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संस्कृत साधना : पाठ १७ (तिङन्त-प्रकरण ३ :: विशेष नियम)

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नमस्कार मित्रों !
पिछले पाठ में आपने तिङ् प्रत्ययों और आत्मनेपद परस्मैपद के विषय में जाना। कौन सी धातुएँ आत्मनेपदी होती है और कौन परस्मैपदी अथवा उभयपदी, यह आप तभी जान पायेंगे जब आप धातुपाठ का अध्ययन करेंगे। किन्तु जब हम आपको धातुओं के रूपों का अभ्यास करायेंगे तब आपको उस धातु के विषय में यह सभी बातें बताते चलेंगे। आज से हम आपको दसों लकारों के प्रयोग से सम्बन्धित नियमों के विषय में बतायेंगे। सबसे पहला है लट् लकार। इसके विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए-

१) लट् लकार वर्तमान काल में होता है। क्रिया के आरम्भ से लेकर समाप्ति तक के काल को वर्तमान काल कहते हैं। जब हम कहते हैं कि ‘रामचरण पुस्तक पढ़ता है या पढ़ रहा है’ तो पढ़ना क्रिया वर्तमान है अर्थात् अभी समाप्त नहीं हुई। और जब कहते हैं कि ‘रामचरण ने पुस्तक पढ़ी’ तो पढ़ना क्रिया समाप्त हो चुकी अर्थात् यह भूतकाल की क्रिया हो गयी।

२) यदि लट् लकार के रूप के साथ ‘स्म’ लगा दिया जाय तो लट् लकार वाले रूप का प्रयोग भूतकाल के लिए हो जायेगा। जैसे – ‘पठति स्म’ = पढ़ता था।

३) सर्वप्रथम हम आपको ‘भू’ धातु के रूप बतायेंगे। ‘भू’ धातु का अर्थ है ‘होना’ , किसी की सत्ता या अस्तित्व को बताने के लिए इस धातु का प्रयोग होता है। यह धातु परस्मैपदी है अतः इसमें तिङ् प्रत्ययों में से प्रथम नौ प्रत्यय लगेंगे। देखिए –

प्रथमपुरुष भू+ तिप् भू+ तस् भू+ झि
मध्यमपुरुष भू+सिप् भू+थस् भू+ थ
उत्तमपुरुष भू+मिप् भू+वस् भू+मस्

व्याकरणशास्त्र की रूपसिद्धि प्रक्रिया को न बताते हुए आपको सिद्ध रूपों को बतायेंगे। रूपसिद्धि की प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। लट् लकार में निम्नलिखित रूप बनेंगे, पुरुष वचन आदि पूर्ववत् रहेंगे-

भवति भवतः भवन्ति
भवसि भवथः भवथ
भवामि भवावः भवामः

इन रूपों का वाक्यों में अभ्यास करने पर आपको उपर्युक्त नियम अभ्यस्त हो जायेंगे।
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शब्दकोश :
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पुत्र के पर्यायवाची शब्द –
१) आत्मजः
२) तनयः
३) सूनुः
४) सुतः
५) पुत्रः

* उपर्युक्त शब्दों को यदि स्त्रीलिंग में बोला जाए तो इनका अर्थ ‘पुत्री’ हो जाता है। जैसे – आत्मजा, सूनू , तनया, सुता, पुत्री । ‘दुहितृ’ माने भी पुत्री होता है।

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वाक्य अभ्यास :
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जब मैं यहाँ होता हूँ तब वह दुष्ट भी यहीं होता है।
= यदा अहम् अत्र भवामि तदा सः दुष्टः अपि अत्रैव भवति।

जब हम दोनों विद्यालय में होते हैं…
= यदा आवां विद्यालये भवावः …

तब तुम दोनों विद्यालय में क्यों नहीं होते हो ?
= तदा युवां विद्यालये कथं न भवथः ?

जब हम सब प्रसन्न होते हैं तब वे भी प्रसन्न होते हैं।
= यदा वयं प्रसन्नाः भवामः तदा ते अपि प्रसन्नाः भवन्ति।

प्राचीन काल में हर गाँव में कुएँ होते थे।
= प्राचीने काले सर्वेषु ग्रामेषु कूपाः भवन्ति स्म।

सब गाँवों में मन्दिर होते थे।
= सर्वेषु ग्रामेषु मन्दिराणि भवन्ति स्म।

मेरे गाँव में उत्सव होता था।
= मम ग्रामे उत्सवः भवति स्म।

आजकल मनुष्य दूसरों के सुख से पीड़ित होता है।
= अद्यत्वे मर्त्यः परेषां सुखेन पीडितः भवति।

जो परिश्रमी होता है वही सुखी होता है।
= यः परिश्रमी भवति सः एव सुखी भवति।

केवल बेटे ही सब कुछ नहीं होते…
= केवलं पुत्राः एव सर्वं न भवन्ति खलु…

बेटियाँ बेटों से कम नहीं होतीं।
= सुताः सुतेभ्यः न्यूनाः न भवन्ति।

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श्लोक :
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अन्नात् भवन्ति भूतानि
पर्जन्यात् अन्नसम्भवः।
यज्ञात् भवति पर्जन्यः
यज्ञः कर्म समुद्भवः ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ३.१४)

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ६ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक-२)

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नमः संस्कृताय !!
सुधी मित्रों ! पिछले पाठ में मैंने क्रियाओं के विषय में थोड़ी चर्चा की थी। मैंने बताया था कि “कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व को ‘क्रिया’ कहते हैं।” यह भी बताया था कि ‘अकर्मक’ और ‘सकर्मक’ भेद से क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं। अब बताएँगे कि कौन सी क्रियाएँ ‘अकर्मक’ होती हैं और कौन सी ‘सकर्मक’।

१) पहले तो यह जान लीजिए कि इन दोनों प्रकार की क्रियाओं को बताने के लिए या इनका वर्णन करने के लिए जिन ( पठति, खादति, हसति, खेलति आदि ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उनके मूल अंश को ‘धातु’ कहते हैं।

२) ये धातुएँ लगभग द्विसहस्र हैं। बहुत से आचार्यों ने इनका अर्थसहित संग्रह किया था। किन्तु सबसे प्रसिद्ध संग्रह महर्षि पाणिनि का ‘धातुपाठ’ है। यह ‘धातुपाठ’ उन्हीं के महान् ग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ का परिशिष्ट है। यह ग्रंथ आपको अपने पास अवश्य रखना चाहिए।

३) जब क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं तो उनका वर्णन करने वाली धातुएँ भी दो प्रकार की हुईं- अकर्मक और सकर्मक। अकर्मक क्रियाएँ बहुत थोड़ी ही हैं, जबकि सकर्मक बहुत सी हैं। इसलिए अकर्मक धातुओं को स्मरण रखने के लिए एक श्लोक में इकट्ठा कर दिया गया है-

लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं
वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं
धातुगणं तेऽकर्मकम् आहुः ॥

४) उपर्युक्त श्लोक में जितने अर्थ गिनाए गये हैं, उन अर्थों वाली धातुएँ ‘अकर्मक’ होती हैं। देखिए-
लज्जा अर्थ वाली—- लज्ज् , ह्री
सत्ता अर्थ वाली—– भू , अस् , विद् , वृतु
स्थिति अर्थ वाली—- स्था
जागरण अर्थ वाली— जागृ
वृद्धि अर्थ वाली—— वृध् , एध् , प्याय्
क्षय अर्थ वाली—— क्षि
भय अर्थ वाली——- भी
जीवन अर्थ वाली—– जीव् , अन्
मरण अर्थ वाली—— मृङ्
शयन अर्थ वाली—— शीङ् , स्वप् , सस्
क्रीडा अर्थ वाली—— क्रीड् , खेल् , रम्
रुचि अर्थ वाली——- रुच्
दीप्ति अर्थ वाली——- दीप् , ज्वल्

आगामी पाठों में इनका प्रयोग भी आपको करवायेंगे । केवल इस श्लोक में गिनाए गये अर्थों वाली धातुएँ ही अकर्मक नहीं हैं अपितु कुछ अन्य अकर्मक धातुएँ भी हैं, जिनका ज्ञान आपको यथास्थान होता रहेगा।

५) ध्यातव्य : यदि आपसे कहा जाए कि “महेन्द्र फुटबॉल खेलता है” इस वाक्य में खेलता है क्रिया सकर्मक है अथवा अकर्मक ? तो आप यह सोचकर भ्रमित न होइयेगा कि ‘फुटबॉल को खेलता है’ इसलिए यह सकर्मक क्रिया है। वास्तव में वह फुटबॉल “से” खेलता है। फुटबॉल “खेलना” क्रिया का करण (साधन) है।

६) उपर्युक्त धातुओं के अतिरिक्त धातुओं को सकर्मक समझना चाहिए।

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वाक्य अभ्यास :
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“तुम गड्डमड्ड वाक्यों से मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हो।”
‘तुम’ कर्त्ता, ‘गड्डमड्ड वाक्य’ करण, ‘मेरी’ सम्बन्ध, ‘बुद्धि’ कर्म, ‘मोहित कर रहे हो’ सकर्मक क्रिया।
= त्वं व्यामिश्रैः वाक्यैः मम बुद्धिं मोहयसि।

“हे केशव ! तुम मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हो ?”
‘हे केशव’ सम्बोधन, ‘तुम’ कर्त्ता, ‘मुझे’ कर्म, ‘घोर कर्म’ अधिकरण, ‘क्यों’ अव्यय, ‘लगाते हो’ सकर्मक क्रिया।
हे केशव ! त्वं माम् घोरे कर्मणि कथं नियोजयसि ?

“बन्दर पैरों से चलता है और दो हाथों से फल खाता है।”
‘बन्दर’ कर्त्ता, ‘पैर’ करण, ‘चलता है’ अकर्मक क्रिया, ‘और’ अव्यय, ‘दो हाथ’ करण, ‘फल’ कर्म, ‘खाता है’ सकर्मक क्रिया।
वानरः पादाभ्यां चलति हस्ताभ्यां च फलानि खादति।

“धूर्तों के हृदय में दया नहीं होती है।”
‘धूर्त’ सम्बन्ध, ‘हृदय’ अधिकरण, ‘दया’ कर्त्ता, ‘होती है’ अकर्मक क्रिया।
धूर्तानां हृदये दया न भवति।

विद्यालय के अध्यापकों को मैं जानता हूँ ।
‘विद्यालय’ सम्बन्ध, ‘अध्यापकों को’ कर्म, ‘मैं’ कर्त्ता, ‘जानता हूँ’ सकर्मक क्रिया।
विद्यालयस्य अध्यापकान् अहं जानामि।

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श्लोक :

यत् करोषि* यत् अश्नासि*
यत् जुहोषि* ददासि* यत्।
यत् तपस्यसि* कौन्तेय
तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ९।२७॥)

इस श्लोक में * चिह्न वाली क्रियाएँ लट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन की हैं। अर्थ पुस्तक में ढूँढकर देखें।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ : ३ (कारक और सम्बन्ध)

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नमः संस्कृताय मित्राणि ! अद्यत्वे शैत्यं निरन्तरं वर्द्धते, न वा ?
तो कल के पाठ में आपने यह जाना कि किसी भी वाक्य में क्रिया का होना अनिवार्य है और उस क्रिया के सम्पादन में जितने भी कारण होते हैं वे “कारक” कहे जाते हैं। एक श्लोक के माध्यम से छहों कारकों का नाम भी बताया था। आपको वह श्लोक अवश्य याद हो गया होगा। चलिए एक बार फिर याद दिला देते हैं-
“कर्त्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट् ॥”

अब इन छह “कारकों” और “सम्बन्ध” के विषय में समझाते हैं। यह भी बताएँगे कि किस कारक के लिए किस विभक्ति का प्रयोग होता है। सम्बोधन को छोड़कर सात विभक्तियाँ होती हैं- यह तो आप जानते ही हैं।

1] कर्त्ता = जो क्रिया को करने में स्वतन्त्र होता है उसे कर्त्ता कहते हैं अर्थात् यह सीधा सीधा क्रिया को सम्पादित करता है। “जो करता है वही कर्त्ता।” जैसे- कृष्णः खेलति – इसमें “खेलना” क्रिया को कृष्ण कर रहा है, इसलिए “कृष्ण” “कर्त्ता कारक” हुआ। कल वाले उदाहरण में- “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ना” क्रिया कौन कर रहा है ? उत्तर है- डोनाल्ड ट्रम्प, यही इस वाक्य में कर्त्ता है।

2] कर्म = जिस पदार्थ के लिए कोई क्रिया की जाती है वह पदार्थ ही उस क्रिया का कर्म होता है। जैसे – “डोनाल्ड ट्रम्प फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “फल” के लिए की जा रही है इसलिए फल “तोड़ना” क्रिया का “कर्म” हुआ।

3] करण = क्रिया की सिद्धि में जो चीज कर्त्ता की सबसे अधिक सहायक होती है वही “करण” है। “डोनाल्ड ट्रम्प डण्डे से फल तोड़ता है।” डोनाल्ड ट्रम्प कर्त्ता है और उसकी सबसे सहायक चीज है डण्डा, इसलिए “डण्डा” करण हुआ।

4] सम्प्रदान = जिसके लिए क्रिया की जाती है तथा जिसको कोई वस्तु दी जाती है उसे “सम्प्रदान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया नरेन्द्र मोदी के लिए की जा रही है इसलिए नरेन्द्र मोदी “सम्प्रदान कारक” हुआ।

5] अपादान = किसी वस्तु के दूसरी वस्तु से अलग होने की क्रिया में जो वस्तु स्थिर रहती है उसे ही “अपादान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प पेड़ से फल तोड़ता है” – पेड़ से फल अलग हो रहा है किन्तु पेड़ स्थिर है, इसलिए स्थिर वस्तु “पेड़” “अपादान” हुआ।

6) *सम्बन्ध = इसे कारकों में नहीं गिना जाता क्योंकि क्रिया के सम्पादन में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। कल इसके विषय में बताया था, आपको याद होगा।

7] अधिकरण = क्रिया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है उस स्थान को “अधिकरण” कारक कहा जाता है। “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “बाग में” हो रही है इसलिए “बाग” “अधिकरण” कारक हआ।

सम्बन्ध को मिलाकर ये कुल सात चीजें हो गईं। विभक्तियाँ भी सात ही होती हैं। इन सातों के लिए अलग-अलग एक-एक विभक्ति निर्धारित कर दी गई है। देखिए-

1] कर्त्ता = प्रथमा विभक्ति
2] कर्म = द्वितीया ”
3] करण = तृतीया ”
4] सम्प्रदान = चतुर्थी ”
5] अपादान = पञ्चमी ”
6] सम्बन्ध = षष्ठी ”
7] अधिकरण = सप्तमी ”

*सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति ही होती है किन्तु शब्द के रूप में प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। जैसे – रामः = हे राम ! (विसर्ग लुप्त हो गये)।
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कल हमने आपको एक बहुत सुंदर श्लोक बताया था-

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय ॥

इसमें “राम” शब्द के एकवचन में सभी विभक्तियों का प्रयोग किया गया है । देखिए –

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
2] रामं रमेशं भजे।
3] रामेण अभिहता निशाचरचमू।
4] रामाय तस्मै नमः ।
5] रामात् नास्ति परायणं परतरम्।
6] रामस्य दासः अस्मि अहम्।
7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे ।
8] हे राम ! मां पालय ।

कल हम आपको वाक्य में कारक पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना बताएँगे। इससे आपको अभ्यास हो जाएगा। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ भी बताएँगे। आप लोगों को कहीं कोई समस्या हो तो टिप्पणी करके निःसंकोच पूछिएगा। तब तक के लिए नमो नमः !!

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 3

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शब्द सिन्धु

Work


  • कार्यप्रवाह – workflow
  • कार्यभार – workload
  • कार्यक्रमस्वचालन – workflow automation
  • कर्मसारथि – co-worker
  • कर्मकरगण – workforce
  • परिबृंहण – additional work

पाठ १.३


Work Theme

  • अहं आगामिवर्षे करिष्यामि | – Next year, I will work.
  • मम अन्यत् कार्यम् अस्ति| – I have some other work.
  • गृहकार्यं सर्वं समाप्तं वा? – Finished your household work?
  • ममापि बहुनि कार्याणि सन्ति – I have a lot of work to do myself.
अहं पठामि में पढ़ता हूँ
त्वं पठसि तू पढ़ता है
स: पठति वह पढ़ता है
अहं खादामि में खाता हूँ
त्वं खादसि तू खाता है
स: खादति वह खाता है
अहं पश्यामि में देखता हूँ
त्वं पश्यसि तू देखता है
स: पश्यति वह देखता है
  • अहं वाणिज्यशास्त्रं पठामि|
  • नवमकक्श्यायां पठामि|
  • संस्कृतं पठामि|
  • त्वं प्रातः किं खादसि?
  • त्वं फलानि अपि खादसि?
  • पुनः कदाचित् पश्यामि (Meet you again)
  • मासे कति चित्राणि पश्यति? – How often do you go to films in a month?

 

Bookish..

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सुभाषित


विवेक-चूड़ामणि

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटीभि:।।11।।

Work leads to purification of the mind, not to perception of the Reality. The realisation of Truth is brought about by discrimination and not in the least by ten million of acts.

कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तुपलब्धि (तत्वदृष्टि) – के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता।


पठन/मनन


Following excerpt is from Kathak griha sutra. It is commenraty by Devapala on first Sun sighting Sanskar for newborn. Try to interpret it by self.

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KathakGrihasutra

 

 

 

संस्कृत साधना : पाठ १८ (तिङन्त-प्रकरण ४ :: विशेष नियम)

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नमस्कार मित्रों !
पिछले पाठ में आपने लट् लकार के प्रयोग सम्बन्धी नियम जाने। ‘भू’ धातु के लट् लकार में बनने वाले रूपों को जाना और उनका वाक्यों में अभ्यास भी किया। स्मरण करा दूँ कि “अनभ्यासे विषं विद्या” अभ्यास न करने पर विद्या विष का काम करती है। आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों ? मान लीजिये कि आप किसी सभा या गोष्ठी में बैठे हैं और सम्बन्धित विद्या का प्रसंग चल गया और आप अनभ्यास के कारण उसमें भ्रमित हो गये, तो बिना अपमानित हुए न बचेंगे। और “सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।” अकीर्ति या अपमान मरण से भी बढ़कर है। अतः अनभ्यास में विद्या हो गयी न विष के समान ! अतः अभ्यास बहुत आवश्यक है। मैंने एक श्लोक आपको बताया था-
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥

इस श्लोक को आप ठीक से स्मरण रखिए। वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त होने वाले लट् लकार के विषय में बता दिया गया। लेट् लकार केवल और केवल वेद में ही पाया जाता है अतः उसके विषय में नहीं बतायेंगे। जब कभी वैदिक व्याकरण सिखायेंगे तब उसके विषय में विस्तार से समझायेंगे। अब भूतकाल के लिए प्रयुक्त होने वाले लकारों के विषय में समझाते हैं। भूतकाल के लिए तीन लकार प्रयुक्त होते हैं- “भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा” सबसे पहला है लुङ् लकार, इसी के विषय में आज चर्चा करते हैं। सामान्य रूप से आप भूतकाल के लिए इन तीनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष नियम जान लीजिए जिससे भाषा में उत्कृष्टता आ जाएगी। संस्कृत में हलन्त, अनुस्वार और विसर्ग पर विशेष ध्यान देना है।

भू (होना), लुङ् लकार

अभूत् (वह हुआ)/ अभूताम् (वे दो हुए) /अभूवन् (वे सब हुए)
अभूः (तू हुआ)/ अभूतम् ( तुम दो हुए)/ अभूत (तुम सब हुए)
अभूवम् (मैं हुआ)/ अभूव (हम दो हुए)/ अभूम (हम सब हुए)

लुङ् लकार के विषय में निम्नलिखित नियम स्मरण रखिए –

१) सबसे पहली बात तो यह स्मरण रखिए कि लुङ् लकार का प्रयोग ‘सामान्य भूतकाल’ के लिए होता है। ‘सामान्य भूतकाल’ का अर्थ है कि जब भूतकाल के साथ ‘कल’ ‘परसों’ आदि विशेषण न लगे हों। बोलने वाला व्यक्ति चाहे अपना अनुभव बता रहा हो अथवा किसी अन्य व्यक्ति का, अभी बीते हुए का वर्णन हो या पहले बीते हुए का, सभी जगह लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है। भले ही घटना साल भर पहले की हो किन्तु यदि कोई विशेषण नहीं लगा है तो लुङ् लकार का ही प्रयोग होगा।

२) ‘आज गया’ , ‘आज पढ़ा’ , ‘आज हुआ’ आदि अद्यतन (आज वाले) भूतकाल के लिए भी लुङ् लकार का ही प्रयोग करना है, लङ् या लिट् का नहीं।

३) लुङ् लकार के रूप के साथ यदि ‘माङ्’ अव्यय ( मा शब्द ) लगा दें तो उसका अर्थ निषेधात्मक हो जाता है और तब इसका प्रयोग भूतकाल के लिए नहीं अपितु ‘आज्ञा’ या ‘विधि’ अर्थ हो जाता है, जैसे – ” दुःखी मत होओ” = “खिन्नः मा भूः” । एक बात ध्यान रखनी है कि जब माङ् का प्रयोग करेंगे तो लुङ् लकार के रूप के अकार का लोप हो जाएगा। अभूत् – मा भूत्, अभूः – मा भूः ।
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शब्दकोश :
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‘सन्तान’ के पर्यायवाची शब्द –

१) सन्तानः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग में)
२) अपत्यम् ( नपुंसकलिंग )
३) तोकम् ( नपुंसकलिंग )

‘देह’ (शरीर) के पर्यायवाची शब्द –

१) कलेवरम् ( नपुंसकलिंग )
२) गात्रम् ( नपुंसकलिंग )
३) वपुष् ( नपुंसकलिंग )
४) संहननम् ( नपुंसकलिंग )
५) शरीरम् ( नपुंसकलिंग )
६) वर्ष्मन् ( नपुंसकलिंग )
७) विग्रहः ( पुँल्लिंग )
८) कायः ( पुँल्लिंग )
९) देहः ( पुँल्लिंग और नपुंसकलिंग (देहम्) )
१०) मूर्तिः ( स्त्रीलिंग )
११) तनुः ( स्त्रीलिंग )
१२) तनूः ( स्त्रीलिंग )

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वाक्य अभ्यास :
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तुम्हारे घर सन्तान हुई।
= तव गृहे सन्तानः अभूत्।

महान् उत्सव हुआ।
= महान् उत्सवः अभूत्।

तुम्हारे माता और पिता आनन्दित हुए।
= तव माता च पिता च आनन्दितौ अभूताम्।

सभी आनन्दमग्न हो गए।
= सर्वे आनन्दमग्नाः अभूवन्।

तुम भी प्रसन्न हुए।
= त्वम् अपि प्रसन्नः अभूः।

तुम दोनों बहुत आनन्दित हुए।
= युवां भूरि आनन्दितौ अभूतम्।

तुम सब थकित हो गये थे।
= यूयं श्रान्ताः अभूत ।

मैं भी थकित हो गया था।
= अहम् अपि श्रान्तः अभूवम्।

हम दोनों उत्सव से हर्षित हुए।
= आवाम् उत्सवेन हर्षितौ अभूव।

हम सब आनन्दित हुए।
= वयम् आनन्दिताः अभूम।
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श्लोक :
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गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥

चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, न चलता हुआ गरुड भी एक पग नहीं जाता । इसलिए चलते रहो।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ३४ (आत्मनेपदी धातुएँ)

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#संस्कृतशिक्षण – 34 [आत्मनेपदी धातुएँ]

प्रियसंस्कृतमित्राणि नमो नमः!
गीर्वाणवाणी की उपासना में आपने अभी तक कारक विभक्तियों, विशेष्य विशेषण, सर्वनाम विशेषण, अकर्मक सकर्मक क्रियाओं, दसों लकारों इत्यादि के विषय में जाना है और अभ्यास भी किया है। यदि आपने निष्ठापूर्वक अभ्यास किया होगा तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत की वाक्यरचना से आपका पूर्ण परिचय हो गया होगा। छात्र भी धनुर्वेद सीखने वाले योद्धा की भाँति होता है, जैसे ‘वशिष्ठधनुर्वेद’ नामक ग्रन्थ में उसके लिए परिश्रम की ही प्रशंसा की गई है, वैसे ही आपको भी अभ्यास में परिश्रम करना चाहिए-

श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः।
तस्माद् गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता॥

श्रम से ही अद्भुत योद्धा बना जा सकता है, श्रम से ही विजय प्राप्त होती है, इसलिए सिद्धान्तों को जानते हुए, गुरु के समक्ष ही अभ्यास करना चाहिए।( सौवाँ श्लोक)

1) आपको स्मरण होगा कि प्रारम्भिक पाठों में हमने बताया था कि जब ‘भू’ आदि धातुओं से भवति भवतः भवन्ति आदि क्रियापद बनाते हैं तो उनमें ‘तिङ्’ प्रत्यय जोड़कर ही ये रूप बनते हैं।

2) उन तिङ् प्रत्ययों में से पहले नौ प्रत्यय ‘परस्मैपदी’ कहे जाते हैं और अन्तिम नौ प्रत्यय ‘आत्मनेपदी’। यह परस्मैपद और आत्मनेपद महर्षि पाणिनि जी के द्वारा बनाये गये पारिभाषिक शब्द हैं। जैसे पाण्डु के सभी पुत्रों को ‘पाण्डव’ कहकर काम चला लिया जाता है वैसे ही परस्मैपद और आत्मनेपद कहकर नौ नौ प्रत्ययों का नाम ले लिया जाता है, अलग अलग अट्ठारहों प्रत्यय नहीं गिनाना पड़ता।

3) परस्मैपद प्रत्ययों के जुड़ने पर जिस प्रकार के रूप बनते हैं वह आपने भू धातु के अभ्यास से जान लिया। भू धातु परस्मैपदी होती है, अतः उसमें परस्मैपद प्रत्यय तिप् तस् झि आदि जुड़े। अब एक धातु आत्मनेपदी बतायेंगे। उसके रूप किस प्रकार से चलते हैं यह आप देख लीजिएगा। ऊपर जो वशिष्ठधनुर्वेद से श्लोक उद्धृत किया है, उसमें ‘प्राप्यते’ क्रियापद आत्मनेपदी है। आत्मनेपद प्रत्यय देख लीजिए –

त आताम् झ
थास् आथाम् ध्वम्
इट् वहि महिङ्

जब किसी धातु में इन्हें जोड़ते हैं तो इनमें कुछ परिवर्तन हो जाता है, देखिए ये इस प्रकार हो जाते हैं-

अते एते अन्ते
असे एथे अध्वे
ए आवहे आमहे

मुद् हर्षे (प्रसन्न होना) धातु, आत्मनेपदी

लट् लकार

मोदते मोदेते मोदन्ते
मोदसे मोदेथे मोदध्वे
मोदे मोदावहे मोदामहे

लुङ् लकार

अमोदिष्ट अमोदिषाताम् अमोदिषत
अमोदिष्ठाः अमोदिषाथाम् अमोदिध्वम्
अमोदिषि अमोदिष्वहि अमोदिष्महि

लङ् लकार

अमोदत अमोदेताम् अमोदन्त
अमोदथाः अमोदेथाम् अमोदध्वम्
अमोदे अमोदावहि अमोदामहि

लिट् लकार (केवल प्रथम पुरुष)

मुमुदे मुमुदाते मुमुदिरे

आपको लगता होगा कि हे भगवान् इतने सारे क्लिष्ट उच्चारण वाले रूप कैसे और कितने सारे याद करने पड़ेंगे ? तो डरिये मत ! मा भैषीः ! आपको किसी एक प्रतिनिधि धातु के रूप किसी प्रकार याद कर डालने हैं बाकी सभी आत्मनेपदी धातुओं के रूप इसी प्रकार चलेंगे। यदि आप प्रत्येक रूप पर आधारित कम से कम एक दो वाक्य बनाकर अभ्यास कर डालें तो ये शीघ्र याद हो जाएँगे। फिर तो आपको आनन्द ही आनन्द आयेगा।

4) आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह कैसे पता चलेगा कि कौन सी धातु परस्मैपदी है और कौन सी आत्मनेपदी अथवा उभयपदी ? तो यह पता चलता है धातुपाठ को पढ़ने से। उभयपदी धातुएँ वे होती हैं जिनके रूप दोनों प्रकार से चलते हैं। अगले पाठों में धातुओं के विषय में यह सब निर्देश कर दिया करेंगे।

5) आगे के पाठों में हम केवल रूपों का संकेत मात्र कर दिया करेंगे, उसी प्रकार से बहुत सी धातुओं के रूप चलेंगे।
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वाक्य अभ्यास :
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बच्चे लड्डुओं से प्रसन्न होते हैं।
= बालकाः मोदकैः मोदन्ते।

मैं सेवइयों से प्रसन्न होता हूँ।
= अहं सूत्रिकाभिः मोदे।

तुम किससे प्रसन्न होते हो ?
= त्वं केन मोदसे ?

मुझे देखकर तुम प्रसन्न हुए थे।
= मां दृष्ट्वा त्वम् अमोदिष्ठाः।

मैं भी प्रसन्न हुआ था।
= अहम् अपि अमोदिषि।

वे भी मेरे आगमन से प्रसन्न हुए थे।
= ते अपि मम आगमनेन अमोदिषत।

कल बच्चों का खेल देखकर तुम क्यों प्रसन्न नहीं हुए ?
= ह्यः खेलां दृष्ट्वा त्वं कथं न अमोदथाः ?

मैं तो कल बहुत प्रसन्न हुआ था।
= अहं तु ह्यः बहु अमोदे।

वे बच्चे भी कल बहुत प्रसन्न हुए थे।
= ते बालकाः अपि ह्यः बहु अमोदन्त।

हनुमान् को देखकर सीता प्रसन्न हुईं।
= हनूमन्तं दृष्ट्वा सीता मुमुदे।

राम और लक्ष्मण को देखकर ऋषि प्रसन्न हुए।
= रामं लक्ष्मणं दृष्ट्वा ऋषयः मुमुदिरे।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत गोवीथि : : गव्य २७ (साहित्य विशेष)

Gavya27

तीक्ष्णा नारुन्तुदा बुद्धिः कर्म शान्तं प्रतापयत्‌ ।

सत्पुरुषोकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है किन्तु शस्त्रोंकी भांति मर्मभेदिनी नहीं होती| उसका कार्य तेजोयुक्त होने से शत्रुको भयप्रद करता है पर शांत गुणके साथ|

शिशुपालवध & न्यायदर्शन

न्यायका व्यापक अर्थ विविध प्रमाणोंसे वस्तुतत्त्वकी परीक्षा करना है| महाकवि माघ अपने काव्य में न्यायका यत्र तत्र वर्ना करते दिखे है|

For example:

चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्।
विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि॥

अर्थात दूर से नारदजी आ रहे थे। पहले तो समझा कि कोई तेजः पुंज आ रहा है; फिर आकृति का भान होने पर मालूम हुआ कि कोई शरीरी है। उसके पश्चात अवयव-विभाग की प्रतीति होने पर जाना कि कोई पुरुष है और फिर क्रमशः निश्चय हुआ कि नारदजी हैं।

कवि माघने प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रक्रियामे निर्विकल्पकज्ञान एवं सविकल्पकज्ञानका संकेत किया है|

करपात्रीजी महाराजने अच्छा समजया है|

“नारद जी महाराज आ रहे थे आकश मार्ग से। यदुवंशियों की सुधर्मा सभा में भगवान कृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द विराजमान थे। बलराम जी विराजमान थे। उन्होंने देखा कि कोई तेजः पुंज अवतरित हो रहा था। कुछ समीप आने पर उन्होंने कोई शरीर समझा। जब अवयवों का पृथक-पृथक कुछ उन्मेष हुआ तो कहा-कोई पुमान-पुरुष आ रहा है और समीप आने पर उन्होंने कहा- ‘ये तो देवर्षि नारद जी आ रहे हैं’।
इस तरह दूर से तेजः पुंज का दर्शन हुआ, नजदीक से शरीरी पुमान का बोध हुआ। अत्यन्त समीप से साक्षात नारद का बोध हुआ। इसी तरह जो तत्त्व से सुदूर हैं वे ब्रह्म ही समझते हैं, केवल प्रकाश रूप समझते हैं भक्त लोग कहते हैं, ब्रह्म क्या है राधा रानी के नूपुर का जो प्रकाश है, वही ब्रह्म है। मौजी हैं। रसिकों का मौज है, रसास्वादन है। हाँ तो जो अत्यन्त दूरस्थ हैं, उन्हें चिन्मय-बोधमय-अखण्ड बोधस्वरूप भगवान भासित होते हैं। जो कुछ नजदीक आते हैं उनके लिए वही केवल बोधरूप नहीं हैं किन्तु सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकतादि अनेक गुणों से विशिष्ट हैं। जो और नजदीक आते हैं वे कहते हैं- ओ हो हो! अचिन्त्य-अनन्त अखण्ड-कल्याणगुणगणोपेत अनन्तकन्दर्पदमनपटीयान भगवान् हैं। हम लोग इसका रस लेते हैं। आनन्द लेते हैं। लेकिन संकेत मात्र कर देते हैं। लक्षण ऐक्य होने से वस्तु का ऐक्य होता है, नाम के अनेकत्व होने से वस्तु का अनेकत्व नहीं होता। लक्षण एक है तो लक्ष्य एक है। यहाँ लक्षण तो एक है- ‘अद्वयं यज्ज्ञानं तदेव तत्त्वम्’ केवल नाम ही तीन हैं। नाम भेद से वस्तु भेद माने तो नाम तो तीन हैं, एतावता वस्तु भी तीन सिद्ध होगी। फिर तो लक्षण भी तीन ही कहना चाहिए। यदि अलग-अलग लक्षण नहीं है एक ही लक्षण है- ‘अद्वयं यज्ज्ञानं तदेव तत्त्वम्’ तो खाली ‘ब्रह्मेति-परमात्मेति, भगवानिति’ नाम मात्र से उसका पार्थक्य कैसे हो जायगा? सजातीय-विजातीय-स्वगत भेद रहित, स्वप्रकाश, नित्य-विज्ञान को ही तत्त्व कहा है। वेदों का महान तात्पर्य ब्रह्म ही में है और वही सब तरह से सर्वोंत्कृष्ट है।” – भागवतसुधा – pg १२४

दूर वस्तुका निरवयज्ञान

निकट आने पर सावयवयज्ञान

क्रमिक ज्ञानसे निश्चयात्मक ज्ञान हो गया!


शब्द सिन्धु


पंक (pa.nka) = mud
पंगु (pa.ngu) = cripple
पंच (pa.ncha) = five
पंचत्वंगं (pa.nchatva.ngaM) = to die
पंचमः (pa.nchamaH) = (Masc.Nom.S)the fifth
पंडितः (pa.nDitaH) = (Masc.nom.Sing.)learned person
पंथा (pa.nthaa) = way
पंथाः (pa.nthaaH) = (masc.Nom.Sing.) path; way
पंथानः (pa.nthaanaH) = ways; paths
पक्वं (pakvaM) = ripe
पक्षवाद्यं (pakShavaadyaM) = (n) pakhaavaj
पङ्क (pa.nka) = mud
पङ्क्ति (pa.nkti) = spectrum
पङ्क्तिदर्शी (pa.nktidarshii) = spectroscope
पङ्क्तिमापी (pa.nktimaapii) = spectrometer
पङ्क्तिलेखा (pa.nktilekhaa) = spectrograph
पचति (pachati) = (1 pp) to cook
पचन्ति (pachanti) = prepare food
पचामि (pachaami) = I digest
पच्यन्ते (pachyante) = are cooked?
पञ्च (paJNcha) = five
पञ्चमं (paJNchamaM) = the fifth
पट (paTa) = spectrogram
पटगृहम् (paTagRiham.h) = (n) a tent
पटु (paTu) = (adj) skilled, clever
पठ् (paTh.h) = to read
पठनं (paThanaM) = reading
पठनीया (paThaniiyaa) = should be read
पठामि (paThaami) = read
पठित्वा (paThitvaa) = after reading
पठेत् (paThet.h) = may read
पण (paNa) = Play
पणन (paNana) = bargain
पणनयोग्य (paNanayogya) = marketable
पणनयोग्यता (paNanayogyataa) = marketability
पणवानक (paNavaanaka) = small drums and kettledrums
पण्डित (paNDita) = learned man
पण्डितं (paNDitaM) = learned
पण्डिताः (paNDitaaH) = the learned
पण्दित (paNdita) = the wise man
पत् (pat.h) = to fall
पतग (pataga) = Bird
पतङ्गाः (pata.ngaaH) = moths
पतति (patati) = (1 pp) to fall
पतत्रिन् (patatrin.h) = bird
पतन (patana) = falling
पतन्ति (patanti) = fall down
पतये (pataye) = husband
पति (pati) = husband
पतिगृहं (patigRihaM) = (Nr.Acc.sing.) husband’s house
पतितं (patitaM) = fallen (past part.)
पतिरेक (patireka) = He is the One Lord


पाठ


1 2 3


सुभाषित


अप्रधान: प्रधान: स्यात् पार्थिवं यदि सेवते।
प्रधानोऽप्यप्रधान: स्याद् यदि सेवाविवर्जित:॥

An unimportant person becomes important, as soon as he is employed by a prince (and) an important person becomes unimportant as soon as he is unemployed.


पठन/स्मरण


 

शिशुपालवधम्/सप्तमः सर्गः

 

अनुगिरमृतुभिर्वितायमानामथ स विलोकयितुं वनान्तलक्ष्मीं ।
निरगमदभिराद्धुमदृतानां भवति महत्सु न निष्फलः प्रयासः ।। ७.१ ।।

दधति सुमनसो वनानि बह्वीर्युवतियुता यदवः प्रयातुमीषुः ।
मनसिमहास्त्रमन्यथामी न कुसुमपञ्चकमलं विसोढुं ।। ७.२ ।।

अवसमधिगम्य तं हरन्तयो हृदयमयत्नकृतोज्वलस्वरूपाः ।
अवनिषु पदमङ्गनास्तदानीं न्यदधत विभ्रमसम्पदोऽङगनासु ।। ७.३ ।।

नखरुचिरचिन्द्रचापं ललितगतेषु गतागतं दधाना ।
मुखरितवलयं पृथौ नितम्बे भुजलतिका मुहुरस्खलत्तरुण्याः ।। ७.४ ।।

अतियपरिणाह्ववान्वितेने बहुतरमर्पितकिङ्किणीकः ।
अलघुनि जघनस्थलेऽपरस्या ध्वनिमधिकं कलमेखलाकलापः ।। ७.५ ।।

गुरुनिबिडनितम्बबिम्बभाराक्रमणनिपीडितमङ्गनाजनस्य ।
चरणयुगमसुस्रुवत्पदेषु स्वरसमसक्तमलक्तकच्छलेन ।। ७.६ ।।

तव सपदि समीपमानये तामहमिति तस्य मयाग्रतोऽभ्यधायि ।
अतिरभसाकृतालघुप्रतिज्ञामनृतगिरं गुणगौरि मा कृथा मां ।। ७.७ ।।

न च सुतनु न वेद्मि यन्महीयानसुनिरसस्तव निश्चयः परेण ।
वितथयति न जानातु मद्वचोऽसाविति च तथापि सखीषु मेऽभिमानः ।। ७.८ ।।

सततमनभिभाषणं मया ते परिणमितं भवतीमनानयन्तया ।
त्वयि तदिति विरोधनिश्चितायां भवति भवत्वसुहृज्जनः सकामः ।। ७.९ ।।

गतधृतिरवलम्बितुं बतासूननलमनालपनादहं भवत्याः ।
प्रणयति यदि न प्रसादबुद्धिर्भव मम मानिनि जीविते दयालुः ।। ७.१० ।।

प्रियमिति वनिता नितान्तमागःस्मरणसरोषषकषायिताक्षी ।
चरणगतसखीवचोऽनुरोधात्किल कथमप्यनुकूलयाञ्चकार ।। ७.११ ।।

द्रुतपदमिति मा वयस्य यासिर्ननु सुतनुं परिपालयानुयान्तीं ।
नहि न विदितखेदमेदतीयस्तनजघनोद्वहने तवापि चेतः ।। ७.१२ ।।

इति वदति सखीजनेऽनुरागाद्दयिततमामपरश्चिरं प्रतीक्ष्य ।
तदनुगमवशादनायतानि न्यधित मिमान इवावनिं पदानि ।। ७.१३ ।।

यदि मयि लघिमानमागतायां तव धृतिरस्ति गतास्मि सम्प्रतीयं ।
द्रुततरपदपातमापपात प्रियमिति कोपपदेन कापि संख्या ।। ७.१४ ।।

अविरलपुलकः सह व्रजन्त्याः प्रतिपदमेकतरः स्तनस्तरुण्याः ।
घटितविघटितः प्रियस्य वक्षस्तटभुवि कन्दुकविभ्रमं बभार ।। ७.१५ ।।

अशिथिलमपरावसज्य कण्ठे दृढपरिरब्धबृहद्बहिस्तनेन ।
हृषिततनुरुहा भुजेन भर्तृर्मृदुममृदु व्यतिविद्धमेकबाहुं ।। ७.१६ ।।

मुहुरसुसममाध्नती नितान्तं प्रणदितकाञ्चि नितम्बमण्डलेन ।
विषमितपृथुहारयष्टि तिर्यक्कुचमितरं तदुरस्थले निपीड्य ।। ७.१७ ।।

गुरुतरकलनूपुरानुनादं सललितनर्तितवामपादपद्मा ।
इतरदतिलोलमादधाना पदमथ मन्मथमन्थरं जगाम ।। ७.१८ ।।

लधुललितपदं तदंसपीठद्वयनिहितोभयपाणिपल्लवान्या ।
सकठिनकुचचूचुकप्रणोदं प्रियमबला सविलासमन्विनाय ।। ७.१९ ।।

जघनमेलघपीवरोरु कृच्छ्रादुरुनिबिरीसनितम्बभारखेदि ।
दयिततमशिरोधरावलम्बिस्वभुजलताविभवेन काचिदूहे ।। ७.२० ।।

अनुवपुरपरेण बाहुमूलप्रहितभुजाकलितस्तनेन निन्ये ।
निहितदशनवाससा कपोले विषमवितीर्णपदं बलादिवान्या ।। ७.२१ ।।

अनुवनमसितभ्रुवः सखीभिः सह पदवीमपरः पुरोगतायाः ।
उरसि सरसरागपदलेखाप्रतिमतयानुययावसंशयानः ।। ७.२२ ।।
मदनरसमहौघपूर्णनाभीह्रदपरिवाहितर्ॐअराजयस्ताः ।
सरित इव सविभ्रमप्रयातप्रणदितहंसकभूषणा विरेजुः ।। ७.२३ ।।

श्रुतिपथमधुराणि सारसानामनुनदि सुश्रुविरे रुतानि ताभिः ।
विदधति जनतामनःशरव्यव्यधपटुमन्मथचापनादशङ्कां ।। ७.२४ ।।

मधुमथनवधूरिवाह्वयन्ति भ्रमरकुलानि जगुर्यदुत्सुकानि ।
तदभिनयमिवावलिर्वनानामतनुत नूतनपल्लवाङुगुलीभिः ।। ७.२५ ।।

असकलकलिकाकुलीकृतालिस्खलनविकीर्णविकासिकेशराणां ।
मरुदवनिरुहां रजो वधूभ्यः मुपहरन्विचकार कोरकाणि ।। ७.२६ ।।

उपवनपवनानुपातदक्षैरलिभिरलाभि यदङ्गनाजनस्य ।
परिमलविषयस्तदुन्नतानामनुगमने खलु सम्पदोऽग्रतःस्थाः ।। ७.२७ ।।

रथचरणधराङ्गनाकराब्जव्यतिकरसम्पदुपात्तस्ॐअनस्याः ।
जगति सुमनसस्तदादि नूनं दधति परिस्फुटमर्थतोऽभिधानं ।। ७.२८ ।।

अभिमुखपतितैर्गुणप्रकर्षादवजितमुद्धतिमुज्वलां दधानैः ।
तरुकिसलयजालमग्रहस्तैः प्रसभमनीयत भङ्गमङ्गनानां ।। ७.२९ ।।

मुदितमधुभुजो भुजेन शाखाश्चलितविशृङ्खलशङ्खकं धुवत्याः ।
तरुरतिशायितापराङ्गनायाः शिरसि मुदेव मुमोच पुष्पवर्षं ।। ७.३० ।।

संस्कृत गोवीथी : गव्य 1

Gavya_1


शब्द सागर


  • गोवीथी – cow-path, that portion of the moon’s path which contains the asterisms Bhadra-padā, Revatī, andᅠ Aṡvinī (orᅠ according to others, Hasta, Citrā, andᅠ Svātī)
  • गव्य – That which belongs to cow, that is which suits to cows, that which is received from cow

पाठ १.१


शब्द

  • सः
  • त्वम्
  • अहम्
  • गच्छति
  • गच्छसि
  • गच्छामि

वाक्य

  • अहं गच्छामि |
  • त्वं गच्छसि |
  • स: गच्छति |

सुभाषित

Memorize


पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः ।
न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः ॥

 


गीता पाठ

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मूल श्लोकः

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।

English Commentary By Swami Sivananda


1.1 धर्मक्षेत्रे on the holy plain? कुरुक्षेत्रे in Kurukshetra? समवेताः assembled together? युयुत्सवः desirous to fight? मामकाः my people? पाण्डवाः the sons of Pandu? च and? एव also? किम् what? अकुर्वत did do? सञ्जय O Sanjaya.

Commentary Dharmakshetra — that place which protects Dharma is Dharmakshetra. Because it was in the land of the Kurus? it was called Kurukshetra.

Sanjaya is one who has conered likes and dislikes and who is impartial.

Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta


।।1.1।।धर्मक्षेत्र इति। अत्र केचित् व्याख्याविकल्पमाहुः कुरूणां करणानां यत् क्षेत्रमनुग्राहकं अतएव सांसारिकधर्माणां (S सांसारिकत्वधर्माणां) सर्वेषां क्षेत्रम् उत्पत्तिनिमित्तत्वात्। अयं स परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् (या. स्मृ. I 8) इत्यस्य च धर्मस्य क्षेत्रम् समस्तधर्माणां क्षयात् अपवर्गप्राप्त्या त्राणभूतं तदधिकारिशरीरम्। सर्वक्षत्राणां क्षदेः हिंसार्थत्वात् परस्परं वध्यघातकभावेन (S परस्परवध्य ) वर्तमानानां रागवैराग्यक्रोधक्षमाप्रभृतीनां समागमो यत्र तस्मिन् स्थिता ये मामका अविद्यापुरुषोचिता अविद्यामयाः संकल्पाः पाण्डवाः शुद्धविद्यापुरुषोचिता विद्यात्मानः ते किमकुर्वत कैः खलु के जिताः इति। मामकः अविद्यापुरुषः पाण्डुः शुद्धः।

Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas

1।।व्याख्या धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे कुरुक्षेत्रमें देवताओंने यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है।

यहाँ धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे पदोंमें क्षेत्र शब्द देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है प्रत्युत तीर्थभूमि भी है जिसमें प्राणी जीतेजी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये यह भूमि चुनी गयी है।

संसारमें प्रायः तीन बातोंको लेकर लड़ाई होती है भूमि धन और स्त्री। इस तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ कुरुक्षेत्रे पद देनेका तात्पर्य भी जमीनको लेकर ल़ड़नेमें है। कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात् राजा कुरुकी जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवों द्वारा पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके लिये लड़ाई करने आये हुए हैं।

यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये कुरुक्षेत्रे पद देना युक्तिसंगत न्यायसंगत है तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही होता है। युद्धजैसा कार्य भी धर्मभूमि तीर्थभूमिमें ही करते हैं जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ धर्मक्षेत्रे पद आया है।

यहाँ आरम्भ में धर्म पदसे एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भके धर्म पदमेंसे धर् लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके मम पदोंसे लिया जाय तो धर्म शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है अर्थात् धर्मका पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेसे धर्मका अनुष्ठान हो जाता है।

इन धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे पदोंसे सभी मनुष्योंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये केवल अपने सुखआरामकी दृष्टिसे नहीं और कर्तव्यअकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता 16। 24)।

समवेता युयुत्सवः राजाओंके द्वारा बारबार सन्धिका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्धके मैं तीखी सूईकी नोकजितनी जमीन भी पाण्डवोंको नहीं दूँगा। (टिप्पणी प0 2.1) तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं।

दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्यप्राप्तिका ही था। वह राज्यप्राप्ति धर्मसे हो चाहे अधर्मसे न्यायसे हो चाहे अन्यायसे विहित रीतिसे हो चाहे निषिद्ध रीतिसे किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना चाहिये ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात् युद्धकी इच्छावाला था।

पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवननिर्वाह कर लेंगे पर अपने धर्ममें बाधा नहीं आने देंगे धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु जिस माँकी आज्ञासे युधिष्ठिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे विवाह किया था उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी (टिप्पणी प0 2.2) अर्थात् केवल माँके आज्ञापालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुये हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही युयुत्सु थे पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे।

मामकाः पाण्डवाश्चैव पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचितअनुचितका विचार न करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ मामकाः पदके अन्तर्गत कौरव (टिप्पणी प0 3.1) और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी पाण्डवाः पद अलग देनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमें समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे पर पाण्डवोंको अपना नहीं मानते थे। (टिप्पणी प0 3.2) इस कारण उन्होंने अपने पुत्रोंके लिये मामकाः और पाण्डुपुत्रोंके लिये पाण्डवा पदका प्रयोग किया है क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह अपने घरोंमें मुहल्लोंमें गाँवोंमें प्रान्तोंमें देशोंमें सम्प्रदायोंमें द्वैधीभाव अर्थात् ये अपने हैं ये दूसरे हैं ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है।

यहाँ पाण्डवाः पदके साथ एव पद देनेका तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया

मामकाः और पाण्डवाः (टिप्पणी प0 3.3) इनमेंसे पहले मामकाः पदका उत्तर सञ्जय आगेके (दूसरे) श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेना को देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्यमुख्य सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी सेनाके मुख्यमुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रणकौशल आदिकी प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर कौरवसेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक पाण्डवाः पदका उत्तर देंगे कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय श्रीकृष्णने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन भीम युधिष्ठिर नकुल सहदेव आदिने अपनेअपने शंख बजाये जिससे दुर्योधनकी सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी सञ्जय पाण्डवोंकी बात कहतेकहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका प्रसङ्ग आरम्भ कर देंगे।

किमकुर्वत किम् शब्दके तीन अर्थ होते हैं विकल्प निन्दा (आक्षेप) और प्रश्न।

युद्ध हुआ कि नहीं इस तरहका विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता क्योंकि दस दिनतक युद्ध हो चुका है और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद सञ्जय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना रहे हैं।

मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने यह क्या किया जो कि युद्ध कर बैठे उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता क्योंकि युद्ध तो चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था।

यहाँ किम् शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता है। धृतराष्ट्र सञ्जयसे भिन्नभिन्न प्रकारकी छोटीबड़ी सब

घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीकठीक जाननेके लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।

सम्बन्ध धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर सञ्जय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।

संस्कृत साधना : पाठ १२ (अभ्यास – तद् और एतद्)

Sanskrut_12

अभ्यास :
~~~~~~
तद् और एतद् के रूपों का वाक्यों में प्रयोग। दोनों सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में याद करिये।

तद् = दूर स्थित व्यक्ति-वस्तु
एतद् = समीपस्थ व्यक्ति-वस्तु

शब्दकोश :
~~~~~~~
गृहम् (घर) के पर्यायवाची शब्द –

1] गृहम् (नपुसंकलिंग)
2] गेहम् (नपुसंकलिंग)
3] उदवसितम् (नपुसंकलिंग)
4] वेश्मन् (नपुसंकलिंग)
5] सद्मन् (नपुसंकलिंग)
6] निकेतनम् (नपुसंकलिंग)
7] निशान्तम् (नपुसंकलिंग)
8] पस्त्यम् (नपुसंकलिंग)
9] सदनम् (नपुसंकलिंग)
10] भवनम् (नपुसंकलिंग)
11] आगारम् (नपुसंकलिंग)
12] मन्दिरम् (नपुसंकलिंग और पुँल्लिंग भी)
13] गृहाः (पुँल्लिंग, सदैव बहुवचन में)
14] निकाय्यः (पुँल्लिंग)
15] निलयः (पुँल्लिंग)
16] आलयः (पुँल्लिंग)
_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

उस बालक का नाम अनिरुद्ध है।
= तस्य बालकस्य नाम अनिरुद्धः अस्ति।

उस बालिका का नाम राधिका है।
= तस्याः बालिकायाः नाम राधिका अस्ति।

वे दोनों इस घर में रहते हैं।
= तौ एतस्मिन् भवने निवसतः।

इस बालिका के पिता उस घर में रहते हैं।
= एतस्याः बालिकायाः पिता तस्मिन् गेहे निवसति।

इन दो बालकों को तुम ये फल देते हो।
= एताभ्यां बालकाभ्यां त्वं एतानि फलानि यच्छसि।

इन घरों में वे बालक रहते हैं।
= एतेषु सदनेषु ते बालकाः निवसन्ति।

उस घर में तुम रहते हो, इस घर में मैं रहता हूँ।
= तस्मिन् निलये त्वं वससि, एतस्मिन् निलये अहं वसामि।

यह घर इस बालिका का है।
= एतत् निकेतनम् अस्याः बालिकायाः अस्ति।

ये हमारे घर हैं।
= एते अस्माकं निलयाः सन्ति।

इनमें हम रहते हैं।
= एतेषु वयं निवसामः।

मोहन उस घर से वस्तुएँ लाकर इस घर में रखता है,
= मोहनः तस्मात् गृहात् वस्तूनि नीत्वा एतस्मिन् गृहे स्थापयति,

और इस घर से वस्तुएँ लेकर उस घर में रखता है।
= तथा च एतस्मात् गृहात् वस्तूनि आदाय तस्मिन् गृहे स्थापयति।

मैं इस घर से विद्यालय जाता हूँ, वह उस घर से विद्यालय जाता है।
= अहम् एतस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छामि , सः तस्मात् निलयात् विद्यालयं गच्छति।

इन दो घरों का स्वामी कौन है ?
= एतयोः भवनयोः स्वामी कः अस्ति ?

इस घर से क्या तू राजा हो जाएगा ?
= एतेन गृहेण किं त्वं राजा भविष्यसि वा ?

** इसी प्रकार आप भी तद् और एतद् सर्वनामों के प्रयोग से कम से कम पाँच वाक्य संस्कृत में बनाइये।
_______________________________________

श्लोक :

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनम् आत्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥
एतैः विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैः त्रिभिः नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयः ततः याति परां गतिम्॥
( श्रीमद्भगवद्गीता १६.२१-२२ )

पुस्तक में अर्थ देखें और सर्वनाम शब्दों को ढूँढकर अपनी कॉपी में लिखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 7

Gavya7


शब्द सिन्धु


कवची (kavachii) = with armor
कवयः (kavayaH) = the intelligent
ज्ञायसे (GYaayase) = can to be known
ज्ञास्यसि (GYaasyasi) = you can know
ज्ञेयं (GYeyaM) = be known
ज्ञेयः (GYeyaH) = should be known
ज्ञेयोसि (GYeyosi) = You can be known


पाठ


संधि

1

Apply above simple sandhi rules on below paragraph, wherever you feel applicable.

2व्यवहार वाक्य

  • समय समागत:| – समय पर आ गए|
  • भवन्तं जानामि| – आपको जनता हूँ|
  • तथैव अस्तु| – वैसा ही हो|
  • जानामि भो:| – जानता हूँ|

सुभाषित


शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
सुजनाः न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने ॥ ॥

Not every mountain has gems in it, and not every
elephant is adorned with pearls . Not every forest
is blessed with sandal trees, and good people are
not to be found everywhere.


पठन/मनन


उषा वंदना

http://sanskritdocuments.org/doc_deities_misc/salutedawn.html?lang=sa

उषावंदनम्
   Salutation of the Dawn

अद्य भावय सुदिनम्!
Look to this Day!
जीवभूतः काल एषः । प्राणस्य प्राणः ।
For it is Life, the very Life of Life.
अस्मिन् स्वल्पकाले सत्यमये तव सतः सत्यं तिष्ठति
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence;
विकासानन्देन
The Bliss of Growth,
कर्मश्रिया
The Glory of Action,
सौन्दर्यशोभया ।
The Splendor of Beauty;
ह्यस्तु स्वप्नः ।
For Yesterday is but a Dream,
श्वस्तु आभासः ।
And Tomorrow is only a Vision;
कर्मकुशलतया आचरिते अद्य
But Today well lived makes every
गतदिनानि आनन्दस्वप्नमयानि भवन्ति ।
Yesterday a Dream of Happiness, and every
भाविदिनानि आशाप्रभया ज्वलन्ति ।
Tomorrow a Vision of Hope.
अतः सुदिनं अद्य सम्यक् भावय!
Look well therefore to this Day!
एषा उषाभिवन्दना!
Such is the Salutation of the Dawn.

 

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