Sanskrit

Sanskrit

संस्कृत गोवीथी : गव्य 1

Gavya_1


शब्द सागर


  • गोवीथी – cow-path, that portion of the moon’s path which contains the asterisms Bhadra-padā, Revatī, andᅠ Aṡvinī (orᅠ according to others, Hasta, Citrā, andᅠ Svātī)
  • गव्य – That which belongs to cow, that is which suits to cows, that which is received from cow

पाठ १.१


शब्द

  • सः
  • त्वम्
  • अहम्
  • गच्छति
  • गच्छसि
  • गच्छामि

वाक्य

  • अहं गच्छामि |
  • त्वं गच्छसि |
  • स: गच्छति |

सुभाषित

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पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः ।
न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः ॥

 


गीता पाठ

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मूल श्लोकः

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।

English Commentary By Swami Sivananda


1.1 धर्मक्षेत्रे on the holy plain? कुरुक्षेत्रे in Kurukshetra? समवेताः assembled together? युयुत्सवः desirous to fight? मामकाः my people? पाण्डवाः the sons of Pandu? च and? एव also? किम् what? अकुर्वत did do? सञ्जय O Sanjaya.

Commentary Dharmakshetra — that place which protects Dharma is Dharmakshetra. Because it was in the land of the Kurus? it was called Kurukshetra.

Sanjaya is one who has conered likes and dislikes and who is impartial.

Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta


।।1.1।।धर्मक्षेत्र इति। अत्र केचित् व्याख्याविकल्पमाहुः कुरूणां करणानां यत् क्षेत्रमनुग्राहकं अतएव सांसारिकधर्माणां (S सांसारिकत्वधर्माणां) सर्वेषां क्षेत्रम् उत्पत्तिनिमित्तत्वात्। अयं स परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् (या. स्मृ. I 8) इत्यस्य च धर्मस्य क्षेत्रम् समस्तधर्माणां क्षयात् अपवर्गप्राप्त्या त्राणभूतं तदधिकारिशरीरम्। सर्वक्षत्राणां क्षदेः हिंसार्थत्वात् परस्परं वध्यघातकभावेन (S परस्परवध्य ) वर्तमानानां रागवैराग्यक्रोधक्षमाप्रभृतीनां समागमो यत्र तस्मिन् स्थिता ये मामका अविद्यापुरुषोचिता अविद्यामयाः संकल्पाः पाण्डवाः शुद्धविद्यापुरुषोचिता विद्यात्मानः ते किमकुर्वत कैः खलु के जिताः इति। मामकः अविद्यापुरुषः पाण्डुः शुद्धः।

Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas

1।।व्याख्या धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे कुरुक्षेत्रमें देवताओंने यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है।

यहाँ धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे पदोंमें क्षेत्र शब्द देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है प्रत्युत तीर्थभूमि भी है जिसमें प्राणी जीतेजी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये यह भूमि चुनी गयी है।

संसारमें प्रायः तीन बातोंको लेकर लड़ाई होती है भूमि धन और स्त्री। इस तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ कुरुक्षेत्रे पद देनेका तात्पर्य भी जमीनको लेकर ल़ड़नेमें है। कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात् राजा कुरुकी जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवों द्वारा पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके लिये लड़ाई करने आये हुए हैं।

यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये कुरुक्षेत्रे पद देना युक्तिसंगत न्यायसंगत है तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही होता है। युद्धजैसा कार्य भी धर्मभूमि तीर्थभूमिमें ही करते हैं जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ धर्मक्षेत्रे पद आया है।

यहाँ आरम्भ में धर्म पदसे एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भके धर्म पदमेंसे धर् लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके मम पदोंसे लिया जाय तो धर्म शब्द बन जाता है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है अर्थात् धर्मका पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेसे धर्मका अनुष्ठान हो जाता है।

इन धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे पदोंसे सभी मनुष्योंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये केवल अपने सुखआरामकी दृष्टिसे नहीं और कर्तव्यअकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता 16। 24)।

समवेता युयुत्सवः राजाओंके द्वारा बारबार सन्धिका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्धके मैं तीखी सूईकी नोकजितनी जमीन भी पाण्डवोंको नहीं दूँगा। (टिप्पणी प0 2.1) तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं।

दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्यप्राप्तिका ही था। वह राज्यप्राप्ति धर्मसे हो चाहे अधर्मसे न्यायसे हो चाहे अन्यायसे विहित रीतिसे हो चाहे निषिद्ध रीतिसे किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना चाहिये ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात् युद्धकी इच्छावाला था।

पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवननिर्वाह कर लेंगे पर अपने धर्ममें बाधा नहीं आने देंगे धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु जिस माँकी आज्ञासे युधिष्ठिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे विवाह किया था उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी (टिप्पणी प0 2.2) अर्थात् केवल माँके आज्ञापालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुये हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही युयुत्सु थे पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे।

मामकाः पाण्डवाश्चैव पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचितअनुचितका विचार न करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ मामकाः पदके अन्तर्गत कौरव (टिप्पणी प0 3.1) और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी पाण्डवाः पद अलग देनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमें समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे पर पाण्डवोंको अपना नहीं मानते थे। (टिप्पणी प0 3.2) इस कारण उन्होंने अपने पुत्रोंके लिये मामकाः और पाण्डुपुत्रोंके लिये पाण्डवा पदका प्रयोग किया है क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह अपने घरोंमें मुहल्लोंमें गाँवोंमें प्रान्तोंमें देशोंमें सम्प्रदायोंमें द्वैधीभाव अर्थात् ये अपने हैं ये दूसरे हैं ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम स्नेह नहीं होता प्रत्युत कलह होती है।

यहाँ पाण्डवाः पदके साथ एव पद देनेका तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया

मामकाः और पाण्डवाः (टिप्पणी प0 3.3) इनमेंसे पहले मामकाः पदका उत्तर सञ्जय आगेके (दूसरे) श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेना को देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्यमुख्य सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी सेनाके मुख्यमुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रणकौशल आदिकी प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर कौरवसेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक पाण्डवाः पदका उत्तर देंगे कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय श्रीकृष्णने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन भीम युधिष्ठिर नकुल सहदेव आदिने अपनेअपने शंख बजाये जिससे दुर्योधनकी सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी सञ्जय पाण्डवोंकी बात कहतेकहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका प्रसङ्ग आरम्भ कर देंगे।

किमकुर्वत किम् शब्दके तीन अर्थ होते हैं विकल्प निन्दा (आक्षेप) और प्रश्न।

युद्ध हुआ कि नहीं इस तरहका विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता क्योंकि दस दिनतक युद्ध हो चुका है और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद सञ्जय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना रहे हैं।

मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने यह क्या किया जो कि युद्ध कर बैठे उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता क्योंकि युद्ध तो चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था।

यहाँ किम् शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता है। धृतराष्ट्र सञ्जयसे भिन्नभिन्न प्रकारकी छोटीबड़ी सब

घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीकठीक जाननेके लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।

सम्बन्ध धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर सञ्जय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।

Who is कविम्?

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कविम्?

Kavi

There is a trend started in youth to become KAVI, esp. Hasya Kavi(Stand up peformances). Good change indeed. And when something changes for good/bad, I wonder.

Who is kavi? Who is poet? Person who could write verses out of thoughts in poetic flare? Person who could create momentary vivid imaginations in reader/listener’s mind? Person who could write meaningless songs?

Here is something about the original/ancient usage of word “कवि”

Rigved:

स मातरा सूर्येणा कवीनामवासयद रुजदद्रिं गर्णानः |

सवाधीभिर्र्क्वभिर्वावशान उदुस्रियाणामस्र्जन निदानम || RV 6.32.2

 

Amid the sages, with the Sun he brightened the Parents: glorified, he burst the mountain; And, roaring with the holy-thoughted singers, he loosed the bond that held the beams of Morning.

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पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत |

इन्द्रो विश्वस्यकर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः || RV 1.11.4

 

Crusher of forts, the young, the wise, of strength unmeasured, was he bornSustainer of each sacred rite, Indra, the Thunderer, much-extolled.

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अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृह‌पतिर्युवा |

हव्यवाडू जुह्वास्यः ||

 

जुह्वास्यः……………..जिसका सुख ज्वाला तेज और

कविः…………………क्रान्तदर्शन अर्थात् जिसमें स्थिरता के साथ दृष्‍टि नहीं पड़ती, तथा जो

युवा………………….पदार्थों के साथ मिलने और उनको पृथक पृथक करने

हव्यवाट्……………..होम‌ किये पदार्थों को देशान्तरों में पहुँचाने और

गृहपति………………स्थान तथा उनमें रहने वालों का पालन करने वाला है, उससे

अग्निः……………….यह प्रत्यक्ष रूपवान पदार्थों को जलाने, पृथिवी और सूर्य्यलोक में ठहरनेवाला अग्नि

अग्निना……………..बिजुली से

समिध्यते…………….अच्छी प्रकार प्रकाशित होता है, वह बहुत कामों को सिद्ध करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिये

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कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे। देवममीवचातनम्।। RV 1.12.7

 

Praise Agni in the sacrifice, the Sage whose ways are ever true, The God who driveth grief away.

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त्वेषं वयं रुद्रं यज्ञसाधं वङ्कुं कविमवसे निह्वयामहे ||

 

We call the quick-shining-effecient enabler of works-seer of truth, Rudra, for our protection.

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विश्वायुं विश्ववेदसं होतारं यजतं कविम् । देवासो रण्वमवसे वसूयवो गीर्भी रण्वं वसूयवः RV 1.128.8

 

Agni the Priest they supplicate to grant them wealth: him, dear, most thoughtful, have they made their messenger, him, offering-bearer have they made, Beloved of all, who knoweth all, the Priest, the Holy one, the Sage– Him, Friend, for help, the Gods when they are fain for wealth, him, Friend, with hymns, when fain for wealth.

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कविं पुराणमनुशासितार

मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: ।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप

मादित्यवर्णं तमस: परस्तात् ।।9।। Gita 8.9

जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविधा से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है ।।9।।

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अनन्तं अव्ययं कविं समुद्रेन्तं विश्वशंभुवम् | पद्म कोश प्रतीकाशं हृदयं च अपि अधोमुखम् || – Narayan Sukt

He is the Limitless, Imperishable, Omniscient, residing in the ocean of he heart, the Cause of the happiness of the universe, the Supreme end of all striving, (manifesting Himself) in the ether of the heart which is comparable to an inverted bud of the lotus flower.

कविम् :   Someone who is gifted with insights,intelligence,knowing,enlightened,skillful,sensible,wise,prudent;is thinker and man of understanding.

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Writer writes,re-write and scrap. Poet writes, re-write again and again until thought become pure golden words.

Writer writes for short term impact. Poet writes for long term impact.

Writer writes for mind.Poet writes for heart.

Writer writes for self-interest.Poet writes selflessly.

Writer writes for attention. Poet doesn’t care.

Writer writes for targeted audience based on public demand.Poet writes when he feels like writing.

Writer writes, we read and we forget as time progresses. Poet writes, we read and life changes.

Yardstick is with you. You decide whom would you call “Poet” and whom would you call “Lyricist”,”Writer”,”Rhymer”,”Wordsmith”

संस्कृत गोवीथि : : गव्य ११ (हनुमान विशेष)

Gavya11

 


शब्द सिन्धु


अघंमनः (aghaMmanaH) = (adj) evil-minded
अघं (aghaM) = grievous sins
अघायुः (aghaayuH) = whose life is full of sins
अङ्क (a.nka) = number
अङ्ग (a.nga) = a limb, or body part
अङ्गं (a.ngaM) = limb(s)
अङ्गानि (a.ngaani) = limbs
अङ्गुल (a.ngula) = a finger
अङ्गुष्ठ (a.ngushhTha) = the big toe
अङ्गुष्ठः (a.ngushhThaH) = (m) thumb
अचरं (acharaM) = and not moving
अचरस्य (acharasya) = and nonmoving
अचल (achala) = (adj) still, stationary
अचलं (achalaM) = unmoving
अचलः (achalaH) = immovable
अचलप्रतिष्ठं (achalapratishhThaM) = steadily situated
अचला (achalaa) = unflinching
अचलेन (achalena) = without its being deviated
अचक्षुस् (achakShus.h) = one without an eye
अचापलं (achaapalaM) = determination
अचिन्त्य (achintya) = inconceivable
अचिन्त्यं (achintyaM) = beyond contemplation
अचिन्त्यः (achintyaH) = inconceivable
अचिराद् (achiraad.h) = without delay/in no time
अचिराद्भव (achiraadbhava) = in no time from the cycle of birth\death
अचिरेण (achireNa) = very soon
अचेतसः (achetasaH) = without KRishhNa consciousness
अच्छेद्यः (achchhedyaH) = unbreakable
अच्युत (achyuta) = O infallible one
अच्युतम् (achyutam.h) = the who does not slip
अज (aja) = goat
अजं (ajaM) = unborn
अजः (ajaH) = unborn
अजगरः (ajagaraH) = (m) python
अजपा (ajapaa) = involuntary repetition (as with a mantra)
अजस्रं (ajasraM) = the unborn one
अजा (ajaa) = (f) goat
अजानं (ajaanaM) = do not understand
अजानत् (ajaanat.h) = knew
अजानता (ajaanataa) = without knowing
अजानन्तः (ajaanantaH) = without knowing
अञ्चलः (aJNchalaH) = (m) aanchal in Hindi
अञ्जन (aJNjana) = the name of the mother of Hanuman
अञ्जनेयासन (aJNjaneyaasana) = the splits
अञ्जलि (aJNjali) = (m) folded hands


पाठ


आत्मीयप्रकरणम्

पुस्तक : संस्कृतवाक्यप्रबोधः

तव ज्येष्टो बन्धुर्भगिनी च कास्ति ? तेरा बड़ा भाई और बहिन कौन है ?
देवदत्तस्सुशीला च । देवदत्त और सुशीला ।
भो बन्धो ! अहं पाठाय व्रजामि । हे भाई ! मैं पढने को जाता हूं ।
गच्छ प्रिय ! पूर्णां विद्यां कृत्वागन्तव्यम् । जा प्यारे ! पूरी विद्या करके आना ।
भवतः कन्याः अद्यश्वः किं पठन्ति ? आपकी बेटियां आजकल क्या पढ़ती हैं ?
वर्णोच्चारणशिक्षादिकं दर्शनशास्त्राणि चाधीत्येदानीं धर्मपाकशिल्पगणितविद्या अधीयते । वर्णोच्चारणशिक्षादिक तथा न्याय आदि शास्त्र पढ़कर अब धर्म, पाक, शिल्प और गणितविद्या पढ़ती हैं ।
भवज्ज्येष्ठया भगिन्या किं किमधीतमिदानीञ्च तया किं क्रियते ? आपकी बड़ी बहिन ने क्या-क्या पढ़ा है और अब वह क्या करती है ?
वर्णज्ञानमारभ्य वेदपर्यन्ताः सर्वा विद्या विदित्वेदानीं बालिकाः पाठयति । अक्षराभ्यास से लेके वेद तक सब पूरी विद्या पढ़के अब कन्याओं को पढ़ाया करती है ।
तया विवाहः कृतो न वा ? उसने विवाह किया वा नहीं ?
इदानीं तु न कृतः परन्तु वरं परीक्ष्य स्वयंवरं कर्तुमिच्छति । अभी तो नहीं किया, परन्तु वर की परीक्षा करके स्वयंवर करने की इच्छा करती है ।
यदा कश्चित् स्वतुल्यः पुरुषो मिलिष्यति तदा विवाहं करिष्यति । जब कोई अपने सदृश पुरुष मिलेगा तब विवाह करेगी ।
तव मित्रैरधीतं न वा ? तेरे मित्रों ने पढ़ा है वा नहीं ?
सर्व एव विद्वांसो वर्त्तन्ते यथाऽहं तथैव तेऽपि, समानस्वभावेषु मैत्र्यास्समभवात् । सब ही विद्वान हैं, जैसा मैं हूं वैसे वे भी हैं, क्योंकि तुल्य स्वभाववालों में मित्रता का सम्भव है ।
तव पितृव्यः किं करोति ? तेरा चाचा क्या करता है ?
राज्यव्यवस्थाम् । राज्य का कारवार ।
इमे किं तव मातुलादयः ? ये क्या तेरे मामा आदि हैं ?
बाढमयं मम मातुल इयं पितृष्वसेयं मातृष्वसेयं गुरुपत्‍न्ययं च गुरुः । ठीक यह मेरा मामा, यह बाप की बहिन भूआ, यह मता की बहिन मौसी, यह गुरु की स्त्री और यह गुरु है ।
इदानीमेते कस्मै प्रयोजनायैकत्र मिलिताः ? इस समय ये सब किसलिये मिलकर इक्ट्ठे हुए हैं ?
मया सत्कारायाऽऽहूताः सन्त आगताः । मैंने सत्कार के अर्थ बुलाये हैं सो ये सब आये हैं ।
इमे मे मम पितृश्वश्रूश्वसुरश्यालदयः सन्ति । ये सब मेरे पिता की सास-ससुर और साले आदि हैं ।
इमे मम मित्रस्य स्त्रीभगिनीदुहितृजामातरः सन्ति । ये मेरे मित्र की स्त्री, बहिन, लड़की और जमाई हैं ।
इमौ मम पितुः श्यालदौहित्रौ स्तः । ये मेरे मामा और भानजे हैं ।

 

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सुभाषित – हनुमान


तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम् |
प्रदेहि सुभगे हारन् यस्य तुष्टासि भामिनि || ६-१२८-८१
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः |
पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा || ६-१२८-८२

Looking at her, Rama who was acquainted with the gesture of another spoke to Seetha as follows: “Dear Seetha! Give the pearl-necklace to a person, with whom you are pleased and in whom the following viz. sharpness, firmness, renown, dexterity, competence, modesty, prudence, virility, prowess and intelligence are ever present.”

हनुमान = प्राण that has following present: तेज,धृति,यश,चतुरता,शक्ति,विनय,निति,पुरुषार्थ,पराक्रम,उत्तम बुध्धि


पठन/मनन/स्मरण – हनुमान


॥ श्रीहनुमद्ध्यानम् मार्कण्डेयपुराणतः ॥

मरकतमणिवर्णं दिव्यसौन्दर्यदेहं
नखरदशनशस्त्रैर्वज्रतुल्यैः समेतम् ।
तडिदमलकिरीटं मूर्ध्नि रोमाङ्कितं च
हरितकुसुमभासं नेत्रयुग्मं सुफुल्लम् ॥ १॥

अनिशमतुलभक्त्या रामदेवस्य योग्या-
न्निखिलगुरुचरित्राण्यास्यपद्माद्वदन्तम् ।
स्फटिकमणिनिकाशे कुण्डले धारयन्तं
गजकर इव बाहुं रामसेवार्थजातम् ॥ २॥

अशनिसमद्रढिम्नं दीर्घवक्षःस्थलं च
नवकमलसुपादं मर्दयन्तं रिपूंश्च ।
हरिदयितवरिष्ठं प्राणसूनुं बलाढ्यं
निखिलगुणसमेतं चिन्तये वानरेशम् ॥ ३॥

इति मार्कण्डेयपुराणतः श्रीहनुमद्ध्यानम् ।

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १८ (साहित्य विशेष)

Gavya18

 


शब्द सिन्धु


अनुभवः (anubhavaH) = (m) experience
अनुमन्ता (anumantaa) = permitter
अनुमातुं (anumaatuM) = to guess
अनुमान (anumaana) = an inference
अनुमानात् (anumaanaat.h) = (ablat.)from guessing or induction
अनुयायिनः (anuyaayinaH) = followers
अनुरज्यते (anurajyate) = is becoming attached
अनुराधा (anuraadhaa) = Seventeenth nakshatra
अनुलिप्त (anulipta) = smeared
अनुलेख (anulekha) = destiny
अनुलेपनं (anulepanaM) = smeared with
अनुलोम (anuloma) = with the grain, naturally
अनुवर्तते (anuvartate) = follows in the footsteps
अनुवर्तन्ते (anuvartante) = would follow
अनुवर्तयति (anuvartayati) = adopt
अनुवादं (anuvaadaM) = translation
अनुवाद्य (anuvaadya) = having translated
अनुविधीयते (anuvidhiiyate) = becomes constantly engaged
अनुशासितारं (anushaasitaaraM) = the controller
अनुशुश्रुम (anushushruma) = I have heard by disciplic succession
अनुशोचन्ति (anushochanti) = lament
अनुशोचितुं (anushochituM) = to lament
अनुषज्जते (anushhajjate) = one necessarily engages
अनुष्टुप् (anushhTup.h) = the format’s name
अनुष्ठन (anushhThana) = (n) performance, execution
अनुसन्ततानि (anusantataani) = extended
अनुसन्धानं (anusandhaanaM) = (n) investigation
अनुसार (anusaara) = following, customary(masc)
अनुसूची (anusuuchii) = schedule
अनुस्मर (anusmara) = go on remembering
अनुस्मरन् (anusmaran.h) = remembering
अनुस्मरेत् (anusmaret.h) = always thinks of
अनुस्वारः (anusvaaraH) = the accompanying sound or letter ( the letter form `.n’ `M’?)
अनुज्ञायतां (anuGYaayataaM) = (verb) be given leave/permission
अनूचानं (anuuchaanaM) = (teacher?)
अनृत (anRita) = false
अनेक (aneka) = Many
अनेकधा (anekadhaa) = into many
अनेकवचनं (anekavachanaM) = plural
अनेकानि (anekaani) = many
अनेन (anena) = by this
अन्गं (angaM) = body
अन्त (anta) = end
अन्तं (antaM) = or end
अन्तः (antaH) = (adv) inside
अन्तःकरण (antaHkaraNa) = Mind
अन्तःपेटिका (antaHpeTikaa) = (f) drawer
अन्तःस्थानि (antaHsthaani) = within
अन्तकाले (antakaale) = at the end of life
अन्तगतं (antagataM) = completely eradicated
अन्तर (antara) = Sub-period in a Dasha
अन्तरं (antaraM) = between
अन्तरङ्ग (antara.nga) = the practices of pranayama and pratyahara
अन्तरदेशीय (antaradeshiiya) = among different countries mainly for transaction??
अन्तरात्मना (antaraatmanaa) = within himself
अन्तरात्मा (antaraatmaa) = the inner self, residing in the heart
अन्तराय (antaraaya) = (m) obstacle
अन्तरारामः (antaraaraamaH) = actively enjoying within
अन्तरिक्ष (antarikSha) = (n) space
अन्तरिक्षं (antarikShaM) = space, sky
अन्तरे (antare) = between
अन्तरेण (antareNa) = without
अन्तर्ज्योतिः (antarjyotiH) = aiming within
अन्तर्युतकम् (antaryutakam.h) = (n) vest
अन्तर्सुखः (antarsukhaH) = happy from within
अन्तवत् (antavat.h) = perishable
अन्तवन्तः (antavantaH) = perishable
अन्तिके (antike) = near
अन्ते (ante) = after
अन्ध (andha) = blind
अन्धकार (andhakaara) = darkness


पाठ


Untitled 2

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • सङ्कटे यद् विसृज्येत, न तत् तत्त्वं, रुचि: तु सा॥
  • स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला।
  • सतां हि वाणी गुणमेव भाषते ।
  • सत्यश्रमाभ्यां सकलार्थसिद्धिः ।
  • सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
  • समूलो वा परिशुष्यति यदनृतं वदति ।
  • सर्वः स्वार्थं समीहते।
  • सर्वथा सुकरा मैत्री, दुष्करं परिपालनम् ।
  • सर्वमतिमात्रं दोषाय ।
  • सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
  • सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
  • सर्वेषामपि शौचानाम् अर्थशौचं परं स्मृतम् ।
  • सर्वेषु भूतेषु दया हि धर्मः ।

सुभाषित


आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा ।
पात्यते तु क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयो: ॥

शिला को पर्वत के उपर ले जाना कठिन कार्य है परन्तू पर्वत के उपर से नीचे ढकेलना तो बहुत ही सुलभ है ।
ऐसे ही मनुष्य को सद्गुणोसे युक्त करना कठिन है पर उसे दुर्गुणों से भरना तो सुलभही है


पठन + स्मरण + मनन


साहित्य दर्पण संस्कृत भाषा में लिखा गया साहित्य विषयक ग्रन्थ है जिसके लेखक पण्डित विश्वनाथ हैं। विश्वनाथ का समय 14वीं शताब्दी ठहराया जाता है। मम्मट के काव्यप्रकाश के समान ही साहित्यदर्पण भी साहित्यालोचना का एक प्रमुख ग्रन्थ है। काव्य के श्रव्य एवं दृश्य दोनों प्रभेदों के संबंध में इस ग्रन्थ में विचारों की विस्तृत अभिव्यक्ति हुई है।

Excerpts from साहित्य दर्पण

Read book here: https://books.google.co.in/books?id=zaIkDl4Dl9kC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=true

ग्रन्थारम्भे निर्विन्घेन प्रारिप्सितपरिसमाप्तिकामो वाङ्भयाधिकृततया वाग्देवतायाः सांमुख्यमाधत्ते–

शरदिन्दुसुन्दररुचिश्चेतसि सा मे गिरं देवी ।
अपहृत्य तमः संततमर्थानखिलान्प्रकाशयतु ।। साद-१.१ ।।

अस्य ग्रन्थस्य काव्याङ्गतया काव्यफलैरेव फलवत्त्वमिति काव्यफलान्याह–

चतुर्वर्गफलप्राप्तिः सुखादल्पधियामपि ।
काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरूप्यते ।। साद-१.२ ।।

चतुर्वर्गफलप्राप्तिहि कोव्यतो “रामादिवत्प्रवतितव्यं न रावणादिवत्” इत्यादिः कृत्याकृत्यप्रवृत्तिनिवृत्त्युपदेशद्वारेण सुप्रतीतैव ।
उक्तं च (भामहेन)– “धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च ।
करोति कीर्तिं प्रीतिं च साधुकाव्यनिषेवणम्” ।।

इति ।
किञ्च काव्याद्धर्मप्राप्तिर्भगवन्नारायणचरणारविन्दस्तवादिना, “एकः शब्दः सुप्रयुक्तः सम्यग्ज्ञातः स्वर्गे लोके कामधुग्भवति” इत्यादिवेदवाक्येभ्यश्च सुप्रसिद्धैव ।
अर्थप्राप्तिश्च प्रत्यक्षसिद्धा ।
कामप्राप्तिश्चार्थद्वारैव ।
मोक्षप्राप्तिश्चैतज्जन्यधर्मफलाननुसंधानात्, मोक्षोपयोगिवाक्ये व्युत्पत्त्याधायकत्वाच्च ।
चतुर्वर्गप्राप्तिर्हि वेदशास्त्रेभ्यो नीरसतया दुःखादेव परिणतबुद्धीनामेव जायते ।
परमानन्दसदोहजनकतया सुखादेव सुकुमारबुद्धीनामपि पुनः काव्यादेव ।
ननु तहि परिणतबुद्धिभिः सत्सु वेदशास्त्रेषु किमिति काव्ये यत्नः करणीय इत्यपि न वक्तव्यम् ।
कटुकौषधोपशमनीयस्य रोगस्य सितशर्करोपशमनीयत्वे कस्य वा रोगिणः सितशर्कराप्रवृत्तिः साधीयसी न स्यात् ? किञ्च काव्यस्योपादेयत्वमग्निपुराणे ऽप्युक्तम्– “नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा ।
कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा” ।।

इति ।
“त्रिवर्गसाधनं नाट्यम्” इति च ।
विष्णुपुराणे ऽपि– “काव्यालापाश्च ये केचिद्रीतकान्यखिलानि च ।
शब्दमूतिधरस्यैते विष्णोरंशा महात्मनः” ।।

इति ।
तेन हेतुना तस्य काव्यस्य स्वरूपं निरूप्यते ।
एतेनाभिधेयं च प्रदर्शितम् ।
तत्किस्वरूपं तावत्काव्यमित्यपेक्षायां कश्चिदाह– “तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनवालंकृती पुनः क्वपि” इति ।
एतच्चिन्त्यम् ।
तथाहि– यदि दोषरहितस्यैव काव्यत्वाङ्गीकारस्तदा– “न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सो ऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः ।
धिग्धिक्छक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः” ।।

इति ।
अस्य शलोकस्य विधेयाविमर्शदोषदुष्टतया काव्यत्वं न स्यात् ।
प्रत्युत ध्वनि(स) त्वेनोत्तमकाव्यतास्याङ्गीकृता, तस्मादव्याप्तिर्लक्षणदोषः ।
ननु कश्चिदेवांशो ऽत्र दुष्टो न पुनः सर्वो ऽपीति चेत्, तर्हि यत्रांशे दोषः सो ऽकाव्यत्वप्रयोजकः, यत्र ध्वनिः स उत्तमकाव्यत्वप्रयोजक इत्यंशाभ्यामुभयत आकृष्यमाणमिदं काव्यमकाव्यं वा किमपि न स्यात् ।
न च कंचिदेवांशं काव्यस्य दूषयन्तः श्रतिदुष्टादयो दोषाः, किं तर्हि सर्वमेव काव्यम् ।
तथाहि– काव्यात्मभूतस्य रसस्यानपकर्षकत्वे तेषां दोषत्वमपि नाङ्गीक्रियते ।
अन्यथा नित्यदोषानित्यदोषत्वव्यवस्थापि न स्यात् ।
यदुक्तं धवनिकृता– “श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः ।
ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः” ।।

इति ।
किञ्च एवं काव्यं प्रविरलविषयं निर्विषयं वा स्यात्, सर्वथा निर्देषस्यैकान्तमसंभवात् ।
नन्वीषदर्थे नञः प्रयोग इति चेत्तर्हि “ईषद्दोषौ शब्दार्थौ काव्यम्” इत्युक्ते निर्देषयोः काव्यत्वं न स्यात् ।
सति संभवे “ईषद्दोषौ” इति चेत् , एतदपि काव्यलक्षणो न वाच्यम् , रत्नादिलक्षणो कीटानुवेधादिपरिहारवत् ।
नही कीटानुवेधादयो रत्नस्य रत्नत्वं व्याहन्तुमीशाः किन्तूपादेयतारतम्यमेव कर्तुम् ।
तद्वदत्र श्रुतिदुष्टादयो ऽपि काव्यस्य ।
उक्तं च– “कीटानुविद्धरत्नादिसाधारण्येन काव्यता ।
दुष्टेष्वपि मता यत्र रसाद्यनुगमः स्फुटः” ।।

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संस्कृत गोवीथि : : गव्य १६ (साहित्य विशेष)

Gavya16


शब्द सिन्धु


अध्यात्मविद्या (adhyaatmavidyaa) = spiritual knowledge
अध्यादेशः (adhyaadeshaH) = (m) ordinance
अध्यापयितुं (adhyaapayituM) = to teach (infinitive of causative of adhi+i, to study)
अध्यापिका (adhyaapikaa) = (f) lady teacher
अध्यास (adhyaasa) = a case of mistaken identity
अध्येष्यते (adhyeshhyate) = will study
अध्योपत्य (adhyopatya) = Lordship
अध्रुवं (adhruvaM) = temporary
अध्वन् (adhvan.h) = road
अध्वान् (adhvaan.h) = (m) road, path, way
अन्.गमेजयत्व (an.gamejayatva) = unsteadiness of the body
अनघ (anagha) = O sinless one
अनन्त (ananta) = infinite, a name of Vishnu
अनन्तं (anantaM) = unlimited
अनन्तः (anantaH) = Ananta
अनन्तरं (anantaraM) = after
अनन्तरूप (anantaruupa) = O unlimited form
अनन्तरूपं (anantaruupaM) = unlimited form
अनन्तविजयं (anantavijayaM) = the conch named Ananta-vijaya
अनन्तवीर्या (anantaviiryaa) = unlimited potency
अनन्ताः (anantaaH) = unlimited
अनन्तासन (anantaasana) = Ananta’s posture
अनन्यचेताः (ananyachetaaH) = without deviation of the mind
अनन्यभाक् (ananyabhaak.h) = without deviation
अनन्यमनसः (ananyamanasaH) = without deviation of the mind
अनन्यया (ananyayaa) = unalloyed, undeviating
अनन्ययोगेन (ananyayogena) = by unalloyed devotional service
अनन्याः (ananyaaH) = having no other object
अनन्येन (ananyena) = without division
अनपेक्षः (anapekShaH) = neutral
अनपेक्ष्य (anapekShya) = without considering the consequences
अनभिश्वङ्गः (anabhishva.ngaH) = being without association
अनभिसन्धाय (anabhisandhaaya) = without desiring
अनभिस्नेहः (anabhisnehaH) = without affection
अनभिज्ञ (anabhiGYa) = ignorant of, unacquainted with
अनयोः (anayoH) = of them
अनर्थं (anarthaM) = purposeless/in vain/danger-productive
अनल (anala) = fire
अनलः (analaH) = fire
अनलेन (analena) = by the fire
अनवलोकयान् (anavalokayaan.h) = not looking
अनवाप्तं (anavaaptaM) = wanted
अनश्नतः (anashnataH) = abstaining from eating
अनश्नन् (anashnan.h) = without eating (having fasted)
अनसुयवे (anasuyave) = to the nonenvious
अनसूयः (anasuuyaH) = not envious
अनसूयन्तः (anasuuyantaH) = without envy
अनहंवादि (anaha.nvaadi) = without false ego


पाठ


Untitled

2

Try to understand this one liners without looking at translation. Write them down on card. Keep them at study table. Keep visiting them daily until you realize their meanings.

  • लोकहितं मम करणीयम् ।
  • लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु।
  • रक्तं पुरुषं स्त्रियः परिभवन्ति ।
  • रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय ।
  • वक्तारो दर्दुरा यत्र, तत्र मौनं हि शोभनम्।
  • वचस्तत्र प्रयोक्तव्यं यत्रोक्तं लभते फलम्।
  • वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः ।
  • वसुधैव कुटुम्बकम्।
  • वस्तुदोषमनादृत्य गुणांश्चिन्वन्ति तद्विदः ।
  • विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः ।
  • विद्यया अमृतमश्नुते।
  • विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च ।
  • विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।
  • विद्याधनं सर्वधनात् प्रधानम्।
  • विद्याविहीनः पशुः।
  • विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ।
  • विश्वसयत्याशु सतां हि योगः ।
  • वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया ।
  • व्यवहारेण हि जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा।
  • व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ।

सुभाषित


आहारनिद्राभयमैथुनं च
सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मोहि तेषामधिको विशेषो
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ ॥
Eating and sleeping and having sex are all common to both animals and humans; what is special about men is their consciousness of Dharma – a man without the feeling of Dharma is comparable to an animal.


पठन -> मनन -> स्मरण (संस्कृत साहित्य विशेष)


In this section, I prefer to introduce excerpts from Sanskrit literature. Read them. don’t seek translations. Re-read them.

प्रतिमानाटकम्

PRATIMA NATAKAM of Bhasa is the only play in the entire Sanskrit literature, which sees good in all people and has a soft corner for all the famous bad characters like, Kaikayi of the classic, the Ramayana. In this play Bhasa portrays these so called villains as good and noble people who were sinned against than sinning. Bhasa tries his best to portray these characters as lynch pins in the scheme of the play of God. On reading Bhasa’s plays, one ends up unconsciously sympathizing with the so called bad characters. Bhasa took the theme of Ramayana for his PRATIMA. The Ramayana is the उपजीव्य काव्य means perennial source for all latter poets.

In Pratima Natak, there are seven acts-

The First act of the drama opens in a stunning manner with the coronation of Rama taking place as soon as it is announced in the presence of Emperor Dasharata, Lakshmana and Satrughana. Sita is in her quarters does not know about her husband’s coronation and is surprised when she learns of it. The coronation is abruptly disrupted by Manthara, the messenger of Kaikayi in the middle of the ceremony. Rama does not know the reason for this disruption and retires to Sita’s quarters. There he learns of Kaikayi reminding Dasharatha about the promise he made to her father as bride price, of making her son the future king of Ayodhya. Now Rama starts out to the forest without Kaikayi and Dasharatha asking him to go. The two well known boons are not mentioned and thus Bhasa protects the characters of Kaikayi and Dashratha. What is more, Rama takes upon himself the blame of accepting the crown greedily to prevent people accusing Kaikayi. Before Rama’s arrival to her quarters Sita casually wears bark-garnments thus saving Kaikayi the unpleasant and cruel task of handing her bark-garments. It is to be noted that the important characters Dashratha, Kaikayi and Manthara do not appear on the stage in this act.

Let us understand by reading the first Act.

पात्राणि

सूत्रधार:

नटी

विजया — प्रतिहारी ।

काञ्चुकीय: —

अवदातिका — चेटी सीताया: ।

सीता — रामपत्नी ।

राम: — दशरथस्य ज्येष्ट: पुत्र: ।

लक्ष्मण: — दशरथस्य पुत्र:

भरत: — दशरथस्य पुत्र: ।

शत्रुघ्न: — दशरथस्य पुत्र:

राजा दशरथ: — कोसलाधिप: ।

नन्दिनिका — अपरा चेटी सीताया: ।

चेटी

सुमन्त्र: — दशरथस्य सारथि: ।

कौसल्या — दशरथस्य पट्टमहिषी — रामस्य जननी ।

सुमित्रा — दशरथस्य महिषी — माता लक्ष्मणस्य शत्रुघ्नस्य च ।

कैकेयी — दशरथस्य महिषी —- माता भरतस्य ।

सुधाकर: —

भट: —

देवकुलिक: — प्रतिमागृहरक्षक:

सूत: — भरतस्य

तापसी —

रावण: — राक्षसराजः— लङ्केश्वर:

वृद्धतापसौ नन्दिलक: च — जनस्थानवासिन:

प्रतिमानाटकम् – स्थापना।

नान्द्यन्ते तत: प्रविशति सूत्रधार:।)

सूत्रधार:

सीताभव: पातु सुमन्त्रतुष्ट:
सुग्रीवराम: सहलक्ष्मणश्र्च।
यो रावणार्यप्रतिमश्र्च देव्या
विभीषणात्मा भरतोऽनुसर्गम्।।1।।
(नेपथ्याभिमुखमवलोक्य।)
आर्येें, इतस्तावत्।
(प्रविश्य)
नटी – अय्य इआम्हि। (आर्य, इयमस्मि।)
सूत्रधार: – आर्यें, इदमेवेदानीं शरत्कालमधिकृत्य गीयतां तावत्।
नटी – अय्य, तह। (गायति।)(आर्य, तथा)
सूत्रधार: – अस्मिन् हि काले
चरति पुलिनेषु हंसी काशांशुकवासिनी सुसंहृष्टा।
(नेपथ्ये)
अय्य, अय्य। (आर्य, आय।)
(आकण्र्य।)
सूत्रधार: – भवतु विज्ञातम्
मुदिता नरेन्द्रभवने त्वरिता प्रतिहाररक्षीव।।2।।
(निष्क्रान्तौ।)

स्थापना।

प्रथमोऽङ्क:

(प्रविश्य।)
प्रतिबारी – अय्य को इह कञ्चुईआणं संणिहिदो। (आर्य के इह काञ्चुकीयानां संनिहित:।)
काञ्चुकीय: – भवति, अयमस्मि। किं क्रियताम्।
प्रतिहारी – अय्य! महाराओ देवासुरसङ्गामेसु अप्पडिहदमारहो दसरहो आणवेदिसिग्धं भट्टिदारअस्स रामस्स रज्जप्पहाव,ञ्जोअकारआ अहिसेअसम्भारा
आणीअन्तु त्ति। (आर्य, महाराजो देवासुरसङ्ग्रामेष्वप्रतिहतमहारथो दशरथ आज्ञापयति। शीघ्रं भर्तृदारकस्य रामस्य राज्यप्रभावसंयोगकारका
अभिषेकसम्भारा आनीयन्तामिति।)
काञ्चुकीय: – भवति, यदाज्ञप्तं महाराजेन, तत् सर्वमुपस्थापितम्। पश्य।

छत्रं सव्यजनं सनन्दिपटहं भद्रासनं कल्पितं
न्यस्ता हेममया: सदर्भकुसुमास्तीर्थाम्बुपूर्णा घटा:।
युक्त: पुष्यरथश्र्च मन्त्रिसहिता: पौरा: समभ्यागता:
सर्वस्यास्य हि मङ्गलं स भगवान् वेद्यां वसिष्ठ: स्थित:।। 3।।
प्रतिहारी – जइ एव्वं, सोहणं किदं। (यद्येवं, शोभनं कृतम्।)
काञ्चुकीय: – हन्त भो:
इदानीं भूमिपालेन
कृतकृत्या: कृता: प्रजा:।
रामाभिधानं मेदिन्यां
शशाङ्कमभिषिञ्चता।।4।।
प्रतिहारी – तुवरदु तुवरदु दाणि अय्यो। (त्वरतां त्वरतामिदानीमार्य:।)
काञ्चुकीय: – भवति! इदं त्वर्यते।
(निष्क्रान्त:)
प्रतिहारी – (परिक्रम्यावलोक्य)अय्य! संभवअ! संभवअ! गच्छ तुवं तुवं पि महाराअवअणेण अय्यपुरोहिदं जहोपआरेण तुवारेहि। (अन्यतो गत्वा।)
सारसिए! सरसिए! सङ्गीदयाळं गच्छिअ नाडईआणं विण्णेवेहि-काळसंवादिणा णाडएण सज्जा होह त्ति। जाव अहं वि सव्वं किदं त्ति
महाराअस्स णिवेदेमि। (निष्क्रान्ता।) (आर्य! सम्भवक! सम्भवक! गच्छ, त्वमपि महाराजवचनेनार्यपुरोहितं यथोपचारेण त्वरय। अन्यतो
गत्वा सारसिके! सारसिके! सङ्गीतशालां गत्वा नाटकीयानां विज्ञापयकालसंवादिना नाटकेन सज्जा भवतेति। यावदहमपि सर्वं
कृतमिति महाराजाय निवेदयामि।)
अवदातिका – अहो अच्चाहिदं। परिहामेण वि हमं वक्कळं उवणअन्तीए मम एतिअं आसी, किं पुण ळोभेण परधणं हरन्तस्स। हसिदुं विअ इच्छमि। ण
खु एआइणीए हसिदव्वं। (अहो अत्याहितम्। परिहासेनापीमं वल्कलमुपनयन्त्या ममैतावद् भयमासीत् किं पुनर्लोभेन परधनं हरत:।
हसितुमिवेच्छामि। न खल्वेकाकिन्या हसितव्यम्।)
सीता – हञ्जे, ओदादीअ परिसङ्किदवण्णा विअ दिस्सइ। किं णु हु विअ एदं। (हञ्जे, अवदातिका परिशङ्कितवर्णेव दृश्यते। किन्नु खल्विवैतत्।)
चेटी – भट्टिणि! सुळहावराहो परिअणे णाम। अवरज्झा भविस्सदि। (भट्टिनि, सुलभापराध:! परिजनो नाम। अपराद्धा भविष्यति।)
सीता – णहि णहि। हसिदुं विअ इच्छदि। (नहि नहि, हसितुमिवेच्छति।)
अवदातिका – (उपसृत्य।) जेदु भट्टिणी! भट्टिणि ण सु अहं अवरज्झा। (जयतु भट्टिनी, भट्टिनि! न खल्वहमपराद्धा।)
सीता – का तुमं पुच्छदि। ओदादिए! किं एदं वामहत्थपरिगहिदं । (का त्वां पृच्छति। अवदातिके! किमेतद् वामहस्तपरिगृहीतम्।)
अवदातिका – भट्टिणि! इदं वक्कळं। (भट्टिनि! इदं वल्कलम्।)
सीता – वक्कळं किस्स आणीदं। (वल्कलं कस्मादानीतम्।)
अवदातिका – सुणादु भट्टिणी। णेवच्छपाळिणी अय्यरेवा णिव्वुत्तरङ्गप्पओअणं असोअरुक्खस्स एक्कं किसळअं अम्हेहि जाइदा आसि। ण अ ताए
दिण्णं। तदो अरिहदि अवराहो त्ति इदं गाहिदं। (शृणोतु भट्टिनी। नोपथ्यपालिन्यार्यरेवा निवृत्तरङ्गप्रयोजनमशोकवृक्षस्यैकं
किसलयमस्माभिर्याचितासीत्। न च तया दत्तम्। ततोऽर्हत्यपराध इतीदं गृहीतम्।)
सूता – पावअं किदं। गच्छ, णिय्योदेहि। (पापकं कृतम्। गच्छ, निर्यातय।)
अवदातिका – भट्टिणि! परिहासणिमित्तं खु मए एदं आणीदं। (भट्टिनि! परिहासनिमित्तं खलु मयैतदानीतम्।)

सीता – उम्मत्तिए! एवं दोसो वड्ढइ। गच्छ णिय्यादेहि, णिय्यादेही। (उन्मत्तिके! एवं दोषो वर्धते। गच्छ, निर्यातय, निर्यातय।)
अवदातिका – जं भट्टिणी आणवेदि। (यद् भट्टिन्याज्ञापयति।) (प्रस्थातुमिच्छति।)
सीता – हळा! एहि दाव। (हला! एहि तावत्।)
अवदातिका – भट्टिणि! इअम्हि। (भट्टिनि! इयमस्मि।)
सीता – हळा! किं णु मम वि दाव सोहदि। (हला! किन्नु खलु ममापि तावत् शोभते।)
अवदातिका – भट्टिणि! सव्वसोवणीअं सुरूवं णाम। अळङ्करोदु भट्टिणी (भट्टिनि! सर्वशोभनीयं सुरूपं नाम! अलङ्करोतु भट्टिनी।)
सीता – अणोहि गाव। हला! पेक्ख, किं दाणिं सोहदि। (आनय तावत्। (गृहीत्वालंकृत्य।) हला! पश्य, किमिदानीं शोभते)?
अवदातिका – तव खु सोहदिणाम। सोवण्णिअं विअ वक्कळं संवुत्तं। (तव खलु शोभते नाम। सौवर्णिकमिव वल्कलं संवृत्तम्।)
सीता – हञ्जे! तुवं किञ्चि ण भणासि। (हञ्जे! त्वं किञ्चिन्न भणसि।)
चेटी – णत्थि वाआए पओअणं। इमे पहरिसिदा तणूरुहा मन्तेन्ति। (पुलकं दर्शयति।)(नास्ति वाचा प्रयोजनम्। इमानि प्रहर्षितानि तनूरुहाणि
मन्त्रयन्ते।)
सीता – हञ्जे आदंसअं दाव आणेहि!(हञ्जे! आदर्शं तावदानय।)
चेटी – जं भट्टिणी आणवेदि। (निष्क्रम्य प्रविश्य।)भट्टिणि! अअं आदंसओ। (यद् भट्टिन्याज्ञापयत्ति। भट्टिनि! अयमादर्श:।)
चेटी – (चेटीमुखं विलोक्य) चिठ्ठदु दाव आदंसओ। तुवं किं वि वत्तुकामा विअ। (तिष्ठतु तावदादर्श:। त्वं किमपि वक्तुकामेव।)
टेटी – भट्टिणि, एवं मए सुदं। अय्यबाळाई कञ्चुई भणादि – अहिसेओ अहिसेओ त्ति। (भट्टिनि!एवं मया श्रुतम्। आर्यबालाकि: कञ्चुकी
भणति – अभिषेकोऽभिषेक इति।)
सीता – कोनि भट्टा रज्जे भविस्सत्ति। (कोपि भर्ता राज्ये भविष्यति।)
(प्रविश्यापरा)
चेटी – भट्टिणि! पिअक्खाणिअं पिअक्खाणिअं। (भट्टिनि, प्रियाख्यानिकं प्रियाख्यानिकम्।)
सीता – किं किं पडिच्छिअ मन्तेसि। (किं किं प्रतीष्य मन्त्रयसे।)
चेटी – भट्टिदारओ किळ अहिसिञ्चीअदि। (भर्तृदारक: किलाभिषिच्यते।)
सीता – अवि तादो कुसळी। (अपि तात: कुशली।)
चेटी – महाराएण एव्व अहिसिञ्जीअदि। (महाराजेनैवाभिषिच्यते।)
सीता – जइ एवं दुदीअं मे पिअं सुदं। विसाळदरं उच्छङ्गंकारेहि। (यद्येवं, द्वितीयं मे प्रियं श्रुतम्। विशालतरमुत्सङ्गे कुरु।)
चेटी – भट्टिणि! तह। (तथा करोति।) (भट्टिनि! तथा।)
(सीता आभरणान्यवमुच्य ददाति।)
चेटी – भट्टिणि! पटहसद्दो विअ । (भट्टिनि! पटहशब्द इव।)
सीता – सो एव्वं (स एव)

चेटी – एक्कपदे ओद्यट्टीअ तुह्णीओ पटहसदो संवुत्तो। (एकपदे अवघट्टित तूष्णीक: पटहशब्द: संवृत्त:।)
सीता – को णु खु उग्धादो अहिसेअस्स। अहव बहुवुत्तन्ताणि राअउळाणि णाम। (को नु खलूद्घातोऽभिषेकस्य। अथवा बहुवृत्तान्तानि
राजकुलानि नाम।)
चेटी – भट्टिणि, एवं मए सुदं-भट्टिदारअं अहिसिञ्चिअ महाराओ वणं गमिस्सदि त्ति। (भट्टिनि! एवं मयाश्रुतं-भर्तृदारकमभिषिच्य महाराजो वनं
गमिष्यतीति।)
सीता – जइ एव्वं, ण सो अहिसेओदओ मुहोदअं णाम। (यद्येवं, न तदभिषेकोदकं, मुखोदकं नाम।)
(तत: प्रविशति राम:।)
राम: – हन्त भो:।
आरब्धे पटहे स्थिते गुरुजने भद्रासने लङ्घिते
स्कन्धोच्चारणनम्यमानवदनप्रच्योतितोये घटे ।
राज्ञाहूय विसर्जिते मयि जनो धैर्येण मे विस्मित:
स्व: पुत्र: कुरुते पितुर्यदि वच: कस्तत्र भो:! विस्मय: ।। 5 ।।
अवदातिका – भट्टिणि! भट्टिदारओ खु आअच्छइ। णावणीदं वक्कलं। (भट्टिनि! भर्तृदारक: खल्वाहच्छति। नापनीतं वल्कलम्।)
राम: – मैथिलि! किमास्यते।
सीता – हं अय्यठत्तो। जेदु अय्यउत्तो। (हं आर्यपुत्र:। जयत्वार्यपुत्र:।)
राम: – मैथिलि! आस्यताम्। (उपविशति।)
सीता – जं अय्यउत्तो आणवेदि। (उपविशति।) (यद् आर्यपुत्र आज्ञापयति।)
अवदातिका – भट्टिणि! सो एव्व भट्टिदारअस्स वेसो। अळिअं विअ एदं भवे। (भट्टिनि! स एव भर्तृदारकस्य वेष:। अलीकमिवैतद् भवेत्।)
सीता – तादिसो जणो अळिअं ण मन्तेदि। अहव बहुवुत्तन्ताणि राअउळाणि णाम। (तादृशो जनोऽलीकं न मन्त्रयते। अथवा बहुवृत्तान्तानि
राजकुलानि नाम।)
राम: – मैथिलि! किमिदं कथ्यते।
सीता – ण खु किञ्चि। इअं दारिआ भणादि – अहिसेओ अहिसेओ त्ति।(न खलु किंचित्। इयं दारिका भणति-अभिषेकोऽभिषेक इति।)
राम: – अवगच्छमि ते कौतूहलम्। अस्त्यभिषेक:। श्रूयताम्। अद्यास्मि महाराजेनोपाध्याया- मात्यप्रकृतिजनसमक्षमेकप्रकारसंक्षिप्तं कोसलराज्यं
कृत्वा बाल्यस्तमङ्कामारोप्य मातृगोत्रं स्निग्धमाभाष्य पुत्र! प्रतिगृह्यता राज्यमित्युक्त:। राज्यम् इत्युक्त:।
सीता – तदाणीं अय्यउत्तेण किं भणिदं। (तदानीमार्यपुत्रेण किं भणितम्।)
राम: – मैथिलि! त्वं तावत् किं तर्कयसि।
सीता – तक्केमि अय्यउत्तेण अभणिअ किञ्चि दिग्धं णिस्ससिए महारा-अस्स पवादमूळेसु पडिअं त्ति। (तर्कयाम्यार्यपुत्रेणाभणित्वा किञ्चिद् दीर्घं
नि:श्वस्य महाराजस्य पादमूलयो: पतितमिति।)
राम: – सुष्ठु तर्कितम्। अल्पं तुल्यशीलानि द्वन्द्वनि सृज्यन्ते। तत्र हि पादयोरस्मि पतित:।
समं बाष्पेण पतता तस्योपरि ममाप्यध:।
पितुर्मे क्लेदितौ पादौ ममापि क्लेदितं शिर:।।6।।
सीता – तदो तदो। (ततस्तत:।)

राम: – ततोऽप्रतिगृह्ममाणोष्वनुनयेषु आसन्नजरादोषै: स्वै प्राणैरस्मि शापित:।
सीता – तदो तदो। (ततस्तत:।)
राम: – ततस्तदानीं,
शत्रुघ्नलक्ष्मणगृहीतघटेऽभिषेके
छत्रे स्वयं नृपतिना रुदता गृहीते।
सम्भ्रान्तया किमपि मन्थरया च कर्णे
राज्ञ: शनैरभिहितं च न चास्मि राजा।।7।।
सीता – पिअं मे। महाराओ एव्व महाराओ, अय्यउत्तो एव्व अय्यउत्तो। (प्रियं मे। महाराज एव महाराज:, आर्यपुत्र एवार्यपुत्र:।)
राम: – मैथिलि, किमर्थं विमुक्तालङ्कारासि।
सीता – ण खु दाव, आवज्झामि। (न तावद्, आबध्नामि।)
राम: – न खलु। प्रत्यग्रावतारितैर्भूषणैर्भवितव्यम्। तथाहि –
कर्णौ त्वरापहृतभूषणभुग्नपाशौ
संस्रंसिताभंरणगौरतलौ च हस्तौ।
एतानि चाभरणभारनतानि गात्रे
स्थानानि नैव समतामुपयान्ति तावत् ।। 8 ।।
सीता – पारेदि अय्यउत्तो अळिअं पि सच्चं विअ मन्तेदुं। (पारयत्यार्यपुत्रोऽलीकमपि सत्यमिव मन्त्रयितुम्।)
राम: – तेन हि अलङ्क्रियताम्। अहमादर्शं धारयिष्ये। (तथा कृत्वा निर्वण्य।) तिष्ठ।
आदर्शे वल्कलानीव किमेते सूर्यरश्मय:।
हसितेन परिज्ञातं क्रीडेयं नियमस्पृहा ।। 9 ।।
अवदातिके, किमेतत्।
अवदातिका – भट्टा! किण्णु हु सोहदि ण सोहदित्ति कोदूहळेण आवज्झा। (भर्त:! किन्नु खलु शोभते न शोभत इति कौतूहलेनाबद्धानि।)
राम: – मैथिलि! किमिदम्। इश्वाकूणां वृद्धालङ्कारस्त्वया धार्यते।अस्त्यस्माकं प्रीति: । आनय।
सीता – मा खु मा खु अय्यउत्तो अमङ्गळं भणादु। (मा खलु मा खल्वार्यपुत्रोऽमङ्गलं भणतु।)
राम: – मैथिलि, किमर्थं वारयसि।
सीता – उज्झिदाहिसेअस्स अय्यउत्तस्स अमङ्गळं विअ मे पडिआदिं। (उज्झिताभिषेकस्यार्यपुत्रस्यामङ्गलमिव मे प्रतिभाति।)
राम: – मा स्वयं मन्युमुत्पाद्य परिहासे विशेषत: ।
शरीरार्धेन मे पूर्वमाबद्धा हि यदा त्वया ।। 10 ।।
(नेपथ्ये)
हा हा महाराज:।
सीता – अय्यउत्त! किं एदं। (आर्यपुत्र, किमेतत्।)
राम: – (आकण्र्य)

नारीणां पुरुषाणां च निर्मर्यादो यदा ध्वनि:।
सुव्यक्तं प्रभवामीति मूले दैवेन ताडितम् ।। 11 ।।
तूर्णं ज्ञायतां शब्द:।
(प्रविश्य)
काञ्चुकीय: – परित्रायतां परित्रायताम्।
राम: – आर्य! क: परित्रातव्य:।
काञ्चुकीय: – महाराज:।
राम: – महाराज इति। आर्य! ननु वक्तव्यम्, एकशरीरसंक्षिप्ता पृथिवी रक्षितव्येति। अथ कुत उत्पन्नोऽयं दोष:।
काञ्चुकीय: – स्वजनात्।
राम: — स्वजनादिति। हन्त नास्ति प्रतीकार:।
काञ्चुकीय: – तत्रभवत्या: कैकेय्या:।
राम: – किमम्बाया:। तेन हि उदर्केण गुणेनात्र भवितव्यम्।
काञ्चुकीय: – कथमिव।
राम: – श्रूयतां,
यस्या: शक्रसमो भर्ता मया पुत्रवती च या ।
फले कस्मिन् स्पृहा तस्या येनाकार्यं करिष्यति ।। 13 ।।
काञ्चुकीय: – कुमार! अलमुपहतासु स्त्रीबुद्धिषु स्वमार्जवमुपनिक्षेप्तुम्। तस्या एव खलु वचनाद् भवदभिषेको निवृत्त:।
राम: – आर्य, गुणा: खल्वत्र।
काञ्चुकीय: – कथमिव।
राम:- श्रूयतां,
वनगमननिवृत्ति: पार्थिवस्यैव ताव-
न्मम पितृपरवत्ता बालभाव: स एव।
नवनृपतिविमर्शे नास्ति शङ्का प्रजाना-
मथ च न परिभोगैर्वञ्चिता भ्रातरो मे ।। 14 ।।
काञ्चुकीय: – अथ च तयानाहूतोपसृतया भरतोऽभिषिच्यतां राज्य इत्युक्तम्। अत्राप्यलोभ:।
राम: – आर्यं! भवान् खल्वस्मत्पक्षपातादेव नार्थमवेक्षते। कुत:,
शुल्के विपणितं राज्यं पुत्रार्थे यदि याच्यते।
तस्या: लोभोऽत्र नास्माकं भ्रातुराज्यापहरिणाम् ।। 15 ।।
काञ्चुकीय: – अथ-
राम:- अत: परं न मातु: परिवादं श्रोतुमिच्छमि। महाराजस्य वृत्तान्तस्तावदभिधीयताम्।
काञ्चुकीय: – ततस्तदानीं,

शोकादवचनाद् राज्ञा हस्तेनैव विसर्जित:
किमप्यभिमतं मन्ये मोहं च नृपतिर्गत: ।। 16 ।।
राम: – कथं मोहमुपगत:।
(नेपथ्ये)
कथं कथं मोहमुपगत इति।
यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनु: स्पृश: मा दया।
राम: – (आकण्र्य पुरतो विलोक्य।)
अक्षोभ्य: क्षोभित: केन लक्ष्मणो धैर्यसागर:।
येन रुष्टेन पश्यामि शताकीर्णमिवाग्रत: ।। 17 ।।
(तत: प्रविश्ति धनुर्बाणपाणिर्लक्ष्मण:।)
लक्षमण: – (सक्रोधम्।) कथं कथं मोहमुपगत इति।
यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनु: स्पृश मा दया
स्वजननिभृत: सर्वोऽप्येवं मृदु: परिभूयते।
अथ न रुचितं मुञ्च त्वं मामहं कृतनिश्र्चयो
युवतिरहितं लोकं कर्तुं यतश्छलिता वयम् ।। 18 ।।
सीता – अय्यउत! रोदिदव्वे काळे सोमित्तिणा धणु गहीदं अपुव्वो खु से आआसो। (आर्यपुत्र! रोदितव्ये काले सौमित्रिणा धनुर्गृहीतम्। अपूर्व:
खल्वस्यायास:।)
राम: – सुमित्रामात:! किमिदम्।
लक्ष्मण: – कथं कथं किंमिदं नाम।
क्रमप्राप्ते हृते राज्ये भुवि शोच्यासने नृपे।
इदानीमपि सन्देह: किं क्षमा निर्मनस्विता ।। 19 ।।
राम: – सुमित्रामात:! अस्मद्राज्यभ्रंशो भवत उद्योग जनयति। आ:, अपण्डित: खलु भवान्।
सुमित्रामात:! अस्मद्राज्यभ्रंशो भवत उद्योगं जनयति। आ:, अपण्डित: खलु भवान्।
भरतो वा भवेद् राजा वयं वा ननु तत् समम्।
यदि तेऽस्ति धनु:श्लाघा स राजा परीपाल्यताम् ।। 20 ।।
लक्ष्मण: – न शक्नोमि रोषं धारयितुम्। भवतु भवतु। गच्छामस्तावत् (प्रस्थित:।)
राम: – त्रैलोक्यं दग्धुकामेव ललाटपुटसंस्थिता।
भ्रकुटिर्लक्ष्मणस्यैषा नियतीव व्यवस्थिता ।। 21 ।।
सुमित्रामात: इतस्तावत्।
लक्ष्मण: – आर्य! अयमस्मि।
राम: – भवत: स्थैर्यमुत्पादयता मयैवमभिहितम्। उच्यतामिदानीम्।
ताते धनुर्नमयि सत्यमवेक्षमाणे
मुञ्चानि मातरि शरं स्वधनं हरन्त्याम्।

दोषेषु बाह्यमनुजं भरतं हनानि
किं रोषणाय रुचिरं त्रिषु पातकेषु ।। 22 ।।
लक्ष्मण: – (सबाण्पम्) हा धिक्। अस्मानविज्ञायोपालभसे।
यत्कृते महतिक्र्लेशे राज्ये मे न मनोरथ:।
वर्षाणि किल वस्तव्यं चतुर्दश वने त्वया ।। 23 ।।
राम: – अत्र मोहमुपहतस्तत्रभवान्। हन्त निवेदितमप्रभुत्वम्। मैथिलि!
मङ्गलार्थेऽनया दत्तान् वल्कलांस्तावदानय।
करोम्यन्यैर्नृपैर्धर्मं नैवाप्तं नोपपादितम् ।। 24 ।।
सीता – गह्णदु अय्यउत्तो। (गृह्णात्वार्यपुत्र:)
राम: – मैथिलि! किं व्यवसितम्।
सीता – णं सहधम्मआरिणी क्खु अहं। (ननु सहधर्मचारिणी खल्वहम्।)
राम: – मयैकाकिना किल गन्तव्यम्।
सीता – अदो णु खु अणुगच्छामि। (अतो नु खल्वनुगच्छामि।)
राम: – वने खलु वस्तव्यम्।
सीता – तं खु मे पासादो। (तत् खलु मे प्रासाद:।)
राम: – श्वश्रूश्वशुरशुश्रूषापि च ते निर्वर्तयितव्या।
सीता – णं उद्दिसिअ देवदाणं पणामो कराअदि। (एनामुद्दिश्य देवतानां प्रणाम: क्रियते।)
राम: – लक्ष्मण! वार्यतामियम्।
लक्ष्मण: – आर्य नोत्सहे श्लाघनीये काले वारयितुमत्रभवतीम्। कुत:-
अनुचरति शशाङ्कं राहुदोषेऽपि तारा
पतति च वनवृक्षे याति भूमिं लता च ।
त्यजति न च करेणु: पङ्कलग्नं गजेन्द्रं
व्रजतु चरतु धर्मं भर्तृनाथा हि नार्य: ।। 25 ।।
चेटी – जेदु भट्टिणी। णेवच्छपाळिणी अय्यरेवा पणमिअ विण्णवेदि-ओदादिआए सङ्गीदसाळादो अच्छिन्दिअ वक्कळा आणीदा। इमा अवरा
अणणुहूदा वक्कळा। णिव्वत्तीअदु दाव किळ पओअणं त्ति। (जयतु भट्टिनी। नेपथ्यपालिन्यार्यरेवा प्रणम्य विज्ञापयति-अवदातिकया
सङ्गीतशालाया आच्छिद्य वल्कला आनीता:। अमेऽपरा अननुभूता वल्कला:। निर्वत्र्यतां तावत् किल प्रयोजनमिति।)
राम: – भद्रे! आनय, संतुष्टैषा। वयमर्थिन:।
चेटी – गह्णदु भटटा (तथा कृत्वा निष्क्रान्ता।) (गृह्णतु भर्ता।)
(रामो गृहीत्वा परिधते।)
लक्ष्मण: – प्रसीदत्वार्यं: ।
निर्योगाद् भूषणान्माल्यात् सर्वेभ्योऽर्धं प्रदाय मे ।
चीरमेकाकिना बद्धं चीरे खल्वसि मत्सरी ।। 26 ।।

राम: – मैथिलि! वार्यतामयम्।
सीता – सोमित्ते! णिवत्तीअदु किळ। (सौमित्रे! निवत्र्यतां किल।)
लक्ष्मण: – आर्ये!
गुरोर्मे पादशुश्रुषां त्वमेका कर्तुमिच्छसि।
तवैव दक्षिण: पादो मम सव्यो भविष्यति ।। 27 ।।
सीता: – दीअदु खु अरुय्यत्तो। सन्तप्पदि सोभित्ती। (दीयतां खल्वार्यपुत्र:। संतप्यते सौमित्रि:।)
राम: – सौमित्रे! श्रूयताम्। वल्कलानि नाम,
तप: सङ्ग्रामकवचं नियमद्विरदाङ्कुश:।
खलीनमिन्द्रियाश्वानां गृह्यतां धर्मसारथि: ।। 28 ।।
लक्ष्मण: – अनुगृहीतोऽस्मि। (गृहीत्वा परिधत्ते।)
राम: – श्रुतवृत्तान्तै: पौरै: संनिरुद्धो राजमार्ग:। उत्सार्यतामुत्सार्यतां तावत्।
लक्ष्मण: – आर्यं! अहमग्रते यास्यामि। उत्सार्यतामुत्सार्यताम्।
राम: – मैथीलि ! अपनीयतामवगुण्ठनम्।
सीता – जं अय्यउत्तो आणवेदि।। (अपनयति।) (यदार्यपुत्र आज्ञापयति।)
राम: – भो भो: पौरा:। शृण्वन्तु शृण्वन्तु भवन्त:।
स्वैरं हि पश्यन्तु कलत्रमेतद्
बाष्पकुलाक्षैर्वदनैर्भवन्त:।
निर्दोषद्दश्या हि भवन्ति नार्यो
यज्ञे विवाहे व्यसने वने च ।। 29 ।।
काञ्चुकीय: – कुमार! न खलु न खलु गन्तव्यम् । एष हि महाराज:,
श्रुत्वा ते वनगमनं वधूसहायं
सौभ्रात्रव्यवसितलक्षमणानुयात्रम्।
उत्थाय क्षितितलरेणुरूषिताङ्ग:
कान्तारद्विरद इवोपयाति जीर्ण: ।। 30 ।।
लक्ष्मण: – आर्य!
चीरमात्रोत्तरीयाणां किं दृश्य वनवासिनाम्।
राम:- गतेष्वस्मासु राजा न शिरस्थानानि पश्यतु ।। 31 ।।
(इति निष्क्रान्ता: सर्वे।)

प्रथमोऽङ्क: ।

 

 

 

संस्कृत गोवीथी : गव्य 2

Gavya_2


शब्द सिन्धु

Morning


  • गतप्रभाते – last morning
  • अद्य प्रभाते – this morning
  • उषसी – Sandhya Time
  • बालादित्य – Morning Sun

पाठ १.२


Morning Theme

  • अद्य प्रातः आगतवान् वा? – Did you come this morning?
  • त्वं प्रातः किं खादसि? – What do you eat in the morning?
  • अद्य प्रातः आरभ्य बहु कार्याणि – I have had a lot work since morning
  • प्रतिप्रभातं विद्यालयं न गच्छामि इति रोदिति – He cries every morning saying he would not go to school

पाठ

Word Word2 Sentence Pattern 1 Sentence Pattern 2
अहं (में) वदामि अहं वदामि| वदामि अहं|
त्वं (तू) वदसि त्वं  वदसि| वदसि त्वं |
स: (वह) वदति स: वदति| वदति स:|

 

वदामि – To say

Usages:

(Focus on वदामि)

  • यथार्थं वदामि – I am telling the truth.
  • अस्मिन् विषये अनन्तरं वदामि – I’ll tell you about it later.
  • अहं किमर्थं असत्यं वदामि? – Why should I tell a lie?
  • त्वां धन्यं वदामि – Thank you!
  • तत्र अहं किमपि न वदामि – I do not want to say anything in this regard
  • अहम् तां किमपि न वदामि । प्रयोजनम् किम् ? – I don’t say anything to her. What is the point?

(Focus on वदसि?)

  • किं भोः, एवं वदसि? – Hey, why do you say so?
  • त्वम् संस्कृतं वदसि ? – Do you speak Sanskrit?

(Focus on वदति)

  • तत्र गमनं मास्तु भोः, सः बहुमूल्यं वदति । He is very expensive, let us not go to him.
  • संस्कृतं जानामि इति वदति भवान् तदनन्तरं संस्कृतेन सम्भाषणं कर्तुं किमर्थं सङ्कोचः ? You say you know Sanskrit but why then this hesitation to talk in Sanskrit?

Patha

सुभाषित


 

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

एक एक क्षण गवाये बिना विद्या पानी चाहिए; और एक एक कण बचा करके धन ईकट्ठा करना चाहिए । क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समजनेवाले को धन कहाँ ?

 


स्वाध्याय – पठन, मनन


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संस्कृत गोवीथि : : गव्य १२ (हनुमान विशेष)

प्राणका प्रेरक कौन?

केन उपनिषद् में प्राण प्रेरककी बात है| सम्पूर्ण जगत प्राण आधीन है, पर प्राण किसके आधीन है?

राजाकी प्रेरणासे दीवान काम कर शकता है, उसी प्रकार, प्राणका प्राण कौन?

स उ प्राणस्य प्राण|

आत्मा|

राम – हनुमान
आत्मा – प्राण

Gavya12


शब्दसिन्धु


अटति (aTati) = (1 pp) to roam
अणीयांसं (aNiiyaa.nsaM) = smaller
अणु (aNu) = atom
अणोः (aNoH) = than the atom
अण्वस्त्रं (aNvastraM) = (n) nuclear weapon
अतः (ataH) = hence
अतत्त्वार्थवत् (atattvaarthavat.h) = without knowledge of reality
अतन्द्रितः (atandritaH) = with great care
अतपस्काय (atapaskaaya) = to one who is not austere
अति (ati) = extremely
अतिपरिचय (atiparichaya) = excessive familiarity
अतिवीर्यं (ativiiryaM) = super power
अतिचार (atichaara) = Accelerated planetary motion
अतितरन्ति (atitaranti) = transcend
अतितरलं (atitaralaM) = ati+tarala, very+unstable
अतिथि (atithi) = (m) guest
अतिथिः (atithiH) = (masc.Nom.sing.)guest (literally undated)
अतिदारूणमन् (atidaaruuNaman.h) = adj. very dreadful
अतिदुर्वृत्त (atidurvRitta) = of exceedingly bad conduct


पाठ


१ २ ३

भोजनप्रकरणम्

नित्यः स्वाध्यायो जातो भोजनसमय आगतो गन्तव्यम् । नित्य का पढ़ना हो गया, भोजन समय आया, चलना चाहिये ।
तव पाकशालायां प्रत्यहं भोजनाय किं किं पच्यते ? तुम्हारी पाकशाला में प्रतिदिन भोजन के लिये क्या-क्या पकाया जाता है ?
शाकसूपौदश्वित्कौदनरोटिकादयः । शाक, दाल, कढ़ी, भात, रोटी आदि ।
किं वः पायसादिमधुरेषु रुचिर्नास्ति ? क्या आप लोगों की खीर आदि मीठे भोजन में रुचि नहीं है ?
अस्ति खलु परन्त्वेतानि कदाचित् कदाचित् भवन्ति । है सही परन्तु ये भोजन कभी-कभी होते हैं ।
कदाचिच्छष्कुली-श्रीखण्डादयोऽपि भवन्ति न वा ? कभी पूरी कचौड़ी शिखरन आदि भी होते हैं वा नहीं ?
भवन्ति परन्तु यथर्त्तुयोगम् । होते हैं परन्तु जैसा ऋतु का योग होता है वैसा ही भोजन बनाते हैं ।
सत्यमस्माकमपि भोजनादिकमेवमेव निष्पद्यते । ठीक है हमारे भी भोजन आदि ऐसे ही बनते हैं ।
त्वं भोजनं करिष्यसि न वा ? तू भोजन करेगा वा नहीं ?
अद्य न करोम्यजीर्णतास्ति । आज नहीं करता अजीर्णता है ।
अधिकभोजनस्येदमेव फलम् । अधिक भोजन का यही फल है ।
बुद्धिमत्ता तु यावज्जीर्यते तावदेव भुज्यते । बुद्धिमान पुरुष तो जितना पचता है उतना ही खाता है ।
अतिस्वल्पे भुक्ते शरीरबलम् ह्रस्त्यधिके चातः सर्वदा मिताहारी भवेत् । बहुत कम और अत्यधिक भोजन करने से शरीर का बल घटता है, इससे सब दिन मिताहारी होवे ।
योऽन्यथाऽऽहारव्यवहारौ करोति स कथं न दुःखी जायेत ? जो उलट-पलट आहार और व्यवहार करता है वह क्यों न दुःखी होवे ?
येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स शरीरसुखं नाप्नोति । जो शरीर से परिश्रम नहीं करता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता ।
येनात्मना पुरुषार्थो न विधीयते तस्यात्मनो बलमपि न जायते । जो आत्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसको आत्मा का बल भी नहीं बढ़ता ।
तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैर्यथाशक्ति सत्क्रिया नित्यं साधनीयाः । इससे सब मनुष्यों को उचित है यथाशक्ति उत्तम कर्मों की साधना नित्य करनी चाहिये ।
भो देवदत्त ! त्वामहं निमन्त्रये । हे देवदत्त ! मैं तुमको भोजन के लिए निमन्त्रित करता हूं ।
मन्येऽहं कदा खल्वागच्छेयम् ? मैं मानता हूँ परन्तु किस समय आऊँ ?
श्वो द्वितीयप्रहरमध्ये आगन्तासि । कल डेढ पहर दिन चढ़े आना ।
आगच्छ भो, आसनमध्यास्व, भवता ममोपरि महती कृपा कृता । आप आइये, आसन पर बैठिये, आपने मुझ पर बड़ी कृपा की ।

 

अकारादिः सूक्तयः

  • अग्ने: खरतरादेव लोहं दृढतरं भवेत्।
  • अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः ।
  • अङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।
  • अजो नित्यं शाश्वतोऽयं पुराणः ।
  • अज्ञः सुखमाराध्यः ।
  • अति सर्वत्र वर्जयेत् ।

सुभाषित


गोष्पदी-कृत-वारीशं मशकी-कृत-राक्षसम् ।
रामायण-महामाला-रत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥

I make obeisance to the son of Vayu (the Wind God),
who tamed the vast ocean into a hoof-print (in
the mud), turned the demons into mosquitoes, and is
the gem in the great garland that the Ramayana is.


पठन/मनन/स्मरण


॥ श्रीहनूमत्स्तुती ॥

हनुमानञ्जनासूनुर्वायुपुत्रो महाबलः ।
रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः ॥ १॥
Hanuman, Anjana’s son, the son of wind-god,
one endowed with great strength,
the favourite of Sri Rama, Arjuna’s friend,
one having reddish brown eyes and unlimited valour

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ २॥
The one who leapt across the ocean,
who dispelled the deep anguish of Sita,
the saviour of Laxmana and who destroyed the pride of Ravana

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत् ॥ ३॥
If one recites these twelve names of the noble Hanuman –
the best among the monkeys before retiring to bed,
on rising up in the morning or during journeys

तस्य सर्व भयं नास्ति रणे च विजयी भवेत् ।
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन ॥ ४॥
He will not face fear from any quarter. He will be successful in
battles. He need not have fear
either while entering the royal door, or a deep cavern.
(From Ananda Ramayana, Manohara Kanda.13-8-11).
॥ ॐ तत्सत् ॥
Encoded, proofread, and comments by
N. Balasubramanian bbalu at satyam.net.in

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 3

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शब्द सिन्धु

Work


  • कार्यप्रवाह – workflow
  • कार्यभार – workload
  • कार्यक्रमस्वचालन – workflow automation
  • कर्मसारथि – co-worker
  • कर्मकरगण – workforce
  • परिबृंहण – additional work

पाठ १.३


Work Theme

  • अहं आगामिवर्षे करिष्यामि | – Next year, I will work.
  • मम अन्यत् कार्यम् अस्ति| – I have some other work.
  • गृहकार्यं सर्वं समाप्तं वा? – Finished your household work?
  • ममापि बहुनि कार्याणि सन्ति – I have a lot of work to do myself.
अहं पठामि में पढ़ता हूँ
त्वं पठसि तू पढ़ता है
स: पठति वह पढ़ता है
अहं खादामि में खाता हूँ
त्वं खादसि तू खाता है
स: खादति वह खाता है
अहं पश्यामि में देखता हूँ
त्वं पश्यसि तू देखता है
स: पश्यति वह देखता है
  • अहं वाणिज्यशास्त्रं पठामि|
  • नवमकक्श्यायां पठामि|
  • संस्कृतं पठामि|
  • त्वं प्रातः किं खादसि?
  • त्वं फलानि अपि खादसि?
  • पुनः कदाचित् पश्यामि (Meet you again)
  • मासे कति चित्राणि पश्यति? – How often do you go to films in a month?

 

Bookish..

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सुभाषित


विवेक-चूड़ामणि

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटीभि:।।11।।

Work leads to purification of the mind, not to perception of the Reality. The realisation of Truth is brought about by discrimination and not in the least by ten million of acts.

कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तुपलब्धि (तत्वदृष्टि) – के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता।


पठन/मनन


Following excerpt is from Kathak griha sutra. It is commenraty by Devapala on first Sun sighting Sanskar for newborn. Try to interpret it by self.

KathakGrihasutra_0

KathakGrihasutra

 

 

 

संस्कृत गोवीथि : : गव्य १०(हनुमान विशेष)

Gavya10


शब्द सिन्धु


अकृतबुद्धित्वात् (akRitabuddhitvaat.h) = due to unintelligence
अकृतात्मानः (akRitaatmaanaH) = those without self-realisation
अकृतेन (akRitena) = without discharge of duty
अकृत्वा (akRitvaa) = without doing (from kRi)
अकृत्स्नविदाः (akRitsnavidaaH) = persons with a poor fund of knowledge
अक्रियाः (akriyaaH) = without duty
अक्रोध (akrodha) = freedom from anger
अक्रोधः (akrodhaH) = freedom from anger
अक्लेद्यः (akledyaH) = insoluble
अखिल (akhila) = entire
अखिलं (akhilaM) = whole
अखिलगुरु (akhilaguru) = preceptor for all, also all types of long syllable letters
अगत (agata) = not past
अगतसूंस्च (agatasuu.nscha) = agata + asuun.h + cha:undeparted life + and (living people)
अगत्वा (agatvaa) = without going (from gam.h)
अगम (agama) = proof of the trustworthiness of a source of knowledge
अगस्तमास (agastamaasa) = month of August
अगोचर (agochara) = (adj) unknown
अग्नि (agni) = fire
अग्निः (agniH) = fire
अग्निपर्वतः (agniparvataH) = (m) volcano, volcanic cone
अग्निपेतिका (agnipetikaa) = (f) matchbox
अग्निशलाका (agnishalaakaa) = (f) matchstick
अग्निषु (agnishhu) = in the fires
अग्नौ (agnau) = in the fire of consummation
अग्र (agra) = (neut in this sense) tip
अग्रं (agraM) = at the tip
अग्रजः (agrajaH) = elder
अग्रतः (agrataH) = (let the two go) before (me)
अग्रदीपः (agradiipaH) = (m) headlight
अग्रे (agre) = in front of/ahead/beforehand


पाठ


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सुभाषित – हनुमान विशेष


स सूर्याय महेन्द्राय पवनाय स्वयंभुवे |
भूतेभ्यश्चाञ्जलिं कृत्वा चकार गमने मतिम् || ५-१-८

He saluted with joined palms to the Sun-God, Lord Indra, God of Wind, Lord Brahma and Bhutas and decided to leave.

 


पठन/मनन – हनुमान विशेष


॥ श्रीहनुमत्सूक्तम् ॥
श्रीमन्तो सर्वलक्षणसम्पन्नो जयप्रदः
सर्वाभरणभूषित उदारो महोन्नतोष्ट्रारूढः
केसरीप्रियनन्न्दनो वायुतनूजो यथेच्छं पम्पातीरविहारी
गन्धमादनसञ्चारी हेमप्राकाराञ्चितकनककदलीवनान्तरनिवासी
परमात्मा वनेचरशापविमोचनो
हेमकनकवर्णो नानारत्नखचिताममूल्यां मेखलां च स्वर्णोपवीतं
कौशेयवस्त्रं च बिभ्राणः सनातनो परमपुरषो
महाबलो अप्रमेयप्रतापशाली रजितवर्णः
शुद्धस्पटिकसङ्काशः पञ्चवदनः
पञ्चदशनेत्रस्सकलदिव्यास्त्रधारी
श्रीसुवर्चलारमणो महेन्द्राद्यष्टदिक्पालक-
त्रयस्त्रिंशद्गीर्वाणमुनिगणगन्धर्वयक्षकिन्नरपन्नगासुरपूजित
पादपद्मयुगलः नानावर्णः कामरूपः
कामचारी योगिध्येयः श्रीहनुमान्
आञ्जनेयः विराट्रूपी विश्वात्मा विश्वरूपः
पवननन्दनः पार्वतीपुत्रः
ईश्वरतनूजः सकलमनोरथान्नो ददातु।

इदं श्रीहनुमत्सूक्तं यो धीमानेकवारं पठेद्यदि
सर्वेभ्यः पापेभ्यो विमुक्तो भूयात् ।

संस्कृत गोवीथी : : गव्य 7

Gavya7


शब्द सिन्धु


कवची (kavachii) = with armor
कवयः (kavayaH) = the intelligent
ज्ञायसे (GYaayase) = can to be known
ज्ञास्यसि (GYaasyasi) = you can know
ज्ञेयं (GYeyaM) = be known
ज्ञेयः (GYeyaH) = should be known
ज्ञेयोसि (GYeyosi) = You can be known


पाठ


संधि

1

Apply above simple sandhi rules on below paragraph, wherever you feel applicable.

2व्यवहार वाक्य

  • समय समागत:| – समय पर आ गए|
  • भवन्तं जानामि| – आपको जनता हूँ|
  • तथैव अस्तु| – वैसा ही हो|
  • जानामि भो:| – जानता हूँ|

सुभाषित


शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
सुजनाः न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने ॥ ॥

Not every mountain has gems in it, and not every
elephant is adorned with pearls . Not every forest
is blessed with sandal trees, and good people are
not to be found everywhere.


पठन/मनन


उषा वंदना

http://sanskritdocuments.org/doc_deities_misc/salutedawn.html?lang=sa

उषावंदनम्
   Salutation of the Dawn

अद्य भावय सुदिनम्!
Look to this Day!
जीवभूतः काल एषः । प्राणस्य प्राणः ।
For it is Life, the very Life of Life.
अस्मिन् स्वल्पकाले सत्यमये तव सतः सत्यं तिष्ठति
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence;
विकासानन्देन
The Bliss of Growth,
कर्मश्रिया
The Glory of Action,
सौन्दर्यशोभया ।
The Splendor of Beauty;
ह्यस्तु स्वप्नः ।
For Yesterday is but a Dream,
श्वस्तु आभासः ।
And Tomorrow is only a Vision;
कर्मकुशलतया आचरिते अद्य
But Today well lived makes every
गतदिनानि आनन्दस्वप्नमयानि भवन्ति ।
Yesterday a Dream of Happiness, and every
भाविदिनानि आशाप्रभया ज्वलन्ति ।
Tomorrow a Vision of Hope.
अतः सुदिनं अद्य सम्यक् भावय!
Look well therefore to this Day!
एषा उषाभिवन्दना!
Such is the Salutation of the Dawn.

 

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