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ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति | आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छ्ते ॥ (अथर्व० ११-५-१७)

अर्थात ब्रह्मचर्य के तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करने में समर्थ होता है। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही आचार्य शिष्यों के शिक्षण की योग्यता को अपने भीतर सम्पादित करता है।

Winning battle against senses is root cause of successful leader.राज्य का मूल इन्द्रियजय है ।

Leader and Teacher – They are what they are (Mediocre or Vibrant of varied degree) due to one essential trait i.e. ब्रह्मचर्येण.

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