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संस्कृत गोवीथि : : गव्य ३६ (शंकराचार्य विशेष)

तत्ज्ञानं प्रशमकरं यदिन्द्रियाणां तत्ज्ञेयं यदुपनिषत्सुनिश्चितार्थम्। ते धन्या भुवि परमार्थनिश्चितेहाः शेषास्तु भ्रमनिलये परिभ्रमंतः ॥१॥ वह ज्ञान है जो इन्द्रियों की चंचलता को शांत कर दे, वह जानने योग्य है...