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संस्कृत साधना : पाठ ६ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक-२)

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नमः संस्कृताय !!
सुधी मित्रों ! पिछले पाठ में मैंने क्रियाओं के विषय में थोड़ी चर्चा की थी। मैंने बताया था कि “कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व को ‘क्रिया’ कहते हैं।” यह भी बताया था कि ‘अकर्मक’ और ‘सकर्मक’ भेद से क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं। अब बताएँगे कि कौन सी क्रियाएँ ‘अकर्मक’ होती हैं और कौन सी ‘सकर्मक’।

१) पहले तो यह जान लीजिए कि इन दोनों प्रकार की क्रियाओं को बताने के लिए या इनका वर्णन करने के लिए जिन ( पठति, खादति, हसति, खेलति आदि ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उनके मूल अंश को ‘धातु’ कहते हैं।

२) ये धातुएँ लगभग द्विसहस्र हैं। बहुत से आचार्यों ने इनका अर्थसहित संग्रह किया था। किन्तु सबसे प्रसिद्ध संग्रह महर्षि पाणिनि का ‘धातुपाठ’ है। यह ‘धातुपाठ’ उन्हीं के महान् ग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ का परिशिष्ट है। यह ग्रंथ आपको अपने पास अवश्य रखना चाहिए।

३) जब क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं तो उनका वर्णन करने वाली धातुएँ भी दो प्रकार की हुईं- अकर्मक और सकर्मक। अकर्मक क्रियाएँ बहुत थोड़ी ही हैं, जबकि सकर्मक बहुत सी हैं। इसलिए अकर्मक धातुओं को स्मरण रखने के लिए एक श्लोक में इकट्ठा कर दिया गया है-

लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं
वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं
धातुगणं तेऽकर्मकम् आहुः ॥

४) उपर्युक्त श्लोक में जितने अर्थ गिनाए गये हैं, उन अर्थों वाली धातुएँ ‘अकर्मक’ होती हैं। देखिए-
लज्जा अर्थ वाली—- लज्ज् , ह्री
सत्ता अर्थ वाली—– भू , अस् , विद् , वृतु
स्थिति अर्थ वाली—- स्था
जागरण अर्थ वाली— जागृ
वृद्धि अर्थ वाली—— वृध् , एध् , प्याय्
क्षय अर्थ वाली—— क्षि
भय अर्थ वाली——- भी
जीवन अर्थ वाली—– जीव् , अन्
मरण अर्थ वाली—— मृङ्
शयन अर्थ वाली—— शीङ् , स्वप् , सस्
क्रीडा अर्थ वाली—— क्रीड् , खेल् , रम्
रुचि अर्थ वाली——- रुच्
दीप्ति अर्थ वाली——- दीप् , ज्वल्

आगामी पाठों में इनका प्रयोग भी आपको करवायेंगे । केवल इस श्लोक में गिनाए गये अर्थों वाली धातुएँ ही अकर्मक नहीं हैं अपितु कुछ अन्य अकर्मक धातुएँ भी हैं, जिनका ज्ञान आपको यथास्थान होता रहेगा।

५) ध्यातव्य : यदि आपसे कहा जाए कि “महेन्द्र फुटबॉल खेलता है” इस वाक्य में खेलता है क्रिया सकर्मक है अथवा अकर्मक ? तो आप यह सोचकर भ्रमित न होइयेगा कि ‘फुटबॉल को खेलता है’ इसलिए यह सकर्मक क्रिया है। वास्तव में वह फुटबॉल “से” खेलता है। फुटबॉल “खेलना” क्रिया का करण (साधन) है।

६) उपर्युक्त धातुओं के अतिरिक्त धातुओं को सकर्मक समझना चाहिए।

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वाक्य अभ्यास :
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“तुम गड्डमड्ड वाक्यों से मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हो।”
‘तुम’ कर्त्ता, ‘गड्डमड्ड वाक्य’ करण, ‘मेरी’ सम्बन्ध, ‘बुद्धि’ कर्म, ‘मोहित कर रहे हो’ सकर्मक क्रिया।
= त्वं व्यामिश्रैः वाक्यैः मम बुद्धिं मोहयसि।

“हे केशव ! तुम मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हो ?”
‘हे केशव’ सम्बोधन, ‘तुम’ कर्त्ता, ‘मुझे’ कर्म, ‘घोर कर्म’ अधिकरण, ‘क्यों’ अव्यय, ‘लगाते हो’ सकर्मक क्रिया।
हे केशव ! त्वं माम् घोरे कर्मणि कथं नियोजयसि ?

“बन्दर पैरों से चलता है और दो हाथों से फल खाता है।”
‘बन्दर’ कर्त्ता, ‘पैर’ करण, ‘चलता है’ अकर्मक क्रिया, ‘और’ अव्यय, ‘दो हाथ’ करण, ‘फल’ कर्म, ‘खाता है’ सकर्मक क्रिया।
वानरः पादाभ्यां चलति हस्ताभ्यां च फलानि खादति।

“धूर्तों के हृदय में दया नहीं होती है।”
‘धूर्त’ सम्बन्ध, ‘हृदय’ अधिकरण, ‘दया’ कर्त्ता, ‘होती है’ अकर्मक क्रिया।
धूर्तानां हृदये दया न भवति।

विद्यालय के अध्यापकों को मैं जानता हूँ ।
‘विद्यालय’ सम्बन्ध, ‘अध्यापकों को’ कर्म, ‘मैं’ कर्त्ता, ‘जानता हूँ’ सकर्मक क्रिया।
विद्यालयस्य अध्यापकान् अहं जानामि।

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श्लोक :

यत् करोषि* यत् अश्नासि*
यत् जुहोषि* ददासि* यत्।
यत् तपस्यसि* कौन्तेय
तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ९।२७॥)

इस श्लोक में * चिह्न वाली क्रियाएँ लट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन की हैं। अर्थ पुस्तक में ढूँढकर देखें।

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ ३४ (आत्मनेपदी धातुएँ)

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#संस्कृतशिक्षण – 34 [आत्मनेपदी धातुएँ]

प्रियसंस्कृतमित्राणि नमो नमः!
गीर्वाणवाणी की उपासना में आपने अभी तक कारक विभक्तियों, विशेष्य विशेषण, सर्वनाम विशेषण, अकर्मक सकर्मक क्रियाओं, दसों लकारों इत्यादि के विषय में जाना है और अभ्यास भी किया है। यदि आपने निष्ठापूर्वक अभ्यास किया होगा तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत की वाक्यरचना से आपका पूर्ण परिचय हो गया होगा। छात्र भी धनुर्वेद सीखने वाले योद्धा की भाँति होता है, जैसे ‘वशिष्ठधनुर्वेद’ नामक ग्रन्थ में उसके लिए परिश्रम की ही प्रशंसा की गई है, वैसे ही आपको भी अभ्यास में परिश्रम करना चाहिए-

श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः।
तस्माद् गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता॥

श्रम से ही अद्भुत योद्धा बना जा सकता है, श्रम से ही विजय प्राप्त होती है, इसलिए सिद्धान्तों को जानते हुए, गुरु के समक्ष ही अभ्यास करना चाहिए।( सौवाँ श्लोक)

1) आपको स्मरण होगा कि प्रारम्भिक पाठों में हमने बताया था कि जब ‘भू’ आदि धातुओं से भवति भवतः भवन्ति आदि क्रियापद बनाते हैं तो उनमें ‘तिङ्’ प्रत्यय जोड़कर ही ये रूप बनते हैं।

2) उन तिङ् प्रत्ययों में से पहले नौ प्रत्यय ‘परस्मैपदी’ कहे जाते हैं और अन्तिम नौ प्रत्यय ‘आत्मनेपदी’। यह परस्मैपद और आत्मनेपद महर्षि पाणिनि जी के द्वारा बनाये गये पारिभाषिक शब्द हैं। जैसे पाण्डु के सभी पुत्रों को ‘पाण्डव’ कहकर काम चला लिया जाता है वैसे ही परस्मैपद और आत्मनेपद कहकर नौ नौ प्रत्ययों का नाम ले लिया जाता है, अलग अलग अट्ठारहों प्रत्यय नहीं गिनाना पड़ता।

3) परस्मैपद प्रत्ययों के जुड़ने पर जिस प्रकार के रूप बनते हैं वह आपने भू धातु के अभ्यास से जान लिया। भू धातु परस्मैपदी होती है, अतः उसमें परस्मैपद प्रत्यय तिप् तस् झि आदि जुड़े। अब एक धातु आत्मनेपदी बतायेंगे। उसके रूप किस प्रकार से चलते हैं यह आप देख लीजिएगा। ऊपर जो वशिष्ठधनुर्वेद से श्लोक उद्धृत किया है, उसमें ‘प्राप्यते’ क्रियापद आत्मनेपदी है। आत्मनेपद प्रत्यय देख लीजिए –

त आताम् झ
थास् आथाम् ध्वम्
इट् वहि महिङ्

जब किसी धातु में इन्हें जोड़ते हैं तो इनमें कुछ परिवर्तन हो जाता है, देखिए ये इस प्रकार हो जाते हैं-

अते एते अन्ते
असे एथे अध्वे
ए आवहे आमहे

मुद् हर्षे (प्रसन्न होना) धातु, आत्मनेपदी

लट् लकार

मोदते मोदेते मोदन्ते
मोदसे मोदेथे मोदध्वे
मोदे मोदावहे मोदामहे

लुङ् लकार

अमोदिष्ट अमोदिषाताम् अमोदिषत
अमोदिष्ठाः अमोदिषाथाम् अमोदिध्वम्
अमोदिषि अमोदिष्वहि अमोदिष्महि

लङ् लकार

अमोदत अमोदेताम् अमोदन्त
अमोदथाः अमोदेथाम् अमोदध्वम्
अमोदे अमोदावहि अमोदामहि

लिट् लकार (केवल प्रथम पुरुष)

मुमुदे मुमुदाते मुमुदिरे

आपको लगता होगा कि हे भगवान् इतने सारे क्लिष्ट उच्चारण वाले रूप कैसे और कितने सारे याद करने पड़ेंगे ? तो डरिये मत ! मा भैषीः ! आपको किसी एक प्रतिनिधि धातु के रूप किसी प्रकार याद कर डालने हैं बाकी सभी आत्मनेपदी धातुओं के रूप इसी प्रकार चलेंगे। यदि आप प्रत्येक रूप पर आधारित कम से कम एक दो वाक्य बनाकर अभ्यास कर डालें तो ये शीघ्र याद हो जाएँगे। फिर तो आपको आनन्द ही आनन्द आयेगा।

4) आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह कैसे पता चलेगा कि कौन सी धातु परस्मैपदी है और कौन सी आत्मनेपदी अथवा उभयपदी ? तो यह पता चलता है धातुपाठ को पढ़ने से। उभयपदी धातुएँ वे होती हैं जिनके रूप दोनों प्रकार से चलते हैं। अगले पाठों में धातुओं के विषय में यह सब निर्देश कर दिया करेंगे।

5) आगे के पाठों में हम केवल रूपों का संकेत मात्र कर दिया करेंगे, उसी प्रकार से बहुत सी धातुओं के रूप चलेंगे।
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वाक्य अभ्यास :
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बच्चे लड्डुओं से प्रसन्न होते हैं।
= बालकाः मोदकैः मोदन्ते।

मैं सेवइयों से प्रसन्न होता हूँ।
= अहं सूत्रिकाभिः मोदे।

तुम किससे प्रसन्न होते हो ?
= त्वं केन मोदसे ?

मुझे देखकर तुम प्रसन्न हुए थे।
= मां दृष्ट्वा त्वम् अमोदिष्ठाः।

मैं भी प्रसन्न हुआ था।
= अहम् अपि अमोदिषि।

वे भी मेरे आगमन से प्रसन्न हुए थे।
= ते अपि मम आगमनेन अमोदिषत।

कल बच्चों का खेल देखकर तुम क्यों प्रसन्न नहीं हुए ?
= ह्यः खेलां दृष्ट्वा त्वं कथं न अमोदथाः ?

मैं तो कल बहुत प्रसन्न हुआ था।
= अहं तु ह्यः बहु अमोदे।

वे बच्चे भी कल बहुत प्रसन्न हुए थे।
= ते बालकाः अपि ह्यः बहु अमोदन्त।

हनुमान् को देखकर सीता प्रसन्न हुईं।
= हनूमन्तं दृष्ट्वा सीता मुमुदे।

राम और लक्ष्मण को देखकर ऋषि प्रसन्न हुए।
= रामं लक्ष्मणं दृष्ट्वा ऋषयः मुमुदिरे।

॥शिवोऽवतु॥

Gau Gavya and Gau-Raksha

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When someone represent गौ-रक्षक in negative image, my blood boils. As a leader, I should actually promote that every citizen should be गौ-रक्षक!

गाय & गव्य
गाय & गव्य

Gavya is a Sanskrit word. It has multiple meanings. It is actually a bridge between different forms of Gau.

Gau means Cow. Gau means senses. Gau means mother Earth. Gavya is their prasad. One produces and another consumes. Cycle goes on forever.

गौ रक्षक
गौ रक्षक

Panchgavya is elixir from Gau, for Gau (Human senses and Mother Earth). Result again is Gavya (Seva from Humans and produce from Mother earth) from gau, for Gau (Cow).

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Method of preparation
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Pancha-Gavya and Gau Raksha
Pancha-Gavya and Gau Raksha

Panchagavya, an organic product has the potential to play the role of promoting growth and providing immunity in plant system. Panchagavya consists of nine products viz. cow dung, cow urine, milk, curd, jaggery, ghee, banana, Tender coconut and water. When suitably mixed and used, these have miraculous effects.

Cow dung – 7 kg
Cow ghee – 1 kg
Mix the above two ingredients thoroughly both in morning and evening hours and keep it for 3 days

Cow Urine – 10 liters
Water – 10 liters
After 3 days mix cow urine and water and keep it for 15 days with regular mixing both in morning and evening hours. After 15 days mix the following and panchagavya will be ready after 30 days.

Cow milk – 3 liters
Cow curd – 2 liters
Tender coconut water – 3 liters
Jaggery – 3 kg
Well ripened poovan banana – 12 nos.

Read more: http://agritech.tnau.ac.in/org_farm/orgfarm_panchakavya.html

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We all have Vishnu seated in us. We must perform duties in his form. Being Gopati.

संस्कृत साधना : पाठ ९ (सर्वनाम विशेषण)

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नमः संस्कृताय !!
आज सर्वनाम विशेषण की चर्चा करते हैं।

१) जिन शब्दों का प्रयोग नाम (संज्ञा) के साथ विशेषण के रूप में किया जाता है या जो नाम (संज्ञा) के स्थान पर अकेले भी आते हैं उन्हें ‘सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वनाम विशेषण’ कहते हैं।जैसे –
‘वह’ बालक जाता है।
= ‘सः’ बालकः गच्छति।
‘ये’ लड़के खेलते हैं।
= ‘एते’ बालकाः क्रीडन्ति।
‘तुम’ ‘कौन’ हो ?
= ‘त्वं’ ‘कः’ असि ?
‘मैं’ ‘वह’ ही लड़का हूँ।
= ‘अहं’ ‘सः’ एव बालकः अस्मि।
‘जो’ ‘उस’ विद्यालय में था।
= ‘यः’ ‘तस्मिन्’ विद्यालये आसीत्।

ऊपर के वाक्यों में वह, ये, तुम, मैं, जो आदि शब्द सर्वनाम हैं।

२) इन सर्वनामों की संख्या लगभग चौंतीस है। इन सभी सर्वनामों का एक जगह संग्रह महर्षि पाणिनि ने अपने “गणपाठ” नामक ग्रन्थ में किया है। यह भी अष्टाध्यायी का एक परिशिष्ट है। किन्तु अभी आपका काम कुछ महत्त्वपूर्ण सर्वनामों से चल जाएगा।

३) सर्व (सब), उभय (दो), अन्य, तद् (वह), यद् (जो), एतद् (यह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद्(तुम), अस्मद् (मैं), भवत्(आप), किम्(क्या)।

४) ध्यान रहे, युष्मद् (तुम) और अस्मद् (मैं) को छोड़कर सभी सर्वनामों के रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। जिस लिंग, वचन और विभक्ति का नाम (संज्ञा) होगा उसके स्थान पर प्रयुक्त हुआ सर्वनाम भी उसी लिंग, वचन और उसी विभक्ति में रहेगा। भवत् (आप) को छोड़कर किसी भी सर्वनाम के रूप सम्बोधन में नहीं होते। इसमें लिंग, विभक्ति इत्यादि की त्रुटि कभी नहीं करना। ध्यान रखना है। अधिकतर विद्यार्थी यहाँ ध्यान नहीं देते और वाक्यरचना त्रुटिपूर्ण हो जाती है।

५) संज्ञा (नाम) का उच्चारण बार बार न करना पड़े इसलिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण –
“श्याम भोजन करता है, श्याम विद्यालय जाता है, श्याम पढ़ता है, श्याम खेलता है और श्याम सोता है।”
= श्यामः भोजनं करोति, श्यामः विद्यालयं गच्छति, श्यामः पठति, श्यामः खेलति, श्यामः स्वपिति।

इसमें कुल पाँच बार श्याम बोलना पड़ा। किन्तु यदि सर्वनाम का प्रयोग कर लें तो केवल एक बार ही ‘श्याम’ कहना पड़ेगा।

“श्यामः भोजनं करोति, सः विद्यालयं गच्छति, सः पठति, सः खेलति, सः स्वपिति।”

६) उपर्युक्त सभी सर्वनामों का अभ्यास आपको कराया जाएगा। आज तद् , एतद् , यद् और किम् का अभ्यास करायेंगे। तद् के रूप लिखकर बताएँगे बाकी के रूपों का संकेतमात्र कर देंगे। तद् की भाँति ही एतद् , यद् और किम् के रूप भी होते हैं।

१] तद् = वह, उस, उन आदि अर्थों में
२] एतद् = यह, इस, इन आदि अर्थों में
३] यद् = जो, जिस, जिन आदि अर्थों में
४] किम् = क्या, कौन, किस, किन आदि अर्थों में

१] तद् पुँल्लिंग :

सः तौ ते
तम् तौ तान्
तेन ताभ्याम् तैः
तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः
तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः
तस्य तयोः तेषाम्
तस्मिन् तयोः तेषु

तद् नपुसंकलिंग :

तत् ते तानि
तत् ते तानि
(शेष पुँल्लिंग की भाँति)

तद् स्त्रीलिंग :

सा ते ताः
ताम् ते ताः
तया ताभ्याम् ताभिः
तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
तस्याः तयोः तासाम्
तस्याम् तयोः तासु

२] एतद् :: तद् के सभी रूपों के आगे ‘ए’ जोड़ दीजिए- (कुछ विशेष नियमों के कारण स को ष हो जाएगा बस)

पुँल्लिंग- एषः एतौ एते
एतम् एतौ एतान् इत्यादि

स्त्रीलिंग- एषा एते एताः
एताम् एते एताः इत्यादि

नपुसंकलिंग- एतत् एते एतानि
एतत् एते एतानि इत्यादि

३] यद् पुँल्लिंग :
यः यौ ये
यम् यौ यान्

स्त्रीलिंग : या ये याः
याम् ये याः

नपुसंकलिंग : यत् ये यानि
यत् ये यानि (शेष पुँल्लिंग)

४) किम्
पुँल्लिंग : कः कौ के
कम् कौ कान्
स्त्रीलिंग : का के काः
काम् के काः
नपुसंक : किम् के कानि
किम् के कानि इत्यादि
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उपर्युक्त सर्वनामों का अभ्यास निम्नलिखित कुछ श्लोकों के माध्यम से कीजिए सन्धियाँ तोड़कर लिख रहा हूँ :

१)
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
सा अपि अन्यम् इच्छति जनं सः जनः अन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिद् अन्या
धिक् ताम् च तम् च मदनं च इमां च मां च ॥
(भर्तृहरि नीतिशतकम्)

२)
कः कालः कानि मित्राणि
कः देशः कौ व्ययागमौ।
कस्य अहं का च मे शक्तिः
इति चिन्त्यं मुहुः मुहुः॥ मुहुः मुहुः = बार बार

३) श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के ५७-५८, ६१, ६८ श्लोक देखें।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ : ३ (कारक और सम्बन्ध)

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नमः संस्कृताय मित्राणि ! अद्यत्वे शैत्यं निरन्तरं वर्द्धते, न वा ?
तो कल के पाठ में आपने यह जाना कि किसी भी वाक्य में क्रिया का होना अनिवार्य है और उस क्रिया के सम्पादन में जितने भी कारण होते हैं वे “कारक” कहे जाते हैं। एक श्लोक के माध्यम से छहों कारकों का नाम भी बताया था। आपको वह श्लोक अवश्य याद हो गया होगा। चलिए एक बार फिर याद दिला देते हैं-
“कर्त्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणम् इत्याहुः कारकाणि षट् ॥”

अब इन छह “कारकों” और “सम्बन्ध” के विषय में समझाते हैं। यह भी बताएँगे कि किस कारक के लिए किस विभक्ति का प्रयोग होता है। सम्बोधन को छोड़कर सात विभक्तियाँ होती हैं- यह तो आप जानते ही हैं।

1] कर्त्ता = जो क्रिया को करने में स्वतन्त्र होता है उसे कर्त्ता कहते हैं अर्थात् यह सीधा सीधा क्रिया को सम्पादित करता है। “जो करता है वही कर्त्ता।” जैसे- कृष्णः खेलति – इसमें “खेलना” क्रिया को कृष्ण कर रहा है, इसलिए “कृष्ण” “कर्त्ता कारक” हुआ। कल वाले उदाहरण में- “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में पेड़ से डण्डे से नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है।” इस वाक्य में “तोड़ना” क्रिया कौन कर रहा है ? उत्तर है- डोनाल्ड ट्रम्प, यही इस वाक्य में कर्त्ता है।

2] कर्म = जिस पदार्थ के लिए कोई क्रिया की जाती है वह पदार्थ ही उस क्रिया का कर्म होता है। जैसे – “डोनाल्ड ट्रम्प फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “फल” के लिए की जा रही है इसलिए फल “तोड़ना” क्रिया का “कर्म” हुआ।

3] करण = क्रिया की सिद्धि में जो चीज कर्त्ता की सबसे अधिक सहायक होती है वही “करण” है। “डोनाल्ड ट्रम्प डण्डे से फल तोड़ता है।” डोनाल्ड ट्रम्प कर्त्ता है और उसकी सबसे सहायक चीज है डण्डा, इसलिए “डण्डा” करण हुआ।

4] सम्प्रदान = जिसके लिए क्रिया की जाती है तथा जिसको कोई वस्तु दी जाती है उसे “सम्प्रदान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी के लिए फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया नरेन्द्र मोदी के लिए की जा रही है इसलिए नरेन्द्र मोदी “सम्प्रदान कारक” हुआ।

5] अपादान = किसी वस्तु के दूसरी वस्तु से अलग होने की क्रिया में जो वस्तु स्थिर रहती है उसे ही “अपादान” कहते हैं। “डोनाल्ड ट्रम्प पेड़ से फल तोड़ता है” – पेड़ से फल अलग हो रहा है किन्तु पेड़ स्थिर है, इसलिए स्थिर वस्तु “पेड़” “अपादान” हुआ।

6) *सम्बन्ध = इसे कारकों में नहीं गिना जाता क्योंकि क्रिया के सम्पादन में इसकी कोई भूमिका नहीं रहती। कल इसके विषय में बताया था, आपको याद होगा।

7] अधिकरण = क्रिया जिस स्थान पर सम्पन्न होती है उस स्थान को “अधिकरण” कारक कहा जाता है। “डोनाल्ड ट्रम्प बाग में फल तोड़ता है” इसमें “तोड़ना” क्रिया “बाग में” हो रही है इसलिए “बाग” “अधिकरण” कारक हआ।

सम्बन्ध को मिलाकर ये कुल सात चीजें हो गईं। विभक्तियाँ भी सात ही होती हैं। इन सातों के लिए अलग-अलग एक-एक विभक्ति निर्धारित कर दी गई है। देखिए-

1] कर्त्ता = प्रथमा विभक्ति
2] कर्म = द्वितीया ”
3] करण = तृतीया ”
4] सम्प्रदान = चतुर्थी ”
5] अपादान = पञ्चमी ”
6] सम्बन्ध = षष्ठी ”
7] अधिकरण = सप्तमी ”

*सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति ही होती है किन्तु शब्द के रूप में प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। जैसे – रामः = हे राम ! (विसर्ग लुप्त हो गये)।
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कल हमने आपको एक बहुत सुंदर श्लोक बताया था-

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मां पालय ॥

इसमें “राम” शब्द के एकवचन में सभी विभक्तियों का प्रयोग किया गया है । देखिए –

1] रामः राजमणिः सदा विजयते।
2] रामं रमेशं भजे।
3] रामेण अभिहता निशाचरचमू।
4] रामाय तस्मै नमः ।
5] रामात् नास्ति परायणं परतरम्।
6] रामस्य दासः अस्मि अहम्।
7] रामे चित्तलयः सदा भवतु मे ।
8] हे राम ! मां पालय ।

कल हम आपको वाक्य में कारक पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना बताएँगे। इससे आपको अभ्यास हो जाएगा। उपर्युक्त श्लोक का अर्थ भी बताएँगे। आप लोगों को कहीं कोई समस्या हो तो टिप्पणी करके निःसंकोच पूछिएगा। तब तक के लिए नमो नमः !!

॥शिवोऽवतु॥

संस्कृत साधना : पाठ २२ (तिङन्त-प्रकरण ७ :: लिङ् लकार (विधिलिङ्))

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नमः संस्कृताय !

लकारों के क्रम में अभी तक आपने लट् लेट् लुङ् लङ् और लिट् लकार के विषय में जाना। लकारों से सम्बन्धित जो श्लोक मैंने बताया था उसका आधा भाग आपने जान लिया- “लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।” साथ ही आपने भू धातु के रूपों का वाक्यों में अभ्यास भी किया। अब श्लोक का तृतीय चरण देखिए- “विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ” अर्थात् ‘विधि’ और ‘आशीर्वाद’ अर्थ में लिङ् लकार और लोट् लकार का प्रयोग होता है। तो आज आपको लिङ् लकार के विषय में बताते हैं। आगामी पाठों में लोट् और अन्य लकारों के विषय में क्रमशः बताएँगे। स्मृतिग्रन्थों में तथा अन्य विधिनिषेध का विधान करने वाले शास्त्रों में विधिलिङ् लकार के प्रचुर प्रयोग मिलते हैं।

१) सर्वप्रथम तो आप यह जान लीजिए कि इस लकार के दो भेद हैं- १. विधिलिङ् २. आशीर्लिङ् । आज केवल विधिलिङ् लकार की चर्चा करते हैं।

२) जिसके द्वारा किसी बात का विधान किया जाता है उसे विधि कहते हैं। जैसे – ‘स्वर्गकामः यजेत्’ स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे। यहाँ यज्ञ करने का विधान किया गया है अतः यज् (यजन करना) धातु में विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार यदि किसी चीज का निषेध करना हो तो वाक्य में निषेधार्थक शब्द का प्रयोग करके विधिलिङ् लकार का प्रयोग करना चाहिए, जैसे -” मांसं न भक्षेत् ” मांस नहीं खाना चाहिए/ न खाये।

मोटे तौर पर आप यह ध्यान में रखिए कि जहाँ “चाहिए” ऐसा बोला जा रहा हो , वहाँ इस लकार का प्रयोग होगा। हिन्दी में ‘करे’ और ‘करना चाहिए’ दोनों लगभग समान अर्थ वाले हैं।

३) जहाँ किसी बात की सम्भावना की जाए वहाँ भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है, जैसे – ” अद्य वर्षः भवेत् ” सम्भव है आज वर्षा हो।

४) योग्यता बतलाने के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग होता है। जैसे – “भवान् पारितोषिकं लभेत् ” – आप पुरस्कार पाने योग्य हैं।

५) आमन्त्रित, निमन्त्रित करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे -” भवान् अद्य मम गृहम् आगच्छेत्” आज आप मेरे घर आयें।

६) इच्छा, कामना करने के अर्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है, जैसे – “भवान् शीघ्रं स्वस्थः भवेत्” आप शीघ्र स्वस्थ हों।

७) आज्ञा के अर्थ में भी विधिलिङ् लकार का प्रयोग किया जाता है।

८) अच्छी प्रकार स्मरण रखिए कि “आशीर्वाद” के अर्थ में इस लकार का प्रयोग नहीं होता। आशीर्वाद के लिए आशीर्लिङ् और कभी कभी लोट् लकार का प्रयोग होता है।

भू धातु, विधिलिङ् लकार

भवेत् भवेताम् भवेयुः
भवेः भवेतम् भवेत्
भवेयम् भवेव भवेम
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शब्दकोश :
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जासूस, भेदिया, गुप्तचर के लिए संस्कृत शब्द –

१] यथार्हवर्णः
२] प्रणिधिः
३] अपसर्पः
४] चरः
५] स्पशः
६] चारः
७] गूढपुरुषः

*ये सभी शब्द पुँल्लिंग में ही होते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
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वह जासूस होवे। ( इच्छा )
= सः गूढपुरुषः भवेत् ।

वे दोनों जासूस सफल हों। (इच्छा)
= तौ यथार्हवर्णौ सफलौ भवेताम् ।

उन सारे गुप्तचरों को राष्ट्रभक्त होना चाहिए। (विधि)
= ते सर्वे स्पशाः राष्ट्रभक्ताः भवेयुः।

तुम्हें गुप्तचर के घर में होना चाहिए। (विधि)
= त्वं गूढपुरुषस्य गृहे भवेः।

तुम दोनों को भेदिया होना चाहिए। (सम्भावना)
= युवां स्पशौ भवेतम् ।

तुम सबको भेदियों से दूर रहना चाहिए।(विधि, आज्ञा)
= यूयं चारेभ्यः दूरं भवेत।

सोचता हूँ, मैं जासूस होऊँ। (इच्छा, सम्भावना)
= मन्ये अहं प्रणिधिः भवेयम्।

हम दोनों भेदियों के भी भेदिये होवें। (इच्छा)
= आवां चाराणाम् अपि चारौ भवेव ।

हम सब गुप्तचरों के प्रशंसक हों।(इच्छा, विधि)
= वयम् अपसर्पाणां प्रशंसकाः भवेम ।
_________________________________________

श्लोक :
====

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेत् युगपद् उत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासः तस्य महात्मनः॥
( श्रीमद्भगवद्गीता ११।१२ )

पुस्तक से देखकर सभी शब्दों का अर्थ अपनी कापी में लिखें और मनन करें ।

॥ शिवोऽवतु ॥

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संस्कृत साधना : पाठ ३० (तिङन्त-प्रकरण १५ :: लृट् लकार )

Sanskrut_30

नमः संस्कृताय!
आज लृट् लकार की बात करते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लकार है। सामान्य भविष्यत् काल के लिए लृट् लकार का प्रयोग किया जाता है। जहाँ भविष्यत् काल की कोई विशेषता न कही जाए वहाँ लृट् लकार ही होता है। कल, परसों आदि विशेषण न लगे हों। भले ही घटना दो पल बाद की हो अथवा वर्ष भर बाद की, बिना किसी विशेषण वाले भविष्यत् में लृट् का प्रयोग करना है। ‘आज होगा’ – इस प्रकार के वाक्यों में भी लृट् होगा।

भू धातु, लृट् लकार

भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति
भविष्यसि भविष्यथः भविष्यथ
भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः

आज मैं विद्यालय में होऊँगा।
= अद्य अहं विद्यालये भविष्यामि।

मैं विद्यालय में होऊँगा।
= अहं विद्यालये भविष्यामि।

कल मैं विद्यालय में होऊँगा।
= श्वः अहं विद्यालये भवितास्मि। (लुट् लकार)
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शब्दकोश :
=======

‘दिन’ के पर्यायवाची –
१] घस्रः ( पुँल्लिंग )
२] दिनम् (नपुंसकलिंग )
३] अहन् (अहः) (नपुंसकलिंग )
४] दिवसः/दिवसम् (पुँल्लिंग / नपुंसकलिंग )
५] वासरः/वासरम् ( पुँल्लिंग / नपुंसकलिंग )
६] भास्वरः (पुँल्लिंग )
७] दिवा (अव्यय)
८] अंशकम् (नपुंसकलिंग )
९] द्यु (नपुंसकलिंग )
१०] वारः (पुँल्लिंग )

सायम् – दिन का अन्तिम भाग (अव्यय )
प्राह्णः – प्रातःकाल (पुँल्लिंग )
मध्याह्नः – दोपहर ( पुँल्लिंग )
अपराह्णः – दिन का द्वितीय अर्द्धभाग (पुँल्लिंग )

रात्रि के आरम्भिक काल के नाम –
१ ] प्रदोषः (पुँल्लिंग )
२ ] रजनीमुखम् (नपुंसकलिंग )
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वाक्य अभ्यास :
===========

आज सन्ध्या को वह उद्यान में होगा।
= अद्य सायं सः उद्याने भविष्यति।

प्रातः वे दोनों मन्दिर में होंगे।
= प्राह्णे तौ मन्दिरे भविष्यतः।

दिन में वे कहाँ होंगे ?
= दिवसे ते कुत्र भविष्यन्ति ?

आज दोपहर तुम कहाँ होगे ?
= अद्य मध्याह्ने त्वं कुत्र भविष्यसि ?

आज दोपहर मैं विद्यालय में होऊँगा ।
= अद्य मध्याह्ने अहं विद्यालये भविष्यामि।

तुम दोनों सायंकाल कहाँ होगे ?
= युवां प्रदोषे कुत्र भविष्यथः ?

हम दोनो तो सन्ध्यावन्दन में होंगे।
= आवां तु सन्ध्यावन्दने भविष्यावः।

क्या तुम वहाँ नहीं होगे ?
= किं त्वं तत्र न भविष्यसि ?

हाँ, मैं भी होऊँगा।
= आम्, अहम् अपि भविष्यामि।

हम सब दिन में वहीं होंगे।
= वयं दिवा तत्र एव भविष्यामः।

तुम सब तो सायंकाल में अपने घर होगे।
= यूयं तु रजनीमुखे स्वगृहे भविष्यथ।

और हम अपने घर होंगे।
= वयं च स्वभवने भविष्यामः।

तो उत्सव कैसे होगा ?
= तर्हि उत्सवः कथं भविष्यति ?

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श्लोक :
====

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न ‘भविष्यामः’ सर्वे वयमतः परम् ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता २।१२)

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ १५ (तिङन्त-प्रकरण)

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नमः संस्कृताय !!
पिछले पाठों में आपने सर्वनाम के विषय में जाना। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सर्वनामों के रूपों का अभ्यास भी आपने किया। मुझे विश्वास है कि आप इस विषय को भलीभाँति समझ गये हैं। जिन सर्वनामों के रूप आपको बताये गये हैं उनका प्रयोग स्थान स्थान पर होता ही रहेगा। अब हम बहुत महत्त्वपूर्ण विषय में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ‘तिङन्त-प्रकरण’ की चर्चा करेंगे। संस्कृतभाषा में यदि आप तिङन्त, कारक और शब्दरूप- ये तीन बातें भली प्रकार जान गये तो समझिए कि संस्कृत के विशाल प्रासाद में प्रवेश कर गए। तब आपको कोई कठिनाई नहीं होगी।

१) पिछले पाठों में हमने आपको धातुओं के विषय में थोड़ा सा बताया था। आपने विस्मृत तो नहीं कर दिया ? चलिये पुनः बता देते हैं । क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द ‘धातु’ कहे जाते हैं, जैसे- भू , अस् , पठ् , पा इत्यादि। अब इन मूल शब्दों अर्थात् धातुओं से- भवति, अस्ति, पठति, पिबति इत्यादि रूप कैसे बन जाते हैं- यह बात आपके मस्तिष्क में कभी न कभी आयी ही होगी ! है कि नहीं ? तो इसका उत्तर है- ‘लकार’ । अब यह ‘लकार’ क्या है, यह बताते हैं-

२) लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में ‘ङ्’ है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।

३) इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे। इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, आप एक श्लोक स्मरण कर लीजिए-

लट् वर्तमाने लेट् वेदे
भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा।
विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ
लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥

अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों का प्रयोग किया जाता है।

आने वाले पाठों में हम प्रत्येक लकार के प्रयोगों के नियमों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही आपको आत्मनेपद – परस्मैपद, धातुओं के दस गणों, सेट् और अनिट् धातुओं के विषय में भी समझायेंगे। इस प्रकरण में आपको विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह तिङन्त-प्रकरण ही संस्कृत का प्राण है।
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शब्दकोश :
=======
‘स्त्री’ के पर्यायवाची शब्द-

१ योषित् २ अबला
३ योषा ४ नारी
५ सीमन्तिनी ६ वधूः
७ प्रतीपदर्शिनी ८ वामा
९ वनिता १० महिला
११ प्रिया १२ रामा
१३ जनिः १४ जनी
१५ योषिता १६ जोषित्
१७ जोषा १८ जोविता
१९ वनिका २० महेलिका
२१ महेला २२ शर्व्वरी
२३ सिन्दूरतिलका २४ सुभ्रूः (सुन्दर भौंह वाली)
२५ सुनयना २६ वामदृक्
२७ अङ्गना २८ ललना
२९ कान्ता ३० पुरन्ध्री
३१ वरवर्णिनी ३२ सुतनुः
३३ तन्वी ३४ तनुः
३५ कामिनी ३६ तन्वङ्गी
३७ रमणी ३८ कुरङ्गनयना
३९ भीरुः ४० भाविनी
४१ विलासिनी ४२ नितम्बिनी
४३ मत्तकासिनी ४४ सुनेत्रा
४५ प्रमदा ४६ सुन्दरी
४७ अञ्चितभ्रूः ४८ ललिता
४९ वासिता ५० भामिनी
५१ वरारोहा ५२ नताङ्गी
५३ त्रिनता ५४ वरा
५५ श्यामा ५६ चारुवदना

* सूक्ष्म अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त शब्दों में से कुछ शब्द जैसे – भीरुः, सुभ्रूः आदि शब्द विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।
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वाक्य अभ्यास :
===========

यह स्त्री बुद्धिमती है।
= एषा नारी बुद्धिमती अस्ति।

वे दो नारियाँ शिक्षका हैं।
= ते वनिते शिक्षिके स्तः।

वे नारियाँ मधुर गीत गाती हैं।
= ताः प्रमदाः मधुरं गीतं गायन्ति।

उस स्त्री से यह सुन्दर भौहों वाली स्त्री पूछती है..
= तां महिलाम् एषा सुभ्रूः पृच्छति…

कि वे स्त्रियाँ किस गीत को गाती हैं ?
= यत् ताः प्रमदाः कं गीतं गायन्ति ?

ये दो स्त्रियाँ उन दो स्त्रियों को फल देती हैं।
= एते प्रमदे ताभ्यां ललनाभ्यां फलानि यच्छतः।

एक स्त्री रोटी पकाती है और एक दाल पकाती है।
= एका जोषा रोटिकाः पचति एका च सूपं पचति।

दो स्त्रियाँ इन स्त्रियों से भोजन पकवाती हैं।
= द्वे अङ्गने एताभिः वनिताभिः भोजनं पाचयतः।

सभी स्त्रियाँ परस्पर बातें करती हैं।
= सर्वाः जोषिताः परस्परं वार्तालापं कुर्वन्ति।

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श्लोक :
====

यः प्रीणाति सुचरितैः पितरं स पुत्रः
यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रम् आपदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

जो अपने सुन्दर आचरणों से पिता को प्रसन्न करे वह पुत्र, जो पति के ही हित को चाहे वह पत्नी, जो सम्पत्ति और विपत्ति में समान व्यवहार करे वह मित्र, इन तीनों को संसार में बहुत पुण्य करने वाला व्यक्ति (ही) प्राप्त करता है।

॥ शिवोऽवतु ॥

संस्कृत साधना : पाठ ५ (क्रिया : अकर्मक और सकर्मक)

Sanskrut_५5

सुधी मित्रों ! नमः संस्कृताय !!
कल के पाठ में आपने वाक्य में कारकों को पहचान कर उनमें विभक्तियाँ लगाना सीखा। आशा करता हूँ कि आपने इसका अभ्यास भी अवश्य किया होगा। देखिए बिना अभ्यास के कोई भी विद्या कदापि नहीं आ सकती। सभी राजकुमारों को पढ़ाते तो आचार्य द्रोण ही थे, किन्तु अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ क्यों हुए ? क्योंकि उन्होंने अभ्यास की पराकाष्ठा कर दी थी। इसलिए ध्यान रहे- “अनभ्यासे विषं विद्या।”

आज क्रिया के विषय में समझाते हैं। ध्यान दीजिए, जब ‘क्रिया’ कहेंगे तब आप “धातु” न समझ बैठियेगा। कर्त्ता की चेष्टा या अस्तित्व (सत्ता) को ‘क्रिया’ कहते हैं और इन क्रियाओं का वर्णन करने वाले मूल शब्द धातु कहे जाते हैं। इनका उपदेश इन्द्र, वायु, काशकृत्स्न, भरद्वाज, पाणिनि, शाकटायन आदि महान् देवताओं और ऋषियों ने किया था। संस्कृतभाषा और संसार की लगभग सभी भाषाओं का मूल यही धातुएँ हैं। किन्तु अभी तो हम “क्रिया” पर चर्चा करेंगे।

१] क्रिया दो प्रकार की होती है- अकर्मक और सकर्मक।

क) अकर्मक क्रिया : जिस क्रिया का कर्म नहीं होता अथवा जिस क्रिया का फल कर्त्ता पर ही पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे – ‘अरविन्द सोता है’ यहाँ शयन की क्रिया हो रही है। उसका फल ‘अरविन्द’ पर ही आश्रित है। यह नहीं कह सकते कि क्या सोता है ? या किसे सोता है ? या किसको सोता है ? इस क्रिया का कर्म नहीं है अतः यह क्रिया अकर्मक है।

ख) सकर्मक क्रिया : जहाँ कर्त्ता की क्रिया का फल किसी अन्य पर पड़े उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस क्रिया का कोई न कोई कर्म हो, वह सकर्मक क्रिया है। जैसे – ‘तारासिंह अशरफ़ अली को पीटता है।’ यहाँ कर्त्ता तारासिंह की क्रिया का असर अशरफ़ अली पर पड़ रहा है, इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।

२] अकर्मक और सकर्मक क्रियाओं को पहचानने की सरल विधि यह है कि जहाँ वाक्य के उच्चारण करने पर ‘क्या’ ‘किसको’ का प्रश्न शेष न रहे वह अकर्मक क्रिया और जहाँ ये प्रश्न शेष रह जाएँ, वह सकर्मक क्रिया है। ‘मोहन जागता है’ ‘मोहन सोता है’ इस प्रकार के वाक्यों में ‘क्या’ जागता है या ‘किसको’ जागता है इत्यादि प्रश्न शेष नहीं रहते, अतः ‘सोना’ ‘जागना’ आदि क्रियाएँ अकर्मक हैं ।

कौन कौन सी क्रियाएँ अकर्मक होती हैं, यह कल बताएँगे।
_______________________________________

वाक्य अभ्यास
==========

वृक्षों पर पक्षी बैठते हैं।
वृक्ष अधिकरण, पक्षी कर्त्ता, ‘बैठते हैं’ क्रिया।
= वृक्षेषु खगाः उपविशन्ति।

तुम रमेश के उद्यान से फल लाते हो।
तुम कर्त्ता, रमेश सम्बन्ध, उद्यान अपादान, फल कर्म, ‘लाते हो’ क्रिया।
= त्वं रमेशस्य उद्यानात् फलानि आनयसि।

तुम दोनों पिताजी के रुपये भिखारी को देते हो।
‘तुम दोनों’ कर्ता, पिताजी सम्बन्ध, रुपये कर्म भिखारी सम्प्रदान, ‘देते हो’ क्रिया ।
= युवां पितुः रूप्यकाणि भिक्षुकाय यच्छथः।

मैं साइकिल से विश्वविद्यालय जाता हूँ।
मैं कर्त्ता, साइकिल करण, विश्वविद्यालय कर्म, ‘जाता हूँ’ क्रिया ।
= अहं द्विचक्रिकया विश्वविद्यालयं गच्छामि।

संग से काम उत्पन्न होता है।
संग अपादान, काम कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया ।
= सङ्गात् सञ्जायते कामः।

काम से क्रोध उत्पन्न होता है।
काम अपादान, क्रोध कर्त्ता, ‘उत्पन्न होता है’ क्रिया।
= कामात् क्रोधः अभिजायते।

क्रोध से मोह होता है ।
= क्रोधात् भवति सम्मोहः।

मोह से स्मृतिविभ्रम होता है।
= मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति।

स्मृतिनाश से बुद्धिनाश होता है।
= स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।

बुद्धिनाश से साधक नष्ट होता है ।
= बुद्धिनाशात् साधकः नश्यति।

_______________________________________

श्लोक :

वेशेन वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च।
वकारैः पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः॥

वेश (पहनावा), शरीर, वाणी, विद्या और विनय – इन पाँच वकारों से युक्त पुरुष पूजित (सम्मानित) होता है।

**उपर्युक्त श्लोक में विभिन्न शब्दों के तृतीया एकवचन के रूप हैं।

संस्कृत साधना : पाठ १३ (कारक-विभक्ति)

Sanskrut_13

नमः संस्कृताय मित्रों !
संस्कृतभाषा की वाक्यरचना हिन्दी से बहुत भिन्न है, यह बात आपको सदैव याद रखनी चाहिए। हिन्दी में अपादान कारक को छोड़कर शेष सभी कारकों में ‘को’ अथवा अन्य चिह्न भी देखने में आते हैं। किन्तु संस्कृत में उसका अनुवाद करते समय आपको यह बात ध्यान रखनी है कि क्रिया के सम्पादन में वह शब्द किस कारक की भूमिका में है। यदि इसका ध्यान रखेंगे तो भ्रमित नहीं होंगे। अगले पाठों में आपको कारक-विभक्ति के विषय में समझाया जाएगा जिससे आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि कब किस पदार्थ को कौन सा कारक माना जाएगा। अभी आप लिंग, वचन, पुरुष, विशेषण, सर्वनाम विशेषण और शब्दकोश पर ध्यान देते जाइये।

अभ्यास :
~~~~~~~

यद् ( जो ), तद् ( वह ) और किम् ( कौन ) के रूप तीनों लिंगों में याद कीजिए।

शब्दकोश :
~~~~~~~~

वनम् (वन) के पर्यायवाची शब्द –
1] अटवी ( स्त्रीलिंग )
2] अरण्यम् ( नपुसंकलिंग )
3] विपिनम् (नपुसंकलिंग )
4] गहनम् (नपुसंकलिंग )
5] काननम् (नपुसंकलिंग )
6] वनम् ( नपुसंकलिंग )

भारी वन के नाम –
1] महारण्यम् (नपुसंकलिंग )
2] अरण्यानी (स्त्रीलिंग)

_______________________________________

वाक्य अभ्यास :
===========

(निम्नलिखित वाक्यों में कुछ पशु-पक्षियों के नाम हैं उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िये ।)

जो भालू बैठा है वह किस वन में रहता है ?
= यः भल्लूकः आसीनः अस्ति सः कस्मिन् कानने निवसति ?

जिस वन में सिंह रहता है उसी वन में खरगोश भी रहता है।
= यस्मिन् अरण्ये सिंहः वसति तस्मिन् एव अरण्ये शशकः अपि वसति।

जिसका नाम पिंगलक है वह सिंह किस वन से आया है ?
= यस्य नाम पिङ्गलकः अस्ति सः कस्मात् विपिनात् आगतः अस्ति ?

जिस मोरनी का नाम चारुपर्णा है वह किस वन से आयी है ?
= यस्याः मयूर्याः नाम चारुपर्णा अस्ति सा कस्मात् अरण्यात् आगता अस्ति ?

जिस वन से वह कौआ आया है उसी वन से वह गौरैया भी आयी है।
= यस्मात् विपिनात् सः वायसः आगतः अस्ति तस्मात् एव विपिनात् सा चटका अपि आगता अस्ति।

जिन पंखों से हंस उड़ता है उन्हीं पंखों से बगुला भी उड़ता है।
= याभ्यां पक्षाभ्यां हंसः उड्डयति ताभ्याम् एव पक्षाभ्यां बकः अपि उड्डयति ।

वह ऊँट किस विधि से काँटे खाता है ?
= सः क्रमेलकः केन विधिना कण्टकानि खादति ?

जिस विधि से सिंह मांस खाता है उसी विधि से ऊँट काँटे खाता है।
= येन विधिना मृगेन्द्रः मांसं खादति तेन एव विधिना उष्ट्रः कण्टकानि खादति।

जो बन्दर लाल मुँह वाला है, वह किस वृक्ष पर चढ़ता है ?
= यः वानरः रक्तमुखः अस्ति सः कं वृक्षम् आरोहति ?

वे भयंकर सुअर जिनके दाँत टेढ़े हैं, किन महावनों में रहते हैं ?
= ते भयङ्कराः कोलाः येषां दन्ताः वक्राः सन्ति, केषु महारण्येषु वसन्ति ?

वे काले हिरन किन वनों से आये हैं ?
= ते कृष्णसाराः केभ्यः गहनेभ्यः आगताः सन्ति ?

वह नेता नहीं वह तो गिरगिट है जो सच्ची बात वाला नहीं है।
= सः नेता नैव स तु सरटः अस्ति यः सत्यवाक्यः नास्ति।
_______________________________________

श्लोक :

यः यः यां यां तनुं भक्तः
श्रद्धयाऽर्चितुम् इच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां
ताम् एव विदधाम्यहम्॥

(श्रीमद्भगवद्गीता 7.21)

पुस्तक में एक एक शब्द का अर्थ देखकर अपनी कापी में लिखें और मनन करें।

॥ शिवोऽवतु ॥

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