SHARE

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता | यजु.

राष्ट्र को बुराइयों से बचाये रखने का उत्तरदायित्व पुरोहितों का है।
———————–
तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्य सामगा | ऋग् १०/१०७/६

निरन्तर ज्ञान दान करते रहना ब्राह्मण की पवित्र जिम्मेदारी है।

Often, there is a myth propagated that this land never had राष्ट्र भावना.

Yes, राष्ट्र is not modern Nation-state. But it does display the inherent cultural common thread keeping Sanatani(s) together. Maratha, Rajput, Punjabi, Tamil – all together, for dharma.

Purohit

राष्ट्र के पुरोहित=नायक में किन भावों का समावेश हो, यह संक्षेप से इन मन्त्रों में अंकित है | पुरोहित में सब प्रकार का बल होना चाहिए क्या ब्राह्मबल और क्या क्षात्रबल | वैदिक पुरोहित की गम्भीर घोषणा सचमुच सबके मनन करने योग्य है संशितं म इदं ब्रह्म = मेरा यह ब्राह्मबल सुतीक्ष्ण है; केवल ब्राह्मबल ही नहीं,प्रत्युत संशितं वीर्यं बलम् = वारक सामर्थ्य और रक्षण शक्ति भी तेज है | दूसरों से आक्रान्त होने पर दूसरों पर आक्रमण करके उनको भगा देने का नाम वीर्य्य और दूसरों से आक्रान्त होने पर अपनी रक्षा कर सकने को बल कहते हैं | क्षात्रबल के ये दो प्रधान अंग हैं | पूरी शान्ति वहीं होती है – यत्र ब्रह्मं च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह (य. 20|25) = जहाँ ब्राह्मबल और क्षात्रसामर्थ्य समान गतिवाले होकर एक साथ विचरते हैं | क्षत्रिय में केवल क्षात्रबल है किन्तु ब्राह्मण में ब्राह्मण तथा क्षात्रबल दोनों हैं | यही ब्राह्मण का उत्कर्ष है | क्षात्रबलविहीन ब्राह्मण सचमुच हीन है, वह पूर्ण ब्राह्मण नहीं है | जिस राष्ट्र का नेता वेदानुकूल होगा, सचमुच उसका क्षात्रतेज अजर=अक्षीण=अहीन ही रहेगा |

राष्त्र को संगठित रखना, तथा राष्ट्र के ओज वीर्य्य आदि की रक्षा करना पुरोहित का काम है –

समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं बलम् मैं इनके राष्ट्र को तथा ओज, बल, वीर्य्य को एक सूत्र में पिरो के रखता हूँ | नेता को चाहिए कि समूचे राष्ट्र के सामने एक महान उद्देष्य रखे | इससे राष्ट्र में एकता बनी रहती है | इस एकता के रहने से ही पुरोहित कह सकेगा एषां राष्ट्रं सुवीरं वर्धयामि (अ. 3|18|5) मैं इनके राष्ट्र को सुवीर बनाकर बढ़ाता हूँ |

जिस प्रकार के शिक्षक होंगे, वैसे ही शिष्य होंगे | यदि शिक्षक हीनवीर्य्य, हतोत्साह होंगे तो राष्ट्र में उत्साह-बलादि का अभाव रहेगा | वैदिक पुरोहित तो कहता है ‍

तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत |
इन्द्रस्य वज्रात् तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः || अ.3|19|4

उनके हथियार कुठार से तीक्ष्णतर और आग से भी अधिक तीक्ष्ण हैं, इन्द्र के वज्र=बिजली से भी तेज हैं जिनका मैं पुरोहित हूँ | उग्र पुरोहित के शिष्य सभी प्रकार से उग्र होंगे, अतः राष्ट्र की उन्नति चाहने वालों को उग्र पुरोहित उत्पन्न करने चाहिए |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती

LEAVE A REPLY