Sanskrit

Sanskrit

संस्कृत साधना : पाठ : ३ (कारक और सम्बन्ध)

Sanskrut_3

नमः संस्कृताय मित्राणि ! अद्यत्वे शैत्यं निरन्तरं वर्द्धते, न वा ?
तो कल के पाठ में आपने यह जाना कि किसी भी वाक्य में क्रिया का होना अनिवार्य है और उस क्रिया के सम्पादन में जितने भी कारण होते हैं वे “कारक” कहे जाते हैं। एक श्लोक के माध्यम से छहों कारकों का नाम भी बताया था। आपको वह श्लोक अवश्य याद हो गया होगा। चलिए एक बार फिर याद दिला देते हैं-
“कर्त्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट् ॥”

अब इन छह “कारकों” और “सम्बन्ध” के विषय में समझाते हैं। यह भी बताएँगे कि किस कारक के लिए किस विभक्ति का प्रयोग होता है। सम्बोधन को छोड़कर सात विभक्तियाँ होती हैं- यह तो आप जानते ही हैं।

1] कर्त्ता = जो क्रिया को करने में स्वतन्त्र होता है उसे कर्त्ता कहते हैं अर्थात् यह सीधा सीधा क्रिया को सम्पादित करता है। “जो करता है वही कर्त्ता।” जैसे- कृष्णः खेलति – इसमें “खेलना” क्रिया को कृष्ण कर रहा है, इसलिए “कृष्ण” “कर्त्ता कारक” हुआ। कल वाले उदाहरण में- “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ना” क्रिया कौन कर रहा है ? उत्तर है- डोनाल्ड ट्रम्प, यही इस वाक्य में कर्त्ता है।

2] कर्म = जिस पदार्थ के लिए कोई क्रिया की जाती है वह पदार्थ ही उस क्रिया का कर्म होता है। जैसे – “डोनाल्ड ट्रम्प फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “फल” के लिए की जा रही है इसलिए फल “तोड़ना” क्रिया का “कर्म” हुआ।

3] करण = क्रिया की सिद्धि में जो चीज कर्त्ता की सबसे अधिक सहायक होती है वही “करण” है। “डोनाल्ड ट्रम्प डण्डे से फल तोड़ता है।” डोनाल्ड ट्रम्प कर्त्ता है और उसकी सबसे सहायक चीज है डण्डा, इसलिए “डण्डा” करण हुआ।

4] सम्प्रदान = जिसके लिए क्रिया की जाती है तथा जिसको कोई वस्तु दी जाती है उसे “सम्प्रदान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया नरेन्द्र मोदी के लिए की जा रही है इसलिए नरेन्द्र मोदी “सम्प्रदान कारक” हुआ।

5] अपादान = किसी वस्तु के दूसरी वस्तु से अलग होने की क्रिया में जो वस्तु स्थिर रहती है उसे ही “अपादान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प पेड़ से फल तोड़ता है” – पेड़ से फल अलग हो रहा है किन्तु पेड़ स्थिर है, इसलिए स्थिर वस्तु “पेड़” “अपादान” हुआ।

6) *सम्बन्ध = इसे कारकों में नहीं गिना जाता क्योंकि क्रिया के सम्पादन में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। कल इसके विषय में बताया था, आपको याद होगा।

7] अधिकरण = क्रिया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है उस स्थान को “अधिकरण” कारक कहा जाता है। “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “बाग में” हो रही है इसलिए “बाग” “अधिकरण” कारक हआ।

सम्बन्ध को मिलाकर ये कुल सात चीजें हो गईं। विभक्तियाँ भी सात ही होती हैं। इन सातों के लिए अलग-अलग एक-एक विभक्ति निर्धारित कर दी गई है। देखिए-

1] कर्त्ता = प्रथमा विभक्ति
2] कर्म = द्वितीया ”
3] करण = तृतीया ”
4] सम्प्रदान = चतुर्थी ”
5] अपादान = पञ्चमी ”
6] सम्बन्ध = षष्ठी ”
7] अधिकरण = सप्तमी ”

*सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति ही होती है किन्तु शब्द के रूप में प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। जैसे – रामः = हे राम ! (विसर्ग लुप्त हो गये)।
_______________________________________

कल हमने आपको एक बहुत सुंदर श्लोक बताया था-

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय ॥

इसमें “राम” शब्द के एकवचन में सभी विभक्तियों का प्रयोग किया गया है । देखिए –

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
2] रामं रमेशं भजे।
3] रामेण अभिहता निशाचरचमू।
4] रामाय तस्मै नमः ।
5] रामात् नास्ति परायणं परतरम्।
6] रामस्य दासः अस्मि अहम्।
7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे ।
8] हे राम ! मां पालय ।

कल हम आपको वाक्य में कारक पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना बताएँगे। इससे आपको अभ्यास हो जाएगा। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ भी बताएँगे। आप लोगों को कहीं कोई समस्या हो तो टिप्पणी करके निःसंकोच पूछिएगा। तब तक के लिए नमो नमः !!

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २३ (साहित्य विशेष)

Gavya23

स्वर्गे सतां शर्म परं न धर्मा
भ्रवन्तिं भूमाविह तच्च ते च । नैषधीयचरितम् – ६ – ९८ |

स्वर्गमें रहनेवालों को केवल सुख होता है , धर्मं नहीं | भारत भूमि में सुख है और धर्मं भी|


शब्द सिन्धु


अमंद (ama.nda) = not slow or dull, active, intelligent; sharp, strong, violent, not little
अमन्यत (amanyata) = believed
अमर्ष (amarshha) = (m) anger
अमल (amala) = without rubbish
अमलं (amalaM) = clean
अमलान् (amalaan.h) = pure
अमानित्वं (amaanitvaM) = humility
अमितविक्रमः (amitavikramaH) = and unlimited force
अमी (amii) = all those
अमुत्र (amutra) = in the next life
अमूढाः (amuuDhaaH) = unbewildered
अमूल्य (amuulya) = priceless, excellent
अमृत (amRita) = of ambrosia, potion to cause immortality
अमृतं (amRitaM) = veritable nectar
अमृतत्त्वाय (amRitattvaaya) = for liberation
अमृतबिन्दू (amRitabinduu) = a drop of nectar
अमृतभुजः (amRitabhujaH) = those who have tasted such nectar
अमृतस्य (amRitasya) = of the immortal
अमृतोद्भवं (amRitodbhavaM) = produced from the churning of the ocean
अमृतोपमं (amRitopamaM) = just like nectar
अमेध्यं (amedhyaM) = untouchable
अम्बन्ध (ambandha) = relation / connection
अम्बर (ambara) = aakaasha
अम्बरं (ambaraM) = sky, garment
अम्बा (ambaa) = mother
अम्बु (ambu) = water
अम्बुधि (ambudhi) = sea
अम्बुवेगाः (ambuvegaaH) = waves of the waters
अम्भस् (ambhas.h) = (n) water
अम्भसा (ambhasaa) = by the water
अम्भसि (ambhasi) = on the water
अम्भुरुहं (ambhuruhaM) = lotus
अम्ल (amla) = (m) sour
अयं (ayaM) = him (from idaM.h)
अयजन्त (ayajanta) = third person plur. imperfect aatmanepada of yaj, to worship
अयतिः (ayatiH) = the unsuccessful transcendentalist


पाठ


1 2 3 4


सुभाषित


सुवर्णपुष्पां पॄथिवीं चिन्वन्ति पुरूषास्त्रय: |
शूरश्र्च कॄतविद्यश्र्च यश्र्च जानाति सेवितुम् ||

Three kinds of people get the golden earth; Chivalrous, learned, and the ones who do service. (The Earth gives all its wealth to the three kinds of people.)


पठन/स्मरण


नैषधीयचरित, श्रीहर्ष द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। यह वृहत्त्रयी नाम से प्रसिद्ध तीन महाकव्यों में से एक है। महाभारत का नलोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है।इस महाकाव्य का मूल आधार है “महाभारत” का “नलोपाख्यान”।

One fundamental that all Mahakavyas follow is : Their story base is from Itihas. They are dharma-centered.

Let us read first sarg’s 30 verses as a part of Sanskrit Learning.

प्रथमः सर्गः

निपीय यस्य क्षितिरक्षिणः कथाः
तथाद्रियन्ते न बुधाः सुधामपि ।
नला सितच्छत्रितकीर्तिमण्डलः
स राशिरासीन्महसां महोज्ज्वलः ॥1॥
रसैः कथा यस्य सुधावधीरणी
नलः स भूजानिरभूह्गुणाद्भुतः ।
सुवर्णदण्डैकसितातपत्रित
ज्वलत्प्रतापावलिकीर्तिमण्डलः ॥2॥
पवित्रमत्रातनुते जगद्युगे
स्मृता रसक्षालनयेव यत्कथा ।
कथं न सा मद्गिरमाविलामपि
स्वसेविनीमेव पवित्रयिष्यति ॥3॥
अधीतिबोधाचरणप्रचारणै
र्दशाश्चतस्रः प्रणयन्नुपाधिभिः ।
चतुर्दशत्वं कृतवान्कृतः स्वयं
न वेद्मि विद्यासु चतुर्दश स्वयम् ॥4॥
अमुष्य विद्या रसनाग्रनर्तकी
त्रयीव नीताङ्गगुणेन विस्तरम् ।
अगाहताष्टादशतां जिगीषया
नवद्वयद्वीपपृथग्जयश्रियाम् ॥5॥
दिगीशवृन्दांशविभूतिरीशिता
दिशां स कामप्रसरावरोधिनीम् ।
बभार शास्त्राणि दृशं द्वयाधिकां
निजत्रिनेत्रावतरत्वबोधिकाम् ॥6॥
पदैश्चतुर्भिः सुकृते स्थिरीकृते
कृतेऽमुना के न तपः प्रपेदिरे ।
भुवं यदेकाङ्घ्रिकनिष्ठया स्पृश
न्दधावधर्मोऽपि कृशस्तपस्विताम् ॥7॥
यदस्य यात्रासु बलोद्धतं रजः
स्फुरत्प्रतापानलघूममञ्जिम ।
तदेव गत्वा पतितं सुधाम्बुधौ
दधाति पङ्कीभवदङ्कतां विधौ ॥8॥
स्फुरद्धनर्निस्वनतद्धनाशुग
प्रगल्भवृष्टिव्ययितस्य संगरे ।
निजस्य तेजः शिखिनः परश्शता
वितेनुरिङ्गालमिवायशः परे ॥9॥
अनल्पदग्धारिपुरानलोज्ज्वलैः
निजप्रतापैर्वलयं ज्वलद्भुवः ।
प्रदक्षिणीकृत्य जयाय सृष्ट्या
रराज नीराजनया स राजघः ॥10॥
निवारितास्तेन महीतलेऽखिले
निरीतिभावं गमितेऽतिवृष्टयः ।
न तत्यजुर्नूनमनन्यविश्रमाः
प्रतीपभूपालमृगीदृशां दृशः ॥11॥
सितांशुवर्णैर्वयति स्म तह्गुणैः
महासिवेम्नः सहकृत्वरी बहुम् ।
दिगङ्गनाङ्गावरणं रणाङ्गणे
यशः पटं तद्भटचातुरीतुरी ॥12॥
प्रतिपभूपैरिव किं ततो भिया
विरुद्धधर्मैरपि मेत्तृतोज्झिता ।
अमित्रजिन्मित्रजिदोजसा स यद्
विचारदृक्चारदृगप्यवर्तत ॥13॥
तदोजसस्तद्यशसः स्थिताविमौ
वृथेति चित्ते कुरुते यदा यदा ।
तनो ति भानोः परिवेषकैतवात्
तदा विधिः कुण्डलनां विधोरपि ॥14॥
अयं दरिद्रो भवितेति वैधसीं
विपिं ललाटेऽर्थिजनस्य जाग्रतीम् ।
मृषां न चक्रेऽल्पितकल्पपादपः
प्रणीय दारिद्रदरिद्रतां नलः ॥15॥
विभज्य मेरुर्न यदर्थिसात्कृतो
न सिन्धुरुत्सर्गजलव्यययैर्मरुः ।
अमानि तत्तेन निजायशोयुगं
द्विफालबद्धाश्चिकुराः शिरः स्थितम् ॥16॥
अजस्रमभ्यासमुपेयुषा समं
मुदैव देवः कविना बुधेन च ।
दधौ पटीयान्समयं नयन्नयं
दिनेश्वरश्रीरुदयं दिने दिने ॥17॥
अधोविधानात्कमलप्रवालयोः
शिरः सु दानादखिलक्षमाभुजाम् ।
पुरेदमूर्ध्व भवतीति वेधसा
पदं किमस्याङ्कितमूर्ध्वरेखया ॥18॥
जगज्जयं तेन च कोशमक्षयं
प्रणीतवान् शैशवशेषवानयम् ।
सखा रतीशस्य ऋतुर्यथा वनं
वपुस्तथालिङ्गदथास्य यौवनम् ॥19॥
अधारि पद्मेषु तदङ्घ्रिणा घृणा
क्व तच्छयच्छायलवोऽपि पल्लवे ।
तदास्यदास्येऽपि गतोऽधिकारितां
न शारदः पार्धिकशर्वरीश्वरः ॥20॥
किमस्य लोम्नां कपटेन कोटिभिः
विधिर्न लेखाभिरजीगणह्गुणान् ।
न रोमकूपौघमिषाज्जगत्कृता
कृताश्च किं दूषणशून्यबिन्दवः ॥21॥
अमुष्य दोर्भ्यामरिदुर्गलुण्ठने
ध्रुवं गृहीतार्गलदीर्घपीनता ।
उरः श्रिया तत्र च गोपुरस्फुरत्
कपाटदुर्धर्षतिरः प्रसारिता ॥22॥
स्वकेलिलेशस्मितनिन्दितेन्दुनो
निजांशदृक्तर्जितपद्मसंपदः ।
अतद्द्वयीजित्वरसुन्दरान्तरे
न तन्मुखस्य प्रतिमा चराचरे ॥23॥
सरोरुहं तस्य दृशैव निर्जितं
जिताः स्मितेनैव विधोरपि श्रियः ।
कुतः परं भव्यमहो महीयसी
तदाननस्योपमितौ दरिद्रता ॥24॥
स्ववालभारस्य तदुत्तमाङ्गजैः
समं चमर्येव तुलाभिलाषिणः ।
अनागसे शंसति बालचापलं
पुनः पुनः पुच्छविलोलनच्छलात् ॥25॥
महीभृतस्तस्य च मन्मथश्रिया
निजस्य चित्तस्य च तं प्रतीच्छया ।
द्विधा नृपे तत्र जगत्त्रयीभुवां
नतभ्रुवां मन्मथविभ्रमोऽभवत् ॥26॥
निमीलनभ्रंशजुषा दृशा भृशं
निपीय तं यस्त्रिदशीर्बिरर्जितः ।
अमूस्तमभ्यासभरं विवृण्वते
निमेषनिः स्वैरधुनापि लोचनैः ॥27॥
अदस्तदाकर्णि फलाढ्यजीवितं
दृशोर्द्वयं नस्तदवीक्षि चाफलम् ।
ति स्म चक्षुः श्रवसां प्रिया नले
स्तुवन्ति निन्दन्ति हृदातदात्मनः ॥28॥
विलोकयन्तीभिरजस्रभावना-
बलादमुं नेत्रनिमीलनेष्वपि ।
अलम्भि मर्त्याभिरमुष्य दर्शने
न विघ्नलेशोऽपि निमेषनिर्मितिः ॥29॥
न का निशि स्वप्नगतं ददर्श
तं जगाद गोत्रस्खलिते च का न तम् ।
तदात्मताध्यातधवा रते च का
चकार वा न स्वमनोभवोद्भवम् ॥30॥

 

 

संस्कृत साधना : पाठ : १

Sanskrut_1

New series for Sanskrit Learning.

सदैव याद रखना है-
1) संस्कृत में तीन वचन होते हैं- एकवचन, द्विवचन, बहुवचन।
2) संस्कृत में तीन पुरुष होते हैं- प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुष, उत्तमपुरुष
3) संस्कृत में शब्दों के तीन लिंग होते हैं- पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुसंकलिंग।
4) संस्कृत में प्रत्येक शब्द के रूप चलते हैं जिन्हें “विभक्ति” कहा जाता है। जैसे-
रामः रामौ रामाः
रामम् रामौ रामान् इत्यादि
(1) (2) (3)
प्रथमपु. पठति पठतः पठन्ति
मध्यमपु. पठसि पठथः पठथ
उत्तमप. पठामि पठावः पठामः

5) पुरुष को पहचानने के लिए एक सूत्र बताता हूँ उसको समझ लीजिए –

“हम उत्तम, तुम मध्यम, बाकी सब प्रथम॥”

अर्थात् हम(वयम्), मैं(अहम्) आदि स्वयं बोलने वाले व्यक्ति के वाचक शब्द हैं उत्तम पुरुष।

तुम(त्वम्) अर्थात् श्रोता के वाचक शब्द मध्यमपुरुष।

और जितने व्यक्तिवाचक शब्द बचते हैं जैसे- वह, वे, राम, श्याम, सीता, गीता आदि, वे प्रथमपुरुष हैं। आप= भवान् शब्द भी सदैव प्रथमपुरुष ही होता है, ध्यान रखना है।

6) सबसे महत्त्वपूर्ण बात- जिस पुरुष और वचन का *कर्ता होगा उसी पुरुष और वचन की क्रिया होगी। यह बात गाँठ बाँध लेनी है।
*कर्ता= जो क्रिया को करता है वही ‘कर्ता’ है। जैसे “रामः पठति” वाक्य में ‘राम’ ‘पठन क्रिया’ को कर रहा है।

यदि ये छह बातें आप ध्यान में रखेंगे तो बहुत आसानी से वाक्य बना लेंगे।
_______________________________________

मुदित पढ़ता है।
= मुदितः पठति।

अभय और साकेत नहीं पढ़ते हैं।
= अभयः साकेतः च न पठतः।

अजय, बालकृष्ण, गोविंद और राधेश्याम थोड़ा* पढ़ते हैं।
= अजयः बालकृष्णः गोविन्दः राधेश्यामः च मनाक्* पठन्ति।

क्या तुम पढ़ते हो ?
= किं त्वं पठसि ?

तुम दोनों क्या पढ़ते हो ?
= युवां किं पठथः ?

तुम सब रामायण पढ़ते हो।
=यूयं रामायणं पठथ।

मैं कुछ भी नहीं पढ़ता।
= अहं किमपि न पठामि।

हम दोनों संस्कृत पढ़ते हैं।
= आवां संस्कृतं पठावः।

हम सब पढ़ते हैं।
= वयं पठामः।

*** खेलना ( क्रीड्)
बोलना ( वद् )
चलना ( चल् ) आदि धातुओं का प्रयोग करते हुए एक एक संस्कृतवाक्य बनाइये।

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३९ (पुराण विशेष) :: धारणा क्या है?

Gavya39

यस्मिन् यस्मिन् भवेदङ्गे योगिनां व्याधिसम्भवः ।
तत्तदङ्गं धिया व्याप्य दारयेत्तत्त्वधारणं ।।

When a particular part of the body is affected by illness, one should fix up the mind on that particular part as though pervaded by the mind.

धारणा is an ultimate cure.

अग्निपुराणम्/अध्यायः ३७५


शब्द सिन्धु


क्षन्तिः (kShantiH) = tolerance
क्षमता (kShamataa) = ability
क्षमा (kShamaa) = forgivance
क्षमी (kShamii) = forgiving
क्षय (kShaya) = loss, weakening, scaricity
क्षयं (kShayaM) = destruction
क्षयकृत् (kShayakRit.h) = the destroyer
क्षयति (kShayati) = (1 pp) to decay
क्षयात् (kShayaat.h) = (from) consunption/destruction
क्षयाय (kShayaaya) = for destruction
क्षर (kShara) = prone to end, destructible
क्षरं (kSharaM) = to the fallible
क्षरः (kSharaH) = constantly changing
क्षात्रं (kShaatraM) = of a ksatriya
क्षान्तिः (kShaantiH) = tolerance
क्षामये (kShaamaye) = ask forgiveness
क्षार (kShaara) = salty
क्षालयति (kShaalayati) = (10 pp) to wash
क्षितिपाल (kShitipaala) = (m) protector of the earth, king
क्षिप् (kShip) = (root) to throw
क्षिपति (kShipati) = (6 pp) to throw
क्षिपामि (kShipaami) = I put
क्षिप्त (kShipta) = neglected or distracted
क्षिप्रं (kShipraM) = soon
क्षी (kShii) = to dimnish
क्षीणकल्मषाः (kShiiNakalmashhaaH) = who are devoid of all sins
क्षीणे (kShiiNe) = spent-up/weakened state of
क्षीर (kShiira) = milk
क्षुद्र (kShudra) = insignificant, small
क्षुद्रं (kShudraM) = petty
क्षुध् (kShudh) = hunger
क्षुधा (kShudhaa) = hunger
क्षुधार्त (kShudhaarta) = hungry
क्षुध्यति (kShudhyati) = (4 pp) to be hungry
क्षुभ्यति (kShubhyati) = (4 pp) to tremble
क्षुर (kShura) = (masc) knife
क्षुरक्रिया (kShurakriyaa) = (fem) shaving, cutting with a knife
क्षुरपत्रम् (kShurapatram.h) = (n) blade
क्षूद्र (kShuudra) = weak (here)
क्षेत्र (kShetra) = field
क्षेत्रं (kShetraM) = the field
क्षेत्रज्ञ (kShetraGYa) = and the knower of the body
क्षेत्रज्ञं (kShetraGYaM) = the knower of the field
क्षेत्रज्ञः (kShetraGYaH) = the knower of the field
क्षेत्रज्ञयोः (kShetraGYayoH) = and the knower of the field
क्षेत्री (kShetrii) = the soul
क्षेत्रेषु (kShetreshhu) = in bodily fields
क्षेपणास्त्रः (kShepaNaastraH) = (m) missile
क्षेपणी (kShepaNii) = (f) rocket
क्षेमं (kShemaM) = protection
क्षेमतरं (kShemataraM) = better
क्षोउति (kShouti) = to sneeze
क्षोभं (kShobhaM) = disturbance
ज्ञ (GYa) = one who knows (suffix)
ज्ञनकारक (GYanakaaraka) = Significator of knowledge which is Jupiter
ज्ञा (GYaa) = to know
ज्ञातचर (GYaatachara) = (adj) known
ज्ञातव्यं (GYaatavyaM) = knowable
ज्ञाति (GYaati) = community (people of the same caste etc.)
ज्ञातुं (GYaatuM) = to know
ज्ञाते (GYaate) = in the realised state
ज्ञातेन (GYaatena) = by knowing
ज्ञात्वा (GYaatvaa) = knowing well
ज्ञान (GYaana) = knowledge
ज्ञानं (GYaanaM) = knowledge
ज्ञानः (GYaanaH) = whose knowledge


पाठ


1 2


सुभाषित


अपि स्वर्णमयी लंका न मे रोचति लक्ष्मण |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ||

Lakshman, This Golden Lanka does not allure me. Mother and Motherland is dearer to me even than heaven.


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


अग्निपुराणम्/अध्यायः ३७५

धारणा

अग्निरुवाच
वारणा मनसो ध्येये संस्थितिर्ध्यानवद् द्विधा ।
मूर्त्तामूर्तहरिध्यानमनोधारणतो हरिः ।। ३७५.१ ।।

यद्वाह्यावस्थितं लक्षअयं तस्मान्न चलते मनः ।
तावत् कालं प्रदेशेषु धारणा मनसि स्थितिः ।। ३७५.२ ।।

कालावधि परिच्छिन्नं देहे संस्थापितं मनः ।
न प्रच्यवति यल्लक्ष्याद्धारणा साऽभिधीयते ।। ३७५.३ ।।

धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादशधारणाः ।
ध्यानं द्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ।। ३७५.४ ।।

धारणाभ्यासयुक्तात्मा यदि प्राणैर्विमुच्यते ।
कुलैकविंशमुत्तार्य्य स्वर्य्याति परमं पदं ।। ३७५.५ ।।

यस्मिन् यस्मिन् भवेदङ्गे योगिनां व्याधिसम्भवः ।
तत्तदङ्गं धिया व्याप्य दारयेत्तत्त्वधारणं ।। ३७५.६ ।।

आग्नेयी वारुणी चैव ऐशानी चामृतात्मिका ।
साग्निः शिखा फडन्ता च विष्णोः कार्य्या द्विजोत्तम ।। ३७५.७ ।।

नाड़ीभिर्विकटं दिव्यं शूलाग्रं वेधयेच्छुभम् ।
पादाङ्गुष्ठात् कपालान्तं रश्मिमण्डलमावृतं ।। ३७५.८ ।।

तिर्य्यक्‌चाधोद्‌र्ध्वभागेभ्यः प्रयान्त्योऽतीव तेजसा ।
चिन्तयेत् साध्केन्द्रस्तं यावत्सर्वं महामुने ।। ३७५.९ ।।

भस्मीभूतं शरीरं स्वन्ततश्चैवोपसंहरेत् ।
शीतश्लेष्मादयः पापं विनश्यन्ति द्विजातयः ।। ३७५.१० ।।

शिरो धीरञ्च कारञ्च कण्ठं चाधोमुखे स्मरेत् ।
ध्यायेदच्छिन्नचित्तात्मा भूयो भूतेन चात्मना ।। ३७५.११ ।।

स्फुरच्छीकरसंस्पर्शप्रभूते हिमगामिभिः ।
धाराभिरखिलं विश्वमापूर्य्य भुवि चिन्तयेत् ।। ३७५.१२ ।।

ब्रह्मरन्ध्राच्च संक्षोभाद्यावदाधारमण्डलम् ।
सुषुम्नान्तर्गतो बूत्वा संपूर्णेन्दुकृतालयं ।। ३७५.१३ ।।

संप्लाव्य हिमसंस्पर्श तोयेनामृतमूर्त्तिना ।
क्षुत् पिपासाक्रमप्रायसन्तापपरिपीड़ितः ।। ३७५.१४ ।।

धारयेद्वारुणीं मन्त्री तुष्ट्यर्थं चाप्यतन्त्रितः ।
वारुणी धारणा प्रोक्ता ऐशानीधारणां श्रृषु ।। ३७५.१५ ।।

व्योग्नि ब्रह्ममये पद्मे प्राणापणे क्षयङ्गते ।
प्रसादं चिन्तयेद् विष्णोर्यावच्चिन्ता क्षयं गता ।। ३७५.१६ ।।

महाभावञ्चपेत् सर्व्वं ततो व्यापक ईश्वरः ।
अर्द्धेन्दुं परमं शान्तं निराभासन्निरञ्जनं ।। ३७५.१७ ।।

असत्यं सत्यमाभाति तावत्सर्वं चराचरं ।
यावत् स्वस्यन्दरूपन्तु न दृष्टं गुरुवक्त्रतः ।। ३७५.१८ ।।

दृष्टे तस्मिन् परे तत्त्वे आब्रह्म सचराचरं ।
प्रमातृमानमेयञ्च ध्यानहृत्पद्मकल्पनं ।। ३७५.१९ ।।

मातृमोदकवत्सर्वं जपहोमार्चनादिकं ।
विष्णुमन्त्रेण वा कुर्य्यादमृतां धारणां वदे ।। ३७५.२० ।।

संपूर्णेन्दुनिभं ध्यायेत् कमलं तन्त्रिमुष्टिगं ।
शिरःस्थं चिन्तयेत् यत्नाच्छशाङ्गायुतवर्चसं ।। ३७५.२१ ।।

सम्पूर्णमण्डलं व्योम्नि शिवकल्लोलपूर्णितं ।
तथा हृत्‌कमले ध्यायेत्तन्मध्ये स्वतनुं स्मरेत् ।।

साधको विगतक्लेशो जायते दारणादिभिः ।। ३७५.२२ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये धारणा नाम पञ्चसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥

संस्कृत साधना : पाठ ६ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक-२)

Sanskrut_6

नमः संस्कृताय !!
सुधी मित्रों ! पिछले पाठ में मैंने क्रियाओं के विषय में थोड़ी चर्चा की थी। मैंने बताया था कि “कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व को ‘क्रिया’ कहते हैं।” यह भी बताया था कि ‘अकर्मक’ और ‘सकर्मक’ भेद से क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं। अब बताएँगे कि कौन सी क्रियाएँ ‘अकर्मक’ होती हैं और कौन सी ‘सकर्मक’।

१) पहले तो यह जान लीजिए कि इन दोनों प्रकार की क्रियाओं को बताने के लिए या इनका वर्णन करने के लिए जिन ( पठति, खादति, हसति, खेलति आदि ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उनके मूल अंश को ‘धातु’ कहते हैं।

२) ये धातुएँ लगभग द्विसहस्र हैं। बहुत से आचार्यों ने इनका अर्थसहित संग्रह किया था। किन्तु सबसे प्रसिद्ध संग्रह महर्षि पाणिनि का ‘धातुपाठ’ है। यह ‘धातुपाठ’ उन्हीं के महान् ग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ का परिशिष्ट है। यह ग्रंथ आपको अपने पास अवश्य रखना चाहिए।

३) जब क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं तो उनका वर्णन करने वाली धातुएँ भी दो प्रकार की हुईं- अकर्मक और सकर्मक। अकर्मक क्रियाएँ बहुत थोड़ी ही हैं, जबकि सकर्मक बहुत सी हैं। इसलिए अकर्मक धातुओं को स्मरण रखने के लिए एक श्लोक में इकट्ठा कर दिया गया है-

लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं
वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं
धातुगणं तेऽकर्मकम् आहुः ॥

४) उपर्युक्त श्लोक में जितने अर्थ गिनाए गये हैं, उन अर्थों वाली धातुएँ ‘अकर्मक’ होती हैं। देखिए-
लज्जा अर्थ वाली—- लज्ज् , ह्री
सत्ता अर्थ वाली—– भू , अस् , विद् , वृतु
स्थिति अर्थ वाली—- स्था
जागरण अर्थ वाली— जागृ
वृद्धि अर्थ वाली—— वृध् , एध् , प्याय्
क्षय अर्थ वाली—— क्षि
भय अर्थ वाली——- भी
जीवन अर्थ वाली—– जीव् , अन्
मरण अर्थ वाली—— मृङ्
शयन अर्थ वाली—— शीङ् , स्वप् , सस्
क्रीडा अर्थ वाली—— क्रीड् , खेल् , रम्
रुचि अर्थ वाली——- रुच्
दीप्ति अर्थ वाली——- दीप् , ज्वल्

आगामी पाठों में इनका प्रयोग भी आपको करवायेंगे । केवल इस श्लोक में गिनाए गये अर्थों वाली धातुएँ ही अकर्मक नहीं हैं अपितु कुछ अन्य अकर्मक धातुएँ भी हैं, जिनका ज्ञान आपको यथास्थान होता रहेगा।

५) ध्यातव्य : यदि आपसे कहा जाए कि “महेन्द्र फुटबॉल खेलता है” इस वाक्य में खेलता है क्रिया सकर्मक है अथवा अकर्मक ? तो आप यह सोचकर भ्रमित न होइयेगा कि ‘फुटबॉल को खेलता है’ इसलिए यह सकर्मक क्रिया है। वास्तव में वह फुटबॉल “से” खेलता है। फुटबॉल “खेलना” क्रिया का करण (साधन) है।

६) उपर्युक्त धातुओं के अतिरिक्त धातुओं को सकर्मक समझना चाहिए।

_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

“तुम गड्डमड्ड वाक्यों से मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हो।”
‘तुम’ कर्त्ता, ‘गड्डमड्ड वाक्य’ करण, ‘मेरी’ सम्बन्ध, ‘बुद्धि’ कर्म, ‘मोहित कर रहे हो’ सकर्मक क्रिया।
= त्वं व्यामिश्रैः वाक्यैः मम बुद्धिं मोहयसि।

“हे केशव ! तुम मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हो ?”
‘हे केशव’ सम्बोधन, ‘तुम’ कर्त्ता, ‘मुझे’ कर्म, ‘घोर कर्म’ अधिकरण, ‘क्यों’ अव्यय, ‘लगाते हो’ सकर्मक क्रिया।
हे केशव ! त्वं माम् घोरे कर्मणि कथं नियोजयसि ?

“बन्दर पैरों से चलता है और दो हाथों से फल खाता है।”
‘बन्दर’ कर्त्ता, ‘पैर’ करण, ‘चलता है’ अकर्मक क्रिया, ‘और’ अव्यय, ‘दो हाथ’ करण, ‘फल’ कर्म, ‘खाता है’ सकर्मक क्रिया।
वानरः पादाभ्यां चलति हस्ताभ्यां च फलानि खादति।

“धूर्तों के हृदय में दया नहीं होती है।”
‘धूर्त’ सम्बन्ध, ‘हृदय’ अधिकरण, ‘दया’ कर्त्ता, ‘होती है’ अकर्मक क्रिया।
धूर्तानां हृदये दया न भवति।

विद्यालय के अध्यापकों को मैं जानता हूँ ।
‘विद्यालय’ सम्बन्ध, ‘अध्यापकों को’ कर्म, ‘मैं’ कर्त्ता, ‘जानता हूँ’ सकर्मक क्रिया।
विद्यालयस्य अध्यापकान् अहं जानामि।

________________________________________

श्लोक :

यत् करोषि* यत् अश्नासि*
यत् जुहोषि* ददासि* यत्।
यत् तपस्यसि* कौन्तेय
तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ९।२७॥)

इस श्लोक में * चिह्न वाली क्रियाएँ लट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन की हैं। अर्थ पुस्तक में ढूँढकर देखें।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ २१ (तिङन्त-प्रकरण ६ :: लिट् लकार अभ्यास)

Sanskrut_21

॥ लिट् लकार अभ्यास ॥

कुछ स्मरणीय बातें –

१) संस्कृत लिखते समय स्वरों, ह्रस्व दीर्घ मात्राओं , अनुस्वार, विसर्ग और हलन्त पर विशेष ध्यान दें। इनका उचित प्रयोग करें। कुछ लोग ‘मम’ के स्थान पर ‘मम्’ लिख देते हैं और ‘प्रणाम’ के स्थान पर ‘प्रणाम्’ – यहाँ अनावश्यक हलन्त लगा दिया गया। उसी प्रकार कुछ लोग ‘आम्’ (हाँ) के स्थान पर ‘आम’ और ‘किम्’ के स्थान पर ‘किम’ लिख देते हैं- यहाँ हलन्त लगाना भूल जाते हैं। इसी प्रकार विसर्ग और मात्रा आदि के विषय में जानना चाहिए।

२) संस्कृत में ‘ ड़ ‘ और ‘ ढ़ ‘ अक्षर नहीं होते अतः इनका प्रयोग न करें। ‘ ड़ ‘ और ‘ ङ ‘ तथा ‘ ढ़ ‘ और ‘ ढ ‘ के अन्तर को तो आप जानते ही होंगे।
‘पीड़ा’ को संस्कृत में ‘पीडा’ लिखा जाता है।
‘गूढ़’ को संस्कृत में ‘गूढ’ लिखा जाता है। इसी प्रकार ‘ड’ और ‘ङ’ , ‘व’ और ‘ब’ तथा श ष स का भी ध्यान रखें।

३) संस्कृत लिखने के लिए आपको पुरुष, वचन, लिंग, विशेष्य, विशेषण, सर्वनाम, कर्त्ता, कर्म, क्रिया, कारक-विभक्ति, धातुरूप (लकार) और शब्दरूप – इतनी बातें जानना अति आवश्यक है। इनमें से अधिकांश बातें मैं समझा चुका हूँ। अब केवल धातुरूप, शब्दरूप और कारकविभक्ति विस्तार से समझाना रह गया है। इसके बाद की बातें सन्धि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग, वाच्यपरिवर्तन आदि प्रौढ संस्कृत लिखने के लिए हैं, इन्हें सीख लेने पर भाषा में प्रौढता आ जाती है।

४) संस्कृत में किस क्रिया के लिए कौन सी धातु है- यह स्मरण रखेंगे तो अनुवाद करना बहुत सहज हो जाएगा। आगामी पाठों में यह बताते चलेंगे।

भू धातु-
बभूव (वह हुआ)/ बभूवतुः (वे दो हुए)/बभूवुः (वे सब हुए)

शब्दकोश :
~~~~~~~

‘विद्वान्’ के पर्यायवाची शब्द –

१] विद्वान्
२] विपश्चित्
३] दोषज्ञः
४] सत्
५] सुधीः
६] कोविदः
७] बुधः
८] धीरः
९] मनीषी
१०] ज्ञः
१२] प्राज्ञः
१३] सङ्ख्यावान्
१४] पण्डितः
१५] कविः
१६] धीमान्
१७] सूरिः
१८] कृती
१८] कृष्टिः
१९] लब्धवर्णः
२०] विचक्षणः
२१] दूरदर्शी
२२] दीर्घदर्शी

ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
_________________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

भारत में अनेक विद्वान् हुए।
= भारते अनेके कोविदाः बभूवुः।

उन विद्वानों में कुछ वैयाकरण हुए।
= तेषु बुधेषु केचित् वैयाकरणाः बभूवुः।

कुछ न्यायदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् न्यायदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

कुछ साङ्ख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= केचित् साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डिताः बभूवुः।

आचार्य व्याघ्रभूति वैयाकरण हुए।
आचार्यः व्याघ्रभूतिः वैयाकरणः बभूव।

आचार्य अक्षपाद नैयायिक हुए।
= आचार्यः अक्षपादः नैयायिकः बभूव।

आचार्य पञ्चशिख सांख्यदर्शन के विद्वान् हुए।
= आचार्यः पञ्चशिखः साङ्ख्यदर्शनस्य पण्डितः बभूव।

वाचक्नवी गार्गी मन्त्रों की विदुषी हुई थी।
= वाचक्नवी गार्गी मन्त्राणां विचक्षणा बभूव।

पाण्डु के पाँच पुत्र हुए।
= पाण्डोः पञ्च सुताः बभूवुः।

वे सभी विद्वान् हुए।
= ते सर्वे प्राज्ञाः बभूवुः।

युधिष्ठिर धर्मशास्त्र और द्यूतविद्या के जानकार हुए।
= युधिष्ठिरः धर्मशास्त्रस्य द्यूतविद्यायाः च कोविदः बभूव।

भीम मल्लविद्या और पाकशास्त्र के वेत्ता हुए।
= भीमसेनः मल्लविद्यायाः पाकशास्त्रस्य च सूरिः बभूव।

सुकेशा ऋषि पाकशास्त्र के उपदेशक हुए थे।
= सुकेशा ऋषिः पाकशास्त्रस्य उपदेशकः बभूव।

श्रीकृष्ण भीमसेन का रसाला खाकर बहुत प्रसन्न हुए थे।
= श्रीकृष्णः भीमसेनस्य रसालं भुक्त्वा भूरि प्रसन्नः बभूव।

अर्जुन धनुर्वेद और गन्धर्ववेद के जानकार हुए।
= फाल्गुनः धनुर्वेदस्य गन्धर्ववेदस्य च विपश्चित् बभूव।

नकुल अश्वविद्या के ज्ञानी हुए।
= नकुलः अश्वविद्यायाः कोविदः बभूव।

आचार्य शालिहोत्र अश्वविद्या के प्रसिद्ध जानकार थे।
= आचार्यः शालिहोत्रः अश्वविद्यायाः प्रथितः पण्डितः बभूव।

सहदेव पशुचिकित्सा और शकुनशास्त्र के विद्वान् थे।
= सहदेवः पशुचिकित्सायाः शकुनशास्त्रस्य च ज्ञः बभूव।

कुन्ती अथर्ववेदीय मन्त्रों की विदुषी हुई।
= पृथा अथर्ववेदीयानां मन्त्राणां पण्डिता बभूव।

लल्लाचार्य और उत्पलाचार्य प्रसिद्ध गणितज्ञ हुए।
= लल्लाचार्यः उत्पलाचार्यः च प्रसिद्धौ गणितज्ञौ बभूवतुः।

मण्डनमिश्र की पत्नी भारती बड़ी विदुषी हुई।
= मण्डनमिश्रस्य पत्नी भारती महती पण्डिता बभूव।

भरद्वाज और शाकटायन वैमानिकरहस्य के ज्ञाता हुए।
= भरद्वाजः शाकटायनः च वैमानिकरहस्यस्य विचक्षणौ बभूवतुः।

शाकपूणि निरुक्त के प्रसिद्ध जानकार हुए थे।
= शाकपूणिः निरुक्तस्य प्रथितः कृष्टिः बभूव।

ऋतुध्वज की महारानी मदालसा तत्त्वज्ञ थी।
= ऋतुध्वजस्य पट्टराज्ञी मदालसा तत्त्वज्ञा बभूव।

भारत में एक नहीं, दो नहीं वरन् सहस्रों विद्वान् हुए हैं।
= भारते एकः न, द्वौ न अपितु सहस्रशाः कोविदाः बभूवुः।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ५५ (गणेश साधना विशेष) :: ऋणहरगणेशस्तोत्रम्

Gavya51

॥ ऋणहरगणेशस्तोत्रम् ॥

सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं
लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम् ।
ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं
सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम् ॥ १॥

सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजितः फलसिद्धये ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ २॥

त्रिपुरस्यवधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ३॥

हिरण्यकशिप्वादीनां वधार्ते विष्णुनार्चितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ४॥

महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ५॥

तारकस्य वधात् पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ६॥

भास्करेण गणेशो हि पूजितश्च स्वसिद्धये।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ७॥

शशिना कान्तिवृद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ८॥

पालनाय च तपसां विश्वामित्रेण पूजितः ।
सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ९॥

इदं त्वृणहरं स्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनम् ।
एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः ।
दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेरसमतां व्रजेत् ॥ १०॥

॥ इति ऋणहर गणेश स्तोत्रम् ॥

(Dhyanam)

Sindhoora varnam , dwibhujam Ganesam,
Lambodharam Padma dale nivishtam,
Brahamadhi devai pari sevyamanam,
Sidhairaryutham tham Pranamami devam

I salute that God Ganesa, who is of red colour ,
Who has two hands , who has a big paunch,
Who sits on a petal of lotus flower.
Who is served by Lord Brahma and other devas,
And who is saluted by the most eminent sages.

Stotram

1.Srushtyadhou brahmana samyak poojitha phala sidhaye ,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , by worshipping whom,
Lord Brahma got the power of creation, destroy all my debts.

2.Tripurasya vadhaath poorvam Shambunaa samyak architha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Lord Shiva,
Before destruction of Tripuras, destroy all my debts.

3.Hiranya kasypaadheenaam vadharthe Vishunaarchitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Lord Vishnu,
For the sake of killing Hiranya Kasipu , destroy all my debts.

4.Mahishasya vadhe devyaa Gana Nadha Prapoojitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , who was worshipped as Lord of Ganas,
By the goddess for killing Mahishasura , destroy all my debts.

5.Tharakasya vadhaath poorvam , kumarena prapoojitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Lord Subramanya,
Before killing of Tharakasura, destroy all my debts.

6.Bhaskarena Ganeso hi poojitha schavi sidhaye,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi worshipped as Ganesa,
By sun god to get his luster, destroy all my debts.

7.Sasinaa kanthi vrudhyartham poojitho Gana Nayaka,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi, worshipped as Lord of Ganas,
By the moon god for increasing his light , destroy all my debts.

8.Palanaya cha thapasaam Viswamithra poojitha,
Sadaiva Parvathi puthra runa nasam karothu may.

Let the son of Goddess Parvathi , worshipped by Viswamithra,
For protecting his penance , destroy all my debts.

9.Idham thw runa haram stotram , theevra daridrya nasanam,
Yeka varam paden nithyam varshamekam samahitha,
Daridryam darunam thyakthwa, Kubhera samatham vrajeth.

If this prayer for destruction of debts ,
Which destroys extreme poverty,
Is daily read for one week,
Before the completion of one year,
He would get out of the pitiable poverty and become like Khubera.

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २० (साहित्य विशेष)

Gavya0

स्थित्यतिक्रान्तिभीरूणि स्वच्छान्याकुलितान्यपि ।
तोयानि तोयराशीनां मनांसि च मनस्विनां ।।

Minds of great people are like water in the sea. Even under tumultuous conditions it does not breach its limits and does not get muddy when shaken.


शब्द सिन्धु


अपि (api) = also
अपीतेषु (apiiteshhu) = (Masc.Loc.Pl.) having not drunk(taken water)
अपुण्य (apuNya) = vice
अपुनरावृत्तिं (apunaraavRittiM) = to liberation
अपुष्प (apushhpa) = one without flowers
अपृथिव्योः (apRithivyoH) = to the earth
अपेक्ष् (apekSh.h) = to expect
अपेक्षा (apekShaa) = (f) expectation, hope
अपैशुनं (apaishunaM) = aversion to fault-finding
अपोहनं (apohanaM) = forgetfulness
अप्ययौ (apyayau) = disappearance
अप्रकाशः (aprakaashaH) = darkness
अप्रतिमप्रभाव (apratimaprabhaava) = O immeasurable power
अप्रतिष्ठं (apratishhThaM) = without foundation
अप्रतिष्ठः (apratishhThaH) = without any position
अप्रतीकारं (apratiikaaraM) = without being resistant
अप्रदाय (apradaaya) = without offering
अप्रमेय (aprameya) = the ununderstandable
अप्रमेयं (aprameyaM) = immeasurable
अप्रमेयस्य (aprameyasya) = immeasurable
अप्रवृत्तिः (apravRittiH) = inactivity
अप्राप्तत् (apraaptat.h) = uttained, obtained
अप्राप्य (apraapya) = failing to attain
अप्रामामाण्य (apraamaamaaNya) = Unjustified
अप्रियं (apriyaM) = the unpleasant
अप्रियः (apriyaH) = and the undesirable
अप्सु (apsu) = in water
अफल (aphala) = one without fruit
अफलप्रेप्सुना (aphalaprepsunaa) = by one without desire for fruitive result
अफलाकाङ्क्षिभिः (aphalaakaa.nkShibhiH) = by those devoid of desire for result
अबन्धु (abandhu) = one who does not have any brothers / kinmen
अबल (abala) = helpless (woman)
अबला (abalaa) = (helpless) Woman
अबुद्धयः (abuddhayaH) = less intelligent persons
अबोध (abodha) = Ignorance
अब्द (abda) = Season of plenty
अब्धि (abdhi) = sea
अब्धी (abdhii) = (m) ocean, sea
अब्रवीत् (abraviit.h) = spoke
अब्रह्मण्य (abrahmaNya) = Not kosher
अभक्ताय (abhaktaaya) = to one who is not a devotee
अभय (abhaya) = freedom from fear
अभयं (abhayaM) = fearlessness
अभये (abhaye) = and fearlessness
अभवत् (abhavat.h) = became
अभविष्यत् (abhavishhyat.h) = will become
अभावः (abhaavaH) = changing quality
अभावयतः (abhaavayataH) = of one who is not fixed
अभाषत (abhaashhata) = began to speak


पाठ


1 2 3

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सन्तोषं जनयेत् प्राज्ञः तदेवेश्वरपूजनम् ।
  • सन्दीप्ते भवने न कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ?
  • सम्भावितस्य चाकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते ।
  • संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति ।
  • बलीयसी केवलमीश्वरेच्छा।
  • बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।
  • बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्।
  • बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।
  • बृहत्सहायः कार्यान्तं क्षोदीयान् अपि गच्छति ।
  • ब्राह्मणस्य तु देहोयं नोपभोगाय विद्यते ।

सुभाषित


परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते |
स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम् ||

नितीशतक 32

In this ever-rotating wheel of birth and death, who that is dead, is not indeed born again? But he alone is (considered as) born by whose birth (his) family attains eminence.


पठन/स्मरण/मनन


बृहत्त्रयी के अंतर्गत तीन महाकाव्य आते हैं – “किरातार्जुनीय” “शिशुपालवध” और “नैषधीयचरित”।

Today, we will spend some time with महाकवि भारवि’s work.

किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य में महाकाव्यों की ‘वृहत्त्रयी’ में स्थान प्राप्त है। महाभारत में वर्णित किरातवेशी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघु कथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है। यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत है किन्तु यह मुख्यतः वीर रस प्रधान रचना है।

इतिहासकथुब्भूतं, सन्तसन्‍निस्सयम्पि वा।

काव्यादर्श अलंकारशास्त्राचार्य दंडी (६ठी – ७वीं शती ई.) द्वारा रचित संस्कृतकाव्यशास्त्र संबंधी प्रसिद्ध ग्रंथ है।

Not all Kavya(s) are called Mahakavya. It is not the length but many other criteria that decides the status of Kavya as Mahakavya. For example: It has to be इतिवृत. Story of Mahakavya should be based on Itihas or well-known popular benevolent person. It is story based on Mahabharata, referenced from Vana parva.

विभावभावानुभाव सञ्चार्यौचित्यचारूणः । विधिः कथाशरीरस्य वृर्त्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा।

ध्वन्यालोकः/उद्द्योतः ३ – १०

Not only that, कवि’s job is to instill and maintain रस in portion of इतिहास where it is missing as per Kavi.

 

Let us read this first Sarg. Tomorrow, we will explore notable quotes from this KAvya.

 

किरातार्जुनीयम्/प्रथमः सर्गः

श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् ।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ।। १.१ ।।

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ।। १.२ ।।

द्विषां विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः ।
स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं विनिश्चितार्थामिति वाचमाददे ।। १.३ ।।

क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।
अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।। १.४ ।।

स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपं हितान्न यः संशृणुते स किंप्रभुः ।
सदानुकूलेषु हि कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसम्पदः ।। १.५ ।।

निसर्गदुर्बोधमबोधविक्लवाः क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ।। १.६ ।।

विशङ्कमानो भवतः पराभवं नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः ।
दुरोदरच्छद्मजितां समीहते नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः ।। १.७ ।।

तथापि जिह्मः स भवज्जिगीषया तनोति शुभ्रं गुणसम्पदा यशः ।
समुन्नयन्भूतिमनार्यसंगमाद्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः ।। १.८ ।।

कृतारिषड्वर्गजयेन मानवीमगम्यरूपां पदवीं प्रपित्सुना ।
विभज्य नक्तंदिवमस्ततन्द्रिणा वितन्यते तेन नयेन पौरुषम् ।। १.९ ।।

सखीनिव प्रीतियुजोऽनुजीविनः समानमानान्सुहृदश्च बन्धुभिः ।
स सन्ततं दर्शयते गतस्मयः कृताधिपत्यामिव साधु बन्धुताम् ।। १.१० ।।

असक्तमाराधयतो यथायथं विभज्य भक्त्या समपक्षपातया ।
गुणानुरागादिव सख्यमीयिवान्न बाधतेऽस्य त्रिगणः परस्परम् ।। १.११ ।।

निरत्ययं साम न दानवर्जितं न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियां ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ।। १.१२ ।।

वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवं ।। १.१३ ।।

विधाय रक्षान्परितः परेतरानशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ।। १.१४ ।।

अनारतं तेन पदेषु लम्भिता विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायतीरुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ।। १.१५ ।।

अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलं तदीयमास्थाननिकेतनाजिरं ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ।। १.१६ ।।

सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलैरकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृकाश्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ।। १.१७ ।।

महौजसो मानधना धनार्चिता धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः ।
न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ।। १.१८ ।।

उदारकीर्तेरुदयं दयावतः प्रशान्तबाधं दिशतोऽभिरक्षया ।
स्वयं प्रदुग्धेऽस्य गुणैरुपस्नुता वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी ।। १.१९ ।।

महीभुजां सच्चरितैश्चरैः क्रियाः स वेद निःशेषमशेषितक्रियः ।
महोदयैस्तस्य हितानुबन्धिभिः प्रतीयते धातुरिवेहितं फलैः ।। १.२० ।।

न तेन सज्यं क्वचिदुद्यतं धनुर्न वा कृतं कोपविजिह्ममाननम् ।
गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम् ।। १.२१ ।।

स यौवराज्ये नवयौवनोद्धतं निधाय दुःशासनमिद्धशासनः ।
मखेष्वखिन्नोऽनुमतः पुरोधसा धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम् ।। १.२२ ।।

प्रलीनभूपालमपि स्थिरायति प्रशासदावारिधि मण्डलं भुवः ।
स चिन्तयत्येव भियस्त्वदेष्यतीरहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता ।। १.२३ ।।

कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः ।
तवाभिधानाद्व्यथते नताननः स दुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः ।। १.२४ ।।

तदाशु कर्तुं त्वयि जिह्ममुद्यते विधीयतां तत्र विधेयमुत्तरम् ।
परप्रणीतानि वचांसि चिन्वतां प्रवृत्तिसाराः खलु मादृशां धियः ।। १.२५ ।।

इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ।। १.२६ ।।

निशम्य सिद्धिं द्विषतामपाकृतीस्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनीरुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ।। १.२७ ।।

भवादृशेषु प्रमदाजनोदितं भवत्यधिक्षेप इवानुशासनम् ।
तथापि वक्तुं व्यवसाययन्ति मां निरस्तनारीसमया दुराधयः ।। १.२८ ।।

अखण्डमाखण्डलतुल्यधामभिश्चिरं धृता भूपतिभिः स्ववंशजैः ।
त्वया स्वहस्तेन मही मदच्युता मतङ्गजेन स्रगिवापवर्जिता ।। १.२९ ।।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिता इवेषवः ।। १.३० ।।

गुणानुरक्तां अनुरक्तसाधनः कुलाभिमानी कुलजां नराधिपः ।
परैस्त्वदन्यः क इवापहारयेन्मनोरमां आत्मवधूं इव श्रियं ।। १.३१ ।।

भवन्तं एतर्हि मनस्विगर्हिते विवर्तमानं नरदेव वर्त्मनि ।
कथं न मन्युर्ज्वलयत्युदीरितः शमीतरुं शुष्कं इवाग्निरुच्छिखः ।। १.३२ ।।

अवन्ध्यकोपस्य निहन्तुरापदां भवन्ति वश्याः स्वयं एव देहिनः ।
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः ।। १.३३ ।।

परिभ्रमंल्लोहितचन्दनोचितः पदातिरन्तर्गिरि रेणुरूषितः ।
महारथः सत्यधनस्य मानसं दुनोति ते कच्चिदयं वृकोदरः ।। १.३४ ।।

विजित्य यः प्राज्यं अयच्छदुत्तरान्कुरूनकुप्यं वसु वासवोपमः ।
स वल्कवासांसि तवाधुनाहरन्करोति मन्युं न कथं धनंजयः ।। १.३५ ।।

वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वं एतौ धृतिसंयमौ यमौ विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुं ।। १.३६ ।।

इमां अहं वेद न तावकीं धियं विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ।। १.३७ ।।

पुराधिरूढः शयनं महाधनं विबोध्यसे यः स्तुतिगीतिमङ्गलैः ।
अदभ्रदर्भां अधिशय्य स स्थलीं जहासि निद्रां अशिवैः शिवारुतैः ।। १.३८ ।।

पुरोपनीतं नृप रामणीयकं द्विजातिशेषेण यदेतदन्धसा ।
तदद्य ते वन्यफलाशिनः परं परैति कार्श्यं यशसा समं वपुः ।। १.३९ ।।

अनारतं यौ मणिपीठशायिनावरञ्जयद्राजशिरःस्रजां रजः ।
निषीदतस्तौ चरणौ वनेषु ते मृगद्विजालूनशिखेषु बर्हिषां ।। १.४० ।।

द्विषन्निमित्ता यदियं दशा ततः समूलं उन्मूलयतीव मे मनः ।
परैरपर्यासितवीर्यसम्पदां पराभवोऽप्युत्सव एव मानिनां ।। १.४१ ।।

विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषां ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ।। १.४२ ।।

पुरःसरा धामवतां यशोधनाः सुदुःसहं प्राप्य निकारं ईदृशं ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परान्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ।। १.४३ ।।

अथ क्षमां एव निरस्तसाधनश्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनं ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकं ।। १.४४ ।।

न समयपरिरक्षणं क्षमं ते निकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः ।
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा विदधति सोपधि संधिदूषणानि ।। १.४५ ।।

विधिसमयनियोगाद्दीप्तिसंहारजिह्मं शिथिलबलं अगाधे मग्नं आपत्पयोधौ ।
रिपुतिमिरं उदस्योदीयमानं दिनादौ दिनकृतं इव लक्ष्मीस्त्वां समभ्येतु भूयः ।। १.४६ ।।

इति भारविकृतौ महाकाव्ये किरातार्जुनीये प्रथमः सर्गः ।

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ४० (पुराण विशेष) :: वृक्ष प्रतिष्ठा

Gavya40

वृक्ष प्रतिष्ठा

This is finest example of how well we used to take care of trees and plants. They were setup in community as living beings.

आचार्ये द्विगुणं दद्यात्पूर्ववन्मण्डपादिकम् ।७०.००८
पापनाशः परा सिद्धिर्वृक्षारामप्रतिष्ठया ॥७०.००८

Establishing trees and sacred groves can wipe out one’s sins and receives highest merits!

With the प्राण प्रतिष्ठा, life infusion, trees can last hundreds of years, but without it? Not our responsibility. Hence, it was compulsory to perform वृक्ष प्रतिष्ठा!

You believe it or not, trees can survive for long if they are infused by Prana of worshipers. This infusion of Prana, via trees, then spread to community for their well-being.

[Old note on same subject]

Planting tree is very sensitive activity. Equivalent to raising children.
No parents wish their children to die prematurely or live painful suffering life.
For the well-being of the tree-life, try to follow during plantation:

• Worship Varuna, Vishnu and Parjanya for the well being of the plant before planting it.
• Worship sapling or seed itself before planting it.
• Make oneself mentally pure and physically clean before starting planting activity.
• Planting in Uttara, Rohini, Anuradha, Chirta, Mrigsira, Ravati, Mula, Vishakha, Tishya, Sravan, Aswini and hasta Nakshatra influences a tree and helps it flourish at best potential.

Reference: Brihat Samhita and Agni puran

Educate children, friends and relatives involved in tree-planting and farming.


शब्द सिन्धु


हित्वा (hitvaa) = having given up/abandoned
हिनस्ति (hinasti) = degrade
हिमालयः (himaalayaH) = the Himalayan mountains
हिरण्यकश्यपु (hiraNyakashyapu) = a demon king, killed by Vishnu
हिरण्यगर्भ (hiraNyagarbha) = Effulgent, a name of Sun
हिरण्यगर्भः (hiraNyagarbhaH) = the Golden Embryo of life and form
हीनौ (hiinau) = bereft, having lost
हुत (huta) = offerings (usually made to a fire)
हुतं (hutaM) = offered
हुतभुक् (hutabhuk.h) = fire (one who eats offerings)
हुताशवक्त्रं (hutaashavaktraM) = fire coming out of Your mouth
हृ (hRi) = to steal
हृत (hRita) = deprived of
हृतत् (hRitat.h) = heart
हृत्स्थं (hRitsthaM) = situated in the heart
हृद् (hRid.h) = heart (neut)
हृदय (hRidaya) = heart
हृदयं (hRidayaM) = heart
हृदयस्थं (hRidayasthaM) = heart-stationed
हृदयानि (hRidayaani) = hearts
हृदयी (hRidayii) = in my heart
हृदयेषु (hRidayeshhu) = in the hearts of
हृदि (hRidi) = in the heart
हृद्देशे (hRiddeshe) = in the location of the heart
हृद्याः (hRidyaaH) = pleasing to the heart
हृषितः (hRishhitaH) = gladdened
हृषीकेश (hRishhiikesha) = O master of all senses
हृषीकेशं (hRishhiikeshaM) = unto Lord KRishhNa
हृषीकेशः (hRishhiikeshaH) = Hrsikesa (KRishhNa, the Lord who directs the senses of the devotees)
हृष्टरोमा (hRishhTaromaa) = with his bodily hairs standing on end due to his great ecstasy
हृष्यति (hRishhyati) = takes pleasure
हृष्यामि (hRishhyaami) = I am enjoying
हेतवः (hetavaH) = causes
हेतु (hetu) = intention
हेतुः (hetuH) = aim (Here: cause)
हेतुना (hetunaa) = for the reason
हेतुमद्भिः (hetumadbhiH) = with cause and effect
हेतोः (hetoH) = in exchange
हेमन् (heman.h) = gold
हेमन्त (hemanta) = (masc) winter
होरा (horaa) = A Varga. The Division of a sign into Solar and Lunar or Division into halves. Used for determining Wealth amongst other things
ह्यः (hyaH) = yesterday
ह्रस्वा (hrasvaa) = (adj) short
ह्रियते (hriyate) = is attracted
ह्रीः (hriiH) = modesty
क्षणं (kShaNaM) = one second
क्षणप्रभा (kShaNaprabhaa) = (f) lightning
क्षणवियोग (kShaNaviyoga) = momentary separation
क्षणवीक्षित (kShaNaviikshita) = glance
क्षत्रिय (kShatriya) = the caste of princes and warriors
क्षत्रियबलं (kShatriyabalaM) = the power or might of the kshatriyas or kings
क्षत्रियस्य (kShatriyasya) = of the ksatriya
क्षत्रियाः (kShatriyaaH) = the members of the royal order


पाठ


1 2


सुभाषित


सत्यं ब्रुयात् प्रियम् ब्रुयान्नब्रुयात् सत्यमप्रियम् |
प्रियम् च नानॄतम् ब्रुयादेष: धर्म: सनातन: ||

speak true, speak what is pleasant to others. don’t tell truth which is not pleasant (which is harmful) (similarly) even though pleasant, don’t speak false, this is Darmah


पठन -> मनन -> स्मरण -> आत्मसात


वृक्ष प्रतिष्ठा

भगवानुवाच
प्रतिष्ठां पादपानाञ्च वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदां ।७०.००१
सर्वौषध्युदकैर्लिप्तान् पिष्टातकविभूषितान् ॥७०.००१
वृक्षान्माल्यैरलङ्कृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत् ।७०.००२
सूच्या सौवर्णया कार्यं सर्वेषां कर्णवेधनम् ॥७०.००२
हेमशलाकयाञ्जनञ्च वेद्यान्तु फलसप्तकम् ।७०.००३
अधिवासयेच्च प्रत्येकं घटान् बलिनिवेदनं ॥७०.००३
इन्द्रादेरधिवासोऽथ होमः कार्यो वनस्पतेः ।७०.००४
वृक्षमध्यादुत्सृजेद्गां ततोऽभिषेकमन्त्रतः ॥७०.००४
ऋग्यजुःसाममन्त्रैश्च वारुणैर्मङ्गलै रवैः(१) ।७०.००५
वृक्षवेदिककुम्भकैश्च(२) स्नपनं द्विजपुङ्गवाः ॥७०.००५
तरूणां यजमानस्य कुर्युश्च यजमानकः ।७०.००६
भूषितो दक्षिणां दद्याद्गोभूभूषणवस्त्रकं ॥७०.००६

क्षीरेण भोजनं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयं ।७०.००७
होमस्तिलाद्यैः कार्यस्तु पलाशसमिधैस्तथा ॥७०.००७
आचार्ये द्विगुणं दद्यात्पूर्ववन्मण्डपादिकम् ।७०.००८
पापनाशः परा सिद्धिर्वृक्षारामप्रतिष्ठया ॥७०.००८
स्कन्दायेशो यथा प्राह प्रतिष्ठाद्यं तथा शृणु ।७०.००९
सूर्येशगणशक्त्यादेः परिवारस्य वै हरेः ॥७०.००९

इत्यादिमाहापुराणे आग्नेये पादपारामप्रतिष्ठाकथनं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १५ (हनुमान विशेष)

Gavya15


शब्द सिन्धु


अधिक (adhika) = additional
अधिकं (adhikaM) = more
अधिकः (adhikaH) = greater
अधिकतरः (adhikataraH) = very much
अधिकार (adhikaara) = title
अधिकारः (adhikaaraH) = right
अधिकारितन्त्रं (adhikaaritantraM) = (n) bureaucracy
अधिक्षिपति (adhikShipati) = to censure
अधिक्षेपः (adhikShepaH) = (m) accusation
अधिगच्छति (adhigachchhati) = attains
अधिगम्य (adhigamya) = having gone to
अधिदैव (adhidaiva) = the principle of subjective existence
अधिदैवं (adhidaivaM) = governing all the demigods
अधिदैवतं (adhidaivataM) = called adhidaiva
अधिनियमः (adhiniyamaH) = (m) act
अधिप (adhipa) = protector
अधिपति (adhipati) = lord
अधिभुत (adhibhuta) = the principle of objective existence
अधिभूतं (adhibhuutaM) = the material manifestation
अधिमात्र (adhimaatra) = superior
अधिमात्रातम (adhimaatraatama) = the highest, the supreme one
अधियज्ञ (adhiyaGYa) = the principle of sacrifice, incarnation
अधियज्ञः (adhiyaGYaH) = the Supersoul
अधिवास (adhivaasa) = dwelling
अधिवेशनं (adhiveshanaM) = (n) conference
अधिष्ठान (adhishhThaana) = seat, abode
अधिष्ठानं (adhishhThaanaM) = sitting place
अधिष्ठाय (adhishhThaaya) = being so situated
अधिसरि (adhisari) = competent candidate
अधीत (adhiita) = studied
अधीता (adhiitaa) = studied
अधीयानः (adhiiyaanaH) = studied
अधुना (adhunaa) = recently
अधोमुख (adhomukha) = face downwards
अधोमुखश्वानासन (adhomukhashvaanaasana) = the dog stretch posture
अध्ययन (adhyayana) = study
अध्ययनैः (adhyayanaiH) = or Vedic study
अध्यक्षेण (adhyakSheNa) = by superintendence
अध्यात्म (adhyaatma) = the principle of self
अध्यात्मं (adhyaatmaM) = transcendental


पाठ


Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
  • यत्र विद्वज्जनो नास्ति प्राज्ञस्तत्राल्पधीरपि ।
  • यदध्यासितमर्हद्भिस्तद्धि तीर्थं प्रचक्षते ।
  • यद्धात्रा निजभावपट्टलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः।
  • यद्यपि शुद्धं लोकविरुद्धं नाकरणीयं नाचरणीयम्।
  • यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् ।
  • यस्यागमः केवलजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति ।
  • याज्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा ।
  • यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ।
  • योग्यत्वाद् यः समुत्कर्षो निरपायः सः सर्वथा ।
  • यो यद्वपति बीजं हि लभते सोऽपि तत्फलम् ।
  • योऽर्थे शुचिस्सः हि शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ।

1 2 3


सुभाषित


हनूमते नमः । अञ्जनासूनवे । वायुपुत्राय ।
महाबलाय । रामेष्टाय । फल्गुनसखाय ।
पिङ्गाक्षाय । अमितविक्रमाय । उदधिक्रमणाय ।
सीताशोकविनाशकाय । लक्ष्मणप्राणदात्रे ।
दशग्रीवस्यदर्पघ्ने नमः ।


पठन/स्मरण/मनन


॥ श्रीहनुमद्व्रतम् ॥

तत्रादौ हनुमद्व्रतं कर्तुमारभमाण आचारानुसारेण
विशिष्टाचारपरम्पराप्राप्तां यथाशक्तिद्रव्यैः पम्पापूजां करिष्ये ।
इति सङ्कल्प्य, मार्गशीर्षमासे शुक्लत्रयोदश्यां व्रतं
करिष्यमाणः द्वादश्यामेव नियतो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः
सम्यग्रात्रिं यापयित्वा ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय
कर्तव्यं सर्वमालोकयति ॥

शौनक उवाच
हनुमद्व्रतसङ्कल्पं कर्तुकामोऽब्रवीज्जनः ।
कस्मिन्देशे व्रतं सम्यक्कर्तव्यं वद सूतज ॥ १॥

किं च व्रतं पूर्वतरैः कुत्राचरितमद्भुतम् ।
सन्ति स्थलानि बहुधा गोष्ठवृन्दावनादयः ॥ २॥

वापीकूपतडागाद्याः कुल्याः कृत्रिमविस्तृताः ।
नद्यो नदाः सागराद्याः पर्वताः सरितो द्रुमाः ।
विचार्य बहुधा तच्च वद नो वदतां वर ॥ ३॥

सूत उवाच
साधु पृष्टं महाभागाः सम्यगेवोच्यते मया ।
बहवः सन्ति देशाश्च पुण्याः पुण्यविवर्धनाः ॥

तथापि वक्ष्ये यद्गुह्यं तच्छृण्वन्तु मुनीश्वराः ॥ ४॥

पूर्वं हनुमतः पूजा कृता पम्पासरित्तटे ।
तस्मात् पम्पासरित्तीरे हनुमद्व्रतमुत्तमम् ॥ ५॥

नानादेशेषु कर्तव्या पम्पापूजा प्रयत्नतः ।
ब्राह्मे मुहुर्ते चोत्थाय शौचादिभिरतन्द्रितः ॥ ६॥

नित्यकर्म समाप्याशु योगक्षेमं समाविशेत् ।
ततश्च पञ्चभिर्वाद्यैरुपेतो बन्धुभिवृर्तः ॥ ७॥

तत्रत्यां च नदीं काञ्चिद्गत्वा स्नात्वा च वाग्यतः ।
अघमर्षणमन्त्रैश्च शुचिः प्रयतमानसः ॥ ८॥

सन्ध्यावन्दनपूर्वं च नित्यकर्म समाप्य च ।
पितॄन् सन्तर्प्य यत्नेन ललाटे तिलकोज्ज्वलः ॥ ९॥

षोडशाप्युपचारांश्च पम्पायाः सर्वतो व्रती ॥ १०॥

पम्पा पूजा ॥

हेमकूटगिरिप्रान्तजनानां गिरिसानुगाम् ।
पम्पामावाहयाम्यस्यां नद्यां हृद्यां प्रयत्नतः ॥ आवाहनम्
तरङ्गशतकल्लोलैः रिङ्गत्तामरसोज्ज्वले ।
पम्पानदि नमस्तुभ्यं गृहाणासनमुत्तमम् ॥ आसनम्
हृद्यं सुगन्धसम्पन्नं शुद्धं शुद्धाम्बुसत्कृतम् ।
पाद्यं गृहाण पम्पाख्ये महानदि नमोऽस्तु ते ॥ पाद्यम्
भागीरथि नमस्तुभ्यं सलिलेन सुशोभने ।
अनर्घ्यमर्घ्यमनघे गृह्यतामिदमुत्तमम् ॥ अर्घ्यम्
पम्पानदि नमस्तुभ्यं महापुण्ये सुशोभने ।
गोदावरीजलेनाद्य गृहाणाचमनीयकम् ॥ आचमनीयम्
दुग्धाज्येक्षुरसैः पुण्यैर्दध्नश्च मधुना तथा ।
पञ्चामृतैः स्नापयिष्ये पम्पानदि नमोऽस्तु ते । पञ्चामृतस्नानम्
शुद्धक्षीरैः शुद्धजलैर्नारिकेलाम्बुभिस्तथा ।
पुण्यैः कृष्णानदीतोयैः सिञ्चामि त्वां सरिद्वरे ॥ स्नानम्
महामूल्यं च कार्पासं दिव्यवस्त्रमनुत्तमम् ।
पम्पानदि महापुण्ये पम्पाशोभातिशोभने ॥ वस्त्रम्
श्रौतस्मार्तादिसत्कर्मफलदं पावनं शुभम् ।
यज्ञोपवीतमधुना कल्पये सरिदुत्तमे ॥ यज्ञोपवीतम्
कर्पूरगुटिकामिश्रं कस्तूर्या च विमर्दितम् ।
यत्नेन कल्पितं गन्धं लेपयेऽङ्गं सरिद्वरे ॥ गन्धम्
लक्षणोक्तान्हरिद्राक्तानक्षतांश्चोत्तमाञ्छुभान् ।
पम्पानदि गृहाणेमाञ्छुभशोभातिवृद्धये ॥ अक्षतान्
अतसीकुसुमोपेतं पङ्केरुहदलोज्ज्वलम् ।
कुङ्कुमं शङ्करजटासम्भूते सरिदर्पये ॥ कुङ्कुमम्
कज्जलं त्रिजगद्वन्द्ये महापुण्ये तरङ्गिणि ।
नेत्रयोः पादमनघं गृह्यतां सरितां वरे ॥ नेत्राञ्जनम्
शतपत्रैश्च कह्लारैः कुमुदैर्वकुलैरपि ।
मल्लिकाजातिपुन्नागैः केवलैश्चापि चम्पकैः ॥

तुलसीदामभिश्चापि तथा बिल्वदलैरपि ।
पूजयामि महापुण्ये पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ पुष्पाणि

अथ अङ्गपूजा ॥

गोदावर्यै नमः पादौ पूजयामि । कृष्णायै नमः गुल्फौ पूजयामि ।
पापहारिण्यै नमः जङ्घे पूजयामि । सुभ्रुवे नमः जानुनी पूजयामि ।
उरुतरङ्गिण्यै नमः ऊरू पजयामि । तडिदुज्ज्वलजवायै नमः कटिं पूजयामि ।
अम्बुशोभिन्यै नमः नितम्बं पूजयामि । अणुमध्यायै नमः मध्यं पूजयामि ।
सुस्तनायै नमः स्तनौ पूजयामि । कम्बुकण्ठ्यै नमः कण्ठं पूजयामि ।
ललिताबाहुरङ्गायै नमः बाहू पूजयामि ।
दीर्घवेण्यै नमः वेणीं पूजयामि । सुवक्त्रायै नमः वक्त्रं पूजयामि ।
दुर्वारवारिपूरायै नमः शिरः पूजयामि । सहस्रमुखायै नमः सर्वाङ्गं
पूजयामि ॥

सदशाङ्गं शुभं दिव्यं सगुग्गुलमनुत्तमम् ।
साज्यं परिमलोद्भूतं धूपं स्वीकुरु पावने ॥ धूपम्
साज्यमग्निप्रकाशोद्यत्कोटिसूर्यसमद्युति ।
पश्य दीपं प्रसन्नाङ्गे पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ दीपम्
शाल्यन्नं स्वर्णपात्रस्थं शाकापूपसमन्वितम् ।
साज्यं दधिपायसं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ नैवेद्यम्
पूगैः सुशोभनैश्चापि नागवल्लीदलैर्युतम् ।
ताम्बूलं गृह्यतां देवि पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ ताम्बूलम्
व्रतपूर्तिमहाकीर्तिदिव्यस्फूर्तिप्रकीर्तिदम् ।
कर्तुकामो व्रतमिदं सौवर्णं पुष्पमर्पये ॥ सुवर्णपुष्पम्
प्रदक्षिणत्रयं देवि प्रयत्नेन प्रकल्पितम् ।
पश्याद्य पावने देवि पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ प्रदक्षिणं
नमस्ते नमस्ते विशालोज्ज्वलाङ्गे
नमस्ते नमस्ते लसत्सत्तरङ्गे ।
नमस्ते नमस्ते गिरिप्रान्तरङ्गे
नमस्ते नमस्ते कलद्बर्हिरङ्गे ॥ नमस्कारं
अपराधशतं देवि मत्कृतं च दिने दिने ।
क्षम्यतां पावने देवि पम्पानदि नमोऽस्तु ते ॥ क्षमापणम्
पम्पानदि महापुण्ये तरङ्गिणि ! नमोऽस्तु ते ।
त्वत्तीरे हनुमत्पूजा कृता रामेण धीमता ॥

मनोरथफलावाप्तिस्तस्याभीष्टं न संशयः ।
सुग्रीवेण च तीरेऽस्मिन्कपिवर्येण ते कृतम् ॥

संस्कृतं च मनोवाञ्छा सहस्तस्य बभूव सा ।
अतस्त्वन्नीरपुलिने कृते हनुमतो व्रते ॥

श्रेयांसि मम सर्वाणि न विघ्नानि भवन्त्विह ।
इति सम्प्रार्थ्य पम्पाख्यां नदीं शुभतरङ्गिणीम् ॥

कलशोदकपाणिश्च गच्छेत् स्वगृहमादरात् ॥

इति पम्पापूजा ॥

देशकालौ स्मृत्वा, मयाऽऽचरितस्य व्रतस्य सम्पूर्णफलावाप्त्यर्थं
भार्यया सह हनुमत्पूजां करिष्ये । इति सङ्कल्प्य
(पीठस्य अधोभागे)-अतलाय नमः । वितलाय नमः । सुतलाय नमः ।
रसातलाय नमः । तलातलाय नमः । महातलाय नमः । पातालाय नमः ।
तत्र अगाधसर्वतःशब्दात्मने नमः । तत्र कमले कमठाय नमः ।
तदुपरि सहस्रमणिफणाप्रकाशमानशेषाय नमः ।
अष्टदिग्गजेभ्यो नमः ।
तदुपरि भूमण्डलाय नमः । तपोलोकाय । महर्लोकाय नमः ।
सत्यलोकाय । अष्टदिक्पालकेभ्यो नमः । तन्मध्ये मेरवे नमः ।
मेरोर्दक्षिणदिग्भागे द्रोणशैलाय नमः । तन्मध्ये सुरतरवे नमः ।
तन्मूले सुवर्णवेदिकायै नमः । वेद्यां वृक्षस्य पूर्वभागे
नवरत्नखचितचारुरत्नपीठाय नमः ।
(हनुमत् पीठे अलङ्कृतं कलशं निधाय)
ॐ नमो भगवते वायुनन्दनाय नमः । इति कलशस्थापनम् ।
ततः देशकालौ सङ्कीर्त्य सीतासमेतश्रीरामचन्द्रध्यानादि मानसं
कृत्वा श्रीहनुमन्तमावाहयेत् । प्राणप्रतिष्ठां च विधिवत्कुर्यात् ॥

द्वादशग्रन्थिपूजा –
अञ्जनीसूनवे नमः प्रथमग्रन्थिं पूजयामि ।
हनुमते नमः द्वितीयग्रन्थिं पूजयामि ।
वायुपुत्राय नमः तृतीयग्रन्थिं पूजयामि ।
महाबलाय नमः चतुर्थग्रन्थिं पूजयामि ।
रामेष्टाय नमः पञ्चमग्रन्थिं पूजयामि ।
फाल्गुनसखाय नमः षष्ठग्रन्थिं पूजयामि ।
पिङ्गाक्षाय नमः सप्तमग्रन्थिं पूजयामि ।
अमितविक्रमाय नमः अष्टमग्रन्थिं पूजयामि ।
कपीश्वराय नमः नवमग्रन्थिं पूजयामिः ।
सीताशोकविनाशनाय नमः दशमग्रन्थिं पूजयामि ।
लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः एकादशग्रन्थिं पूजयामि ।
दशग्रीवदर्पघ्नाय नमः द्वादशग्रन्थिं पूजयामि ।
भविष्यद्ब्रह्मणेनमः त्रयोदशग्रन्थिं पूजयामि ।

(अङ्ग पूजा)
हनुमते नमः पादौ पूजयामि ।
सुग्रीवसखाय नमः गुल्फौ पूजयामि ।
अङ्गदमित्राय नमः जङ्घे पूजयामि ।
रामदासाय नमः ऊरू पूजयामि ।
अक्षघ्नाय नमः कटिं पूजयामि ।
लङ्कादहनाय नमः वालं पूजयामि ।
रामदासाय नमः नाभिं पूजयामि ।
सागरोल्लङ्घनाय नमः मध्यं पूजयामि ।
लङ्कामर्दनाय नमः केशावलिं पूजयामि ।
सञ्जीवनीहर्त्रे नमः स्तनौ पूजयामि ।
सौमित्रिप्राणदाय नमः वक्षः पूजयामि ।
कुण्ठितदशकण्ठाय नमः कण्ठं पूजयामि ।
रामाभिषेककारिणे नमः हस्तौ पूजयामि ।
मन्त्ररचितरामायणाय नमः वक्त्रं पूजयामि ।
प्रसन्नदवदनाय नमः वदनं पूजयामि ।
पिङ्गनेत्राय नमः नेत्रं पूजयामि ।
श्रुतिपारगाय नमः श्रुतिं पूजयामि ।
ऊर्ध्वपुण्ड्रधारिणे नमः कपोलं पूजयामि ।
मणिकण्ठमालिने नमः शिरः पूजयामि ।
सर्वाभीष्टप्रदाय नमः सर्वाङ्गं पूजयामि ।

दोरग्रहणम्
अञ्जनीगर्भसम्भूत रामकार्यार्थसम्भव ।
वरदातः कृता पूजा रक्ष मां प्रतिवत्सरम् ।
व्रतोद्यापनं – यजमानो महानद्यां माध्याह्निकस्नानं कृत्वा,
नित्यकर्म विधायाऽऽचार्य-ब्रह्मऋत्विग्भिः सहोपविश्य,
प्राणानायम्य,
अद्य शुभतिथौ धर्मपत्नीसमेतस्य मम
हनुमद्-व्रतकल्पोक्त-सम्पूर्णफलावाप्तये
धर्मार्थ-काम-मोक्ष-चतुर्विध-पुरुषार्थसिद्ध्यर्थं
श्रीमदाञ्जनेयप्रीत्यर्थं च हनुमद्व्रतोद्यापनाख्यं कर्म करिष्ये ।
अस्मिन् कर्मणि आचार्यत्वं भवन्तः कुर्वन्त्विति वेदवेत्तारं कुटुम्बिनं
वित्तहीनं शान्तमाचारवन्तं ब्राह्मणमाचार्यत्वे नियोज्य, एवं
लक्षणसहयुक्तमपरं ब्राह्मणं नियोज्य, ततः त्रयोदशकलशावाहनार्थं
त्रयोदशब्राह्मणानृत्विग्विधौ नियोज्य एवमावरणं कृत्वा, ततो
निष्कमात्रसुवर्णेन, तदर्धेन यथाशक्ति वा हनुमत्प्रतिमां कृत्वा
प्राणानायम्य, हनुमद्-व्रतोद्यापनाङ्गत्वेन पम्पापूजां कृत्वा,
पुनः प्राणानायम्य, शुभतिथौ धर्मपत्नीसमेतस्य मम
मनोवाञ्छाफलसिद्ध्यर्थं
श्रीमदाञ्जनेयप्रीत्यर्थमाञ्जनेयप्रतिमापूजां करिष्ये ।
इति सङ्कल्प्य,
तत्प्रतिमाशुद्ध्यर्थं पञ्चामृतस्नपनं कृत्वा, मूलमन्त्रेण
शुद्धोदकस्नपनं कृत्वा, पञ्चप्रस्थपरिमितश्वेततण्डुलोपरि
अलङ्कृतपूर्णकलशं संस्थाप्य तदुपरि प्रतिमामाधाय
प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा।ततस्त्रयोदशकलशान्
प्रतिमावेष्टितांस्तण्डुलेषु निधाय, कलशपूजां कृत्वा,
तेषु कलशेषु वस्त्राण्यावेष्ट्य, तेषु नानाविधफलानि दत्वा,
कलशपूजां कृत्वा, ततः पीठार्चनं कुर्यात् ॥

पीठस्याधस्तले – अतलाय नमः । वितलाय नमः ।
सुतलाय नमः । रसातलाय नमः । तलातलाय नमः ।
महातलाय नमः । पातालाय नमः ।
तथागाधसर्वतोमुख-सुधाधिभ्यां नमः । तत्र कमठाय नमः ।
तदुपरि – सहस्रफणिफणामण्डित-मणिप्रकाशिताशेषलोकशेषाय नमः ।
अष्टदिग्गजेभ्यो नमः । तदुपरि भूमण्डलाय नमः ।
दिक्पालेभ्यो नमः । तन्मध्ये मेरवे नमः ।
मेरोर्दक्षिणदिग्भागे रत्नसानवे नमः । तन्मध्ये सुरतरवे नमः ।
तन्मूले सुवर्णवेदिकायै नमः । वेद्यां वृक्षस्य पूर्वभागे
नवरत्नखचितनूतनपीठाय नमः । (एवं भावयित्वा)
स्वामिन् ! सर्वजगन्नाथ ! यावत् पूजावसानकम् ।
तावत् त्वं प्रीतिभावेन प्रतिमायां स्थिरो भव ॥

ततस्त्रयोदशग्रन्थियुक्तदोरकं प्रतिष्ठाप्य,
ध्यानम् –
वन्दे विद्युद्वलयलसितं ब्रह्मसूत्रं दधानं,
कर्णद्वन्द्वे कनकवलये कुण्डले धारयन्तम् ।
सत्कौपीनं कटिपरिहृतं कामरूपं कपीन्द्रं
नित्यं ध्यायाम्यनिलतनयं वज्रदेहं वरिष्ठम् ॥

प्रतप्त-जाम्बूनद-दिव्यमंसं देदीप्यमानाग्निविभासुराक्षम् ।
प्रफुल्ल-पङ्केरुह-शोभनास्यं ध्याये हृदिस्थं पवमानसूनुम् ॥

अथ कल्पोक्तप्रकारेण आवाहनादि -षोडशोपचारान् कृत्वा
नमःसर्वहितार्थाय जगदाराध्यकर्मणे ।
अमेयायाञ्जनेयाय पुनरर्घ्यं पुरोऽर्पये ।
इति प्रसन्नार्घ्यं समर्पयामि नमः ।
भक्त्या प्रकल्पितैरेतैरुपचारैश्च षोडशैः ।
भगवन् हनुमन्नीश ! प्रीयतां मे प्रियोक्तिभिः ॥

उपचारसमर्पणं यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥

एवं रात्रौ प्रथमयामपूजां कृत्वा,
तस्यां रात्र्यां प्रतियामपूजां कुर्वन्,
गीतवादित्रादिभिर्मङ्गलध्वनिभिर्भागवतपठनादिपुराण-
श्रवणादिभिर्जागरणं कृत्वा, परेद्युः प्रभाते महानद्यां ब्राह्मणैः सह
स्नानं कृत्वा, नित्यकर्म विधाय गन्धादिभिरलङ्कृत्य, गृहमागत्य,
पूर्ववत्पूजां कृत्वा, हनुमद्व्रतोद्यापनाङ्गहोमं कुर्यात् ।
क्षीरान्नेनाज्येन पिप्पलसमिद्भिः कल्पोक्तद्रव्येण
मूलमन्त्रेणाष्टोत्तरसहस्रमष्टोत्तरशतं वा होमं कुर्यात् ।
पूर्णाहुतिं दत्वा, ब्रह्मणे दक्षिणां दत्वा, तत आचार्यं पूजयित्वा,
प्रतिमां सवस्त्रां सालङ्कारां सतण्डुलां च दत्वा, तद्दानसाद्गुण्यार्थं
दक्षिणां दत्वा, आचार्याय सवत्सां सालङ्कारां पयस्विनीं गां दद्यात् ।
तत ऋत्विग्भ्यः सवस्त्रान् कलशान् दत्वा दक्षिणां च दत्वा,
विशिष्टपङ्गुदीनान्धकृपणजनान् ब्राह्मणान् सन्तर्प्य, ऋत्विगादि-
ब्राह्मणान् शतं पञ्चाशत्, पञ्चविंशतिं त्रयोदश वा ब्राह्मणान्
मिष्टान्नभोजनेन सन्तर्प्य, भूरिदानं विभवानुसारेण कुर्यात् ।
एवं कुर्वन् यजमानः कृतार्थो भवति ।
हनुमान् सुप्रीतो वरदो भूत्वा पुत्रपौत्रादि सर्वकामान्
प्रयच्छति । इति शौनकादिकान् प्रति सूतः प्रोवाच । इति ॥

From Hanumatstutimanjari, Mahaperiaval Publication
Proofread by PSA Easwaran psaeaswaran at gmail

Popular Posts

My Favorites

Desi Cow Ghee against Cancer and Coronary Heart Diesease

Note 1 Ghee is medicine but modern doctors blame it for all life style diseases. They even prescribe ban at home. Well, urban dwellers disconnected from...