ChildDevelopment

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Child Planning and Season

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Your IQ, your risk of heart disease, and other health problems are influenced by how well your grandmother ate during the third trimester of her pregnancy with your mother. The effects of the prenatal environment can even be multigenerational. If you want data, study generations grown after The Dutch famine of 1944, Bengal famine 1940s.

Basically, there is strong legacy link between atmosphere (and so available food, water) at the time of spring (time of progeny planning) of grandparent generation.

So if you are pregnant this year (or next year) in India, where drought is predicted, you must take care of your food intake. It is not only critical for your placenta supply line economics but for health all upcoming generations.

In ancient India, predicting drought was possible so State/Nation/Kingdom used to store grains for at least 12 years. Grains grown during famine year and year after famine, was not considered as food due to low nutrient value. Instead grains from State storage was utilized.

Present generation is suffering from chronic diseases. Roots were sown when their grandparents were eating first lot of Green revolution in India. Advent of chemical farming is showing results now.

I know, our dumb govt under the influence of their western masters, won’t think in this direction. Better take individual actions. If you can get old grains, use it for pregnant mothers in family. Save future of India.

Preparation for Upanayan (उपनयन संस्कार) : Introduction to Rishi24 (ऋषि-२४)

Rishi

Gayatri

Last year when I visited local Ayyappa Temple with my son, we had vivid experience about how still some people still holding the dharma bastion in this chaotic times.

What an enchanting experience! I must say, down south, we have preserved the ritual sacredness much better than rest of Bharat in general. I could show little Kerala outside Kerala to my son

Ayappa

My son, listening to Ganesh Gayatri and Durga Gayatri, asked pertinent question. To answer him, I had to do home work.

His question: “Why are they chanting different version of ‘Prachodayat mantra(s) i.e. Gayatri mantras? Why do we chant Gayatri for different God? (આ જુદા જુદા પ્રચોદયાત મંત્ર કેમ બોલે છે? એવું કેમ? પ્રચોદયાત મંત્ર કેમ બોલવાનો?)”

🙂

So entire year, so far, I spent time researching on Maa Gayatri. My friends doing research on same also helped. Exactly after a year, we unveiled another layer of detail about Gayatri mantra and Gayatri chanda.

We visited Gayatri Shakti Peetha in our city. Little unknown and unexplored Sadhana Sthala in city. A place where 24 Rishis who had vision of individual syllable are established.

What I realized is that, this is how Maa Gayatri needs to be introduced to kids and prepare them for Upanayan. Unless and until they realize various tenets of life principles, they won’t realize the value of Gayatri mantra दीक्षा.

And we fail in this introduction, we compromise with kid’s potential. Don’t wait till Upanayan. Build enough stage and foundation for Upanayana.


From the book गायत्री का हर अक्षर शक्ति स्रोत

More here : http://literature.awgp.org/book/gayatri_ka_har_akhshar_shakti_strot/v1.1


गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं। इन्हें मिलाकर पढ़ने से ही इनका शब्दार्थ और भावार्थ समझ में आता है। पर शक्ति-साधना के सन्दर्भ में इनमें से प्रत्येक अक्षर का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व है। इन अक्षरों को परस्पर मिला देने से परम तेजस्वी सविता देवता से सद्बुद्धि को प्रेरित करने के लिए प्रार्थना की गई है और साधक को प्रेरणा दी गई है कि वह जीवन की सर्वोपरि सम्पदा ‘सद्बुद्धि’ का—ऋतम्भरा प्रज्ञा का महत्व समझें और अपने अन्तराल में दूर दर्शिता का अधिकाधिक समावेश करें। यह प्रसंग अति महत्वपूर्ण होते हुए भी रहस्यमय तथ्य यह है कि इस महामन्त्र का प्रत्येक अक्षर शिक्षकों और सिद्धियों से भरा पूरा है।

शिक्षा की दृष्टि से गायत्री मन्त्र के प्रत्येक अक्षर में प्रमुख सद्गुणों का उल्लेख किया गया है और बताया गया है कि उनको आत्मसात करने पर मनुष्य देवोपम विशेषताओं से भर जाता है। अपना कल्याण करता है और अन्य असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पार लगाता है। हाड़-मांस से बनी और मल-मूत्र से बनी काया में जो कुछ विशिष्टता दिखाई पड़ती है वह उससे समाहित सत्प्रवृत्तियों के ही हैं। जिसके गुण-कर्म स्वभाव में जितनी उत्कृष्टता है वह उसी अनुपात से महत्वपूर्ण बनता है और महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त करके जीवन सौभाग्य को हर दृष्टि से सार्थक बनाता है।

इन सद्गुणों की उपलब्धि को लोक शिक्षण सम्पर्क एवं वातावरण के प्रभाव में से भी बहुत कुछ प्रगति हो सकती है। किन्तु अध्यात्म-विज्ञान के अनुसार साधना उपक्रम द्वारा भी इन विभूतियों में से जिसकी कमी दिखती है, जिसके सम्वर्धन की आवश्यकता अनुभव होती है उसके लिए उपासनात्मक उपचार किये जा सकते हैं।

जिस प्रकार शरीर में कोई रासायनिक पदार्थ कम पड़ जाने से स्वास्थ्य लड़खड़ाने लगता है, उसी प्रकार उपरोक्त 24 सद्गुणों में से किसी में न्यूनता रहने पर उसी अनुपात से व्यक्तित्व त्रुटिपूर्ण रह जाता है। उस अभाव के कारण प्रगति-पथ पर बढ़ने में अवरोध खड़ा होता है। फलतः पिछड़ापन लदा रहने से उन उपलब्धियों का लाभ नहीं मिल पाता जिनके लिए मनुष्य-जीवन सुरदुर्लभ अवसर हस्तगत हुआ है। आहार के द्वारा एवं औषधि, उपचार से शरीर की रासायनिक आवश्यकता पूरी हो जाती है तो फिर स्वस्थता का आनन्द मिलने लगता है। इसी प्रकार गायत्री उपासना के विशिष्ट उपचारों से सत्प्रवृत्तियों की कमी पूरी की जा सकती है। उस अभाव को पूरा करने पर स्वभावतः प्रखरता एवं प्रतिभा बढ़ती है। उसके सहारे मनुष्य अधिक पुरुषार्थ करता है—अधिक दूर दर्शिता का परिचय देता है, शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता बढ़ने से अभीष्ट प्रयोजन पूरा करने में सरलता रहने और सफलता मिलने लगती है। सत्प्रवृत्तियों की इसी परिणित को सिद्धियां कहते हैं।

गायत्री के 24 अक्षर :—

1-तत, 2-स, 3-वि, 4-तु, 5-र्व, 6-रे, 7-णि, 8-यं, 9-भ, 10-र्गो, 11-दे, 12-व, 13-स्य, 14-धी, 15-म, 16-हि, 17-धि, 18-यो, 19-यो, 20-नः, 21-प्र, 22-चो, 23-द, 24-यात् 24 अक्षरों से सम्बन्धित 24 कलाएं :—

(1) तापिनी (2) सफला (3) विश्वा (4) तुष्टा (5) वरदा (6) रेवती (7) शूक्ष्मा (8) ज्ञाना (9) भर्गा (10) गोमती (11) दर्विका (12) थरा (13) सिंहिका (14) ध्येया (15) मर्यादा (16) स्फुरा (17) बुद्धि (18) योगमाया (19) योगात्तरा (20) धरित्री (21) प्रभवा (22) कुला (23) दृष्या (24) ब्राह्मी 24 अक्षरों से सम्बन्धित 24 मातृकाएं :— (1) चन्द्रकेश्चवरी (2)अजतवला (3) दुरितारि (4) कालिका (5) महाकाली (6) श्यामा (7) शान्ता (8) ज्वाला (9) तारिका (10) अशोका (11) श्रीवत्सा (12) चण्डी (13) विजया (14) अंकुशा (15) पन्नगा (16) निर्वाक्षी (17) वेला (18) धारिणी (19) प्रिया (20) नरदता (21) गन्धारी (22) अम्बिका (23) पद्मावती (24) सिद्धायिका सामान्य दृष्टि से कलाएं और मातृकाएं अलग अलग प्रतीत होती हैं। किन्तु तात्विक दृष्ट से देखने पर उन दोनों का अन्तर समाप्त हो जाता है। उन्हें श्रेष्ठता की सामर्थ्य कह सकते हैं, और उनके नामों के अनुरूप उनके द्वारा उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों का अनुमान लगा सकते हैं।

समग्र गायत्री को सर्व विघ्न विनासिनी—सर्व सिद्धि प्रदायनी कहा गया है। संकटों का सम्वरण और सौभाग्य संवर्धन के लिए उसका आश्रय लेना सदा सुखद परिणाम ही उत्पन्न करता है। तो भी विशेष प्रयोजनों के लिए उसके 24 अक्षरों में प्रथक प्रथक प्रकार की विशेषताएं भरी हैं। किसी विशेष प्रयोजन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए उसकी विशेष शक्ति धारा का भी आश्रय लिया जा सकता है। चौबीस अक्षरों की अपने विशेषताएं और प्रतिक्रियाएं हैं—जिन्हें सिद्धियां भी कहा जा सकता है—इस प्रकार बताई गई हैं—

(1) आरोग्य (2) आयुष्य (3) तुष्टि (4) पुष्टि (5) शान्ति (6) वैभव (7) ऐश्वर्य (8) कीर्ति (9) अनुग्रह (10) श्रेय (11) सौभाग्य (12) ओजस् (13) तेजस् (14) गृहलक्ष्मी (15) सुसंतति। (16) विजय (17) विद्या (18) बुद्धि (19) प्रतिभा (20) ऋद्धि (21) सिद्धि (22) संगति (23) स्वर्ग (24) मुक्ति।

गायत्री के समग्र विनियोग में सविता देवता, विश्वामित्र ऋषि एवं गायत्री छन्द का उल्लेख किया गया है, परन्तु उसके वर्गीकरण में प्रत्येक अक्षर एक स्वतंत्र शक्ति बन जाता है ।। हर अक्षर अपने आप में एक मंत्र है ।। ऐसी दशा में २४ देवता, २४ ऋषि एवं २४ छन्दों का उल्लेख होना भी आवश्यक है ।। तत्त्वदर्शियों ने वैसा किया भी है ।। गायत्री विज्ञान की गहराई में उतरने पर इन विभेदों का स्पष्टीकरण होता है ।। नारंगी ऊपर से एक दीखती है, पर छिलका उतारने पर उसके खण्ड घटक स्वतंत्र इकाइयों के रूप में भी दृष्टिगोचर होते हैं ।। गायत्री को नारंगी की उपमा दी जाय तो उसके अन्तराल में चौबीस अक्षरों के रूप में २४ खण्ड घटकों के दर्शन होते हैं ।। जो विनियोग एक समय गायत्री मंत्र का होता है, वैसा ही प्रत्येक अक्षर का भी आवश्यक होता है ।। चौबीस अक्षरों के लिए चौबीस विनियोग बनने पर उनके २४ देवता २४ ऋषि एवं २४ छन्द भी बन जाते हैं ।।

ऋषियों और देवताओं का परस्पर समन्वय है ।। ऋषियों की साधना से विष्णु की तरह सुप्तावस्था में पड़ी रहने वाली देवसत्ता को जाग्रत होने का अवसर मिलता है ।। देवताओं के अनुग्रह से ऋषियों को उच्चस्तरीय वरदान मिलते हैं ।। वे सामर्थ्यवान बनते हैं और स्व पर कल्याण की महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं ।।

ऋषि सद्गुण हैं और देवता उनके प्रतिफल ।। ऋषि को जड़ और देवता को वृक्ष कहा जा सकता है ।। ऋषित्व और देवत्व के संयुक्त का परिणाम फल- सम्पदा के रूप में सामने आता है ।। ऋषि लाखों हुए हैं और देवता तो करोड़ों तक बताये जाते हैं ।। ऋषि पृथ्वी पर और देवता स्वर्ग में रहने वाले माने जाते हैं ।। स्थूल दृष्टि से दोनों के बीच ऐसा कोई तारतम्य नहीं है, जिससे उनकी संख्या समान ही रहे ।। उस असमंजस का निराकरण गायत्री के २४ अक्षरों से सम्बद्ध ऋषि एवं देवताओं से होता है ।। हर सद्गुण का विशिष्ट परिणाम होना समझ में आने योग्य बात है ।। यों प्रत्येक सद्गुण परिस्थिति के अनुसार अनेकानेक सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकता है, फिर भी यह मान कर ही चलना होगा कि प्रत्येक सत्प्रवृत्ति की अपनी विशिष्ट स्थिति होती है और उसी के अनुरूप अतिरिक्त प्रतिक्रिया भी होती है ।। ऋषि रूपी पुरुषार्थ से देवता रूपी वरदान संयुक्त रूप से जुड़े रहने की बात हर दृष्टि से समझी जाने योग्य है ।।
मूर्धन्य ऋषियों की गणना २४ है ।। इसका उल्लेख गायत्री तंत्र में इस प्रकार मिलता है-

वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठः शुक्रः कण्वः पराशरः ।।
विश्वामित्रो महातेजाः कपिलः शौनको महान्॥ १३॥
याज्ञवल्क्या भरद्वाजो जमदग्निस्तपोनिधिः ।।
गौतमो मुद्गलश्चैव वेदव्यासश्च लोमशः॥ १४॥
अगस्त्यः कौशिको वत्सः पुलस्त्यो मांडुकस्तथा ।।
दुर्वासास्तपसां श्रेष्ठो नारदः कश्यपस्तथा॥ १५॥
इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानां क्रमशोमुने ।।

अर्थात्- गायत्री के २४ अक्षरों के द्रष्टा २४ ऋषि यह है-
(१) वामदेव
(२) अत्रि
(३) वशिष्ठ
(४) शुक्र
(५) कण्व
(६) पाराशर
(७) विश्वामित्र
(८) कपिल
(९) शौनक
(१०) याज्ञवल्क्य
(११) भारद्वाज
(१२) जमदग्नि
(१३) गौतम
(१४) मुद्गल
(१५) वेदव्यास
(१६) लोमश
(१७) अगस्त्य
(१८) कौशिक
(१९) वत्स
(२०) पुलस्त्य
(२१) माण्डूक
(२२) दुर्वासा
(२३) नारद
(२४) कश्यप ।।
— गायत्री तंत्र प्रथम पटल

इन २४ ऋषियों को सामान्य जन- जीवन में जिन सत्प्रवृत्तियों के रूप में जाना जा सकता है, वे यह हैं- (१) प्रज्ञा (२) सृजन (३) व्यवस्था (४) नियंत्रण (५) सद्ज्ञान (६) उदारता (७) आत्मीयता (८) आस्तिकता (९) श्रद्धा (१०) शुचिता (११) संतोष (१२) सहृदयता (१३) सत्य (१४) पराक्रम (१५) सरसता (१६) स्वावलम्बन (१७) साहस (१८) ऐक्य (१९) संयम (२०) सहकारिता (२१) श्रमशीलता (२२) सादगी (२३) शील (२४) समन्वय ।। प्रत्यक्ष ऋषि यही २४ हैं ।।

Parenting barometer: Are you ecologically sensitive parent?

ecologically

Parenting barometer

ZERO Score: When your kid spend more time in front of screens (Mobile/Tablet/TV/Laptop) than in front of green.

ZERO Score: When your kid knows Chota Bheem more than a street dog’s daily fun tricks.

ZERO Score: When your kid demand biscuit and chocolate and packaged wafers more often than food prepared by mother or grand mother.

So, how many zeroes did you get? 🙂 Get well soon. There is never late in changing bad practices.

All living organisms except humans play their critical role in ecology. It is just we who act as arrogantly moronic consumers who knows only how to consume and never ever play active role as part of ecology.

What do we deserve? A kick on the ass and face in the mud? Well, we deserve worse than a kick and a spoiled face.

Do you grow your kids as ecologically sensitive citizens or help them become partners in crime? Does your kid bow to the mother earth daily with highest reverence? Does your kid feed Gau and other animals before taking meal? Does your kid plant a tree every year?

Well, they don’t do all of this because parents are arrogant and selfish humans who never act as part of ecology. Unfortunate kids who grow in artificial toxic selfish urban homes under the patronage of selfish helpless ignorant parents.

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