SanskritGavya

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संस्कृत गोवीथि : : गव्य ११ (हनुमान विशेष)

Gavya11

 


शब्द सिन्धु


अघंमनः (aghaMmanaH) = (adj) evil-minded
अघं (aghaM) = grievous sins
अघायुः (aghaayuH) = whose life is full of sins
अङ्क (a.nka) = number
अङ्ग (a.nga) = a limb, or body part
अङ्गं (a.ngaM) = limb(s)
अङ्गानि (a.ngaani) = limbs
अङ्गुल (a.ngula) = a finger
अङ्गुष्ठ (a.ngushhTha) = the big toe
अङ्गुष्ठः (a.ngushhThaH) = (m) thumb
अचरं (acharaM) = and not moving
अचरस्य (acharasya) = and nonmoving
अचल (achala) = (adj) still, stationary
अचलं (achalaM) = unmoving
अचलः (achalaH) = immovable
अचलप्रतिष्ठं (achalapratishhThaM) = steadily situated
अचला (achalaa) = unflinching
अचलेन (achalena) = without its being deviated
अचक्षुस् (achakShus.h) = one without an eye
अचापलं (achaapalaM) = determination
अचिन्त्य (achintya) = inconceivable
अचिन्त्यं (achintyaM) = beyond contemplation
अचिन्त्यः (achintyaH) = inconceivable
अचिराद् (achiraad.h) = without delay/in no time
अचिराद्भव (achiraadbhava) = in no time from the cycle of birth\death
अचिरेण (achireNa) = very soon
अचेतसः (achetasaH) = without KRishhNa consciousness
अच्छेद्यः (achchhedyaH) = unbreakable
अच्युत (achyuta) = O infallible one
अच्युतम् (achyutam.h) = the who does not slip
अज (aja) = goat
अजं (ajaM) = unborn
अजः (ajaH) = unborn
अजगरः (ajagaraH) = (m) python
अजपा (ajapaa) = involuntary repetition (as with a mantra)
अजस्रं (ajasraM) = the unborn one
अजा (ajaa) = (f) goat
अजानं (ajaanaM) = do not understand
अजानत् (ajaanat.h) = knew
अजानता (ajaanataa) = without knowing
अजानन्तः (ajaanantaH) = without knowing
अञ्चलः (aJNchalaH) = (m) aanchal in Hindi
अञ्जन (aJNjana) = the name of the mother of Hanuman
अञ्जनेयासन (aJNjaneyaasana) = the splits
अञ्जलि (aJNjali) = (m) folded hands


पाठ


आत्मीयप्रकरणम्

पुस्तक : संस्कृतवाक्यप्रबोधः

तव ज्येष्टो बन्धुर्भगिनी च कास्ति ? तेरा बड़ा भाई और बहिन कौन है ?
देवदत्तस्सुशीला च । देवदत्त और सुशीला ।
भो बन्धो ! अहं पाठाय व्रजामि । हे भाई ! मैं पढने को जाता हूं ।
गच्छ प्रिय ! पूर्णां विद्यां कृत्वागन्तव्यम् । जा प्यारे ! पूरी विद्या करके आना ।
भवतः कन्याः अद्यश्वः किं पठन्ति ? आपकी बेटियां आजकल क्या पढ़ती हैं ?
वर्णोच्चारणशिक्षादिकं दर्शनशास्त्राणि चाधीत्येदानीं धर्मपाकशिल्पगणितविद्या अधीयते । वर्णोच्चारणशिक्षादिक तथा न्याय आदि शास्त्र पढ़कर अब धर्म, पाक, शिल्प और गणितविद्या पढ़ती हैं ।
भवज्ज्येष्ठया भगिन्या किं किमधीतमिदानीञ्च तया किं क्रियते ? आपकी बड़ी बहिन ने क्या-क्या पढ़ा है और अब वह क्या करती है ?
वर्णज्ञानमारभ्य वेदपर्यन्ताः सर्वा विद्या विदित्वेदानीं बालिकाः पाठयति । अक्षराभ्यास से लेके वेद तक सब पूरी विद्या पढ़के अब कन्याओं को पढ़ाया करती है ।
तया विवाहः कृतो न वा ? उसने विवाह किया वा नहीं ?
इदानीं तु न कृतः परन्तु वरं परीक्ष्य स्वयंवरं कर्तुमिच्छति । अभी तो नहीं किया, परन्तु वर की परीक्षा करके स्वयंवर करने की इच्छा करती है ।
यदा कश्चित् स्वतुल्यः पुरुषो मिलिष्यति तदा विवाहं करिष्यति । जब कोई अपने सदृश पुरुष मिलेगा तब विवाह करेगी ।
तव मित्रैरधीतं न वा ? तेरे मित्रों ने पढ़ा है वा नहीं ?
सर्व एव विद्वांसो वर्त्तन्ते यथाऽहं तथैव तेऽपि, समानस्वभावेषु मैत्र्यास्समभवात् । सब ही विद्वान हैं, जैसा मैं हूं वैसे वे भी हैं, क्योंकि तुल्य स्वभाववालों में मित्रता का सम्भव है ।
तव पितृव्यः किं करोति ? तेरा चाचा क्या करता है ?
राज्यव्यवस्थाम् । राज्य का कारवार ।
इमे किं तव मातुलादयः ? ये क्या तेरे मामा आदि हैं ?
बाढमयं मम मातुल इयं पितृष्वसेयं मातृष्वसेयं गुरुपत्‍न्ययं च गुरुः । ठीक यह मेरा मामा, यह बाप की बहिन भूआ, यह मता की बहिन मौसी, यह गुरु की स्त्री और यह गुरु है ।
इदानीमेते कस्मै प्रयोजनायैकत्र मिलिताः ? इस समय ये सब किसलिये मिलकर इक्ट्ठे हुए हैं ?
मया सत्कारायाऽऽहूताः सन्त आगताः । मैंने सत्कार के अर्थ बुलाये हैं सो ये सब आये हैं ।
इमे मे मम पितृश्वश्रूश्वसुरश्यालदयः सन्ति । ये सब मेरे पिता की सास-ससुर और साले आदि हैं ।
इमे मम मित्रस्य स्त्रीभगिनीदुहितृजामातरः सन्ति । ये मेरे मित्र की स्त्री, बहिन, लड़की और जमाई हैं ।
इमौ मम पितुः श्यालदौहित्रौ स्तः । ये मेरे मामा और भानजे हैं ।

 

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सुभाषित – हनुमान


तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम् |
प्रदेहि सुभगे हारन् यस्य तुष्टासि भामिनि || ६-१२८-८१
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः |
पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा || ६-१२८-८२

Looking at her, Rama who was acquainted with the gesture of another spoke to Seetha as follows: “Dear Seetha! Give the pearl-necklace to a person, with whom you are pleased and in whom the following viz. sharpness, firmness, renown, dexterity, competence, modesty, prudence, virility, prowess and intelligence are ever present.”

हनुमान = प्राण that has following present: तेज,धृति,यश,चतुरता,शक्ति,विनय,निति,पुरुषार्थ,पराक्रम,उत्तम बुध्धि


पठन/मनन/स्मरण – हनुमान


॥ श्रीहनुमद्ध्यानम् मार्कण्डेयपुराणतः ॥

मरकतमणिवर्णं दिव्यसौन्दर्यदेहं
नखरदशनशस्त्रैर्वज्रतुल्यैः समेतम् ।
तडिदमलकिरीटं मूर्ध्नि रोमाङ्कितं च
हरितकुसुमभासं नेत्रयुग्मं सुफुल्लम् ॥ १॥

अनिशमतुलभक्त्या रामदेवस्य योग्या-
न्निखिलगुरुचरित्राण्यास्यपद्माद्वदन्तम् ।
स्फटिकमणिनिकाशे कुण्डले धारयन्तं
गजकर इव बाहुं रामसेवार्थजातम् ॥ २॥

अशनिसमद्रढिम्नं दीर्घवक्षःस्थलं च
नवकमलसुपादं मर्दयन्तं रिपूंश्च ।
हरिदयितवरिष्ठं प्राणसूनुं बलाढ्यं
निखिलगुणसमेतं चिन्तये वानरेशम् ॥ ३॥

इति मार्कण्डेयपुराणतः श्रीहनुमद्ध्यानम् ।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १७ (साहित्य विशेष)

Gavya17

 


शब्द सिन्धु


अनहङ्कारः (anaha.nkaaraH) = being without false egoism
अनात्मनः (anaatmanaH) = of one who has failed to control the mind
अनादर (anaadara) = lack of respect
अनादि (anaadi) = without beginning
अनादिं (anaadiM) = without beginning
अनादित्व (anaaditva) = non-beginning
अनादित्वात् (anaaditvaat.h) = due to eternity
अनानसफलम् (anaanasaphalam.h) = (n) pineapple
अनामयं (anaamayaM) = without miseries
अनारम्भात् (anaarambhaat.h) = by nonperformance
अनार्य (anaarya) = persons who do not know the value of life
अनावृत्तिं (anaavRittiM) = no return
अनाशिनः (anaashinaH) = never to be destroyed
अनाश्रितः (anaashritaH) = without taking shelter
अनाहत (anaahata) = unbeaten
अनिकेतः (aniketaH) = having no residence
अनिच्छन् (anichchhan.h) = without desiring
अनित्य (anitya) = uncertain/temporary/ephemeral/transient
अनित्यं (anityaM) = temporary
अनित्यः (anityaH) = nonpermanent
अनियमित (aniyamita) = irregular
अनिर्देश्यं (anirdeshyaM) = indefinite
अनिर्विण्णचेतस (anirviNNachetasa) = without deviation
अनिलः (anilaH) = wind or air
अनिलचुल्लि (anilachulli) = (f) gas (LPG)
अनिवार्य (anivaarya) = (adj) compulsary
अनिश्चयत् (anishchayat.h) = due to non-determination (having not decided)
अनिष्ट (anishhTa) = and undesirable
अनिष्टं (anishhTaM) = leading to hell
अनीश्वरं (aniishvaraM) = with no controller
अनु (anu) = following
अनुकम्पार्थं (anukampaarthaM) = to show special mercy
अनुकारि (anukaari) = like
अनुचारय (anuchaaraya) = (causative of anu+car) follow
अनुचिन्तयन् (anuchintayan.h) = constantly thinking of
अनुतिष्ठन्ति (anutishhThanti) = regularly perform
अनुत्तमं (anuttamaM) = the finest
अनुत्तमां (anuttamaaM) = the highest
अनुदर्शनं (anudarshanaM) = observing
अनुदानं (anudaanaM) = (n) donation, grant
अनुदिनं (anudinaM) = daily
अनुद्दिश्य (anuddishya) = having targetted or aimed at
अनुद्योगिता (anudyogitaa) = unemployment
अनुद्योगी (anudyogii) = unemployed
अनुद्विग्नमनाः (anudvignamanaaH) = without being agitated in mind
अनुद्वेगकरं (anudvegakaraM) = not agitating
अनुपकारिणे (anupakaariNe) = irrespective of return
अनुपश्यति (anupashyati) = one tries to see through authority
अनुपश्यन्ति (anupashyanti) = can see
अनुपश्यामि (anupashyaami) = do I foresee
अनुप्रपन्नाः (anuprapannaaH) = following
अनुबन्ध (anubandha) = (m) result, effect
अनुबन्धं (anubandhaM) = of future bondage
अनुबन्धः (anubandhaH) = (m) annexure


पाठ


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Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • शठे शाठ्यं समाचरेत्।
  • शत्रवो यान्ति मित्रत्वं विशुद्धे सति चेतसा ।
  • शत्रोरपि गुणा वाच्याः दोषा वाच्या गुरोरपि ।
  • शरीरं पातयामि कार्यं वा साधयामि।
  • शास्त्रं हि निश्चितधियां क्व न सिद्धमेति।
  • शिरो वा तद्यज्ञस्य यदातिथ्यम् ।
  • शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ।
  • शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ।

सुभाषित


प्रीणाति य सुचरितैः पितरं स पुत्रो
यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम् ।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यत्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ॥

पिता को अपने सद्वर्तन से खुश करनेवाला पुत्र, केवल पति का हित चाहनेवाली पत्नी, और जो सुख-दुःख में समान आचरण रखता हो ऐसा मित्र – ये तीन जगत में पुण्यवान को हि प्राप्त होते हैं ।


पठन/स्मरण/मनन


चम्पू श्रव्य काव्य का एक भेद है, अर्थात गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। गद्य तथा पद्य मिश्रित काव्य को “चंपू” कहते हैं।

गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते – (साहित्य दर्पण ६ / ३३६)
काव्य की इस विधा का उल्लेख साहित्यशास्त्र के प्राचीन आचार्यों- भामह, दण्डी, वामन आदि ने नहीं किया है। यों गद्य पद्यमय शैली का प्रयोग वैदिक साहित्य, बौद्ध जातक, जातकमाला आदि अति प्राचीन साहित्य में भी मिलता है। चम्पूकाव्य परंपरा का प्रारम्भ हमें अथर्व वेद से प्राप्त होता है। चम्पू नाम के प्रकृत काव्य की रचना दसवीं शती के पहले नहीं हुई। त्रिविक्रम भट्ट द्वारा रचित ‘नलचम्पू’, जो दसवीं सदी के प्रारम्भ की रचना है, चम्पू का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अतिरिक्त सोमदेव सुरि द्वारा रचित यशःतिलक, भोजराज कृत चम्पू रामायण, कवि कर्णपूरि कृत आनन्दवृन्दावन, गोपाल चम्पू (जीव गोस्वामी), नीलकण्ठ चम्पू (नीलकण्ठ दीक्षित) और चम्पू भारत (अनन्त कवि) दसवीं से सत्रहवीं शती तक के उदाहरण हैं। यह काव्य रूप अधिक लोकप्रिय न हो सका और न ही काव्यशास्त्र में उसकी विशेष मान्यता हुई। हिन्दी में यशोधरा (मैथिलीशरण गुप्त) को चम्पू-काव्य कहा जाता है, क्योंकि उसमें गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है।

गद्य और पद्य के इस मिश्रण का उचित विभाजन यह प्रतीत होता है कि भावात्मक विषयों का वर्णन पद्य के द्वारा तथा वर्णनात्मक विषयों का विवरण गद्य के द्वारा प्रस्तुत किया जाय। परन्तु चंपूरचयिताओं ने इस मनोवैज्ञानिक वैशिष्ट्य पर विशेष ध्यान न देकर दोनों के संमिश्रण में अपनी स्वतंत्र इच्छा तथा वैयक्तिक अभिरुचि को ही महत्व दिया है।

Let us read and imbibe this version of Sanskrit by पठन/स्मरण/मनन of भोज रचित चंपू रामायण – बाल काण्ड

Read the book here: https://www.scribd.com/doc/100068695/Bhoja-Champu-Champu-Ramayana

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संस्कृत गोवीथी : : गव्य 3

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शब्द सिन्धु

Work


  • कार्यप्रवाह – workflow
  • कार्यभार – workload
  • कार्यक्रमस्वचालन – workflow automation
  • कर्मसारथि – co-worker
  • कर्मकरगण – workforce
  • परिबृंहण – additional work

पाठ १.३


Work Theme

  • अहं आगामिवर्षे करिष्यामि | – Next year, I will work.
  • मम अन्यत् कार्यम् अस्ति| – I have some other work.
  • गृहकार्यं सर्वं समाप्तं वा? – Finished your household work?
  • ममापि बहुनि कार्याणि सन्ति – I have a lot of work to do myself.
अहं पठामि में पढ़ता हूँ
त्वं पठसि तू पढ़ता है
स: पठति वह पढ़ता है
अहं खादामि में खाता हूँ
त्वं खादसि तू खाता है
स: खादति वह खाता है
अहं पश्यामि में देखता हूँ
त्वं पश्यसि तू देखता है
स: पश्यति वह देखता है
  • अहं वाणिज्यशास्त्रं पठामि|
  • नवमकक्श्यायां पठामि|
  • संस्कृतं पठामि|
  • त्वं प्रातः किं खादसि?
  • त्वं फलानि अपि खादसि?
  • पुनः कदाचित् पश्यामि (Meet you again)
  • मासे कति चित्राणि पश्यति? – How often do you go to films in a month?

 

Bookish..

Untitled

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सुभाषित


विवेक-चूड़ामणि

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटीभि:।।11।।

Work leads to purification of the mind, not to perception of the Reality. The realisation of Truth is brought about by discrimination and not in the least by ten million of acts.

कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तुपलब्धि (तत्वदृष्टि) – के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता।


पठन/मनन


Following excerpt is from Kathak griha sutra. It is commenraty by Devapala on first Sun sighting Sanskar for newborn. Try to interpret it by self.

KathakGrihasutra_0

KathakGrihasutra

 

 

 

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 7

Gavya7


शब्द सिन्धु


कवची (kavachii) = with armor
कवयः (kavayaH) = the intelligent
ज्ञायसे (GYaayase) = can to be known
ज्ञास्यसि (GYaasyasi) = you can know
ज्ञेयं (GYeyaM) = be known
ज्ञेयः (GYeyaH) = should be known
ज्ञेयोसि (GYeyosi) = You can be known


पाठ


संधि

1

Apply above simple sandhi rules on below paragraph, wherever you feel applicable.

2व्यवहार वाक्य

  • समय समागत:| – समय पर आ गए|
  • भवन्तं जानामि| – आपको जनता हूँ|
  • तथैव अस्तु| – वैसा ही हो|
  • जानामि भो:| – जानता हूँ|

सुभाषित


शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
सुजनाः न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने ॥ ॥

Not every mountain has gems in it, and not every
elephant is adorned with pearls . Not every forest
is blessed with sandal trees, and good people are
not to be found everywhere.


पठन/मनन


उषा वंदना

http://sanskritdocuments.org/doc_deities_misc/salutedawn.html?lang=sa

उषावंदनम्
   Salutation of the Dawn

अद्य भावय सुदिनम्!
Look to this Day!
जीवभूतः काल एषः । प्राणस्य प्राणः ।
For it is Life, the very Life of Life.
अस्मिन् स्वल्पकाले सत्यमये तव सतः सत्यं तिष्ठति
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence;
विकासानन्देन
The Bliss of Growth,
कर्मश्रिया
The Glory of Action,
सौन्दर्यशोभया ।
The Splendor of Beauty;
ह्यस्तु स्वप्नः ।
For Yesterday is but a Dream,
श्वस्तु आभासः ।
And Tomorrow is only a Vision;
कर्मकुशलतया आचरिते अद्य
But Today well lived makes every
गतदिनानि आनन्दस्वप्नमयानि भवन्ति ।
Yesterday a Dream of Happiness, and every
भाविदिनानि आशाप्रभया ज्वलन्ति ।
Tomorrow a Vision of Hope.
अतः सुदिनं अद्य सम्यक् भावय!
Look well therefore to this Day!
एषा उषाभिवन्दना!
Such is the Salutation of the Dawn.

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १९ (साहित्य विशेष)

Gavya19


शब्द सिन्धु


अन्न (anna) = food
अन्नं (annaM) = foodstuff
अन्नात् (annaat.h) = from grains
अन्य (anya) = other person
अन्यं (anyaM) = other
अन्यः (anyaH) = another
अन्यत् (anyat.h) = other
अन्यत्र (anyatra) = somewhere else
अन्यथा (anyathaa) = other
अन्यया (anyayaa) = by the other
अन्यां (anyaaM) = another
अन्यान् (anyaan.h) = others
अन्यानि (anyaani) = different
अन्यायेन (anyaayena) = illegally
अन्ये (anye) = others
अन्येन (anyena) = by another
अन्येभ्यः (anyebhyaH) = from others
अन्यैः (anyaiH) = by others
अन्योन्य (anyonya) = mutual
अन्वय (anvaya) = Family
अन्वशोचः (anvashochaH) = you are lamenting
अन्विच्छ (anvichchha) = try for
अन्वित (anvita) = (p.p) Followed or attended by, in company with, joined by; having ossessed of; overpowerd by, connected grammatically;
अन्विताः (anvitaaH) = absorbed
अन्वेषणम् (anveshhaNam.h) = (n) search, exploration
अपकृ (apakRi) = to harm
अपकेन्द्रण (apakendraNa) = centrifugation
अपङ्ग (apa.nga) = handicapped
अपची (apachii) = to decrease
अपठम् (apaTham.h) = read
अपण्डित (apaNDita) = someone who is not a scholar
अपत्य (apatya) = Progeny
अपनुद्यात् (apanudyaat.h) = can drive away
अपमा (apamaa) = comparison
अपमानयोः (apamaanayoH) = and dishonour
अपर (apara) = other
अपरं (aparaM) = junior
अपररात्र (apararaatra) = (m) dawn
अपरस्पर (aparaspara) = without cause
अपरा (aparaa) = lower
अपराजितः (aparaajitaH) = who had never been vanquished
अपराजीत (aparaajiita) = Unconquered
अपराणि (aparaaNi) = others
अपरान् (aparaan.h) = others
अपरिग्रह (aparigraha) = abstention from greed, non-possessiveness
अपरिग्रहः (aparigrahaH) = free from the feeling of possessiveness
अपरिमेयं (aparimeyaM) = immeasurable
अपरिहार्ये (aparihaarye) = of that which is unavoidable
अपरे (apare) = others
अपर्याप्तं (aparyaaptaM) = immeasurable
अपलायनं (apalaayanaM) = not fleeing
अपवर्ग (apavarga) = heaven, liberation
अपवहनं (apavahanaM) = seducetion
अपवाद (apavaada) = exceptional
अपविघ्नः (apavighnaH) = without obstacles
अपश्यत् (apashyat.h) = he could see
अपस्मार (apasmaara) = forgetful
अपस्मारः (apasmaaraH) = (m) epilepsy
अपहरण (apaharaNa) = stealing
अपहरणं (apaharaNaM) = abduction, kipnapping
अपहर्तारं (apahartaaraM) = the remover]destroyer
अपहृत (apahRita) = stolen
अपहृतचेतसां (apahRitachetasaaM) = bewildered in mind
अपात्रेभ्यः (apaatrebhyaH) = to unworthy persons
अपान (apaana) = one of the vital airs, controls the elimination of bodily wastes
अपानं (apaanaM) = the air going downward
अपाने (apaane) = in the air which acts downward
अपापो (apaapo) = without sins
अपायिनः (apaayinaH) = disappearing
अपारा (apaaraa) = one who has no limits
अपावृतं (apaavRitaM) = wide open


पाठ


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Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सहते विपत्सहस्रं मानी नैवापमानलेशमपि ।
  • सहसा विदधीत न क्रियाम् अविवेकः परमापदां पदम् ।
  • सिद्ध्यन्ति कुत्र सुकृतानि विना श्रमेण ?
  • सुतप्तमपि पानीयं शमत्येव पावकम्।
  • सुदुर्लभाः सर्वमनोरमा गिरः ।
  • सुलभा रम्यता लोके दुर्लभं हि गुणार्जनम् ।
  • सुलभो हि द्विषां भङ्गः दुर्लभा सत्स्ववाच्यता ।
  • सोत्साहानां नास्त्यसाध्यं नराणाम् ।
  • स्मृत्वा स्मृत्वा याति दुःखं नवत्वम् ।
  • स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।
  • स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
  • सङ्घे शक्तिः कलौ युगे ।

सुभाषित


तत्त्वं किमपि काव्यानां जानाति विरलो भुवि ।

मार्मिकः को मरन्दानामन्तरेण मधुव्रतम् ॥ ११७ ॥

अन्वयः : भुवि काव्यानां किम् अपि तत्त्वं विरलः जानाति । मधुव्रतम् अन्तरेण मरन्दानां मार्मिकः कः?

It is only a rare person who understands anything of the essence of a literary work. Who has a deep insight into the honey of flowers other than the honey-bee?


पठन


चित्र काव्य

Wiki: https://hi.wikipedia.org/wiki/चित्रकाव्य

 

चित्रकाव्य वह आलंकारिक काव्य है जिसके चरणों की रचना ऐसी युक्ति से की गई हो कि वे चरण किसी विशिष्ट क्रम से लिखे जाने पर कमल, खड़ग, घोड़े, रथ, हाथी आदि के चित्रों के समान बन जाते हों। इसकी गणना अधम प्रकार के काव्यों में होती है।

Why is it called अधम or lowly work?

काव्यस्यात्मा ध्वनि|

 

जिस प्रकार अतिशय अलंकृत नारी लावण्य के अभाव में हृदयावर्जक नहीं हो सकती, उसी प्रकार ध्वनि तत्व के अभाव में अलंकृत काव्य भी हृदयावर्जक नहीं हो सकता। इसलिए अपने काव्य के प्रारम्भ में ही उन्होंने ‘काव्यस्यात्मा ध्वनि’ कहा। ध्वनि ही उनके अनुसार काव्य का आत्मभूत तत्व है।

काव्यका आत्मा ध्वनि है| जब तक काव्य सुसंगत ध्वनि प्रदान नहीं कर पाता, वह अधम कहा जाता है|

चित्र शब्दका साधारण अर्थ प्राण-शून्य आकृति| चित्रकाव्यभी जब तक ध्वनि-शून्य है, तब तक वह शब्दार्थी सूप रचना मात्र है |

प्राणहीन = तत्वहीन

कविको काव्य प्राणवान बनानेका प्रयत्न करना चाहिए | चित्रकाव्य तक अटकना नहीं है|

This is one view.

Here is the another view from the book:

Read the चित्रकाव्य मीमांसा as a part of SAnskrit leanring and then go through the book for further knowledge.

Download book from: https://archive.org/details/PathakRamRupChritaKavyaKautukam

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Example

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संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४५ : कृष्ण जन्म विशेष : श्रीनन्दकुमाराष्टकम्

Gavya45

Resuming posts on Sanskrit learning. We have covered enough basic lessons. I wish, learners now carve their own path ahead.

I will share something unique that I encounter in Sanskrit everyday here. Some special chapters.

For example, for next few days, we will engross in Shri Krishna bhakti!

॥ श्रीनन्दकुमाराष्टकम् ॥

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम् ।
वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम् ॥

वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ।
भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम् ॥ १॥

सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम् ।
गुञ्जाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम् ॥

वल्लभपटपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं विबुधवरम् ॥ २॥

शोभितमुखधुलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदतरम् ।
मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरसुरम् ।
वल्लभमतिविमलं शुभपदकमलं नखरुचि अमलं तिमिरहरम् ॥ ३॥

शिरमुकुटसुदेशं कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम् ।
मायाकृतमनुजं हलधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ॥ ४॥

इन्दीवरभासं प्रकटसुरासं कुसुमविकासं वंशिधरम् ।
हृत्मन्मथमानं रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभमृदुहासं कुञ्जनिवासं विविधविलासं केलिकरम् ॥ ५॥

अतिपरमप्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्मकरम् ।
मोहनमतिधीरं फणिबलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ।
वल्लभव्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरम् ॥ ६॥

जलधरद्युतिअङ्गं ललितत्रिभङ्गं बहुकृतरङ्गं रसिकवरम् ।
गोकुलपरिवारं मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ।
वल्लभव्रजचन्द्रं सुभगसुछन्दं कृतआनन्दं भ्रान्तिहरम् ॥ ७॥

वन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् ।
कालियशिरगमनं कृतफणिनमनं घातितयमनं मृदुलतरम् ।
वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरम् ॥ ८॥

॥ इति श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यविरचितं
श्रीनन्दकुअमराष्टकं सम्पूर्णम्॥

श्रीनन्दकुमाराष्टकम् 
Nandakumarshtakam

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम् ।
वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम् ॥
वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् ।
भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम् ॥ १॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who is the pretty cowherd, who wears garland of forest flowers, Who has very broad eyes, who is killer of all sorrow, Who is the moon of Brindavana, who is essence of happiness, Who is the ultimate of happiness, who is the supporter of the world, Who is black, who is loved by all, who is the complete pleasure, Who is pretty every moment and who pleases every one.

सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम् ।
गुञ्जाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम् ॥
वल्लभपटपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं विबुधवरम् ॥ २॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who has pretty lotus like face, who defeats god of love in beauty, Who is store house of happiness, who wears the crown, Who wears garland made of gunja, who roams about in the garden, Who is greatly benevolent, who steals the dresses of gopis, Who likes the silk cloths, who wears the holy thread, Who has butter in his hand and the lord who gives boons.

शोभितमुखधुलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदतरम् ।
मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरसुरम् ।
वल्लभमतिविमलं शुभपदकमलं नखरुचि अमलं तिमिरहरम् ॥ ३॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who shines with dust of Yamuna on his face, whose voice is incomparable, Who blesses people with pleasure, whose face is coated with pollen grains,Who looks after cows, who plays flute with sweetest notes, who is very pure, Who has feet as pretty as a lotus, who has shining nail and who removes darkness.

शिरमुकुटसुदेशं कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम् ।
मायाकृतमनुजं हलधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम् ।
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरम् ॥ ४॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who has crown on his pretty head, who has curly hair, Who is dressed up like an actor, who is more pretty than god of love, Who by illusion looks human, who is the brother of Balarama, Who lightens earth by killing asuras, who takes care of the people of vruja, Who is a dear, who walks prettily, Who wants good always and who is good.

इन्दीवरभासं प्रकटसुरासं कुसुमविकासं वंशिधरम् ।
हृत्मन्मथमानं रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम् ।
वल्लभमृदुहासं कुञ्जनिवासं विविधविलासं केलिकरम् ॥ ५॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who has shine like blue lotus flower, who by nature is divine, Who looks like a opened lotus flower, who holds a flute, Who destroys the pride of god of love, who has a pleasant calm look, Who steals the mind by playing soulful music, Who is witty but soft and who lives on Kuncha vine and plays various roles.

अतिपरमप्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्मकरम् ।
मोहनमतिधीरं फणिबलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ।
वल्लभव्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरम् ॥ ६॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Who is a great expert who takes care of oppressed people, Who obeys his devotees, who is engaged in doing his duty, Who is pretty and very brave, who is very heroic Adisesha, Who kills all his enemies, who is extremely fickle,Who entertains the Vraja, Who has a face like a lotus flower, Who pacifies Bala Rama and who carried a mountain.

जलधरद्युतिअङ्गं ललितत्रिभङ्गं बहुकृतरङ्गं रसिकवरम् ।
गोकुलपरिवारं मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ।
वल्लभव्रजचन्द्रं सुभगसुछन्दं कृतआनन्दं भ्रान्तिहरम् ॥ ७॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Whose limbs shine like a rich cloud, Who can be easily defeated by love, Who lives in different places, who is a great connoisseur, Whose family is in Gokula, Who looks like the god of love, Who lives in kuncha, who is great in hiding himself, Who is the moon of the vruja, who is like the pretty verse, Who makes everyone happy and who drives away illusion.

वन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् ।
कालियशिरगमनं कृतफणिनमनं घातितयमनं मृदुलतरम् ।
वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरम् ॥ ८॥

Sing about that son of Nanda, who is essence of all pleasures, Who is the inner meaning of religion and bridge to Brahman, Whose feet are fit to be saluted, who makes everything holy, Who takes care of the world, who is carried in mind by pure people, Who climbed up on the head of Kaliya, who is saluted by Adhi Sesha, Who killed Kala yavana, who is extremely soft by nature, Who steals away our sorrow, who has a very pure feet, Who is the solace for the oppressed and who leads us to salvation.

॥ इति श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यविरचितं श्रीनन्दकुअमराष्टकं सम्पूर्णम्।

Thus ends the octet on the son of Nanda, Composed by Sri Vallabacharya.

–       Translation by P. R. Ramachander

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३१ (शंकराचार्य विशेष)

Gavuya31

What is Pranayam to Adi Shankaracharya?

चित्तादिसर्वभावेषु ब्रह्मत्वेनैव भावनात्
निरोधः सर्व वृत्तीनां प्राणायामः स उच्यते॥

The restraint of all modifications of the mind by regarding all mental states like memories as Reality alone, is called pranayama.

अपरोक्षानुभूति


शब्द सिन्धु


विजानतः (vijaanataH) = who is in complete knowledge
विजानीताः (vijaaniitaaH) = are in knowledge
विजानीयं (vijaaniiyaM) = shall I understand
विजितात्मा (vijitaatmaa) = self-controlled
विजितेन्द्रियः (vijitendriyaH) = sensually controlled
विततः (vitataH) = are spread
वितरति (vitarati) = to distribute
वितर्क (vitarka) = discernment
वितृ (vitRi) = to distribute
वितृष्णां (vitRishhNaaM) = desirelessness
वित्त (vitta) = money
वित्तं (vittaM) = wealth
वित्तकोषः (vittakoshhaH) = (m) bank
वित्ते (vitte) = wealth
वित्तेशः (vitteshaH) = the lord of the treasury of the demigods
विद् (vid.h) = to obtain
विदः (vidaH) = who understand
विदधामि (vidadhaami) = give
विदारयति (vidaarayati) = to split apart
विदाहिनः (vidaahinaH) = burning
विदितम् (viditam.h) = known
विदितात्मनां (viditaatmanaaM) = of those who are self-realised
विदित्वा (viditvaa) = having known/realised
विदिशां (vidishaaM) = non-direction
विदुः (viduH) = understood
विदूषकः (viduushhakaH) = (m) clown, joker
विदेश (videsha) = foreign land
विदेशी (videshii) = foreigner
विद्धि (viddhi) = know for sure
विद्मः (vidmaH) = do we know
विद्महे (vidmahe) = ?
विद्यते (vidyate) = there is
विद्यनिपुणै (vidyanipuNai) = by the ace scholar Shankara (Plural is used for reverance)
विद्यया (vidyayaa) = (fem.instr.sing.) by knowledge
विद्या (vidyaa) = knowledge


पाठ


1 2

लोकोक्ति

बहुत अधिक प्रचलित और लोगों के मुँहचढ़े वाक्य लोकोक्ति के तौर पर जाने जाते हैं। इन वाक्यों में जनता के अनुभव का निचोड़ या सार होता है। इनकी उत्पत्ति एवं रचनाकार ज्ञात नहीं होते।

न अस्ति अवमानभयम् अनार्यस्य

न अस्ति अवमानभयम् अनार्यस्य

न आक्रोशात्सारमेयाणां गजो मार्गान्निवर्तते।
न काकशापेन म्रियेत धेनु:।

न तेजसां हि वय: समीक्ष्यते।

न त्यजन्ति रुतं मञ्जु काकसम्पर्कत: पिका:।

न देवचरितं चरेत्

न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।


सुभाषित


अतो गरीय: किं नु स्याद् अशर्म नरकेष्वपि।
यत् प्रियस्य प्रियं कर्तुम् अधमेन न शक्यते॥

What greater misfortune can there be even in hell than to (have) a worthless person who is (willfully) unable to do a good deed for a friend?


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


॥ एकश्लोकी ॥

किं ज्योतिस्तवभानुमानहनि मे रात्रौ प्रदीपादिकं
स्यादेवं रविदीपदर्शनविधौ किं ज्योतिराख्याहि मे ।
चक्षुस्तस्य निमीलनादिसमये किं धीर्धियो दर्शने
किं तत्राहमतो भवान्परमकं ज्योतिस्तदस्मि प्रभो ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ एकश्लोकी सम्पूर्णा ॥

Is it your light that shines in the day as the sun and as the bright
lamp in the night? Let it be. Which light shines when i close my eyes?
(in mental vision) Which light illumines in my intellctual perception?
You are that supreme light that illumines the awareness of `aham’ and
I am that light. In short `that thou art’ or `ahambrahmasmi.’
I am that by the light of which the world is illumined in the day and
the night also by the lamp, beause the Brahman is the source of all
light, agni or surya. He is the light through which the indriyas
function . When the eyes are closed, there is no perception, the
eyes implying perception through all indriyas, then the mind
functions with the help of the intellect , which in its turn
functions by the light of the atman, which is beyond body, mind and
intellect and that am I, the supreme reality, Brahman.

संस्कृत गोवीथी : गव्य 2

Gavya_2


शब्द सिन्धु

Morning


  • गतप्रभाते – last morning
  • अद्य प्रभाते – this morning
  • उषसी – Sandhya Time
  • बालादित्य – Morning Sun

पाठ १.२


Morning Theme

  • अद्य प्रातः आगतवान् वा? – Did you come this morning?
  • त्वं प्रातः किं खादसि? – What do you eat in the morning?
  • अद्य प्रातः आरभ्य बहु कार्याणि – I have had a lot work since morning
  • प्रतिप्रभातं विद्यालयं न गच्छामि इति रोदिति – He cries every morning saying he would not go to school

पाठ

Word Word2 Sentence Pattern 1 Sentence Pattern 2
अहं (में) वदामि अहं वदामि| वदामि अहं|
त्वं (तू) वदसि त्वं  वदसि| वदसि त्वं |
स: (वह) वदति स: वदति| वदति स:|

 

वदामि – To say

Usages:

(Focus on वदामि)

  • यथार्थं वदामि – I am telling the truth.
  • अस्मिन् विषये अनन्तरं वदामि – I’ll tell you about it later.
  • अहं किमर्थं असत्यं वदामि? – Why should I tell a lie?
  • त्वां धन्यं वदामि – Thank you!
  • तत्र अहं किमपि न वदामि – I do not want to say anything in this regard
  • अहम् तां किमपि न वदामि । प्रयोजनम् किम् ? – I don’t say anything to her. What is the point?

(Focus on वदसि?)

  • किं भोः, एवं वदसि? – Hey, why do you say so?
  • त्वम् संस्कृतं वदसि ? – Do you speak Sanskrit?

(Focus on वदति)

  • तत्र गमनं मास्तु भोः, सः बहुमूल्यं वदति । He is very expensive, let us not go to him.
  • संस्कृतं जानामि इति वदति भवान् तदनन्तरं संस्कृतेन सम्भाषणं कर्तुं किमर्थं सङ्कोचः ? You say you know Sanskrit but why then this hesitation to talk in Sanskrit?

Patha

सुभाषित


 

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

एक एक क्षण गवाये बिना विद्या पानी चाहिए; और एक एक कण बचा करके धन ईकट्ठा करना चाहिए । क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समजनेवाले को धन कहाँ ?

 


स्वाध्याय – पठन, मनन


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संस्कृत गोवीथि : : गव्य २० (साहित्य विशेष)

Gavya0

स्थित्यतिक्रान्तिभीरूणि स्वच्छान्याकुलितान्यपि ।
तोयानि तोयराशीनां मनांसि च मनस्विनां ।।

Minds of great people are like water in the sea. Even under tumultuous conditions it does not breach its limits and does not get muddy when shaken.


शब्द सिन्धु


अपि (api) = also
अपीतेषु (apiiteshhu) = (Masc.Loc.Pl.) having not drunk(taken water)
अपुण्य (apuNya) = vice
अपुनरावृत्तिं (apunaraavRittiM) = to liberation
अपुष्प (apushhpa) = one without flowers
अपृथिव्योः (apRithivyoH) = to the earth
अपेक्ष् (apekSh.h) = to expect
अपेक्षा (apekShaa) = (f) expectation, hope
अपैशुनं (apaishunaM) = aversion to fault-finding
अपोहनं (apohanaM) = forgetfulness
अप्ययौ (apyayau) = disappearance
अप्रकाशः (aprakaashaH) = darkness
अप्रतिमप्रभाव (apratimaprabhaava) = O immeasurable power
अप्रतिष्ठं (apratishhThaM) = without foundation
अप्रतिष्ठः (apratishhThaH) = without any position
अप्रतीकारं (apratiikaaraM) = without being resistant
अप्रदाय (apradaaya) = without offering
अप्रमेय (aprameya) = the ununderstandable
अप्रमेयं (aprameyaM) = immeasurable
अप्रमेयस्य (aprameyasya) = immeasurable
अप्रवृत्तिः (apravRittiH) = inactivity
अप्राप्तत् (apraaptat.h) = uttained, obtained
अप्राप्य (apraapya) = failing to attain
अप्रामामाण्य (apraamaamaaNya) = Unjustified
अप्रियं (apriyaM) = the unpleasant
अप्रियः (apriyaH) = and the undesirable
अप्सु (apsu) = in water
अफल (aphala) = one without fruit
अफलप्रेप्सुना (aphalaprepsunaa) = by one without desire for fruitive result
अफलाकाङ्क्षिभिः (aphalaakaa.nkShibhiH) = by those devoid of desire for result
अबन्धु (abandhu) = one who does not have any brothers / kinmen
अबल (abala) = helpless (woman)
अबला (abalaa) = (helpless) Woman
अबुद्धयः (abuddhayaH) = less intelligent persons
अबोध (abodha) = Ignorance
अब्द (abda) = Season of plenty
अब्धि (abdhi) = sea
अब्धी (abdhii) = (m) ocean, sea
अब्रवीत् (abraviit.h) = spoke
अब्रह्मण्य (abrahmaNya) = Not kosher
अभक्ताय (abhaktaaya) = to one who is not a devotee
अभय (abhaya) = freedom from fear
अभयं (abhayaM) = fearlessness
अभये (abhaye) = and fearlessness
अभवत् (abhavat.h) = became
अभविष्यत् (abhavishhyat.h) = will become
अभावः (abhaavaH) = changing quality
अभावयतः (abhaavayataH) = of one who is not fixed
अभाषत (abhaashhata) = began to speak


पाठ


1 2 3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सन्तोषं जनयेत् प्राज्ञः तदेवेश्वरपूजनम् ।
  • सन्दीप्ते भवने न कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ?
  • सम्भावितस्य चाकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते ।
  • संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति ।
  • बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा।
  • बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।
  • बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्।
  • बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।
  • बृहत्सहायः कार्यान्तं क्षोदीयान् अपि गच्छति ।
  • ब्राह्मणस्य तु देहोयं नोपभोगाय विद्यते ।

सुभाषित


परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते |
स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम् ||

नितीशतक 32

In this ever-rotating wheel of birth and death, who that is dead, is not indeed born again? But he alone is (considered as) born by whose birth (his) family attains eminence.


पठन/स्मरण/मनन


बृहत्त्रयी के अंतर्गत तीन महाकाव्य आते हैं – “किरातार्जुनीय” “शिशुपालवध” और “नैषधीयचरित”।

Today, we will spend some time with महाकवि भारवि’s work.

किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य में महाकाव्यों की ‘वृहत्त्रयी’ में स्थान प्राप्त है। महाभारत में वर्णित किरातवेशी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघु कथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है। यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत है किन्तु यह मुख्यतः वीर रस प्रधान रचना है।

इतिहासकथुब्भूतं, सन्तसन्‍निस्सयम्पि वा।

काव्यादर्श अलंकारशास्त्राचार्य दंडी (६ठी – ७वीं शती ई.) द्वारा रचित संस्कृतकाव्यशास्त्र संबंधी प्रसिद्ध ग्रंथ है।

Not all Kavya(s) are called Mahakavya. It is not the length but many other criteria that decides the status of Kavya as Mahakavya. For example: It has to be इतिवृत. Story of Mahakavya should be based on Itihas or well-known popular benevolent person. It is story based on Mahabharata, referenced from Vana parva.

विभावभावानुभाव सञ्चार्यौचित्यचारूणः । विधिः कथाशरीरस्य वृर्त्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा।

ध्वन्यालोकः/उद्द्योतः ३ – १०

Not only that, कवि’s job is to instill and maintain रस in portion of इतिहास where it is missing as per Kavi.

 

Let us read this first Sarg. Tomorrow, we will explore notable quotes from this KAvya.

 

किरातार्जुनीयम्/प्रथमः सर्गः

श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् ।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ।। १.१ ।।

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ।। १.२ ।।

द्विषां विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः ।
स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं विनिश्चितार्थामिति वाचमाददे ।। १.३ ।।

क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।
अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।। १.४ ।।

स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपं हितान्न यः संशृणुते स किंप्रभुः ।
सदानुकूलेषु हि कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसम्पदः ।। १.५ ।।

निसर्गदुर्बोधमबोधविक्लवाः क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ।। १.६ ।।

विशङ्कमानो भवतः पराभवं नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः ।
दुरोदरच्छद्मजितां समीहते नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः ।। १.७ ।।

तथापि जिह्मः स भवज्जिगीषया तनोति शुभ्रं गुणसम्पदा यशः ।
समुन्नयन्भूतिमनार्यसंगमाद्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः ।। १.८ ।।

कृतारिषड्वर्गजयेन मानवीमगम्यरूपां पदवीं प्रपित्सुना ।
विभज्य नक्तंदिवमस्ततन्द्रिणा वितन्यते तेन नयेन पौरुषम् ।। १.९ ।।

सखीनिव प्रीतियुजोऽनुजीविनः समानमानान्सुहृदश्च बन्धुभिः ।
स सन्ततं दर्शयते गतस्मयः कृताधिपत्यामिव साधु बन्धुताम् ।। १.१० ।।

असक्तमाराधयतो यथायथं विभज्य भक्त्या समपक्षपातया ।
गुणानुरागादिव सख्यमीयिवान्न बाधतेऽस्य त्रिगणः परस्परम् ।। १.११ ।।

निरत्ययं साम न दानवर्जितं न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियां ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ।। १.१२ ।।

वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवं ।। १.१३ ।।

विधाय रक्षान्परितः परेतरानशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ।। १.१४ ।।

अनारतं तेन पदेषु लम्भिता विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायतीरुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ।। १.१५ ।।

अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलं तदीयमास्थाननिकेतनाजिरं ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ।। १.१६ ।।

सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलैरकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृकाश्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ।। १.१७ ।।

महौजसो मानधना धनार्चिता धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः ।
न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ।। १.१८ ।।

उदारकीर्तेरुदयं दयावतः प्रशान्तबाधं दिशतोऽभिरक्षया ।
स्वयं प्रदुग्धेऽस्य गुणैरुपस्नुता वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी ।। १.१९ ।।

महीभुजां सच्चरितैश्चरैः क्रियाः स वेद निःशेषमशेषितक्रियः ।
महोदयैस्तस्य हितानुबन्धिभिः प्रतीयते धातुरिवेहितं फलैः ।। १.२० ।।

न तेन सज्यं क्वचिदुद्यतं धनुर्न वा कृतं कोपविजिह्ममाननम् ।
गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम् ।। १.२१ ।।

स यौवराज्ये नवयौवनोद्धतं निधाय दुःशासनमिद्धशासनः ।
मखेष्वखिन्नोऽनुमतः पुरोधसा धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम् ।। १.२२ ।।

प्रलीनभूपालमपि स्थिरायति प्रशासदावारिधि मण्डलं भुवः ।
स चिन्तयत्येव भियस्त्वदेष्यतीरहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता ।। १.२३ ।।

कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः ।
तवाभिधानाद्व्यथते नताननः स दुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः ।। १.२४ ।।

तदाशु कर्तुं त्वयि जिह्ममुद्यते विधीयतां तत्र विधेयमुत्तरम् ।
परप्रणीतानि वचांसि चिन्वतां प्रवृत्तिसाराः खलु मादृशां धियः ।। १.२५ ।।

इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ।। १.२६ ।।

निशम्य सिद्धिं द्विषतामपाकृतीस्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनीरुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ।। १.२७ ।।

भवादृशेषु प्रमदाजनोदितं भवत्यधिक्षेप इवानुशासनम् ।
तथापि वक्तुं व्यवसाययन्ति मां निरस्तनारीसमया दुराधयः ।। १.२८ ।।

अखण्डमाखण्डलतुल्यधामभिश्चिरं धृता भूपतिभिः स्ववंशजैः ।
त्वया स्वहस्तेन मही मदच्युता मतङ्गजेन स्रगिवापवर्जिता ।। १.२९ ।।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिता इवेषवः ।। १.३० ।।

गुणानुरक्तां अनुरक्तसाधनः कुलाभिमानी कुलजां नराधिपः ।
परैस्त्वदन्यः क इवापहारयेन्मनोरमां आत्मवधूं इव श्रियं ।। १.३१ ।।

भवन्तं एतर्हि मनस्विगर्हिते विवर्तमानं नरदेव वर्त्मनि ।
कथं न मन्युर्ज्वलयत्युदीरितः शमीतरुं शुष्कं इवाग्निरुच्छिखः ।। १.३२ ।।

अवन्ध्यकोपस्य निहन्तुरापदां भवन्ति वश्याः स्वयं एव देहिनः ।
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः ।। १.३३ ।।

परिभ्रमंल्लोहितचन्दनोचितः पदातिरन्तर्गिरि रेणुरूषितः ।
महारथः सत्यधनस्य मानसं दुनोति ते कच्चिदयं वृकोदरः ।। १.३४ ।।

विजित्य यः प्राज्यं अयच्छदुत्तरान्कुरूनकुप्यं वसु वासवोपमः ।
स वल्कवासांसि तवाधुनाहरन्करोति मन्युं न कथं धनंजयः ।। १.३५ ।।

वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वं एतौ धृतिसंयमौ यमौ विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुं ।। १.३६ ।।

इमां अहं वेद न तावकीं धियं विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ।। १.३७ ।।

पुराधिरूढः शयनं महाधनं विबोध्यसे यः स्तुतिगीतिमङ्गलैः ।
अदभ्रदर्भां अधिशय्य स स्थलीं जहासि निद्रां अशिवैः शिवारुतैः ।। १.३८ ।।

पुरोपनीतं नृप रामणीयकं द्विजातिशेषेण यदेतदन्धसा ।
तदद्य ते वन्यफलाशिनः परं परैति कार्श्यं यशसा समं वपुः ।। १.३९ ।।

अनारतं यौ मणिपीठशायिनावरञ्जयद्राजशिरःस्रजां रजः ।
निषीदतस्तौ चरणौ वनेषु ते मृगद्विजालूनशिखेषु बर्हिषां ।। १.४० ।।

द्विषन्निमित्ता यदियं दशा ततः समूलं उन्मूलयतीव मे मनः ।
परैरपर्यासितवीर्यसम्पदां पराभवोऽप्युत्सव एव मानिनां ।। १.४१ ।।

विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषां ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ।। १.४२ ।।

पुरःसरा धामवतां यशोधनाः सुदुःसहं प्राप्य निकारं ईदृशं ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परान्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ।। १.४३ ।।

अथ क्षमां एव निरस्तसाधनश्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनं ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकं ।। १.४४ ।।

न समयपरिरक्षणं क्षमं ते निकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः ।
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा विदधति सोपधि संधिदूषणानि ।। १.४५ ।।

विधिसमयनियोगाद्दीप्तिसंहारजिह्मं शिथिलबलं अगाधे मग्नं आपत्पयोधौ ।
रिपुतिमिरं उदस्योदीयमानं दिनादौ दिनकृतं इव लक्ष्मीस्त्वां समभ्येतु भूयः ।। १.४६ ।।

इति भारविकृतौ महाकाव्ये किरातार्जुनीये प्रथमः सर्गः ।

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २१ (साहित्य विशेष)

 

Gavya21

सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्‌।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेवसम्पद:॥1:30॥

[बिना सोचे-विचारे सहसा किसी काम को अंजाम नहीं देना चाहिए. अविवेक बड़ी विपत्तियों का घर है. सम्पत्तियाँ (सफलताएँ) तो गुणों पर लुब्ध होती हैं और विचारशील व्यक्ति का स्वयं ही वरण करती हैं.]


शब्द सिन्धु


अभि (abhi) = preposition
अभि+तड् (abhi+taD.h) = to strike
अभिकथनं (abhikathanaM) = (n) allegation
अभिक्रम (abhikrama) = in endeavouring
अभिचार (abhichaara) = black magic
अभिजनवान् (abhijanavaan.h) = surrounded by aristocratic relatives
अभिजातः (abhijaataH) = born of
अभिजातस्य (abhijaatasya) = of one who is born of
अभिजानन्ति (abhijaananti) = they know
अभिजानाति (abhijaanaati) = does know
अभिजायते (abhijaayate) = becomes manifest
अभिजित (abhijita) = A nakshatra between uttaraashhDhaa and shravaNa mainly centred on the star Vega. For some reason it is not usually included in the 27 nakshatras although it would make 28 if it was. adhipatii – Lord
अभिजिन्मुहूर्त (abhijin.hmuhuurta) = the most auspicious moment
अभितः (abhitaH) = everywhere
अभिद्रोहः (abhidrohaH) = (m) insurgency
अभिधानं (abhidhaanaM) = (n) designation
अभिधास्यति (abhidhaasyati) = explains
अभिधीयते (abhidhiiyate) = is called
अभिनन्दती (abhinandatii) = praises
अभिनय (abhinaya) = acting
अभिनिवेश (abhinivesha) = possessiveness
अभिन्यासः (abhinyaasaH) = (m) layout
अभिपुष्टिः (abhipushhTiH) = (f) affirmation
अभिप्रवृत्तः (abhipravRittaH) = being fully engaged
अभिप्रायः (abhipraayaH) = (m) opinion
अभिभवति (abhibhavati) = transforms
अभिभवात् (abhibhavaat.h) = having become predominant
अभिभूय (abhibhuuya) = surpassing
अभिमनः (abhimanaH) = conceit
अभिमान (abhimaana) = self-importance
अभिमुखाः (abhimukhaaH) = towards


पाठ (सातवलेकर पाठमाला से)


1 2 3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • न कञ्च न वसतौ प्रत्याचक्षीत ।
  • न कालमतिवर्तन्ते महान्तः स्वेषु कर्मसु ।
  • न गृहं गृहमित्याहुः गृहिणी गृहमुच्यते।
  • न जातु कामः कामानामुपभोगे न शाम्यति।
  • न जातु कामः कामानाम् उपभोगे न शाम्यति।
  • न तद् दानं प्रशंसन्ति ये न वृत्तिर्विपद्यते ।
  • न नश्यति तमो नाम कृतया दीपवार्तया ।
  • न रत्नम् अन्विष्यति मृग्यते हि तत्।
  • न वक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ।
  • न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।
  • न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ।
  • न विश्वसेत् अविश्वस्ते विश्वस्ते नाति विश्वसेत्।
  • न शक्या हि स्त्रियो रोद्धुं प्रस्थिता दयितं प्रति ।
  • न हि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति ।
  • न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति ।
  • न हि दुष्करमस्तीह किञ्चदध्यवसायिनाम् ।
  • न हि निर्विण्णमागम्य कश्चित् प्राप्नोति शोभनम् ।
  • न हि सर्वः सर्वं जानाति ।
  • न ह्यमूला जनश्रुतिः।

सुभाषित


येषां बाहुबलं न अस्ति येषां न अस्ति मनोबलम् ।
तेषां चंद्रबलं देवः किं करोति अम्बरे स्थितम् ॥ ॥

Those who do not have armstrength (physical strength) and those who do not have mental strength, What good can moon’s strength do to them being resident in the sky ?


पठन/स्मरण


You will always notice two points about Sanskrit Mahakavya(s).

  1. Vivid detailed description of mother nature and her changing colors with season
  2. Dharma / Niti

Sharing some notable excerpts from किरातार्जुनीयम्

धर्म/व्यवहार/निति अंश

क्रियासु युक्तैर्नृपचारचक्षुषो न वञ्चनीया: प्रभवोsनुजीविभि:।
अतोsर्हसि क्षंतुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।।1:4।।
स किंसखा साधु न शास्ति योsधिपं हितान्न य: संश्रृणुते स किंप्रभु:।
सदाsनुकूलेषु हि कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसंपद: ॥1:5॥

व्रजंति ते मूढधिप:है पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिन:।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिता इवेषव:॥1:30॥

अवंध्यकोपस्य विहन्तुरापदां भवंति वश्या: स्वमेव देहिन:।
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातदार्हेन न विद्विषादर:॥1:33॥

सहसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्‌।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेवसम्पद:॥1:30॥

नैसर्गिक वर्णन

Read following one from Sarga 5

उत्फुल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मादुद्धूतः सरसिजसम्भवः परागः ।
वात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्तादाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीं ।। ५.३९ ।।

I must share translation for this.

स्थल-कमलिनी का वन. उसमें फूले हुए कमल. वायु-चक्र के कारण चारों ओर फूलों से उड़ते पराग-कण. ऊपर आकाश में पहुंचकर वे मंडलाकार फैल जाते हैं. लगता है जैसे सुवर्णमय छत्र तन गया हो.

In 4th Sarga, there is beautiful description of Sharad Ritu!

किरातार्जुनीयम्/चतुर्थः सर्गः

ततः स कूजत्कलहंसमेखलां सपाकसस्याहितपाण्डुतागुणां ।
उपाससादोपजनं जनप्रियः प्रियां इवासादितयौवनां भुवं ।। ४.१ ।।

विनम्रशालिप्रसवौघशालिनीरपेतपङ्काः ससरोरुहाम्भसः ।
ननन्द पश्यन्नुपसीम स स्थलीरुपायनीभूतशरद्गुणश्रियः ।। ४.२ ।।

निरीक्ष्यमाणा इव विस्मयाकुलैः पयोभिरुन्मीलितपद्मलोचनैः ।
हृतप्रियादृष्टिविलासविभ्रमा मनोऽस्य जह्रुः शफरीविवृत्तयः ।। ४.३ ।।

तुतोष पश्यन्कलमस्य स अधिकं सवारिजे वारिणि रामणीयकं ।
सुदुर्लभे नार्हति कोऽभिनन्दितुं प्रकर्षलक्ष्मीं अनुरूपसंगमे ।। ४.४ ।।

नुनोद तस्य स्थलपद्मिनीगतं वितर्कं आविष्कृतफेनसंतति ।
अवाप्तकिञ्जल्कविभेदं उच्चकैर्विवृत्तपाठीनपराहतं पयः ।। ४.५ ।।

कृतोर्मिरेखं शिथिलत्वं आयता शनैः शनैः शान्तरयेण वारिणा ।
निरीक्ष्य रेमे स समुद्रयोषितां तरङ्गितक्ष्ॐअविपाण्डु सैकतं ।। ४.६ ।।

मनोरमं प्रापितं अन्तरं भ्रुवोरलंकृतं केसररेणुणाणुना ।
अलक्तताम्राधरपल्लवश्रिया समानयन्तीं इव बन्धुजीवकं ।। ४.७ ।।

नवातपालोहितं आहितं मुहुर्महानिवेशौ परितः पयोधरौ ।
चकासयन्तीं अरविन्दजं रजः परिश्रमाम्भःपुलकेन सर्पता ।। ४.८ ।।

कपोलसंश्लेषि विलोचनत्विषा विभूषयन्तीं अवतंसकोत्पलं ।
सुतेन पाण्डोः कलमस्य गोपिकां निरीक्ष्य मेने शरदः कृतार्थता ।। ४.९ ।।

उपारताः पश्चिमरात्रिगोचरादपारयन्तः पतितुं जवेन गां ।
तं उत्सुकाश्चक्रुरवेक्षणोत्सुकं गवां गणाः प्रस्नुतपीवरौधरसः ।। ४.१० ।।

परीतं उक्षावजये जयश्रिया नदन्तं उच्चैः क्षतसिन्धुरोधसं ।
ददर्श पुष्टिं दधतं स शारदीं सविग्रहं दर्पं इवाधिपं गवां ।। ४.११ ।।

विमुच्यमानैरपि तस्य मन्थरं गवां हिमानीविशदैः कदम्बकैः ।
शरन्नदीनां पुलिनैः कुतूहलं गलद्दुकूलैर्जघनैरिवादधे ।। ४.१२ ।।

गतान्पशूनां सहजन्मबन्धुतां गृहाश्रयं प्रेम वनेषु बिभ्रतः ।
ददर्श गोपानुपधेनु पाण्डवः कृतानुकारानिव गोभिरार्जवे ।। ४.१३ ।।

परिभ्रमन्मूर्धजषट्पदाकुलैः स्मितोदयादर्शितदन्तकेसरैः ।
मुखैश्चलत्कुण्डलरश्मिरञ्जितैर्नवातपामृष्टसरोजचारुभिः ।। ४.१४ ।।

निबद्धनिःश्वासविकम्पिताधरा लता इव प्रस्फुरितैकपल्लवाः ।
व्यपोढपार्श्वैरपवर्तितत्रिका विकर्षणैः पाणिविहारहारिभिः ।। ४.१५ ।।

व्रजाजिरेष्वम्बुदनादशङ्किनीः शिखण्डिनां उन्मदयत्सु योषितः ।
मुहुः प्रणुन्नेषु मथां विवर्तनैर्नदत्सु कुम्भेषु मृदङ्गमन्थरं ।। ४.१६ ।।

स मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः ।
निरीक्षितुं नोपरराम बल्लवीरभिप्रनृत्ता इव वारयोषितः ।। ४.१७ ।।

पपात पूर्वां जहतो विजिह्मतां वृषोपभुक्तान्तिकसस्यसम्पदः ।
रथाङ्गसीमन्तितसान्द्रकर्दमान्प्रसक्तसम्पातपृथक्कृतान्पथः ।। ४.१८ ।।

जनैरुपग्रामं अनिन्द्यकर्मभिर्विविक्तभावेङ्गितभूषणैर्वृताः ।
भृशं ददर्शाश्रममण्डपोपमाः सपुष्पहासाः स निवेशवीरुधः ।। ४.१९ ।।

ततः स सम्प्रेक्ष्य शरद्गुणश्रियं शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषं ।
उवाच यक्षस्तं अचोदितोऽपि गां न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति ।। ४.२० ।।

इयं शिवाया नियतेरिवायतिः कृतार्थयन्ती जगतः फलैः क्रियाः ।
जयश्रियं पार्थ पृथूकरोतु ते शरत्प्रसन्नाम्बुरनम्बुवारिदा ।। ४.२१ ।।

उपैति सस्यं परिणामरम्यता नदीरनौद्धत्यं अपङ्कता महीं ।
नवैर्गुणैः सम्प्रति संस्तवस्थिरं तिरोहितं प्रेम घनागमश्रियः ।। ४.२२ ।।

पतन्ति नास्मिन्विशदाः पतत्त्रिणो धृतेन्द्रचापा न पयोदपङ्क्तयः ।
तथापि पुष्णाति नभः श्रियं परां न रम्यं आहार्यं अपेक्षते गुणं ।। ४.२३ ।।

विपाण्डुभिर्ग्लानतया पयोधरैश्च्युताचिराभागुणहेमदामभिः ।
इयं कदम्बानिलभर्तुरत्यये न दिग्वधूनां कृशता न राजते ।। ४.२४ ।।

विहाय वाञ्छां उदिते मदात्ययादरक्तकण्ठस्य रुते शिखण्डिनः ।
श्रुतिः श्रयत्युन्मदहंसनिःस्वनं गुणाः प्रियत्वेऽधिकृता न संस्तवः ।। ४.२५ ।।

अमी पृथुस्तम्बभृतः पिशङ्गतां गता विपाकेन फलस्य शालयः ।
विकासि वप्राम्भसि गन्धसूचितं नमन्ति निघ्रातुं इवासितोत्पलं ।। ४.२६ ।।

मृणालिनीनां अनुरञ्जितं त्विषा विभिन्नं अम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं द्रुतं धनुष्खण्डं इवाहिविद्विषः ।। ४.२७ ।।

विपाण्डु संव्यानं इवानिलोद्धतं निरुन्धतीः सप्तपलाशजं रजः ।
अनाविलोन्मीलितबाणचक्षुषः सपुष्पहासा वनराजियोषितः ।। ४.२८ ।।

अदीपितं वैद्युतजातवेदसा सिताम्बुदच्छेदतिरोहितातपं ।
ततान्तरं सान्तरवारिशीकरैः शिवं नभोवर्त्म सरोजवायुभिः ।। ४.२९ ।।

सितच्छदानां अपदिश्य धावतां रुतैरमीषां ग्रथिताः पतत्रिणां ।
प्रकुर्वते वारिदरोधनिर्गताः परस्परालापं इवामला दिशः ।। ४.३० ।।

विहारभूमेरभिघोषं उत्सुकाः शरीरजेभ्यश्च्युतयूथपङ्क्तयः ।
असक्तं ऊधांसि पयः क्षरन्त्यमूरुपायनानीव नयन्ति धेनवः ।। ४.३१ ।।

जगत्प्रसूतिर्जगदेकपावनी व्रजोपकण्ठं तनयैरुपेयुषी ।
द्युतिं समग्रां समितिर्गवां असावुपैति मन्त्रैरिव संहिताहुतिः ।। ४.३२ ।।

कृतावधानं जितबर्हिणध्वनौ सुरक्तगोपीजनगीतनिःस्वने ।
इदं जिघत्सां अपहाय भूयसीं न सस्यं अभ्येति मृगीकदम्बकं ।। ४.३३ ।।

असावनास्थापरयावधीरितः सरोरुहिण्या शिरसा नमन्नपि ।
उपैति शुष्यन्कलमः सहाम्भसा मनोभुवा तप्त इवाभिपाण्डुतां ।। ४.३४ ।।

अमी समुद्धूतसरोजरेणुना हृता हृतासारकणेन वायुना ।
उपागमे दुश्चरिता इवापदां गतिं न निश्चेतुं अलं शिलीमुखाः ।। ४.३५ ।।

मुखैरसौ विद्रुमभङ्गलोहितैः शिखाः पिशङ्गीः कलमस्य बिभ्रती ।
शुकावलिर्व्यक्तशिरीषक्ॐअला धनुःश्रियं गोत्रभिदोऽनुगच्छति ।। ४.३६ ।।

इति कथयति तत्र नातिदूरादथ ददृशे पिहितोष्णरश्मिबिम्बः ।
विगलितजलभारशुक्लभासां निचय इवाम्बुमुचां नगाधिराजः ।। ४.३७ ।।

तं अतनुवनराजिश्यामितोपत्यकान्तं नगं उपरि हिमानीगौरं आसद्य जिष्णुः ।
व्यपगतमदरागस्यानुसस्मार लक्ष्मीं असितं अधरवासो बिभ्रतः सीरपाणेः ।। ४.३८ ।।

इति भारविकृतौ महाकाव्ये किरातार्जुनीये चतुर्थः सर्गः ।

 

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