साहित्य विशेष)

Gavya17

 


शब्द सिन्धु


अनहङ्कारः (anaha.nkaaraH) = being without false egoism
अनात्मनः (anaatmanaH) = of one who has failed to control the mind
अनादर (anaadara) = lack of respect
अनादि (anaadi) = without beginning
अनादिं (anaadiM) = without beginning
अनादित्व (anaaditva) = non-beginning
अनादित्वात् (anaaditvaat.h) = due to eternity
अनानसफलम् (anaanasaphalam.h) = (n) pineapple
अनामयं (anaamayaM) = without miseries
अनारम्भात् (anaarambhaat.h) = by nonperformance
अनार्य (anaarya) = persons who do not know the value of life
अनावृत्तिं (anaavRittiM) = no return
अनाशिनः (anaashinaH) = never to be destroyed
अनाश्रितः (anaashritaH) = without taking shelter
अनाहत (anaahata) = unbeaten
अनिकेतः (aniketaH) = having no residence
अनिच्छन् (anichchhan.h) = without desiring
अनित्य (anitya) = uncertain/temporary/ephemeral/transient
अनित्यं (anityaM) = temporary
अनित्यः (anityaH) = nonpermanent
अनियमित (aniyamita) = irregular
अनिर्देश्यं (anirdeshyaM) = indefinite
अनिर्विण्णचेतस (anirviNNachetasa) = without deviation
अनिलः (anilaH) = wind or air
अनिलचुल्लि (anilachulli) = (f) gas (LPG)
अनिवार्य (anivaarya) = (adj) compulsary
अनिश्चयत् (anishchayat.h) = due to non-determination (having not decided)
अनिष्ट (anishhTa) = and undesirable
अनिष्टं (anishhTaM) = leading to hell
अनीश्वरं (aniishvaraM) = with no controller
अनु (anu) = following
अनुकम्पार्थं (anukampaarthaM) = to show special mercy
अनुकारि (anukaari) = like
अनुचारय (anuchaaraya) = (causative of anu+car) follow
अनुचिन्तयन् (anuchintayan.h) = constantly thinking of
अनुतिष्ठन्ति (anutishhThanti) = regularly perform
अनुत्तमं (anuttamaM) = the finest
अनुत्तमां (anuttamaaM) = the highest
अनुदर्शनं (anudarshanaM) = observing
अनुदानं (anudaanaM) = (n) donation, grant
अनुदिनं (anudinaM) = daily
अनुद्दिश्य (anuddishya) = having targetted or aimed at
अनुद्योगिता (anudyogitaa) = unemployment
अनुद्योगी (anudyogii) = unemployed
अनुद्विग्नमनाः (anudvignamanaaH) = without being agitated in mind
अनुद्वेगकरं (anudvegakaraM) = not agitating
अनुपकारिणे (anupakaariNe) = irrespective of return
अनुपश्यति (anupashyati) = one tries to see through authority
अनुपश्यन्ति (anupashyanti) = can see
अनुपश्यामि (anupashyaami) = do I foresee
अनुप्रपन्नाः (anuprapannaaH) = following
अनुबन्ध (anubandha) = (m) result, effect
अनुबन्धं (anubandhaM) = of future bondage
अनुबन्धः (anubandhaH) = (m) annexure


पाठ


1 2

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • शठे शाठ्यं समाचरेत्।
  • शत्रवो यान्ति मित्रत्वं विशुद्धे सति चेतसा ।
  • शत्रोरपि गुणा वाच्याः दोषा वाच्या गुरोरपि ।
  • शरीरं पातयामि कार्यं वा साधयामि।
  • शास्त्रं हि निश्चितधियां क्व न सिद्धमेति।
  • शिरो वा तद्यज्ञस्य यदातिथ्यम् ।
  • शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ।
  • शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ।

सुभाषित


प्रीणाति य सुचरितैः पितरं स पुत्रो
यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् ।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यत्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥

पिता को अपने सद्वर्तन से खुश करनेवाला पुत्र, केवल पति का हित चाहनेवाली पत्नी, और जो सुख-दुःख में समान आचरण रखता हो ऐसा मित्र – ये तीन जगत में पुण्यवान को हि प्राप्त होते हैं ।


पठन/स्मरण/मनन


चम्पू श्रव्य काव्य का एक भेद है, अर्थात गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। गद्य तथा पद्य मिश्रित काव्य को “चंपू” कहते हैं।

गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते – (साहित्य दर्पण ६ / ३३६)
काव्य की इस विधा का उल्लेख साहित्यशास्त्र के प्राचीन आचार्यों- भामह, दण्डी, वामन आदि ने नहीं किया है। यों गद्य पद्यमय शैली का प्रयोग वैदिक साहित्य, बौद्ध जातक, जातकमाला आदि अति प्राचीन साहित्य में भी मिलता है। चम्पूकाव्य परंपरा का प्रारम्भ हमें अथर्व वेद से प्राप्त होता है। चम्पू नाम के प्रकृत काव्य की रचना दसवीं शती के पहले नहीं हुई। त्रिविक्रम भट्ट द्वारा रचित ‘नलचम्पू’, जो दसवीं सदी के प्रारम्भ की रचना है, चम्पू का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अतिरिक्त सोमदेव सुरि द्वारा रचित यशःतिलक, भोजराज कृत चम्पू रामायण, कवि कर्णपूरि कृत आनन्दवृन्दावन, गोपाल चम्पू (जीव गोस्वामी), नीलकण्ठ चम्पू (नीलकण्ठ दीक्षित) और चम्पू भारत (अनन्त कवि) दसवीं से सत्रहवीं शती तक के उदाहरण हैं। यह काव्य रूप अधिक लोकप्रिय न हो सका और न ही काव्यशास्त्र में उसकी विशेष मान्यता हुई। हिन्दी में यशोधरा (मैथिलीशरण गुप्त) को चम्पू-काव्य कहा जाता है, क्योंकि उसमें गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है।

गद्य और पद्य के इस मिश्रण का उचित विभाजन यह प्रतीत होता है कि भावात्मक विषयों का वर्णन पद्य के द्वारा तथा वर्णनात्मक विषयों का विवरण गद्य के द्वारा प्रस्तुत किया जाय। परन्तु चंपूरचयिताओं ने इस मनोवैज्ञानिक वैशिष्ट्य पर विशेष ध्यान न देकर दोनों के संमिश्रण में अपनी स्वतंत्र इच्छा तथा वैयक्तिक अभिरुचि को ही महत्व दिया है।

Let us read and imbibe this version of Sanskrit by पठन/स्मरण/मनन of भोज रचित चंपू रामायण – बाल काण्ड

Read the book here: https://www.scribd.com/doc/100068695/Bhoja-Champu-Champu-Ramayana

3-70410b5b48 1 2 3 4

संस्कृत गोवीथी : गव्य 2

Gavya_2


शब्द सिन्धु

Morning


  • गतप्रभाते – last morning
  • अद्य प्रभाते – this morning
  • उषसी – Sandhya Time
  • बालादित्य – Morning Sun

पाठ १.२


Morning Theme

  • अद्य प्रातः आगतवान् वा? – Did you come this morning?
  • त्वं प्रातः किं खादसि? – What do you eat in the morning?
  • अद्य प्रातः आरभ्य बहु कार्याणि – I have had a lot work since morning
  • प्रतिप्रभातं विद्यालयं न गच्छामि इति रोदिति – He cries every morning saying he would not go to school

पाठ

Word Word2 Sentence Pattern 1 Sentence Pattern 2
अहं (में) वदामि अहं वदामि| वदामि अहं|
त्वं (तू) वदसि त्वं  वदसि| वदसि त्वं |
स: (वह) वदति स: वदति| वदति स:|

 

वदामि – To say

Usages:

(Focus on वदामि)

  • यथार्थं वदामि – I am telling the truth.
  • अस्मिन् विषये अनन्तरं वदामि – I’ll tell you about it later.
  • अहं किमर्थं असत्यं वदामि? – Why should I tell a lie?
  • त्वां धन्यं वदामि – Thank you!
  • तत्र अहं किमपि न वदामि – I do not want to say anything in this regard
  • अहम् तां किमपि न वदामि । प्रयोजनम् किम् ? – I don’t say anything to her. What is the point?

(Focus on वदसि?)

  • किं भोः, एवं वदसि? – Hey, why do you say so?
  • त्वम् संस्कृतं वदसि ? – Do you speak Sanskrit?

(Focus on वदति)

  • तत्र गमनं मास्तु भोः, सः बहुमूल्यं वदति । He is very expensive, let us not go to him.
  • संस्कृतं जानामि इति वदति भवान् तदनन्तरं संस्कृतेन सम्भाषणं कर्तुं किमर्थं सङ्कोचः ? You say you know Sanskrit but why then this hesitation to talk in Sanskrit?

Patha

सुभाषित


 

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

एक एक क्षण गवाये बिना विद्या पानी चाहिए; और एक एक कण बचा करके धन ईकट्ठा करना चाहिए । क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समजनेवाले को धन कहाँ ?

 


स्वाध्याय – पठन, मनन


Listen this video

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ९(हनुमान विशेष)

Gavya9

 


शब्द सिन्धु


अंशभूतं (a.nshabhuutaM) = has been a part of her
अंशः (a.nshaH) = fragmental particle
अंशुमान् (a.nshumaan.h) = radiant
अंशेन (a.nshena) = part
अकर्तारं (akartaaraM) = as the nondoer
अकर्म (akarma) = inaction
अकर्मकृत् (akarmakRit.h) = without doing something
अकर्मणः (akarmaNaH) = than no work
अकर्मणि (akarmaNi) = in not doing prescribed duties
अकल्मषं (akalmashhaM) = freed from all past sinful reactions
अकस्मात् (akasmaat.h) = by chance
अकारः (akaaraH) = the first letter
अकारो (akaaro) = the letter `a’
अकार्य (akaarya) = and forbidden activities
अकार्यं (akaaryaM) = what ought not to be done
अकार्ये (akaarye) = and what ought not to be done
अकीर्ति (akiirti) = infamy
अकीर्तिं (akiirtiM) = infamy
अकीर्तिः (akiirtiH) = ill fame
अकुर्वत् (akurvat.h) = did
अकुर्वत (akurvata) = did they do
अकुशलं (akushalaM) = inauspicious


पाठ


Untitled

2

3


सुभाषित


कृतम् हनुमता कार्यम् सुमहद्भुवि दुर्लभम् |
मनसापि यदन्येन न शक्यम् धरणीतले || ६-१-२

“A very outstanding work, the most arduous in the world has been done by Hanuman, which could not be carried out even in thought by any other on the surface of this earth.”


पठन/मनन/स्मरण


आञ्जनेय गायत्रि
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि ।
तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ॥
Meaning: I wish to know the son of a~njani.
I meditate on vAyu putra.
May that hanumAn propel us.

आञ्जनेय त्रिकाल वंदनं
प्रातः स्मरामि हनुमन् अनन्तवीर्यं
श्री रामचन्द्र चरणाम्बुज चंचरीकम् ।
लंकापुरीदहन नन्दितदेववृन्दं
सर्वार्थसिद्धिसदनं प्रथितप्रभावम् ॥

Meaning: I remember that hanuman during
the early hours as one whose valor is
immeasurable. I remember that bee who
stays always at shrI ramachandra’s
feet. I remember HIM who burnt la.nka
and made gods happy. I remember him
who is the store house of all siddhis
and who is capable of anything.
माध्यम् नमामि वृजिनार्णव तारणैकाधारं
शरण्य मुदितानुपम प्रभावम् ।
सीताधि सिंधु परिशोषण कर्म दक्षं
वंदारु कल्पतरुं अव्ययं आञ्ज्नेयम् ॥

Meaning: I bow that Anjaneya svAmi during
the mid day as the one capable Person
to crossing the ocean, who blesses the
person with enormous happiness when
he/she takes refuge in HIM. He is
entrusted with the responsibility of
annihilating sIta’s sorrows. He is like
a wish-fulfilling tree for one who bows to HIM.
सायं भजामि शरणोप स्मृताखिलार्ति
पुञ्ज प्रणाशन विधौ प्रथित प्रतापम् ।
अक्षांतकं सकल राक्षस वंश
धूम केतुं प्रमोदित विदेह सुतं दयालुम् ॥

Meaning: I worship that A~njaneya svAmi
during the evening as the one who saves
everyone who takes HIS name. He the most
valorous one, who killed akShA and was
the dhUmaketu for all the demons.
He also made sIta devi (daughter of
videha country) happy.

——-
Ravisankar S. Mayavaram

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १३ (हनुमान विशेष)

Gavya13

पवनपुत्र हनुमान

पवन शब्द का अर्थ है पवित्र करने वाला। यथा पुनाति इति पवनः।

वायोरग्निः (तै.उ. २-१-१)

पवनपुत्र अग्नि.

हनुमान – अग्नि personified.


शब्द सिन्धु


अतिरिच्यते (atirichyate) = becomes more
अतिवर्तते (ativartate) = transcends
अतिशय (atishaya) = wonderful
अतिशयोक्ति (atishayokti) = exaggeration
अतीतः (atiitaH) = surpassed
अतीत्य (atiitya) = transcending
अतीन्द्रियं (atiindriyaM) = transcendental
अतीव (atiiva) = very much
अतुलनीय (atulaniiya) = uncomparable
अतूल्यं (atuulyaM) = uncomparable
अत्मानं (atmaanaM) = (masc.Acc.S)the self
अत्यजत् (atyajat.h) = left, sacrifice
अत्यन्तं (atyantaM) = the highest
अत्यर्थं (atyarthaM) = highly
अत्यागिनां (atyaaginaaM) = for those who are not renounced
अत्यानि (atyaani) = surpassing
अत्युष्ण (atyushhNa) = very hot
अत्येति (atyeti) = surpasses
अत्र (atra) = here
अथ (atha) = thereupon
अथशब्द (athashabda) = the word atha (prayers are started with words atha or AUM)
अथर्ः (atha.rH) = object, meaning
अथर्वण्वाक्यं (atharvaNvaakyaM) = `atharvaNa” word-piece
अथर्वशीर्ष (atharvashiirshha) = atharva(?)
अथर्वशीर्षं (atharvashiirshhaM) = ‘atharva’ heading or head
अथवा (athavaa) = or
अथातः (athaataH) = atha and ataH : then and therefore
अथौ (athau) = or in other words


पाठ


1 2 3

समयः (Time)

संस्कृतभाषा/वाक्यान

https://goo.gl/tihzmn

  • कः समयः ? = What is the time?
  • सपादचतुर्वादनम् । = A quarter past four.
  • द्विवादने अवश्यं गन्तव्यं अस्ति । = I must leave at 2.
  • त्रिवादने एकं यानं अस्ति । = There is a bus at three.
  • पादोन षड्वादने भवान् मिलति वा ? = Will you meet at a quarter to six ?
  • सार्धपञ्चवादने अहं गृहे तिष्ठामि । = I will be at home at half past five.
  • पञ्च ऊन दशवादने मम घटी स्थगिता । = My watch stoppped at 5 minutes to 10 o’clock.
  • संस्कृतवार्ताप्रसारः सायं दशाधिक षड्वादने । = The Sanskrit news bulletin is at 6.10 p.m.
  • सार्धं द्विघण्टात्मकः कार्यक्रमः । = It is a programme for two and a half hours.
  • षड्वादनपर्यन्तं तत्र किं करोति ? = What are you going to do there till six o’clock ?

सुभाषित


महा-व्याकरणाम्भोधि-मन्थ-मानस-मन्दरम् ।
कवयन्तं राम-कीर्त्या हनुमन्तमुपास्महे ॥ ३॥
I worship Hanuman whose intellect, like the
Mandara mountain (which was used to churn the ocean
of milk for nectar) acted as the churning rod for the
great ocean of the science of grammar,
and who keeps praising the fame of Rama. 3.


पठन/स्मरण


॥ श्रीहनुमत् पञ्चरत्नम् ॥ .. Garland of Five Gems on Shri Hanuman .. Translation by A. Narayanaswami वीताखिल-विषयेच्छं जातानन्दाश्र पुलकमत्यच्छम् । सीतापति दूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम् ॥ १॥ I now call to mind Hanuman, the son of the wind god, gladdening to contemplate, who is free of all sensual desires, who sheds tears of joy and is filled with rapture, who is the purest of the pure and the first of Rama’s messengers. 1. तरुणारुण मुख-कमलं करुणा-रसपूर-पूरितापाङ्गम् । सञ्जीवनमाशासे मञ्जुल-महिमानमञ्जना-भाग्यम् ॥ २॥ I think of Hanuman, whose face is like the lotus, red like the rising sun, the corners of whose eyes are full of the feeling of mercy, who is life-giving, whose greatness has the quality of beauty, who personifies Anjana’s good fortune. 2. शम्बरवैरि-शरातिगमम्बुजदल-विपुल-लोचनोदारम् । कम्बुगलमनिलदिष्टम् बिम्ब-ज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे ॥ ३॥ I seek refuge in the one who flies faster than the arrows of madana, whose eyes wide as the petals of the lotus are filled with kindness, whose neck is smooth and well-formed as the conch shell, who represented good fortune to the wind god, and whose lips are bright-red like the bimba fruit. 3. दूरीकृत-सीतार्तिः प्रकटीकृत-रामवैभव-स्फूर्तिः । दारित-दशमुख-कीर्तिः पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्तिः ॥ ४॥ May the form of Hanuman come resplendent before me, the one that dispelled Sita’s grief, that brought out the glory of Shri Rama’s prowess, that tore Ravana’s reputation into shreds. 4. वानर-निकराध्यक्षं दानवकुल-कुमुद-रविकर-सदृशम् । दीन-जनावन-दीक्षं पवन तपः पाकपुञ्जमद्राक्षम् ॥ ५॥ I saw the leader of the Vanara (monkey) populace, the one who was (inimical) like the sun’s rays to the (night-blooming) lily of the Danava people (the demonic race), who is dedicated to the protection of those in distress, who was the culmination of the accumulated penances of Vayu. 5. एतत्-पवन-सुतस्य स्तोत्रं यः पठति पञ्चरत्नाख्यम् । चिरमिह-निखिलान् भोगान् भुङ्क्त्वा श्रीराम-भक्ति-भाग्-भवति ॥ ६॥ He who recites this hymn to Hanuman, entitled ᳚Pancharatnam,᳚ will become one with the devotees of Shri Rama after enjoying for long the pleasures of this world. 6. इति श्रीमच्छंकर-भगवतः कृतौ हनुमत्-पञ्चरत्नं संपूर्णम् ॥ Here ends ᳚Hanumat Pancharatnam,᳚ composed by Shri Shankara Bhagavata, Adi Shankaracarya. Encoded by Raman Anantaraman (anantaraman@nscl.msu.edu)

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 7

Gavya7


शब्द सिन्धु


कवची (kavachii) = with armor
कवयः (kavayaH) = the intelligent
ज्ञायसे (GYaayase) = can to be known
ज्ञास्यसि (GYaasyasi) = you can know
ज्ञेयं (GYeyaM) = be known
ज्ञेयः (GYeyaH) = should be known
ज्ञेयोसि (GYeyosi) = You can be known


पाठ


संधि

1

Apply above simple sandhi rules on below paragraph, wherever you feel applicable.

2व्यवहार वाक्य

  • समय समागत:| – समय पर आ गए|
  • भवन्तं जानामि| – आपको जनता हूँ|
  • तथैव अस्तु| – वैसा ही हो|
  • जानामि भो:| – जानता हूँ|

सुभाषित


शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
सुजनाः न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने ॥ ॥

Not every mountain has gems in it, and not every
elephant is adorned with pearls . Not every forest
is blessed with sandal trees, and good people are
not to be found everywhere.


पठन/मनन


उषा वंदना

http://sanskritdocuments.org/doc_deities_misc/salutedawn.html?lang=sa

उषावंदनम्
   Salutation of the Dawn

अद्य भावय सुदिनम्!
Look to this Day!
जीवभूतः काल एषः । प्राणस्य प्राणः ।
For it is Life, the very Life of Life.
अस्मिन् स्वल्पकाले सत्यमये तव सतः सत्यं तिष्ठति
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence;
विकासानन्देन
The Bliss of Growth,
कर्मश्रिया
The Glory of Action,
सौन्दर्यशोभया ।
The Splendor of Beauty;
ह्यस्तु स्वप्नः ।
For Yesterday is but a Dream,
श्वस्तु आभासः ।
And Tomorrow is only a Vision;
कर्मकुशलतया आचरिते अद्य
But Today well lived makes every
गतदिनानि आनन्दस्वप्नमयानि भवन्ति ।
Yesterday a Dream of Happiness, and every
भाविदिनानि आशाप्रभया ज्वलन्ति ।
Tomorrow a Vision of Hope.
अतः सुदिनं अद्य सम्यक् भावय!
Look well therefore to this Day!
एषा उषाभिवन्दना!
Such is the Salutation of the Dawn.

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४० (पुराण विशेष) :: वृक्ष प्रतिष्ठा

Gavya40

वृक्ष प्रतिष्ठा

This is finest example of how well we used to take care of trees and plants. They were setup in community as living beings.

आचार्ये द्विगुणं दद्यात्पूर्ववन्मण्डपादिकम् ।७०.००८
पापनाशः परा सिद्धिर्वृक्षारामप्रतिष्ठया ॥७०.००८

Establishing trees and sacred groves can wipe out one’s sins and receives highest merits!

With the प्राण प्रतिष्ठा, life infusion, trees can last hundreds of years, but without it? Not our responsibility. Hence, it was compulsory to perform वृक्ष प्रतिष्ठा!

You believe it or not, trees can survive for long if they are infused by Prana of worshipers. This infusion of Prana, via trees, then spread to community for their well-being.

[Old note on same subject]

Planting tree is very sensitive activity. Equivalent to raising children.
No parents wish their children to die prematurely or live painful suffering life.
For the well-being of the tree-life, try to follow during plantation:

• Worship Varuna, Vishnu and Parjanya for the well being of the plant before planting it.
• Worship sapling or seed itself before planting it.
• Make oneself mentally pure and physically clean before starting planting activity.
• Planting in Uttara, Rohini, Anuradha, Chirta, Mrigsira, Ravati, Mula, Vishakha, Tishya, Sravan, Aswini and hasta Nakshatra influences a tree and helps it flourish at best potential.

Reference: Brihat Samhita and Agni puran

Educate children, friends and relatives involved in tree-planting and farming.


शब्द सिन्धु


हित्वा (hitvaa) = having given up/abandoned
हिनस्ति (hinasti) = degrade
हिमालयः (himaalayaH) = the Himalayan mountains
हिरण्यकश्यपु (hiraNyakashyapu) = a demon king, killed by Vishnu
हिरण्यगर्भ (hiraNyagarbha) = Effulgent, a name of Sun
हिरण्यगर्भः (hiraNyagarbhaH) = the Golden Embryo of life and form
हीनौ (hiinau) = bereft, having lost
हुत (huta) = offerings (usually made to a fire)
हुतं (hutaM) = offered
हुतभुक् (hutabhuk.h) = fire (one who eats offerings)
हुताशवक्त्रं (hutaashavaktraM) = fire coming out of Your mouth
हृ (hRi) = to steal
हृत (hRita) = deprived of
हृतत् (hRitat.h) = heart
हृत्स्थं (hRitsthaM) = situated in the heart
हृद् (hRid.h) = heart (neut)
हृदय (hRidaya) = heart
हृदयं (hRidayaM) = heart
हृदयस्थं (hRidayasthaM) = heart-stationed
हृदयानि (hRidayaani) = hearts
हृदयी (hRidayii) = in my heart
हृदयेषु (hRidayeshhu) = in the hearts of
हृदि (hRidi) = in the heart
हृद्देशे (hRiddeshe) = in the location of the heart
हृद्याः (hRidyaaH) = pleasing to the heart
हृषितः (hRishhitaH) = gladdened
हृषीकेश (hRishhiikesha) = O master of all senses
हृषीकेशं (hRishhiikeshaM) = unto Lord KRishhNa
हृषीकेशः (hRishhiikeshaH) = Hrsikesa (KRishhNa, the Lord who directs the senses of the devotees)
हृष्टरोमा (hRishhTaromaa) = with his bodily hairs standing on end due to his great ecstasy
हृष्यति (hRishhyati) = takes pleasure
हृष्यामि (hRishhyaami) = I am enjoying
हेतवः (hetavaH) = causes
हेतु (hetu) = intention
हेतुः (hetuH) = aim (Here: cause)
हेतुना (hetunaa) = for the reason
हेतुमद्भिः (hetumadbhiH) = with cause and effect
हेतोः (hetoH) = in exchange
हेमन् (heman.h) = gold
हेमन्त (hemanta) = (masc) winter
होरा (horaa) = A Varga. The Division of a sign into Solar and Lunar or Division into halves. Used for determining Wealth amongst other things
ह्यः (hyaH) = yesterday
ह्रस्वा (hrasvaa) = (adj) short
ह्रियते (hriyate) = is attracted
ह्रीः (hriiH) = modesty
क्षणं (kShaNaM) = one second
क्षणप्रभा (kShaNaprabhaa) = (f) lightning
क्षणवियोग (kShaNaviyoga) = momentary separation
क्षणवीक्षित (kShaNaviikshita) = glance
क्षत्रिय (kShatriya) = the caste of princes and warriors
क्षत्रियबलं (kShatriyabalaM) = the power or might of the kshatriyas or kings
क्षत्रियस्य (kShatriyasya) = of the ksatriya
क्षत्रियाः (kShatriyaaH) = the members of the royal order


पाठ


1 2


सुभाषित


सत्यं ब्रुयात् प्रियम् ब्रुयान्नब्रुयात् सत्यमप्रियम् |
प्रियम् च नानॄतम् ब्रुयादेष: धर्म: सनातन: ||

speak true, speak what is pleasant to others. don’t tell truth which is not pleasant (which is harmful) (similarly) even though pleasant, don’t speak false, this is Darmah


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


वृक्ष प्रतिष्ठा

भगवानुवाच
प्रतिष्ठां पादपानाञ्च वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदां ।७०.००१
सर्वौषध्युदकैर्लिप्तान् पिष्टातकविभूषितान् ॥७०.००१
वृक्षान्माल्यैरलङ्कृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत् ।७०.००२
सूच्या सौवर्णया कार्यं सर्वेषां कर्णवेधनम् ॥७०.००२
हेमशलाकयाञ्जनञ्च वेद्यान्तु फलसप्तकम् ।७०.००३
अधिवासयेच्च प्रत्येकं घटान् बलिनिवेदनं ॥७०.००३
इन्द्रादेरधिवासोऽथ होमः कार्यो वनस्पतेः ।७०.००४
वृक्षमध्यादुत्सृजेद्गां ततोऽभिषेकमन्त्रतः ॥७०.००४
ऋग्यजुःसाममन्त्रैश्च वारुणैर्मङ्गलै रवैः(१) ।७०.००५
वृक्षवेदिककुम्भकैश्च(२) स्नपनं द्विजपुङ्गवाः ॥७०.००५
तरूणां यजमानस्य कुर्युश्च यजमानकः ।७०.००६
भूषितो दक्षिणां दद्याद्गोभूभूषणवस्त्रकं ॥७०.००६

क्षीरेण भोजनं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयं ।७०.००७
होमस्तिलाद्यैः कार्यस्तु पलाशसमिधैस्तथा ॥७०.००७
आचार्ये द्विगुणं दद्यात्पूर्ववन्मण्डपादिकम् ।७०.००८
पापनाशः परा सिद्धिर्वृक्षारामप्रतिष्ठया ॥७०.००८
स्कन्दायेशो यथा प्राह प्रतिष्ठाद्यं तथा शृणु ।७०.००९
सूर्येशगणशक्त्यादेः परिवारस्य वै हरेः ॥७०.००९

इत्यादिमाहापुराणे आग्नेये पादपारामप्रतिष्ठाकथनं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १९ (साहित्य विशेष)

Gavya19


शब्द सिन्धु


अन्न (anna) = food
अन्नं (annaM) = foodstuff
अन्नात् (annaat.h) = from grains
अन्य (anya) = other person
अन्यं (anyaM) = other
अन्यः (anyaH) = another
अन्यत् (anyat.h) = other
अन्यत्र (anyatra) = somewhere else
अन्यथा (anyathaa) = other
अन्यया (anyayaa) = by the other
अन्यां (anyaaM) = another
अन्यान् (anyaan.h) = others
अन्यानि (anyaani) = different
अन्यायेन (anyaayena) = illegally
अन्ये (anye) = others
अन्येन (anyena) = by another
अन्येभ्यः (anyebhyaH) = from others
अन्यैः (anyaiH) = by others
अन्योन्य (anyonya) = mutual
अन्वय (anvaya) = Family
अन्वशोचः (anvashochaH) = you are lamenting
अन्विच्छ (anvichchha) = try for
अन्वित (anvita) = (p.p) Followed or attended by, in company with, joined by; having ossessed of; overpowerd by, connected grammatically;
अन्विताः (anvitaaH) = absorbed
अन्वेषणम् (anveshhaNam.h) = (n) search, exploration
अपकृ (apakRi) = to harm
अपकेन्द्रण (apakendraNa) = centrifugation
अपङ्ग (apa.nga) = handicapped
अपची (apachii) = to decrease
अपठम् (apaTham.h) = read
अपण्डित (apaNDita) = someone who is not a scholar
अपत्य (apatya) = Progeny
अपनुद्यात् (apanudyaat.h) = can drive away
अपमा (apamaa) = comparison
अपमानयोः (apamaanayoH) = and dishonour
अपर (apara) = other
अपरं (aparaM) = junior
अपररात्र (apararaatra) = (m) dawn
अपरस्पर (aparaspara) = without cause
अपरा (aparaa) = lower
अपराजितः (aparaajitaH) = who had never been vanquished
अपराजीत (aparaajiita) = Unconquered
अपराणि (aparaaNi) = others
अपरान् (aparaan.h) = others
अपरिग्रह (aparigraha) = abstention from greed, non-possessiveness
अपरिग्रहः (aparigrahaH) = free from the feeling of possessiveness
अपरिमेयं (aparimeyaM) = immeasurable
अपरिहार्ये (aparihaarye) = of that which is unavoidable
अपरे (apare) = others
अपर्याप्तं (aparyaaptaM) = immeasurable
अपलायनं (apalaayanaM) = not fleeing
अपवर्ग (apavarga) = heaven, liberation
अपवहनं (apavahanaM) = seducetion
अपवाद (apavaada) = exceptional
अपविघ्नः (apavighnaH) = without obstacles
अपश्यत् (apashyat.h) = he could see
अपस्मार (apasmaara) = forgetful
अपस्मारः (apasmaaraH) = (m) epilepsy
अपहरण (apaharaNa) = stealing
अपहरणं (apaharaNaM) = abduction, kipnapping
अपहर्तारं (apahartaaraM) = the remover]destroyer
अपहृत (apahRita) = stolen
अपहृतचेतसां (apahRitachetasaaM) = bewildered in mind
अपात्रेभ्यः (apaatrebhyaH) = to unworthy persons
अपान (apaana) = one of the vital airs, controls the elimination of bodily wastes
अपानं (apaanaM) = the air going downward
अपाने (apaane) = in the air which acts downward
अपापो (apaapo) = without sins
अपायिनः (apaayinaH) = disappearing
अपारा (apaaraa) = one who has no limits
अपावृतं (apaavRitaM) = wide open


पाठ


1 2

3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सहते विपत्सहस्रं मानी नैवापमानलेशमपि ।
  • सहसा विदधीत न क्रियाम् अविवेकः परमापदां पदम् ।
  • सिद्ध्यन्ति कुत्र सुकृतानि विना श्रमेण ?
  • सुतप्तमपि पानीयं शमत्येव पावकम्।
  • सुदुर्लभाः सर्वमनोरमा गिरः ।
  • सुलभा रम्यता लोके दुर्लभं हि गुणार्जनम् ।
  • सुलभो हि द्विषां भङ्गः दुर्लभा सत्स्ववाच्यता ।
  • सोत्साहानां नास्त्यसाध्यं नराणाम् ।
  • स्मृत्वा स्मृत्वा याति दुःखं नवत्वम् ।
  • स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।
  • स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
  • सङ्घे शक्तिः कलौ युगे ।

सुभाषित


तत्त्वं किमपि काव्यानां जानाति विरलो भुवि ।

मार्मिकः को मरन्दानामन्तरेण मधुव्रतम् ॥ ११७ ॥

अन्वयः : भुवि काव्यानां किम् अपि तत्त्वं विरलः जानाति । मधुव्रतम् अन्तरेण मरन्दानां मार्मिकः कः?

It is only a rare person who understands anything of the essence of a literary work. Who has a deep insight into the honey of flowers other than the honey-bee?


पठन


चित्र काव्य

Wiki: https://hi.wikipedia.org/wiki/चित्रकाव्य

 

चित्रकाव्य वह आलंकारिक काव्य है जिसके चरणों की रचना ऐसी युक्ति से की गई हो कि वे चरण किसी विशिष्ट क्रम से लिखे जाने पर कमल, खड़ग, घोड़े, रथ, हाथी आदि के चित्रों के समान बन जाते हों। इसकी गणना अधम प्रकार के काव्यों में होती है।

Why is it called अधम or lowly work?

काव्यस्यात्मा ध्वनि|

 

जिस प्रकार अतिशय अलंकृत नारी लावण्य के अभाव में हृदयावर्जक नहीं हो सकती, उसी प्रकार ध्वनि तत्व के अभाव में अलंकृत काव्य भी हृदयावर्जक नहीं हो सकता। इसलिए अपने काव्य के प्रारम्भ में ही उन्होंने ‘काव्यस्यात्मा ध्वनि’ कहा। ध्वनि ही उनके अनुसार काव्य का आत्मभूत तत्व है।

काव्यका आत्मा ध्वनि है| जब तक काव्य सुसंगत ध्वनि प्रदान नहीं कर पाता, वह अधम कहा जाता है|

चित्र शब्दका साधारण अर्थ प्राण-शून्य आकृति| चित्रकाव्यभी जब तक ध्वनि-शून्य है, तब तक वह शब्दार्थी सूप रचना मात्र है |

प्राणहीन = तत्वहीन

कविको काव्य प्राणवान बनानेका प्रयत्न करना चाहिए | चित्रकाव्य तक अटकना नहीं है|

This is one view.

Here is the another view from the book:

Read the चित्रकाव्य मीमांसा as a part of SAnskrit leanring and then go through the book for further knowledge.

Download book from: https://archive.org/details/PathakRamRupChritaKavyaKautukam

1_1 1_2 1_3

Example

1_4 1_5

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 4 (धर्म)

Gavya_4


शब्द सिन्धु


धर्मसारथि –  charioteer of dharma
धर्मवत् – accompanied by dharman or the law
धर्मार्थ – religious merit and wealth
धर्मागम – Law book


पाठ १.३


 

Bookish

Capture

Capture१

Now, it is easy to understand following set of sentences.

Capture२Simple Sentences for daily usage

  • प्रयत्नं करोमि – I will try.
  • तथा न वदतु – Don’t say that!
  • अहं किं करोमि – What can I do?
  • अवश्यं आगच्छामि – Certainly, I will come

सुभाषित


विद्या मित्रं प्रवासेषु ,भार्या मित्रं गृहेषु च |व्याधितस्यौषधं मित्रं , धर्मो मित्रं मृतस्य च ||

अर्थात् : ज्ञान यात्रा में ,पत्नी घर में, औषध रोगी का तथा धर्म मृतक का ( सबसे बड़ा ) मित्र होता है |


पठन/मनन


पञ्चतन्त्रम् – इत्यस्मात् पुनर्निर्दिष्टम्
लेखक – विष्णुशर्मा
कथामुखम्
ओं नमः श्रीशारदागणपतिगुरुभ्यः । महाकविभ्यो नमः ।


ब्रह्मा रुद्रः कुमारो हरिवरुणयमा वह्निरिद्रः कुबेरः
चन्द्रादित्यौ सरस्वत्यदधियुगनगा वायुरुर्वीभुजङ्गाः ।
सिढा नद्यो श्विनौ श्रीर् दितिर् अदितिसुता मातरश् चंडिकाद्या
वेदास्तीर्थानि यक्षा गणवसुमुनयः पन्तु नित्यं ग्रहाश्च ॥
मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।
चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः ॥०.१॥
सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम्।
तन्त्रैः पञ्चभिरैतच्चकार सुममोहरं शास्त्रम् ॥०.२॥
तद् यथानुश्रूयते। अस्ति दक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम्। तत्र सकलार्थिसार्थकल्पद्रुमः प्रवरङक्पमुकुटमणिम् अजरीचयचर्चितचरणयुगलः सकलकल्पपारंगतेऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव। तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसो वसुशक्तिरुग्रशक्तिरनेकशक्तिश्चेति नामानो बभूवुः।
अथ राजा तान् शास्त्रविमुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय प्रोवाच । भोः ज्ञातम् एतद् भवद्भिर्यः ममैते त्रयोऽपि पुत्राः शास्त्रविमुखा विवेकहीनाश्च। तदेतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्यम् आवहति । अथवा साध्विदम् उच्यते
अजातमृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम्।
यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥०.३॥
वरं गर्भस्रवो वरं मृतेषु नैवाभिगमनम्
वरं जातः प्रोतो वरमपि च कंयैव जनिता।
वरं वन्ध्या भार्या वरमपि च गर्भेषु वसतिः
न चाविदग्धान् रूपद्रविणगुणयुक्तोऽपि तनयः॥ ०.४॥
किं तया क्रियते धेन्वा या न सूते न दुग्धदा।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान्॥ ०.५॥
तदेतेषां यथा बुद्धिप्रबोधनं भवति तथा कोऽप्युपायो नुष्ठीयताम् । अत्र च मद्दत्तां वृत्तिं भुञ्जानानां पण्डितानां पञ्चशती तिष्ठति।
ततो यथा मम मनोरथाः सिद्धिं यान्ति तथानुष्ठीयतामिति।
तत्रैकः प्रोवाचदेव द्वादशभिर्वर्षैर्व्याकरणं श्रूयते । ततो धर्मशास्त्राणि आदीनि अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि। एवञ्च ततो दर्मार्थकामशास्त्राणि ज्ञायन्ते। ततः प्रतिबोधनं भवति।
अथ तन्मध्यतः सुमतिर्नाम सचिवः प्राह । अशाश्वतो यं जीवितव्यविषयः। प्रभूतकालज्ञेयानि शब्दशास्त्राणि। तत् सङ्क्षेपमात्रं शास्त्रं किञ्चितेतेषां प्रबोधनार्थं चिन्त्यतामिति। उक्तं च यतः
अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रम्
स्वल्पं तथायुर्वहवश्च विघ्नाः।
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु
हंसैर्ययथा क्षीरमिवाम्बुध्यात् ॥ ०.६॥
तदत्रास्ति विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणः सकलशास्त्रपारङ्गमः छात्रसंसदि लब्धकीर्तिः। तस्मै समर्पयतु एतान्। स नूनं द्राक् प्रबुद्धान् करिष्यति इति।
स राजा तदाकर्ण्य विष्णुशर्माणमाहूय प्रोवाच । भोः भगवन् मदनुग्रहार्थमेतान् अर्थशास्त्रं प्रति द्राग् यथानंयषड्दर्शनान् विदधासि तथा कुरु। तदाहं त्वां शासनशतेन योजयिष्यामि।
अथ विष्णुशर्मा तं राजानमाहदेव श्रूयतां मे तथ्यवचनम्। नाहं विद्याविक्रयं शासनशतेनापि करोमि। पुनरेतान् तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।
अथासौ राजा तां ब्राह्मणस्यासम्भाव्यां प्रतिज्ञां श्रुत्वा ससचिवः प्रहृष्टो विस्मन्वितस्तस्मै सादरं तान् कुमारान् समर्प्य परां निर्व्यतिम् आजगाम। विष्णुशर्मणापि तान् आदाय तदर्थं मित्रभॆदमित्रप्राप्तिकाकोलूकीयलब्धप्रणाशापरीक्षितकारकाणि चेति पञ्चन्त्राणि रचयित्वा पाठिताः ते राजपुत्राः। तेपि तानधीत्य मासषट्केन यथोक्ताः संवृत्ताः। ततः प्रभृत्येतत् पञ्चतन्त्रं नाम नीतिशास्त्रं बालबोधनार्थं भूतले प्रवृत्तम्। किं बहुना
अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं श्रुणोति च।
न पराभवमवाप्नोति शक्रादपि कदाचन ॥०.७॥
इति कथामुखम्।

 

Popular Posts

My Favorites

भारतीय इतिहास 101 – When Kings were elected by Citizens (प्रजा...

============================================== भारतीय इतिहास 101 - When Kings were elected by Citizens (प्रजा आधीन राजा) ============================================== 'King elected by People' is relatively unknown aspect of Indian History for...

Education : Then and Now